पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री गोवर्धन महाराज / गिरिराज जी आरती
7 पाठ

श्री गिरीराज जी की आरती - ॐ जय गिरिराज किसोरी, स्वामी जय गिरिराज किसोरी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री गिरीराज जी की आरती - ॐ जय गिरिराज किसोरी, स्वामी जय गिरिराज किसोरी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

Bhaktilok.in के इस पावन भक्ति खंड में आपका हार्दिक स्वागत है। ब्रजमंडल के मुकुटमणि, भगवान श्रीकृष्ण के अतिप्रिय सखा और स्वयं भगवान रूप श्री गोवर्धन महाराज (गिरिराज जी) की उपासना सनातन धर्म में अद्वितीय स्थान रखती है। 'ॐ जय गिरिराज किसोरी' के रूप में गाई जाने वाली श्री गिरिराज जी की यह आरती भक्तों को भगवान कृष्ण और गिरिराज शिला के अभेद्य प्रेम, भक्ति और शरणागति का बोध कराती है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम श्री गिरिराज जी की आरती के संपूर्ण बोल, उसका गहन भावार्थ, धार्मिक एवं पौराणिक महत्व, पूजा की सही विधि, आवश्यक सामग्री तथा जीवन में मिलने वाले आध्यात्मिक फलों का सांग्रुप अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय गिरिराज किसोरी, स्वामी जय गिरिराज किसोरी। ब्रज के कनक मुकुटमणि, भवभय हरन मोरी॥ ॐ जय...

धनुष बाण कर साजे, बंसी वट छाजे। ग्वाल बाल संगे खेलत, त्रिभुवन मन राजे॥ ॐ जय...

इंद्र गर्व जब बाढ़्यो, मूसलधार बरसार्ग्यो। नख पर धरि गोवर्धन, सब ब्रज जन तार्यो॥ ॐ जय...

दूध दही का भोग लगावै, तुलसी दल साजे। आरती करत भक्त जन, मुदित मन विराजे॥ ॐ जय...

जो जन तेरी आरती गावै, मनवांछित फल पावै। संकट सब मिट जावै, भवसागर तर जावै॥ ॐ जय...

गिरिराज महाराज की जय, गोवर्धन धारी की जय। बोलो बांके बिहारी लाल की जय, ब्रजवासी भक्तन की जय॥

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री गिरिराज जी की यह आरती अत्यंत भावुक और भक्तिरस से ओतप्रोत है। आइए इसके प्रत्येक पद के गहन भावार्थ को समझते हैं:

प्रथम पद: ॐ जय गिरिराज किसोरी, स्वामी जय गिरिराज किसोरी। ब्रज के कनक मुकुटमणि, भवभय हरन मोरी॥
अर्थ: हे गिरिराज! आपकी जय हो, हे स्वामी! आपकी जय हो। आप ब्रज भूमि के स्वर्ण मुकुट के समान सुशोभित मणियाँ हैं, जो भक्तों के संसार के सभी भयों और दुखों को हरने वाले हैं। हे प्रभु, मेरी भी रक्षा करें।

द्वितीय पद: धनुष बाण कर साजे, बंसी वट छाजे। ग्वाल बाल संगे खेलत, त्रिभुवन मन राजे॥
अर्थ: आपके हाथों में दिव्य अस्त्र-शस्त्र और वंशीवट का वह पावन स्वरूप सुशोभित होता है। आप ग्वाल-बालों के संग क्रीड़ा करते हुए तीनों लोकों के मन को मोह लेते हैं और त्रिभुवन में राज करते हैं।

तृतीय पद: इंद्र गर्व जब बाढ़्यो, मूसलधार बरसार्ग्यो। नख पर धरि गोवर्धन, सब ब्रज जन तार्यो॥
अर्थ: जब घमंडी देवराज इंद्र का अहंकार अत्यधिक बढ़ गया और उसने मूसलधार वर्षा से ब्रज को डुबोना चाहा, तब आपने अपने बाएं हाथ की कनिष्ठिका उंगली पर गोवर्धन पर्वत को धारण कर संपूर्ण ब्रजवासियों की रक्षा की और उनका उद्धार किया।

चतुर्थ पद: दूध दही का भोग लगावै, तुलसी दल साजे। आरती करत भक्त जन, मुदित मन विराजे॥
अर्थ: भक्तजन आपको दूध, दही और अन्नकूट का भव्य भोग अर्पित करते हैं, जिसमें पवित्र तुलसी दल सुशोभित रहता है। जब भक्त प्रसन्नचित्त होकर आपकी आरती करते हैं, तो आपका दिव्य स्वरूप उनके हृदय में विराजमान हो जाता है।

पंचम पद: जो जन तेरी आरती गावै, मनवांछित फल पावै। संकट सब मिट जावै, भवसागर तर जावै॥
अर्थ: जो भी मनुष्य सच्ची श्रद्धा के साथ आपकी इस आरती का गायन और श्रवण करता है, वह अपनी सभी मनवांछित इच्छाओं को प्राप्त करता है। उसके समस्त संकट नष्ट हो जाते हैं और वह आसानी से इस भवसागर से तर जाता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिन्दू धर्म शास्त्रों और विशेषकर श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, श्री गिरिराज गोवर्धन को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का ही स्वरूप माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा था—"गोवर्धनो ममैवाङ्गम्" यानी गोवर्धन मेरा ही अंग है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा बंद करवाकर गोवर्धन पूजा करने का उपदेश दिया था। तभी से गोवर्धन परिक्रमा और गिरिराज जी की आरती का अनंत महत्व हो गया है।

गिरिराज जी की परिक्रमा और आरती करने से मनुष्य को समस्त तीर्थों के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है। स्कन्द पुराण और गर्ग संहिता में उल्लेख मिलता है कि जो व्यक्ति गिरिराज शिला का पूजन और उनकी आरती विधि-विधान से करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसके कुल के पितृ भी तृप्त हो जाते हैं।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

  1. स्थान की शुद्धि: प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल या मंदिर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें।
  2. विग्रह स्थापना: मंदिर में गिरिराज शिला, गोवर्धन महाराज का चित्र या मूर्ति स्थापित करें। यदि गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर हैं, तो वहाँ दूध, जल, अक्षत, रोली से पूजन करें।
  3. दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और धूपबत्ती जलाएं।
  4. आरती का क्रम: घंटी और शंखनाद के साथ 'ॐ जय गिरिराज किसोरी' आरती का सस्वर गान करें।
  5. परिक्रमा: आरती संपन्न होने के बाद दीपक को प्रभु के चरणों से लेकर सिर तक घुमाएं और अंत में स्वयं की भी तीन बार परिक्रमा करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

सामग्री का नाम विवरण एवं उपयोग
शुद्ध घी का दीपक पंचमुखी या एक मुखी दीपक, जो आरती थाल का मुख्य भाग है।
कपूर आरती के अंत में कपूर प्रज्वलित कर आरती को पूर्णता प्रदान करने के लिए।
घंटी और शंख नकारात्मक ऊर्जा दूर करने और सकारात्मक स्पंदन हेतु।
पुष्प एवं तुलसी दल प्रभु चरणों में अर्पण करने और आरती थाल में रखने हेतु।
रोली, अक्षत और चंदन तिलक लगाने और पूजन सामग्री के रूप में।
भोग सामग्री दूध, दही, मक्खन-मिश्री या अनूकुट का भोग।

राग, ताल एवं गायन समय

श्री गिरिराज जी की आरती को शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण या राग यमन की सुमधुर धुनों में गाया जाता है। इसकी ताल त्रिताल या दादरा होती है, जो भक्ति और उत्साह का संचार करती है। इस आरती को गाने का सबसे उत्तम समय प्रातःकालीन मंगला आरती के समय या संध्या बेला में गोधूलि बेला के दौरान होता है। पूर्णिमा, अमावस्या और दीपावली के अगले दिन आने वाले 'गोवर्धन पूजा' (अन्नकूट) के दिन इस आरती का विशेष सामूहिक गायन ब्रज में अलौकिक आनंद प्रदान करता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से श्री गिरिराज जी की आरती करने वाले साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति: मन का भटकाव और अज्ञात भय समाप्त होता है, तथा चित्त में स्थिरता आती है।
  • पारिवारिक सुख-समृद्धि: घर में अन्न-धन के भंडार भरे रहते हैं और गोधन (समृद्धि) की प्राप्ति होती है।
  • शत्रु विजय एवं रक्षा: इंद्र के अहंकार को चूर्ण करने वाले गिरिराज जी भक्तों की हर परिस्थिति में रक्षा करते हैं।
  • मोक्ष मार्ग की प्राप्ति: भवसागर के बंधनों से मुक्ति मिलती है और भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य भक्ति प्राप्त होती है।

१. श्री गिरीराज जी की आरती - ॐ जय गिरिराज किसोरी, स्वामी जय गिरिराज किसोरी: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री गोवर्धन महाराज / गिरिराज जी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री गोवर्धन महाराज / गिरिराज जी जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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