॥ श्री हनुमान जी की आरती - आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन संस्कृति में संकटमोचन महाबली हनुमान जी की उपासना अमोघ फलदायी मानी जाती है। जब भी भक्त अपने जीवन के किसी संकट, भय, या बाधा से घिर जाता है, तब भगवान हनुमान का स्मरण मात्र ही उसे हर प्रकार के भय से मुक्त कर देता है। श्री हनुमान जी की परम प्रसिद्ध आरती 'आरती कीजै हनुमान लला की, दुष्ट दलन रघुनाथ कला की' केवल एक भजन या स्तुति नहीं है, बल्कि यह साक्षात हनुमान जी के दिव्य स्वरूप, उनके पराक्रम, उनकी निष्ठा और उनके करुणामय स्वभाव का सजीव चित्रण है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम हनुमान जी की इस अलौकिक आरती के संपूर्ण बोल, शब्द-दर-शब्द भावार्थ, गायन के नियम, पूजा सामग्री, और इसके निरंतर गान से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरवर काँपै। रोग दोष जाके निकट न झाँपै॥
अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीरा रघुनाथ पठाया। लंका जारि सिया सुधि लाया॥
लंका सी कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लागी॥
लंका जारि असुर संहारै। सियारामजी के काज संवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सजीवन लाए। फेरि राम-लक्ष्मण जिए जीराये॥
पैठि पाताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े॥
बाएँ हाथ वैद्य जस लीजै। दाएँ हाथ संतन को दीजै॥
सूरी समर संकट मोचन। ये तीनों जग में अति बलवान॥
भक्ति भाव से पूजा कीजै। नाथ कृपा अपनी दृष्टि कीजै॥
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री हनुमान जी की यह आरती अत्यंत शक्तिशाली और ऊर्जावान है। इसके प्रत्येक शब्द में उनके महान कृत्यों और भगवद् भक्ति का गौरव छिपा है। आइए इस पावन आरती के विस्तृत भावार्थ को समझें:
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
हे भक्तो! हम सब मिलकर पवनसुत हनुमान जी की आरती करें, जो प्रभु श्रीराम की दिव्य कला और शक्ति के अवतार हैं तथा दुष्टों और असुरों का नाश करने वाले हैं।
जाके बल से गिरवर काँपै। रोग दोष जाके निकट न झाँपै॥
जिनके अद्भुत और असीम बल से बड़े-बड़े पर्वत भी कांप उठते हैं, और जिनके स्मरण मात्र से ही सभी प्रकार के रोग, शोक और मानसिक दोष साधक के पास भी आने का साहस नहीं करते।
अंजनि पुत्र महाबलदायी। संतन के प्रभु सदा सहाई॥
माता अंजनी की कोख से प्रकट होने वाले ये महाबली हनुमान जी संतों, ऋषियों और भक्तों की रक्षा के लिए सदैव उनके सहायक और मार्गदर्शक रहते हैं।
दे बीरा रघुनाथ पठाया। लंका जारि सिया सुधि लाया॥
प्रभु श्रीराम से आज्ञा और बीड़ा लेकर इन्होंने प्रतापी लंका में प्रवेश किया, पूरी लंका को अपनी पूंछ की अग्नि से जलाया और माता सीता की खोज कर उनका संदेश श्रीराम तक पहुँचाया।
लंका सी कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लागी॥
सुदृढ़ स्वर्ण नगरी लंका और उसके चारों तरफ असीम समुद्र जैसी गहरी खाई को पार करने में पवनपुत्र हनुमान जी को एक पल की भी देर नहीं लगी।
लंका जारि असुर संहारै। सियारामजी के काज संवारे॥
लंका को जलाकर राक्षसों का संहार किया और अपने आराध्य प्रभु श्री सीताराम जी के सभी कठिन कार्यों को सहजता से पूरा किया।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सजीवन लाए। फेरि राम-लक्ष्मण जिए जीराये॥
युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण जी शक्ति लगने से मूर्छित हो गए, तब हनुमान जी द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर आए और प्रभु राम तथा लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की।
पैठि पाताल तोरि जमकारे। अहिरावण की भुजा उखाड़े॥
पाताल लोक में प्रवेश कर मायावी अहिरावण का वध किया और यमराज के समान उसका अहंकार तोड़कर उसकी भुजाओं को उखाड़ फेंका।
बाएँ हाथ वैद्य जस लीजै। दाएँ हाथ संतन को दीजै॥
एक हाथ से आप दुष्टों का संहार करने वाले और दूसरे हाथ से संतों को अभय वरदान और सुख प्रदान करने वाले हैं।
सूरी समर संकट मोचन। ये तीनों जग में अति बलवान॥
आप युद्ध भूमि में शत्रुओं के लिए तलवार के समान और भक्तों के लिए संकटमोचन हैं। संसार में आपके समान बलवान और कोई दूसरा नहीं है।
भक्ति भाव से पूजा कीजै। नाथ कृपा अपनी दृष्टि कीजै॥
हे नाथ! हम पूरी श्रद्धा और भक्ति भाव से आपकी पूजा और आरती कर रहे हैं, कृपया अपनी कृपा दृष्टि हम पर सदैव बनाए रखें।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार श्री हनुमान जी चिरंजीवी हैं और इस कलयुग में प्रत्यक्ष रूप से जागृत देवता माने गए हैं। तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान चालीसा के पश्चात यदि कोई सबसे अधिक प्रभावकारी स्तोत्र है, तो वह यही आरती है। इस आरती का नियमित गान करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, या मंगल दोष से पीड़ित जातकों के लिए हनुमान जी की यह आरती अचूक उपाय मानी जाती है। यह आरती भक्त के भीतर अदम्य साहस, आत्मविश्वास और धर्म के प्रति निष्ठा का संचार करती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- शुद्धता एवं स्नान: प्रातकाल या संध्याकाल में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। लाल या पीले रंग के वस्त्र हनुमान जी की पूजा में अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर को चौकी पर स्थापित करें।
- संकल्प एवं ध्यान: आसन पर बैठकर मन को शांत करें और हनुमान जी का ध्यान करते हुए पूजा का संकल्प लें।
- षोडशोपचार पूजन: हनुमान जी को सिंदूर, चमेली का तेल, जनेऊ, अक्षत, लाल फूल, पान का बीड़ा और बूंदी के लड्डू का भोग अर्पित करें।
- दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी या चमेली के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। धूपबत्ती जलाएं और इसके पश्चात श्रद्धापूर्वक कर्पूर या घी के दीपक से आरती उतारें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक आदर्श और फलदायी आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का होना अनिवार्य है:
- आरती की थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: शुद्ध गाय का घी या चमेली के तेल का दीपक (रुई की बत्ती के साथ)।
- कपूर: आरती के अंत में प्रज्वलित करने के लिए शुद्ध भीमसेनी कपूर।
- घंटी और शंख: नकारात्मकता को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा के आह्वान के लिए पीतल की घंटी और शंख।
- पुष्प और अक्षत: आरती के समय चरणों में अर्पित करने के लिए ताजे लाल फूल और अक्षत।
- धूप और अगरबत्ती: सुगंधित धूप जो वातावरण को पवित्र करती है।
- भय और संकट से मुक्ति: जो व्यक्ति प्रतिदिन सच्चे मन से इस आरती को गाता है, उसे जीवन के किसी भी बड़े संकट या अज्ञात भय से मुक्ति मिलती है।
- ग्रह बाधा निवारण: शनि दोष, राहु-केतु के कुप्रभाव और मंगल दोष के शमन के लिए यह आरती रामबाण औषधि का कार्य करती है।
- मानसिक बल और आत्मविश्वास: इस आरती का पाठ करने से साधक के भीतर गजब का आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता और मानसिक दृढ़ता उत्पन्न होती है।
- शारीरिक आरोग्य: रोग और बीमारियों से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए हनुमान आरती आरोग्य और दीर्घायु प्रदान करने वाली होती है।
राग, ताल एवं गायन समय
श्री हनुमान जी की आरती को ऊर्जा, वीरता और भक्ति के भाव के साथ गाया जाता है। इसे पारंपरिक रूप से राग कल्याण या यमन में गाया जा सकता है, जो मन को प्रसन्नता और आध्यात्मिक शांति देता है। ताल के रूप में इसे कहहरवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) में आसानी से गाया जा सकता है। इस आरती को करने का सर्वोत्तम समय प्रतिदिन प्रातःकाल (सूर्योदय के समय) और संध्याकाल (प्रदोष काल) माना जाता है। मंगलवार और शनिवार के दिन विशेष अनुष्ठान के दौरान इस आरती का सामूहिक गान अत्यंत फलदायी होता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
श्री हनुमान जी की आरती कब करनी चाहिए?
श्री हनुमान जी की आरती प्रतिदिन सुबह और शाम के समय करनी चाहिए। विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार को हनुमान मंदिर या घर पर संध्या के समय आरती करना अत्यंत शुभ फल देता है।
क्या महिलाएं हनुमान जी की आरती कर सकती हैं?
हाँ, महिलाएं बिल्कुल हनुमान जी की आरती कर सकती हैं। सनातन ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार भगवान की भक्ति में किसी भी प्रकार का लिंगभेद नहीं होता है। हालांकि, मासिक धर्म के दौरान दूर से प्रणाम करना और मानसिक स्मरण करना उत्तम माना गया है।
हनुमान जी की आरती के समय कौन सा दीपक जलाना चाहिए?
हनुमान जी की पूजा और आरती में शुद्ध गाय के घी का दीपक या विशेष रूप से चमेली के तेल का दीपक जलाना सर्वाधिक श्रेष्ठ माना जाता है।
हनुमान जी को भोग में क्या अर्पित करना चाहिए?
हनुमान जी को बूंदी के लड्डू, बेसन के लड्डू, पान का बीड़ा, गुड़-चने और फल (विशेषकर केला) का भोग अत्यंत प्रिय है।