पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान हयग्रीव (भगवान विष्णु का अवतार) आरती
16 पाठ

श्री हयग्रीव भगवान की आरती: ॐ जय हयग्रीव देवा, स्वामी जय हयग्रीव देवा - संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं ज्ञान प्राप्ति की विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री हयग्रीव भगवान की आरती: ॐ जय हयग्रीव देवा, स्वामी जय हयग्रीव देवा - संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं ज्ञान प्राप्ति की विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान हयग्रीव, भगवान विष्णु का वह दिव्य अवतार हैं जो ज्ञान, विद्या और बुद्धि के अधिष्ठाता माने जाते हैं। 'हय' का अर्थ है अश्व (घोड़ा) और 'ग्रीव' का अर्थ है गर्दन, अर्थात जिनका मुख अश्व के समान है। वे वेदों के उद्धारक और समस्त विद्याओं के स्रोत हैं। उनकी आरती करना न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि एकाग्रता और स्मरण शक्ति में भी अद्भुत वृद्धि करता है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय हयग्रीव देवा, स्वामी जय हयग्रीव देवा।
ब्रह्मा-विष्णु-महेश, वंदना करें देवा॥ ॐ जय...॥

वेद-पुराणों के तुम, स्वामी हो ज्ञानी।
मधु-कैटभ को मार, वेद किए दानी॥ ॐ जय...॥

श्वेत वर्ण अति सुंदर, मुख अश्व का सोहे।
भक्तों के मन मोहें, दुष्टों को रोहें॥ ॐ जय...॥

शंख, चक्र, गदा, पद्म, धारे कर भारी।
ज्ञान-ज्योति से हरते, अज्ञान अंधियारी॥ ॐ जय...॥

विद्या के तुम सागर, बुद्धि के तुम दाता।
संकट मोचन स्वामी, तुम ही भाग्य विधाता॥ ॐ जय...॥

जो कोई गावे आरती, श्रद्धा मन लावे।
हयग्रीव की कृपा से, सब सुख पावे॥ ॐ जय...॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

आरती की प्रथम पंक्ति 'ॐ जय हयग्रीव देवा' में हम भगवान के जयकारे लगाते हुए उन्हें समस्त ब्रह्मांड का स्वामी स्वीकार करते हैं। 'ब्रह्मा-विष्णु-महेश, वंदना करें देवा' का अर्थ है कि स्वयं त्रिदेव भी हयग्रीव के ज्ञान के समक्ष नतमस्तक हैं। 'वेद-पुराणों के तुम स्वामी' पंक्ति यह दर्शाती है कि समस्त शास्त्रों का ज्ञान उन्हीं से उद्भूत है। मधु और कैटभ नामक असुरों से वेदों की रक्षा करके उन्होंने सृष्टि के ज्ञान को पुनर्जीवित किया। 'श्वेत वर्ण' उनकी सात्विकता का प्रतीक है, जो शुद्ध बुद्धि का प्रतिनिधित्व करता है। 'शंख, चक्र, गदा, पद्म' उनके विष्णु स्वरूप को स्पष्ट करते हैं, जो धर्म की रक्षा और अज्ञान के विनाश का प्रतीक है। अंत में, भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वे अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर जीवन में विद्या का प्रकाश भरें।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब मधु और कैटभ नामक असुरों ने वेदों को चुराकर रसातल में छिपा दिया था, तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण कर उनका वध किया और वेदों को पुनः ब्रह्मा जी को सौंपा। यह अवतार ज्ञान की विजय का प्रतीक है। छात्रों, शोधकर्ताओं और आध्यात्मिक साधकों के लिए हयग्रीव की उपासना अनिवार्य मानी गई है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

आरती के समय सर्वप्रथम भगवान की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं। तत्पश्चात उन्हें पीले वस्त्र और चंदन अर्पित करें। धूप, दीप और नैवेद्य (विशेषकर गुड़-चने का भोग) अर्पित करें। आरती करते समय मन को शांत रखें और दीपक को गोलाकार घुमाते हुए भगवान के चरणों से मुख तक ले जाएं।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

आरती के लिए एक पीतल की थाली, शुद्ध घी का दीपक, कपूर, धूपबत्ती, ताजे पुष्प, अक्षत (बिना टूटे चावल), और घंटी का होना आवश्यक है। शंख की ध्वनि से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

राग, ताल एवं गायन समय

हयग्रीव आरती को राग कल्याण या यमन में गाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसका गायन समय ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) या संध्या काल में सर्वोत्तम होता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित हयग्रीव आरती करने से स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है, परीक्षा में सफलता मिलती है और वाणी में ओज आता है। यह नकारात्मक विचारों को दूर कर मन को एकाग्र करने में सहायक है।

१. श्री हयग्रीव भगवान की आरती: ॐ जय हयग्रीव देवा, स्वामी जय हयग्रीव देवा - संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं ज्ञान प्राप्ति की विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान हयग्रीव (भगवान विष्णु का अवतार) के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री भगवान हयग्रीव (भगवान विष्णु का अवतार) जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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