पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री गोवर्धन महाराज आरती
6 पाठ

श्री गोवर्धन महाराज की आरती - उठो गोवर्धन महाराज, तेरी सात कोस की परिक्रमा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री गोवर्धन महाराज की आरती - उठो गोवर्धन महाराज, तेरी सात कोस की परिक्रमा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म में गोवर्धन पर्वत को केवल एक शैल न मानकर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरूप माना गया है। ब्रजमंडल की पावन भूमि पर स्थित श्री गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा और उनकी आरती का सनातन संस्कृति में अद्वितीय एवं परम पवित्र स्थान है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का महापर्व अत्यंत उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर और विशेषकर गुरु पूर्णिमा, अन्नकूट तथा प्रत्येक मास की पूर्णिमा को लाखों श्रद्धालु 'सात कोस की परिक्रमा' (लगभग 21 किलोमीटर) पूर्ण करते हैं और श्री गोवर्धन महाराज की आरती गाकर अपने जीवन को धन्य बनाते हैं। 'उठो गोवर्धन महाराज, तेरी सात कोस की परिक्रमा' के उद्घोष के साथ गाई जाने वाली यह आरती भक्तों के हृदय में भक्ति रस का संचार करती है और उन्हें भगवान श्री कृष्ण की असीम कृपा का अनुभव कराती है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

आरती श्री गोवर्धन महाराज की, रती सब संत भक्त समाज की।
उठो गोवर्धन महाराज, तेरी सात कोस की परिक्रमा।
तेरे कंठ छबि अति भारी, तेरे सीने मणियों की छबि न्यारी।
उठो गोवर्धन महाराज...

तेरे शिर पर मुकुट सज रहा है, चरणों में घुंघरू बज रहा है।
कानन कुण्डल की छबि न्यारी, बलिहारी जांय ब्रज के नारी।
उठो गोवर्धन महाराज...

रूप तुम्हारा है अति पावन, दर्शन से कटे महापातक पावन।
ब्रज के ग्वाल-बाल सब गावें, दरश कर मनवांछित फल पावें।
उठो गोवर्धन महाराज...

दूध और बतासे भोग लगावें, मीठे पूए और खीर बनावें।
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावें, प्रेम सहित सब शीश नवावें।
उठो गोवर्धन महाराज...

जो यह आरती गावे-सुनावे, नित प्रति भोग लगावे।
ताको हरि चरणन मेंिवासा, पूरे मन की आश।
उठो गोवर्धन महाराज, तेरी सात कोस की परिक्रमा।

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री गोवर्धन महाराज की यह दिव्य आरती केवल कुछ पंक्तियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह ब्रजवासियों के अगाध प्रेम और भगवान श्री कृष्ण के प्रति समर्पण का सजीव दस्तावेज है। इस अनुत्तरित और मधुर आरती का प्रत्येक शब्द आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत है।

आरती श्री गोवर्धन महाराज की, रती सब संत भक्त समाज की: इस प्रारंभिक पंक्ति का भाव यह है कि श्री गोवर्धन महाराज की यह आरती संपूर्ण संत समाज, ब्रज के भक्तों और समस्त मानवता के कल्याण के लिए है। गोवर्धन महाराज की आराधना करने से न केवल मनुष्य के व्यक्तिगत कष्ट दूर होते हैं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड में सकारात्मकता और शांति का प्रसार होता है।

उठो गोवर्धन महाराज, तेरी सात कोस की परिक्रमा: ब्रज की लोक-संस्कृति में गोवर्धन पर्वत को जगाने और उनका आह्वान करने का यह अनूठा तरीका है। भक्तगण प्रातःकाल उठकर गिरिराज जी से प्रार्थना करते हैं कि हे महाराज! अब आप जागृत होकर हमारे द्वारा की जा रही सात कोस (लगभग 21 किमी) की इस कठिन परिक्रमा को स्वीकार करें और हमारे श्रम को सार्थक बनाएं।

तेरे कंठ छबि अति भारी, तेरे सीने मणियों की छबि न्यारी: गिरिराज शिलाओं का प्राकृतिक सौंदर्य ऐसा है मानो उनके गले में कोई सुंदर वनमाला या आभूषण सुशोभित हो। उनके वक्षस्थल पर चमकती हुई मणियाँ और शिलाखंड दिव्य आभूषणों की भांति शोभायमान प्रतीत होते हैं, जो हर भक्त के मन को मोह लेते हैं।

दूध और बतासे भोग लगावें, मीठे पूए और खीर बनावें: गिरिराज गोवर्धन को छप्पन भोग के साथ-साथ दूध, बतासे, शुद्ध घी के पूए और मीठी खीर का विशेष भोग लगाया जाता है। यह पंक्ति दर्शाती है कि भगवान को सादगी और प्रेम के साथ परोसा गया भोग अत्यंत प्रिय है, जिसे वे बड़े चाव से स्वीकार करते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने जब देवराज इंद्र के घमंड को चूर करने के लिए ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का आदेश दिया, तब से यह परंपरा आरंभ हुई। इंद्र के कोप से जब मूसलाधार वर्षा और प्रलयकारी मेघ ब्रज पर टूटे, तब बालगोपाल कृष्ण ने अपनी कनिष्ठ अंगुली पर सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को छाते की तरह उठाकर संपूर्ण ब्रजवासियों और पशु-पक्षियों की रक्षा की थी। तभी से गोवर्धन पर्वत को 'गिरिराज' की पदवी प्राप्त हुई और वे भगवान कृष्ण के ही विग्रह रूप में पूजे जाने लगे।

ऐसी मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से श्री गोवर्धन महाराज की परिक्रमा करता है और उनकी आरती गाता है, उसके जीवन के सभी कष्ट, पाप और दरिद्रता दूर हो जाती है। गिरिराज जी की परिक्रमा करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है और भगवान कृष्ण के चरणों में अनंत भक्ति मिलती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

गोवर्धन महाराज की आरती करने और परिक्रमा लगाने के कुछ निश्चित शास्त्रीय एवं पारंपरिक नियम हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य माना गया है:

  • प्रातःकाल स्नान एवं शुद्धि: आरती से पूर्व प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले या श्वेत वस्त्र) धारण करें।
  • स्थान का चयन: यदि आप ब्रज में हैं तो मानसी गंगा, दानघाटी या किसी प्रमुख शिला के निकट आरती करें। यदि आप अपने घर पर हैं, तो गिरिराज शिला या भगवान कृष्ण के विग्रह के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें।
  • पंचोपचार पूजन: रोली, अक्षत (अतूट चावल), पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (दूध-बतासा या मिष्ठान) अर्पित करें।
  • प्रदक्षिणा (परिक्रमा): आरती संपन्न होने के बाद भगवान की परिक्रमा करें। घर पर आरती करते समय अपने स्थान पर ही तीन बार clockwise घूमकर परिक्रमा पूरी करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

धार्मिक अनुष्ठानों में सही सामग्री का उपयोग पूजा को पूर्णता प्रदान करता है। गोवर्धन महाराज की आरती के लिए निम्नलिखित सामग्री अनिवार्य रूप से एकत्र करनी चाहिए:

  • शुद्ध तांबे या पीतल का आरती का थाल
  • शुद्ध घी का दीपक (रुई की बत्ती सहित)
  • कपूर की टिकिया
  • धूपबत्ती या अगरबत्ती
  • ताजे पुष्प एवं माला
  • रोली, कुमकुम और अक्षत
  • नैवेद्य के रूप में दूध, बतासे, फल या मीठे पूए
  • घंटी (Ghanti) और शंख (Shankh)

राग, ताल एवं गायन समय

संगीत और भक्ति का गहरा नाता है। श्री गोवर्धन महाराज की यह आरती मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाई जाती है, जो मन को शांत और एकाग्र करती है। इस आरती को गाने के लिए কাহারवा या दादरा ताल का प्रयोग किया जाता है। गायन का सबसे उत्तम समय प्रातःकाल (सूर्योत्थान के समय) या गोधूलि बेगा (संध्या काल) माना जाता है, जब ब्रज में गायें चरकर वापस लौटती हैं।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नित्य नियम से श्री गोवर्धन महाराज की आरती करने और उनके चरणों में ध्यान लगाने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. मानसिक शांति: भगवान गिरिराज के स्मरण मात्र से मन का चंचलता और तनाव समाप्त होता है, जिससे अगाध मानसिक शांति मिलती है।
  2. पारिवारिक सुख-समृद्धि: अन्नकूट और गोवर्धन पूजा के प्रभाव से घर में कभी भी अन्न और धन की कमी नहीं होती।
  3. पापों का नाश: जन्म-जन्मांतर के अज्ञात पाप और कर्म बंधन गोवर्धन परिक्रमा एवं आरती से कट जाते हैं।
  4. भक्ति भाव की प्राप्ति: भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के चरणों में अनन्य प्रेम और भक्ति की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री गोवर्धन महाराज की आरती कब करनी चाहिए?

श्री गोवर्धन महाराज की आरती प्रातःकाल परिक्रमा आरंभ करने से पूर्व या संध्याकाल में सूर्यास्त के समय करनी चाहिए। कार्तिक मास के अन्नकूट पर्व पर विशेष रूप से यह आरती गाई जाती है।

गोवर्धन पर्वत की सात कोस की परिक्रमा की कुल दूरी कितनी होती है?

गोवर्धन पर्वत की सात कोस की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर (21 km) की होती है, जिसे भक्तगण पैदल, दंडवत या दूध की धारा बहाते हुए पूरा करते हैं।

घर पर गोवर्धन महाराज की आरती कैसे करें?

घर पर गोवर्धन शिला (यदि उपलब्ध हो) या भगवान श्रीकृष्ण के चित्र के समक्ष घी का दीपक जलाकर, फल-दूध का भोग लगाकर और शंख-घंटी बजाकर श्रद्धापूर्वक यह आरती की जा सकती है।

गोवर्धन आरती में किस प्रकार के भोग का विशेष महत्व है?

गोवर्धन महाराज को दूध, बतासे, मीठे पूए, खीर और छप्पन प्रकार के व्यंजनों (अन्नकूट) का भोग लगाना अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।

१. श्री गोवर्धन महाराज की आरती - उठो गोवर्धन महाराज, तेरी सात कोस की परिक्रमा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री गोवर्धन महाराज के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री गोवर्धन महाराज जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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