॥ श्री हयग्रीव भगवान की आरती - ॐ जय हयग्रीव देवा, स्वामी जय हयग्रीव देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म और पौराणिक ग्रंथों में भगवान श्री हयग्रीव को विद्या, ज्ञान, बुद्धि, कला और वेदों के अधिष्ठाता देवता के रूप में पूजा जाता है। भगवान विष्णु का यह विशिष्ट अश्वारूढ़ (घोड़े के मुख वाले) अवतार अज्ञान के अंधकार को दूर करके जीवों को मोक्ष और पराविद्या की प्राप्ति कराता है। जब मधुकैटभ जैसे महाअसुर वेदों को चुराकर रसातल में ले गए थे, तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण करके ही वेदों की रक्षा की थी और ब्रह्माजी को पुनः संपूर्ण सृष्टि के सृजन का ज्ञान प्रदान किया था। ऐसे महान ज्ञान के सागर, परम आराध्य श्री हयग्रीव भगवान की आरती करना और उनके चरणों में ध्यान लगाना साधक के जीवन के सभी प्रकार के अज्ञान, जड़ता, मूढ़ता और मानसिक विकारों को समूल नष्ट कर देता है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम आपके लिए लाए हैं श्री हयग्रीव भगवान की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गहन भावार्थ, विधि-विधान और इसके अनन्त आध्यात्मिक लाभ।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय हयग्रीव देवा, स्वामी जय हयग्रीव देवा।
विद्या के आगर तुम, भक्तों के सेवा॥ ॐ जय...॥
अश्वमुख धारी हरि, वेदों के उर धारी।
मधु कैटभ हन्ता तुम, त्रिभुवन के भय हारी॥ ॐ जय...॥
श्वेतवर्ण तनु शोभे, मस्तक मणि राजै।
चतुर्भुज रूप धारी, शंख चक्र साजै॥ ॐ जय...॥
ब्रह्मा को ज्ञान दिया, संकट सब टाला।
गले में वैजयंती, सुंदर वनमाला॥ ॐ जय...॥
विद्या के तुम दाता, बुद्धि के प्रदाता।
भक्तन के प्रतिपालक, संतन सुखदाता॥ ॐ जय...॥
जो जन तेरी आरती, प्रेम सहित गावे।
विद्या बुद्धि विवेक, सो नर सब पावे॥ ॐ जय...॥
कष्ट मिटे सब तन के, पाप कटे मन के।
चरण शरण जो आये, प्राण बचे तन के॥ ॐ जय...॥
ॐ जय हयग्रीव देवा, स्वामी जय हयग्रीव देवा।
आरती जो जन गावे, पावे पद मेवा॥ ॐ जय...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री हयग्रीव भगवान की यह आरती अत्यंत सरल, मधुर और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। इस आरती की हर एक पंक्ति में भगवान के स्वरूप और उनके गुणों का गुणगान किया गया है:
प्रथम पद: 'ॐ जय हयग्रीव देवा, स्वामी जय हयग्रीव देवा। विद्या के आगर तुम, भक्तों के सेवा॥'
अर्थ: हे हयग्रीव देव! आपकी जय हो, हे स्वामी आपकी जय हो। आप समस्त प्रकार की विद्याओं के भंडार (आगर) हैं और अपने भक्तों की सच्ची सेवा व रक्षा करने वाले हैं।
द्वितीय पद: 'अश्वमुख धारी हरि, वेदों के उर धारी। मधु कैटभ हन्ता तुम, त्रिभुवन के भय हारी॥'
अर्थ: हे श्री हरि! आपने घोड़े (अश्व) का मुख धारण किया है और वेदों को अपने हृदय में धारण कर उनकी रक्षा की है। आपने महापराक्रमी असुर मधु और कैटभ का वध किया है तथा तीनों लोकों (त्रिभुवन) के समस्त भयों को हरने वाले हैं।
तृतीय पद: 'श्वेतवर्ण तनु शोभे, मस्तक मणि राजै। चतुर्भुज रूप धारी, शंख चक्र साजै॥'
अर्थ: आपका शरीर श्वेत (सफेद) वर्ण का है जो अत्यधिक शोभायमान है, मस्तक पर दिव्य मणि सुशोभित हो रही है। आपने चतुर्भुज रूप धारण किया है, जिनके हाथों में शंख और चक्र अत्यंत सुशोभित होते हैं।
चतुर्थ पद: 'ब्रह्मा को ज्ञान दिया, संकट सब टाला। गले में वैजयंती, सुंदर वनमाला॥'
अर्थ: आपने संकट के समय भगवान ब्रह्मा को वेदों का दिव्य ज्ञान पुनः प्रदान किया और उनके सभी संकटों को टाला। आपके गले में वैजयंती माला और सुंदर फूलों की वनमाला सुशोभित है।
पंचम पद: 'विद्या के तुम दाता, बुद्धि के प्रदाता। भक्तन के प्रतिपालक, संतन सुखदाता॥'
अर्थ: हे प्रभु! आप ही विद्या और ज्ञान के वास्तविक दाता हैं, आप ही बुद्धि प्रदान करने वाले हैं। आप अपने भक्तों का पालन-पोषण करने वाले और संतों को सुख प्रदान करने वाले हैं।
षष्ठम पद: 'जो जन तेरी आरती, प्रेम सहित गावे। विद्या बुद्धि विवेक, सो नर सब पावे॥'
अर्थ: जो भी मनुष्य सच्ची श्रद्धा और प्रेम के साथ आपकी इस आरती का गान करता है, वह जीवन में विद्या, बुद्धि और विवेक—इन तीनों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में हयग्रीव अवतार को वेदों और विद्या का मूल स्रोत माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार सृष्टि के आरंभ में जब दैत्य मधुकैटभ वेदों को चुराकर समुद्र के नीचे ले गए थे, तब संपूर्ण ब्रह्मांड में अज्ञान और अंधकार छा गया था। तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप (घोड़े का मुख और मनुष्य का शरीर) धारण कर रसातल में प्रवेश किया और असुरों का वध करके वेदों को पुनः प्राप्त किया। उन्होंने ब्रह्माजी को वेदों का पाठ पढ़ाया, जिससे सृष्टि की रचना आगे बढ़ सकी।
यही कारण है कि छात्र, शिक्षक, शोधकर्ता, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक साधक हयग्रीव भगवान की उपासना विशेष रूप से करते हैं। परीक्षा में सफलता, एकाग्रता, वाणी की सिद्धि और प्रज्ञा (स्मरण शक्ति) की प्राप्ति के लिए हयग्रीव स्तोत्र और आरती का पाठ अचूक माना जाता है। जो विद्यार्थी नियमित रूप से हयग्रीव भगवान की आरती गाते हैं, उनकी बुद्धि तीव्र होती है और वाणी में माँ सरस्वती का वास होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान श्री हयग्रीव की आरती और पूजन विधि अत्यंत सरल है, परंतु इसे पूर्ण नियम और निष्ठा के साथ किया जाना चाहिए:
- प्रातःकाल स्नान: साधक को प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नान कर स्वच्छ, श्वेत या पीले वस्त्र धारण करने चाहिए।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। चौकी पर हयग्रीव भगवान की तस्वीर या विग्रह स्थापित करें।
- षोडशोपचार पूजन: भगवान को रो अक्षत, चंदन, श्वेत पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (विशेषकर शर्करा युक्त चावल या मिश्री) अर्पित करें।
- आरती गान: घी का दीपक और कपूर प्रज्वलित करके दोनों हाथों से थाल थामकर प्रेम और भावपूर्ण स्वर में 'ॐ जय हयग्रीव देवा' आरती गाएं।
- परिक्रमा और क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात भगवान की तीन बार परिक्रमा करें, शंख और घंटी बजाएं, तथा अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगते हुए विद्या और बुद्धि का वरदान मांगें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
पूजा की पूर्णता के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना आवश्यक है:
- तांबे, पीतल या चांदी की साफ थाली
- शुद्ध गाय के घी का दीपक (या कपूर की आरती)
- रोटी, कुमकुम, अक्षत (अतूट चावल) और चंदन
- ताजे श्वेत या पीले पुष्प और सुंदर माला
- धूपबत्ती और अगरबत्ती
- नैवेद्य के लिए फल, मिश्री या पंचामृत
- पूजा के दौरान बजाने के लिए पवित्र शंख और घंटी (Ghanta)
राग, ताल एवं गायन समय
श्री हयग्रीव भगवान की आरती को शांत, गंभीर और सात्विक स्वरों में गाया जाना चाहिए।
- निर्धारित राग: इसे 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है, जो मन को एकाग्र करता है।
- ताल: कहवा या दादरा ताल (चौबीस मात्रा या आठ मात्रा के मानक बोल) पर इस आरती का लयबद्ध गान किया जा सकता है।
- गायन समय: इस आरती को करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (सूर्योत्थान के समय) या अध्ययन/विद्या आरंभ करने से पूर्व का होता है। इसके अलावा प्रदोष काल में भी संध्या आरती करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री हयग्रीव भगवान की आरती करने वाले साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक एकाग्रता और स्मरण शक्ति: विद्यार्थियों और बौद्धिक कार्यों से जुड़े लोगों की स्मरण शक्ति तीव्र होती है।
- अज्ञान का नाश: मन के सभी प्रकार के संशय, भ्रम, आलस्य और मूढ़ता का शमन होता है।
- वाक् सिद्धि: वक्ता, शिक्षक, लेखक और कवियों की वाणी में ओज, प्रभाव और सत्यता की वृद्धि होती है।
- नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति: घर का वातावरण सात्विक, पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहता है।
- मोक्ष और ज्ञान प्राप्ति: अंततः साधक को संसार के बंधनों से मुक्ति और पराविद्या का बोध होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
श्री हयग्रीव भगवान कौन हैं और उनका स्वरूप क्या है?
भगवान हयग्रीव भगवान विष्णु के एक प्रमुख अवतार हैं, जिनका मुख घोड़े का और शरीर मनुष्य का है। वे वेदों, विद्या, और ज्ञान के अधिष्ठाता देवता हैं।
हयग्रीव भगवान की आरती किस दिन करना सबसे उत्तम होता है?
हयग्रीव भगवान की आरती प्रतिदिन सुबह करना श्रेष्ठ है। इसके अलावा गुरुवार, एकादशी तिथि और हयग्रीव जयंती (श्रावण पूर्णिमा) के दिन इनकी विशेष पूजा व आरती का विधान है।
क्या विद्यार्थी इस आरती का पाठ कर सकते हैं?
हाँ, विद्यार्थियों के लिए हयग्रीव भगवान की पूजा और आरती करना अत्यंत फलदायी है। इससे पढ़ाई में मन लगता है और बौद्धिक क्षमता बढ़ती है।
आरती करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
आरती हमेशा पवित्र मन, शुद्ध शरीर और पूर्ण श्रद्धा के साथ करनी चाहिए। दीपक प्रज्वलित करते समय मंत्रोच्चार और घंटी-शंख का उचित ध्वनि के साथ प्रयोग करना चाहिए।