पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान हरिहर (विष्णु और शिव) आरती
11 पाठ

श्री हरि हर संयुक्त आरती - ॐ जय हरिहर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री हरि हर संयुक्त आरती - ॐ जय हरिहर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म में भगवान विष्णु (हरि) और भगवान शिव (हर) को एक ही परमब्रह्म के दो अलग-अलग स्वरूप माना गया है। जब इन दोनों शक्तियों का मिलन होता है, तब ब्रह्मांड के संतुलन, पालन और संहार की संपूर्णता सिद्ध होती है। 'श्री हरि हर संयुक्त आरती' - 'ॐ जय हरिहर देवा' दोनों देवताओं की अनन्य महिमा का गान करती है। यह आरती साधक को द्वैत भाव से ऊपर उठाकर अद्वैत और परम शांति के मार्ग पर ले जाती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन आरती के संपूर्ण बोल, गहन भावार्थ, पूजा विधि और इसके आध्यात्मिक रहस्यों को समझेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय हरिहर देवा, स्वामी जय हरिहर देवा।

भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥ ॐ जय...

एक तरफ चक्र विराजे, दूजी दिशि शोभे त्रिशूल।

गल माल मुण्डन की, और कौस्तुभ मणि कूल॥ ॐ जय...

पीताम्बर अंगा सोहे, बाघम्बर की छटा अपार।

शेष शय्या बैठे, और ध्यावे नंदी सवार॥ ॐ जय...

क्षीरसागर वासा, कैलाश धाम ठिकाना।

वेद पुराण बखाने, महिमा को नहीं जाना॥ ॐ जय...

ब्रह्मादिक सुर मुनि जन, सेवा नित्त लगावें।

नारद शारद मिलके, गुणगान सुनावें॥ ॐ जय...

दीनन के दुखहारी, तुम ही हो रखवारे।

कष्ट मिटाओ सबका, करुणा कर डारे॥ ॐ जय...

जो जन आरती गावे, मनवांछित फल पावे।

सुख सम्पत्ति घर आवे, दुःख दूर भगावे॥ ॐ जय...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

ॐ जय हरिहर देवा, स्वामी जय हरिहर देवा। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥
हे हरिहर भगवान! आपकी जय हो, आपके स्वामी स्वरूप की जय हो। आप अपने शरणागत भक्त जनों के सभी दुखों और संकटों को पल भर में दूर कर देते हैं।

एक तरफ चक्र विराजे, दूजी दिशि शोभे त्रिशूल। गल माल मुण्डन की, और कौस्तुभ मणि कूल॥
आपके इस संयुक्त रूप की अद्भुत छटा है—एक हाथ में भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र सुशोभित है, तो दूसरी तरफ भगवान शिव का त्रिशूल विराजित है। आपके गले में एक ओर भक्तों के संहार का मुण्डमाल है, तो दूसरी ओर भगवान विष्णु की वक्षःस्थल पर चमकने वाली दिव्य कौस्तुभ मणि शोभा दे रही है।

पीताम्बर अंगा सोहे, बाघम्बर की छटा अपार। शेष शय्या बैठे, और ध्यावे नंदी सवार॥
आपके शरीर पर एक तरफ भगवान विष्णु का पीताम्बर (पीला वस्त्र) सुशोभित है, तो दूसरी तरफ भगवान शिव का बाघम्बर (बाघ की खाल) का वस्त्र अपनी अपार छटा बिखेर रहा है। आप एक ओर क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं, और दूसरी तरफ कैलाश पर नंदी की सवारी का ध्यान करते हैं।

क्षीरसागर वासा, कैलाश धाम ठिकाना। वेद पुराण बखाने, महिमा को नहीं जाना॥
आपका निवास स्थान क्षीरसागर भी है और कैलाश धाम भी आपका ही ठिकाना है। वेद और पुराण भी आपकी अनंत महिमा का बखान करते हैं, परंतु कोई भी आपकी महिमा की थाह नहीं पा सका है।

ब्रह्मादिक सुर मुनि जन, सेवा नित्त लगावें। नारद शारद मिलके, गुणगान सुनावें॥
ब्रह्मा जी आदि सभी देवता और मुनिगण निरंतर आपकी सेवा में लीन रहते हैं। देवर्षि नारद और माता सरस्वती मिलकर आपके यश और गुणों का गान करते हैं।

दीनन के दुखहारी, तुम ही हो रखवारे। कष्ट मिटाओ सबका, करुणा कर डारे॥
हे प्रभु! आप गरीबों और दीनों के दुखों को हरने वाले तथा उनके एकमात्र रखवाले हैं। अपनी असीम करुणा बरसाकर हम सभी के कष्टों का निवारण कीजिए।

जो जन आरती गावे, मनवांछित फल पावे। सुख सम्पत्ति घर आवे, दुःख दूर भगावे॥
जो भी मनुष्य श्रद्धा और विश्वास के साथ इस पावन आरती का गान करता है, वह अपनी इच्छा के अनुसार सभी फल प्राप्त करता है। उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और समस्त दुख कोसों दूर भाग जाते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन परंपरा में हरिहर स्वरूप इस बात का प्रतीक है कि शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है। स्कन्द पुराण और पद्म पुराण में हरिहर उपासना को अत्यंत फलदायी बताया गया है। जो लोग वैष्णव और शैव संप्रदाय के बीच भेद मानते हैं, उनके लिए हरिहर का यह स्वरूप एक सुंदर संदेश देता है कि मोक्ष के मार्ग में शिव और विष्णु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस आरती का पाठ करने से एक साथ दोनों महान शक्तियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे साधक के जीवन में संतुलन, संयम, भक्ति और ज्ञान का उदय होता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  2. पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें।
  3. भगवान हरिहर की संयुक्त प्रतिमा या चित्र को चौकी पर स्थापित करें।
  4. षोडशोपचार या पंचोपचार विधि से गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  5. धूप और दीप प्रज्वलित करने के बाद दोनों हाथों से आरती की थाली उठाएं।
  6. आरती गाते समय शंख और घंटी अनिवार्य रूप से बजाएं ताकि नकारात्मक ऊर्जा दूर हो सके।
  7. आरती पूर्ण होने के बाद भगवान को दीप अर्पित करें और सभी उपस्थित भक्तों में चरणामृत तथा प्रसाद वितरित करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

सामग्री महत्वपूर्ण उपयोग
पूजा की थाल तांबे, पीतल या चांदी की थाल जिसमें सभी पूजन सामग्री व्यवस्थित हो।
दीपक (घी या तेल) अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने का प्रतीक।
कपूर पवित्रता और जीवात्मा के परमात्मा में विलीन होने का प्रतीक।
घंटी (Ghanti) नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाने और सकारात्मक ऊर्जा के आह्वान के लिए।
शंख (Shankh) ब्रह्मांडीय नाद 'ॐ' की ध्वनि उत्पन्न करने के लिए।

राग, ताल एवं गायन समय

श्री हरिहर संयुक्त आरती को शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाया जा सकता है। इसे কাহারवा या तीनताल की लय में गाना अत्यंत आनंददायक होता है। इस आरती को करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल की बेला (ब्रह्म मुहूर्त से सूर्योदय के पश्चात) और प्रदोष काल (संध्या के समय) माना गया है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

इस आरती का नित्य पाठ करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
  • घर में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मकता का संचार होता है।
  • विष्णु भगवान की कृपा से ऐश्वर्य और शिव जी की कृपा से वैराग्य एवं बुद्धि की प्राप्ति होती है।
  • अकाल मृत्यु और भय का नाश होता है।
  • कुंडली में ग्रह दोष शांत होते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री हरि हर संयुक्त आरती - ॐ जय हरिहर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान हरिहर (विष्णु और शिव) के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री भगवान हरिहर (विष्णु और शिव) जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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