॥ श्री धनवन्तरि भगवान की पावनआरती - ॐ जय धनवन्तरि देवा, स्वामी जय धनवन्तरि देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान धनवन्तरि को हिंदू सनातन धर्म में आयुर्वेद के जनक, आरोग्यता के देवता और भगवान विष्णु के दिव्य अवतार के रूप में पूजा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) के दिन जब भगवान धनवन्तरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, तो संपूर्ण ब्रह्मांड में जय-जयकार हो गई थी। उनकी यह पावन आरती भक्तों को शारीरिक और मानसिक व्याधियों से मुक्ति दिलाकर दीघार्यु, उत्तम स्वास्थ्य और आध्यात्मिक चेतना प्रदान करती है। Bhaktilok.in के इस विशेष और विस्तृत गाइड में हम श्री धनवन्तरि भगवान की आरती के संपूर्ण बोल, प्रत्येक पंक्ति का गहरा भावार्थ, नियम, सामग्री और आरोग्यता के रहस्यों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय धनवन्तरि देवा, स्वामी जय धनवन्तरि देवा।
जल से प्रगट हुए तुम, भव-भय हर देवा॥ ॐ जय...॥
चतुर्भुज रूप विराजे, शंख चक्र धारी।
अमृत कलश लिए कर, भव की पीड़ा हारी॥ ॐ जय...॥
आयुर्वेद के ज्ञाता, जग के तुम स्वामी।
दुःख हर्ता सुख कर्ता, अन्तर्यामी॥ ॐ जय...॥
उत्सव धनतेरस का, हर घर में आया।
दीप जलाकर भक्तों, तुमको है रिझाया॥ ॐ जय...॥
रोग शोक सब मिटाओ, शरण पड़े आए।
दरश तुम्हारे पाकर, सब सुख मिल जाए॥ ॐ जय...॥
तन को आरोग्य देना, मन को विश्वास।
तेरी कृपा से प्रभुजी, हो सबका विकास॥ ॐ जय...॥
जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे।
धन-धान्य आरोग्य से, घर उसका भर जावे॥ ॐ जय...॥
ॐ जय धनवन्तरि देवा, स्वामी जय धनवन्तरि देवा।
जल से प्रगट हुए तुम, भव-भय हर देवा॥ ॐ जय धनवन्तरि देवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान धनवन्तरि की आरती का प्रत्येक शब्द आध्यात्मिक और शारीरिक आरोग्यता की ऊर्जा से ओतप्रोत है। आइए इसके विस्तृत भावार्थ को समझें:
प्रथम पद: 'ॐ जय धनवन्तरि देवा, स्वामी जय धनवन्तरि देवा। जल से प्रगट हुए तुम, भव-भय हर देवा॥' - इस प्रथम पंक्ति में भक्त भगवान धनवन्तरि की जयकार करते हुए उन्हें स्मरण करता है कि हे स्वामी! आप क्षीरसागर (जल) से उत्पन्न हुए हैं और संसार के सभी जन्म-मरण तथा भयों को हरने वाले हैं।
द्वितीय पद: 'चतुर्भुज रूप विराजे, शंख चक्र धारी। अमृत कलश लिए कर, भव की पीड़ा हारी॥' - आपके इस दिव्य रूप में चार भुजाएं हैं, जिनमें शंख, चक्र और अमृत से भरा कलश सुशोभित है। आपके हाथों में मौजूद यह अमृत कलश संसार की समस्त भौतिक और शारीरिक पीड़ाओं का नाश करने वाला है।
तृतीय पद: 'आयुर्वेद के ज्ञाता, जग के तुम स्वामी। दुःख हर्ता सुख कर्ता, अन्तर्यामी॥' - आप इस संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी और आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के आदिश्रृंख्ला प्रणेता हैं। आप सबके मन की बात जानने वाले अन्तर्यामी हैं जो भक्तों के दुखों को हरकर सुख प्रदान करते हैं।
चतुर्थ पद: 'उत्सव धनतेरस का, हर घर में आया। दीप जलाकर भक्तों, तुमको है रिझाया॥' - कार्तिक मास के त्रयोदशी यानी धनतेरस के पावन पर्व पर आपके प्रकटोत्सव को हर घर में दीप जलाकर और मिष्ठान्न अर्पित करके उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।
पंचम पद: 'रोग शोक सब मिटाओ, शरण पड़े आए। दरश तुम्हारे पाकर, सब सुख मिल जाए॥' - हे प्रभु! जो भी आपकी शरण में सच्चे मन से आता है, उसके समस्त रोग, शोक और संताप मिट जाते हैं। आपके दिव्य दर्शन मात्र से मनुष्य को सांसारिक और आध्यात्मिक सुखों की प्राप्ति हो जाती है।
छठा पद: 'तन को आरोग्य देना, मन को विश्वास। तेरी कृपा से प्रभुजी, हो सबका विकास॥' - हे भगवान! हमें हमारे शरीर के लिए उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य) और मन में अडिग विश्वास प्रदान करें। आपकी कृपा से ही सबका कल्याण और उत्थान संभव है।
अंतिम पद: 'जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे। धन-धान्य आरोग्य से, घर उसका भर जावे॥' - जो भी मनुष्य इस पावन आरती को नियमपूर्वक श्रद्धा और ध्यान के साथ गाता है, उसका घर धन-धान्य, वैभव और असीम आरोग्यता से परिपूर्ण हो जाता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिंदू पुराणों के अनुसार, समुद्र मंथन के चौदह रत्नों में से भगवान धनवन्तरि त्रयोदशी तिथि को प्रकट हुए थे। उनके एक हाथ में आयुर्वेद ग्रंथ और दूसरे हाथ में अमृत कलश था। उन्हें चिकित्सा विज्ञान का प्रथम आचार्य माना जाता है। धनतेरस के दिन इनकी पूजा करने से घर में अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है, स्वास्थ्य लाभ मिलता है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। मान्यता है कि इनकी आरती करने से घर के सभी सदस्य दीर्घायु और निरोगी जीवन प्राप्त करते हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- सबसे पहले प्रातः काल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल या मंदिर की अच्छे से साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़कें।
- लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाकर भगवान धनवन्तरि की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
- भगवान को रोली, अक्षत, पीले फूल, माला, और नैवेद्य (भोग) अर्पित करें।
- धूप और शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
- हाथ में पुष्प लेकर धनवन्तरि स्तोत्र या मंत्र का मानसिक जप करें।
- सच्चे भाव, श्रद्धा और ताल-सुर के साथ श्री धनवन्तरि जी की आरती गाएं।
- आरती के पश्चात शंख और घंटी बजाएं तथा दोनों हाथों से आरती की ज्योति लेकर उसे अपनी आँखों से लगाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
- तांबे या पीतल की साफ थाली या थाल
- शुद्ध गाय के घी का दीपक (या कपूर)
- रोली, कुमकुम और अक्षत (बिना टूटे हुए चावल)
- ताजे पीले और लाल फूल एवं पुष्पमाला
- नैवेद्य हेतु मौसमी फल या आयुर्वेदिक औषधीय गुणों से युक्त भोग (जैसे धनिया-मिश्री या शहद)
- पूजा की घंटी और शंख
- धूपबत्ती या अगरबत्ती
राग, ताल एवं गायन समय
श्री धनवन्तरि भगवान की आरती को संगीत शास्त्र के अनुसार राग कल्याण या राग यमन की शांत और मधुर धुनों में गाया जाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसे तीन ताल (16 मात्रा) या কাহারवा ताल (8 मात्रा) में गाया जा सकता है। आरती गाने का सर्वोत्तम समय प्रातः कालीन बेला (ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय) तथा सायंकालीन गोधूलि बेला है। विशेषकर धनतेरस के दिन रात्रि के समय प्रदोष काल में यह आरती सस्वर करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
- उत्तम स्वास्थ्य: नियमित आरती करने से शारीरिक रोग और व्याधियां दूर होती हैं और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
- दीर्घायु: अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है और जीवन की आयु लंबी होती है।
- मानसिक शांति: तनाव, डिप्रेशन और मानसिक अशांति से राहत मिलती है।
- सकारात्मकता: घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।
- समृद्धि: आरोग्य के साथ-साथ घर में धन-धान्य और लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।