॥ श्री गंगा जी की आरती - ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता (संपूर्ण बोल एवं भावार्थ) ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★माता गंगा सनातन संस्कृति, भारतीय जनजीवन और अध्यात्म की जीवंत धारा हैं। उन्हें केवल एक नदी नहीं, अपितु मोक्षदायिनी, पापहारिणी और लोककल्याणकारी देवी के रूप में पूजा जाता है। 'ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता' आरती का गान करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्म के पाप धुल जाते हैं और उसे भवसागर से मुक्ति मिलती है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम माता गंगा की इस महाआरती के संपूर्ण बोल, गूढ़ भावार्थ, धार्मिक महत्व, और पूजन विधि का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुझको ध्याता, मन वांछित फल पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥
चन्द्र सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।
पुत्री हो तुम शंभू की, प्रकटी हो ज्ञाता।
बागीरथ तप कीन्हों, बही सुरसरि माता॥ ॐ जय गंगे माता॥
नाम तुम्हारा जो जपत, पातक सब हरता।
चरण कमल जो सेवत, भवसागर तरता॥ ॐ जय गंगे माता॥
अमृत सम जल तेरा, छबि अति मनभाता।
जाह्नवी नाम सुहावा, कोटिन जग ज्ञाता॥ ॐ जय गंगे माता॥
रोग दोष सब हरता, जग में सुखदाता।
महिमा अमित तुम्हारी, भाषा नहीं जाता॥ ॐ जय गंगे माता॥
भगत जनों के संकट, क्षण में दूर करता।
जो नर आरती गावै, नित सुख संपति पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥
गंगा जी की आरती, जो कोई नर गावै।
कवि ‘नारायण’ कहते, मनवांछित फल पावै॥ ॐ जय गंगे माता॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
गंगा आरती का प्रत्येक शब्द आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत है। आइए इसके सरल भावार्थ को समझें:
प्रथम पद: 'ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता। जो नर तुझको ध्याता, मन वांछित फल पाता॥'
अर्थ: हे माता गंगा! आपकी जय हो। जो भी मनुष्य श्रद्धा और भक्ति भाव से आपका स्मरण और ध्यान करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर लेता है।
द्वितीय पद: 'चन्द्र सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता। शरण पड़ें जो तेरी, सो नर तर जाता॥'
अर्थ: चंद्रमा के समान शीतल और कांतिमय आपका निर्मल जल है। जो भी प्राणी आपकी शरण में आता है, वह इस संसार रूपी भवसागर से तर जाता है और मोक्ष को प्राप्त करता है।
तृतीय पद: 'पुत्री हो तुम शंभू की, प्रकटी हो ज्ञाता। बागीरथ तप कीन्हों, बही सुरसरि माता॥'
अर्थ: हे माता! आप भगवान शिव की पुत्री (जटाओं में निवास करने वाली) और समस्त ज्ञान की स्रोत हैं। राजा भगीरथ के कठोर तप के कारण ही आप स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुईं और सुरसरि कहलाईं।
चतुर्थ पद: 'नाम तुम्हारा जो जपत, पातक सब हरता। चरण कमल जो सेवत, भवसागर तरता॥'
अर्थ: आपका पावन नाम जपने मात्र से व्यक्ति के सभी पाप (पातक) नष्ट हो जाते हैं। आपके चरण कमलों की सेवा करने से साधक जीवन-मरण के चक्र से छूट जाता है।
पंचम पद: 'अमृत सम जल तेरा, छबि अति मनभाता। जाह्नवी नाम सुहावा, कोटिन जग ज्ञाता॥'
अर्थ: आपका जल अमृत के समान संजीवनी है और आपकी अलौकिक छवि मन को मोह लेती है। ऋषि महर्षि के नाम पर आपका 'जाह्नवी' नाम भी संपूर्ण संसार में विख्यात है।
षष्ठ पद: 'रोग दोष सब हरता, जग में सुखदाता। महिमा अमित तुम्हारी, भाषा नहीं जाता॥'
अर्थ: आप सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक रोगों तथा दोषों का निवारण करती हैं और संपूर्ण जगत को सुख प्रदान करती हैं। आपकी अनंत महिमा का वर्णन करने में शब्द और भाषाएं भी असमर्थ हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, माता गंगा भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट हुई हैं और राजा भगीरथ के तप से पृथ्वी पर आईं। गंगा स्नान और गंगा आरती का सनातन परंपरा में अद्वितीय स्थान है। मान्यता है कि गंगाजल के स्पर्श मात्र से अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। संध्याकाल में हरिद्वार के हर की पौड़ी, वाराणसी के दशाश्वमेध घाट और ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर होने वाली भव्य महाआरती साक्षात ब्रह्म साक्षात्कार का अनुभव कराती है। इस आरती को गाने और सुनने से पितृ दोष, ग्रह बाधा और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- सर्वप्रथम प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान या गंगा तट पर माता गंगा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- गंगाजल का आचमन कर अपने आपको और स्थान को पवित्र करें।
- माता गंगा को शुद्ध जल, रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य (मिठाई या फल) अर्पित करें।
- धूप और दीप प्रज्वलित करने के बाद श्रद्धा भाव से 'ॐ जय गंगे माता' आरती गाएं।
- आरती के उपरांत अपने हाथों से दीप को चारों दिशाओं में घुमाएं और अंत में सभी को आरती लें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
माता गंगा की आरती को विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री आवश्यक है:
- थाल (पूप थाली): तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: घी या तिल के तेल का पंचमुखी या एकमुखीय दीपक।
- कपूर: आरती में कपूर प्रज्वलित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- घंटी: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मकता लाने के लिए घंटी बजाना अनिवार्य है।
- शंख: आरती के आरंभ और समापन पर शंखनाद किया जाता है।
- पुष्प और रोली: माता को अर्पित करने के लिए ताजे फूल और अक्षत।
राग, ताल एवं गायन समय
श्री गंगा जी की आरती को प्रायः 'राग कल्याण' या 'राग यमन' की धुनों में गाया जाता है। इसका ताल विधान कहरवा या दादरा ताल पर आधारित होता है। गायन का सबसे उत्तम समय संध्याकाल (प्रदोष काल) या ब्रह्ममुहूर्त है। संध्या आरती का विशेष महत्व है जब दीपों की रोशनी और मंत्रोच्चार से संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक हो जाता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से गंगा आरती का पाठ करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मन को शांति और मानसिक विकारों से मुक्ति मिलती है।
- घर में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- अकाल मृत्यु और भय का नाश होता है।
- पितृों की तृप्ति होती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है।