॥ श्री दत्तात्रेय जी की आरती - ॐ जय दिगंबरा स्वामी जय दिगंबरा संपूर्ण बोल एवं भावार्थ ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म में भगवान दत्तात्रेय को त्रिमूर्ति—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—का अद्वितीय और साक्षात स्वरूप माना गया है। अत्रि ऋषि और माता अनुसूया के घर प्रकट हुए भगवान दत्तात्रेय (श्री गुरुदेव दत्त) की आराधना से साधक को एक ही साथ तीनों देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है। उनकी उपासना में 'ॐ जय दिगंबरा स्वामी जय दिगंबरा' आरती का विशेष महत्व है। इस विस्तृत आरती गाइड में हम भगवान दत्तात्रेय की इस पावन आरती के संपूर्ण बोल, गूढ़ भावार्थ, धार्मिक महत्व, और पूजन की संपूर्ण विधि का वर्णन करेंगे, जो आपके आध्यात्मिक मार्ग को प्रशस्त करेगा।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय दिगंबरा स्वामी जय दिगंबरा, अत्रि ऋषि के जाया, सती अनुसूया के घरा। ॐ जय दिगंबरा...
झोली फैलाए गाऊँ, चरणों में शीश नवाऊँ।
संकट मेरे हरो जी, भवसागर से तरो जी। ॐ जय दिगंबरा...
तीन शीश छह भुजा विराजे, गदा त्रिशूल सुहाए।
स्मरण मात्र से प्रभुजी, सारे कष्ट नसाए। ॐ जय दिगंबरा...
गाय और चार श्वान साथ तुम्हारे, साधु रूप अवतारे।
अज्ञान तिमिर नाशो, ज्ञानदीप प्रगटाओ। ॐ जय दिगंबरा...
पीतांबर भृगुधारी, अनुपम छवि तुम्हारी।
दर्शन पाकर स्वामी, दुनिया हुई बलिहारी। ॐ जय दिगंबरा...
जो कोई आरती गावे, मनवांछित फल पावे।
दुःख दारिद्र मिट जावे, सुख-संपत्ति घर आवे। ॐ जय दिगंबरा...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान दत्तात्रेय की यह आरती अत्यंत सरल और भावपूर्ण है। इसके माध्यम से भक्त अपने आराध्य के चरणों में अपनी पूर्ण शरणागति अर्पित करता है।
प्रथम पंक्ति: 'ॐ जय दिगंबरा स्वामी जय दिगंबरा, अत्रि ऋषि के जाया, सती अनुसूया के घरा।'
अर्थ: हे संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी! आप दिगंबर (दिशाएँ ही जिनके वस्त्र हैं, अर्थात आकाश रूपी वस्त्र वाले) रूप में सुशोभित हैं, आपकी जय हो। आप महर्षि अत्रि और परम पवित्र माता अनुसूया के पुत्र रूप में इस धरा पर प्रकट हुए हैं।
द्वितीय पंक्ति: 'झोली फैलाए गाऊँ, चरणों में शीश नवाऊँ। संकट मेरे हरो जी, भवसागर से तरो जी।'
अर्थ: हे प्रभु! मैं आपके द्वार पर भिक्षुक की तरह झोली फैलाकर आपकी महिमा का गुणगान कर रहा हूँ और आपके श्रीचरणों में अपना मस्तक झुका रहा हूँ। मेरे सभी संकटों का हरण करो और इस भवसागर (संसार चक्र) से मुझे पार लगाओ।
तृतीय पंक्ति: 'तीन शीश छह भुजा विराजे, गदा त्रिशूल सुहाए। स्मरण मात्र से प्रभुजी, सारे कष्ट नसाए।'
अर्थ: आपके इस दिव्य स्वरूप में तीन मस्तक और छह भुजाएँ शोभायमान हैं, जिनमें गदा और त्रिशूल सुशोभित हैं। हे प्रभु! केवल आपका स्मरण करने मात्र से भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट नष्ट हो जाते हैं।
चतुर्थ पंक्ति: 'गाय और चार श्वान साथ तुम्हारे, साधु रूप अवतारे। अज्ञान तिमिर नाशो, ज्ञानदीप प्रगटाओ।'
अर्थ: कामधेनु गाय और चार वेद रूपी चार श्वान (कुत्ते) आपके साथ रहते हैं। आपने साधु के रूप में अवतार लिया है। हमारे जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करो और हमारे भीतर ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करो।
पंचम पंक्ति: 'पीतांबर भृगुधारी, अनुपम छवि तुम्हारी। दर्शन पाकर स्वामी, दुनिया हुई बलिहारी।'
अर्थ: आपने पीले वस्त्र (पीतांबर) धारण किए हैं और आपकी यह अलौकिक छवि अत्यंत अनुपम है। हे स्वामी! आपके इन दर्शनों को पाकर संपूर्ण संसार आप पर बलिहारी जाता है।
षष्ठ पंक्ति: 'जो कोई आरती गावे, मनवांछित फल पावे। दुःख दारिद्र मिट जावे, सुख-संपत्ति घर आवे।'
अर्थ: जो भी भक्त सच्चे मन से इस आरती को गाता है, वह अपने मन की हर इच्छा को पूर्ण करता है। उसके जीवन के सभी दुःख और दरिद्रता मिट जाती है तथा उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय का अवतार मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन हुआ था। उन्हें 'गुरुओं के गुरु' (परम गुरु) माना जाता है। दत्तात्रेय संप्रदाय में उनकी पूजा का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। मान्यता है कि उन्होंने प्रकृति, पक्षियों, पशुओं और मनुष्यों सहित कुल 24 गुरु बनाए थे, जिससे यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान कहीं से भी और किसी से भी प्राप्त किया जा सकता है। नियमित रूप से दत्तात्रेय आरती का गान करने से पितृ दोष, ग्रह बाधा और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। दत्तात्रेय जी का स्मरण मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान दत्तात्रेय की आरती करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
- प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले या श्वेत वस्त्र) धारण करें।
- पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें और लकड़ी की चौकी पर दत्तात्रेय जी का चित्र या विग्रह स्थापित करें।
- भगवान को पीले पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन, धूप और दीप अर्पित करें।
- नैवेद्य के रूप में फल, मिठाई या विशेषतः दूध से बनी बनी खीर या पदार्थों का भोग लगाएं।
- शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और दोनों हाथों से थाल थामकर पूरी श्रद्धा के साथ 'ॐ जय दिगंबरा' आरती गाएं।
- आरती के पश्चात घंटी बजाएं और शंखनाद करें। अंत में आरती को पूरे घर में घुमाएं ताकि सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो सके।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
दत्तात्रेय जी की आरती को पूर्ण और विधि-विधान से संपन्न करने हेतु निम्नलिखित सामग्रियों की आवश्यकता होती है:
- पूजा की थाल: तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (रुई की बाती के साथ)।
- कपूर: आरती की दिव्यता बढ़ाने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए शुद्ध कपूर।
- धूप एवं अगरबत्ती: सुगंधित धूप या लोबान।
- पुष्प: ताजे पीले या लाल फूल।
- घंटी एवं शंख: नकारात्मक ऊर्जा दूर करने और सकारात्मक स्पंदन के लिए पीतल की घंटी और दक्षिणावर्ती शंख।
- आचमन पात्र: जल से भरा पात्र और चम्मच।
राग, ताल एवं गायन समय
भगवान दत्तात्रेय की आरती को शास्त्रीय संगीत के राग कल्याण अथवा राग यमन की धुनों में गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसकी ताल धीमी और मध्यम गति (द्रुत या मध्यलय) की होती है, जिससे मन शांत और एकाग्र हो जाता है।
गायन का सर्वोत्तम समय:
- प्रतिदिन प्रातः काल सूर्योदय के समय (ब्रह्म मुहूर्त या सुबह 6 से 8 बजे के बीच)।
- सायंकाल प्रदोष काल में (संध्या वंदन के समय)।
- विशेषकर मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा, गुरुवार के दिन और दत्तात्रेय जयंती के पावन अवसर पर यह आरती अवश्य गानी चाहिए।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
दत्तात्रेय आरती का नियमित पाठ करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति: अत्यधिक तनाव, चिंता और अवसाद से मुक्ति मिलती है और मन स्थिर होता है।
- पितृ दोष शांति: दत्तात्रेय जी की कृपा से पितरों को मुक्ति मिलती है और पितृ दोष का शमन होता है।
- ज्ञान एवं बुद्धि: विद्यार्थियों और ज्ञान के उपासकों को स्मरण शक्ति और तीव्र बुद्धि की प्राप्ति होती है।
- शत्रु बाधा निवारण: अदृश्य शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है।
- मोक्ष मार्ग की प्राप्ति: साधक भवसागर से तर जाता है और अंत में परम गति को प्राप्त करता है।