॥ श्री गिरिराज महाराज की पावन आरती - ॐ जय गिरिराज हरे, स्वामी जय गिरिराज हरे: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★ब्रजमंडल के अधिष्ठाता, भगवान श्रीकृष्ण के अतिप्रिय और साक्षात स्वरूप माने जाने वाले श्री गिरिराज गोवर्धन महाराज की पावन आरती (Shri Giriraj Maharaj Ki Aarti) का सनातन धर्म में अत्यंत विशिष्ट स्थान है। गोवर्धन पर्वत को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना गया है और भक्तजन इन्हें 'गिरिराज धरण' या 'श्रीनाथ जी' के रूप में पूजते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी गोवर्धन पूजा और अन्नकूट के पावन पर्व पर इस आरती का गान करने से साधक के जीवन के सभी संताप दूर हो जाते हैं। ब्रज की सात कोस की परिक्रमा करने वाले प्रत्येक श्रद्धालु के लिए गिरिराज महाराज की यह दिव्य आरती अपनी पूजा का समापन करने का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण होती है। इस लेख में हम गिरिराज महाराज की संपूर्ण आरती, उसके शाश्वत भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके अनंत आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय गिरिराज हरे, स्वामी जय गिरिराज हरे।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय गिरिराज हरे॥
नंद यशोदा नंदन, ब्रजमंडल चन्दन।
तुही मकुट मणि राजा, त्रिभुवन के बंधन॥ ॐ जय गिरिराज हरे॥
रतन जटित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे।
नारद मुनि गुण गावें, सुर मुनि मन साजे॥ ॐ जय गिरिराज हरे॥
धूपा दीप कलि साजे, फल मेवा धारे।
दूध घृत की धारा, बहती अति प्यारे॥ ॐ जय गिरिराज हरे॥
गिरिधर नाम लियो जो, संकट सब टारे।
असुरन मान गयो जब, इंद्र गर्व जारे॥ ॐ जय गिरिराज हरे॥
चौबीस योजन परिकर, महिमा अति भारी।
दरश करत पातक हर, भव से पार उतारी॥ ॐ जय गिरिराज हरे॥
जो जन आरती गावें, मनवांछित फल पावें।
संकट से बच जावे, हरि चरणन जावें॥ ॐ जय गिरिराज हरे॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
श्री गिरिराज महाराज की यह आरती केवल कुछ पंक्तियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह गोवर्धन पर्वत की महिमा और उनके श्री चरणों में संपूर्ण समर्पण का एक जीवंत दस्तावेज है। आइए, इसकी प्रत्येक पंक्ति के गहरे भावार्थ को समझते हैं:
प्रथम चरण - 'ॐ जय गिरिराज हरे, स्वामी जय गिरिराज हरे। भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे॥' - इस प्रथम उद्गार में भक्त अपने आराध्य गिरिराज महाराज की जयकार करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! आप समस्त हरे (दुखों को हरने वाले) हैं। आपके स्मरण मात्र से ही भक्तों के तमाम मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक संकट एक ही क्षण में नष्ट हो जाते हैं।
द्वितीय चरण - 'नंद यशोदा नंदन, ब्रजमंडल चन्दन। तुही मकुट मणि राजा, त्रिभुवन के बंधन॥' - यहाँ गिरिराज और श्रीकृष्ण की अभिन्नता का वर्णन है। गोवर्धन ब्रजमंडल के लिए ऐसे सुगंधित चंदन के समान हैं जो पूरे क्षेत्र को पवित्र करते हैं। आप तीनों लोकों के मुकुट की मणि के समान हैं और संसार के समस्त बंधनों को काटने वाले मुक्तिदाता हैं।
तृतीय चरण - 'रतन जटित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे। नारद मुनि गुण गावें, सुर मुनि मन साजे॥' - गिरिराज शिला की अलौकिक सुंदरता का बखान करते हुए भक्त कहते हैं कि आपका आसन रत्नों से जटित सिंहासन के समान दिव्य है। देवर्षि नारद और अन्य सभी ऋषि-मुनि आपके गुणों का गान करते हैं तथा देवता भी आपके दर्शन के लिए लालायित रहते हैं।
चतुर्थ चरण - 'धूपा दीप कलि साजे, फल मेवा धारे। दूध घृत की धारा, बहती अति प्यारे॥' - पूजा की सामग्री का वर्णन करते हुए कहा गया है कि धूप, दीप, पुष्प और विविध प्रकार के फल-मेवे आपको समर्पित किए जाते हैं। गोवर्धन पूजा के समय दूध और घृत (घी) की धाराएं आपके ऊपर प्रवाहित की जाती हैं, जो अत्यंत मनमोहक प्रतीत होती हैं।
पंचम चरण - 'गिरिधर नाम लियो जो, संकट सब टारे। असुरन मान गयो जब, इंद्र गर्व जारे॥' - द्वापर युग की उस लीला का स्मरण किया गया है जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठ अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर अहंकार में चूर देवराज इंद्र के घमंड को चूर-चूर किया था और ब्रजवासियों की रक्षा की थी। जो भी गिरिधर का नाम लेता है, उसके सारे कष्ट टल जाते हैं।
षष्ठम चरण - 'चौबीस योजन परिकर, महिमा अति भारी। दरश करत पातक हर, भव से पार उतारी॥' - गिरिराज परिक्रमा के भौगोलिक और आध्यात्मिक स्वरूप को दर्शाते हुए कहा गया है कि इनकी चौबीस योजन (लगभग 21 कोस) की परिक्रमा की महिमा अपार है। इनके दर्शन मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भवसागर से पार हो जाता है।
सप्तम चरण - 'जो जन आरती गावें, मनवांछित फल पावें। संकट से बच जावे, हरि चरणन जावें॥' - आरती के फलश्रुति के रूप में कहा गया है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से इस पावन आरती का गान करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है और अंत में भगवान हरि के चरणों में स्थान पाता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन परंपरा में गोवर्धन पर्वत को साक्षात श्री कृष्ण का विग्रह माना गया है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, एक बार ब्रजवासियों ने देवराज इंद्र की पूजा की तैयारी की, तब बालकृष्ण ने इंद्र के अहंकार को तोड़ने के लिए गिरिराज गोवर्धन की पूजा करने का आदेश दिया। कृष्ण ने स्वयं विशाल रूप धारण कर ब्रजवासियों द्वारा लाए गए छप्पन भोग को ग्रहण किया और घोषणा की कि 'मैं और गिरिराज एक ही हैं।'
जो व्यक्ति गोवर्धन की पूजा करता है, उसे सीधे श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट महोत्सव के दौरान गिरिराज जी को छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं और उनकी परिक्रमा की जाती है। इस संपूर्ण अनुष्ठान का समापन गिरिराज महाराज की आरती के बिना अधूरा माना जाता है। यह आरती साधक को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर भक्ति और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
श्री गिरिराज महाराज की आरती करने के लिए निम्नलिखित नियमों और चरणों का पालन करना अनिवार्य माना गया है:
- स्थान का चयन: यदि आप ब्रज में हैं, तो गोवर्धन परिक्रमा मार्ग या मानसी गंगा के तट पर आरती करें। यदि घर पर हैं, तो गिरिराज शिला (गोवर्धन शिला) को एक पवित्र पाटे या चौकी पर स्थापित करें।
- शुद्धता: स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तन और मन दोनों की पवित्रता आरती के लिए अत्यंत आवश्यक है।
- आचमन और संकल्प: पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और भगवान गिरिराज का ध्यान कर मानसिक संकल्प लें।
- दीपक प्रज्वलन: घी या चमेली के तेल का दीपक जलाएं। धूपबत्ती और कपूर प्रज्वलित करें।
- आरती का क्रम: थाल में दीपक, कपूर और पुष्प रखकर 'ॐ जय गिरिराज हरे' का गान करते हुए दक्षिणावर्त (clockwise) दिशा में कम से कम चार बार थाल को घुमाएं।
- पुष्पांजलि: आरती के पश्चात भगवान को पुष्प अर्पित करें, साष्टांग प्रणाम करें और क्षमा प्रार्थना के साथ आरती को सभी उपस्थित भक्तों में वितरित करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
एक आदर्श और पूर्ण आरती करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियों का थाल में होना अनिवार्य है:
- पूजन थाली: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: मिट्टी या धातु का दीपक, जिसमें शुद्ध गाय का घी और रुई की बत्ती हो।
- कपूर: शुद्ध कपूर जो आरती के समय सकारात्मक ऊर्जा और सुगंध फैलाता है।
- घंटी और शंख: आरती के दौरान नाद करने के लिए पीतल की घंटी और शंख, जिससे नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं।
- पुष्प और रोली: ताजे फूल, दूर्वा, अक्षत (चावल) और रोली तिलक के लिए।
- भोग सामग्री: मिश्री, माखन-मिश्री, फल या अन्नकूट का प्रसाद।
राग, ताल एवं गायन समय
श्री गिरिराज महाराज की आरती का गायन मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में किया जाता है, जो संध्या बेला के समय मन को अत्यंत शांति और दिव्यता प्रदान करता है। इसकी ताल কাহারवा (8 बीट) या दादरा (6 बीट) होती है, जिस पर आसानी से तालियां बजाई जा सकती हैं।
गायन का सर्वोत्तम समय: इस आरती को प्रतिदिन संध्याकाल (प्रदोष काल) में करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अतिरिक्त, कार्तिक मास के गोवर्धन पूजा दिवस, पूर्णिमा, या जब भी आप गोवर्धन परिक्रमा पूर्ण करें, तब इस आरती का गान अवश्य करना चाहिए।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से गिरिराज महाराज की आरती करने और उनके चरणों में ध्यान लगाने से जीवन में निम्नलिखित चमत्कारिक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर और मन में व्याप्त समस्त नकारात्मक ऊर्जा, वास्तु दोष और बुरी दृष्टियां दूर होती हैं।
- आर्थिक समृद्धि: भगवान गिरिराज की कृपा से अन्न और धन के भंडार सदैव भरे रहते हैं, कभी गरीबी या अभाव नहीं आता।
- अहंकार का शमन: गोवर्धन महाराज का पूजन मनुष्य के भीतर छिपे अहंकार और घमंड को नष्ट कर उसे विनम्र बनाता है।
- मोक्ष की प्राप्ति: अंत समय में भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में स्थान और भवसागर से मुक्ति मिलती है।