पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री भगवान विष्णु (हंसावतार) आरती
11 पाठ

श्री हंसावतार भगवान की पावन आरती - ॐ जय हंस देवा, स्वामी जय हंस देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री हंसावतार भगवान की पावन आरती - ॐ जय हंस देवा, स्वामी जय हंस देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में 'हंसावतार' का स्थान अत्यंत विशिष्ट और ज्ञानवर्धक है। जब सनकादि ऋषियों ने ब्रह्मा जी से आत्म-ज्ञान के विषय में प्रश्न किया, तब भगवान विष्णु ने 'हंस' रूप धारण कर उन्हें योग, ज्ञान और भक्ति का उपदेश दिया। हंसावतार भगवान की आरती करना न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि साधक के भीतर विवेक और वैराग्य का संचार भी करता है। इस लेख में हम हंसावतार भगवान की पावन आरती, उसके अर्थ और पूजा की विधि को विस्तार से जानेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय हंस देवा, स्वामी जय हंस देवा।
ब्रह्मज्ञान के दाता, प्रभु तुम हो सुखमेवा॥ ॐ जय हंस देवा...

सनकादिक मुनि ध्यावें, तुमको मन लावें।
वेद-पुराण बखानें, तुमको सब गावें॥ ॐ जय हंस देवा...

विवेक के तुम सागर, अज्ञान के नाशक।
भक्तों के तुम रक्षक, भव-भय के नाशक॥ ॐ जय हंस देवा...

श्वेत वर्ण अति पावन, हंस रूप धारी।
ज्ञान-ज्योति से भर दो, दुनिया ये सारी॥ ॐ जय हंस देवा...

जो कोई आरती गावे, प्रेम सहित गावे।
हंस रूप प्रभु उसका, मंगल कर जावे॥ ॐ जय हंस देवा...

ॐ जय हंस देवा, स्वामी जय हंस देवा।
ब्रह्मज्ञान के दाता, प्रभु तुम हो सुखमेवा॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

हंसावतार की आरती का प्रत्येक शब्द आध्यात्मिक गहराई लिए हुए है। 'ॐ जय हंस देवा' का अर्थ है कि हम उस परमात्मा की जय-जयकार करते हैं जो हंस रूप में अवतरित हुए। वे 'ब्रह्मज्ञान के दाता' हैं, अर्थात वे ही हमें आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग दिखाते हैं। 'सनकादिक मुनि ध्यावें' पंक्ति यह दर्शाती है कि स्वयं सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार जैसे महान ऋषि भी उन्हीं का ध्यान करते हैं। 'विवेक के तुम सागर' का अर्थ है कि प्रभु ही हमें सही और गलत के बीच भेद करने की बुद्धि प्रदान करते हैं। 'श्वेत वर्ण' पवित्रता का प्रतीक है, जो यह बताता है कि ज्ञान का मार्ग निष्कलंक और शुद्ध है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, हंसावतार भगवान विष्णु का वह स्वरूप है जिसने सृष्टि के आरंभ में ज्ञान का प्रकाश फैलाया। जब सृष्टि की रचना के समय सनकादि ऋषियों ने ब्रह्मा जी से पूछा कि 'मैं कौन हूँ और मेरा लक्ष्य क्या है?', तब ब्रह्मा जी भी असमंजस में पड़ गए। तब भगवान विष्णु ने हंस रूप में प्रकट होकर उन्हें 'हंस-गीता' का उपदेश दिया। यह आरती उसी ज्ञान की परंपरा को स्मरण करने का माध्यम है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

आरती करने के लिए सर्वप्रथम स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें। भगवान हंसावतार की प्रतिमा या चित्र को चौकी पर स्थापित करें। गंगाजल से अभिषेक करें और पीले पुष्प अर्पित करें। धूप-दीप जलाकर श्रद्धापूर्वक आरती करें। आरती के समय घंटी और शंख का नाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आरती के अंत में 'कर्पूर गौरं करुणावतारं' का पाठ करना चाहिए।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

आरती के लिए एक पीतल या चांदी की थाली, शुद्ध घी का दीपक (पांच बत्तियों वाला), कपूर, धूप, ताजे पीले फूल, चंदन, अक्षत (बिना टूटे चावल), और नैवेद्य (भोग) के रूप में फल या मिष्ठान रखें। शंख और घंटी का होना अनिवार्य है क्योंकि ये नकारात्मक ऊर्जा को दूर करते हैं।

राग, ताल एवं गायन समय

हंसावतार की आरती को 'राग कल्याण' या 'राग यमन' में गाना अत्यंत प्रभावी होता है। यह राग मन को शांत और एकाग्र करता है। इसे सायंकाल के समय या ब्रह्ममुहूर्त में गाना सबसे अधिक फलदायी माना गया है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से हंसावतार की आरती करने से साधक के भीतर का अज्ञान रूपी अंधकार दूर होता है। यह आरती एकाग्रता बढ़ाती है, निर्णय लेने की क्षमता में सुधार करती है और मन को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

१. श्री हंसावतार भगवान की पावन आरती - ॐ जय हंस देवा, स्वामी जय हंस देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान विष्णु (हंसावतार) के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री भगवान विष्णु (हंसावतार) जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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