पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री दधिमती माता आरती
14 पाठ

श्री दधिमती माता की पावन आरती - जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री दधिमती माता की पावन आरती - जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

माता दधिमती सनातन धर्म और शक्ति उपासना की एक अत्यंत ही प्रभावशाली, जागृत और पौराणिक शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी हैं। माँ महालक्ष्मी और माँ चंडी का संयुक्त स्वरूप मानी जाने वाली श्री दधिमती माता की पावन आरती (Dadhimati Mata Aarti) का गान करने से भक्तों के जीवन के सभी प्रकार के कष्ट, संताप, दरिद्रता और भय का नाश होता है। राजस्थान के नागौर जिले के गोटन के पास स्थित दधिमती माता का यह प्राचीन मंदिर आदि शक्ति के प्रमुख पीठों में शुमार है। यहाँ प्रस्तुत है श्री दधिमती माता की संपूर्ण आरती, इसके गहरे दार्शनिक भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके निरंतर जप व श्रवण से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभों का संपूर्ण और विस्तृत विमर्श।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता।
ब्रह्मू दधिचि तपस्या, सफल करी माता॥
(जय दधिमती माता...)

श्वेत वस्त्र पहनावा, मुकुट सिर साजे।
हाथ त्रिशूल खड़ग वर, शत्रुओं को भाजे॥
(जय दधिमती माता...)

सिंहासन विराजे, जग की महारानी।
तीनों लोक ध्यावें, तेरी महिमा बानी॥
(जय दधिमती माता...)

ऋषि दधीचि की भगिनी, शक्ति अवतारा।
भक्तन के हितकारी, भव से तू तारा॥
(जय दधिमती माता...)

धूप दीप नैवेद्यम, चरणन में लाई।
दरश दिखाओ मैया, बिगड़ी बनाओ आई॥
(जय दधिमती माता...)

जो जन तेरी आरती, प्रेम से गावे।
सुख-संपत्ति पावे, भव भय मिट जावे॥
(जय दधिमती माता...)

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री दधिमती माता की यह आरती केवल स्तुति नहीं, बल्कि माता के स्वरूप और उनके दिव्य आविर्भाव का जीवंत वर्णन है। इस आरती की हर एक पंक्ति में वेदों, पुराणों और ऋषि परंपरा का गहरा सार छिपा है:

"जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता। ब्रह्मू दधिचि तपस्या, सफल करी माता॥"
इस प्रथम पंक्ति में भक्त माता की जयकार करते हुए यह स्मरण करते हैं कि हे माता! आप दधिमती के नाम से पूजित हैं। महर्षि दधीचि की तपस्या और उनके दिव्य तेज से उत्पन्न होकर आपने इस धरा पर अवतरित होकर उनके कुल और तपस्या को पूर्णता प्रदान की है।

"श्वेत वस्त्र पहनावा, मुकुट सिर साजे। हाथ त्रिशूल खड़ग वर, शत्रुओं को भाजे॥"
माता के इस रूप वर्णन में उनके सात्विक और तेजस्वी स्वरूप को दर्शाया गया है। माता ने श्वेत वस्त्र धारण किए हैं, मस्तक पर दैदीप्यमान मुकुट सुशोभित है और उनके हाथों में त्रिशूल, खड़ग (तलवार) तथा अभय मुद्रा सुशोभित है जो दुष्टों और शत्रुओं का नाश करने वाली है।

"सिंहासन विराजे, जग की महारानी। तीनों लोक ध्यावें, तेरी महिमा बानी॥"
माता समस्त ब्रह्मांड की स्वामिनी हैं। वे रत्नजटित सिंहासन पर विराजमान होकर पूरे जगत का संचालन करती हैं। स्वर्ग, पाताल और मृत्युलोक—तीनों लोकों के देवी-देवता और ऋषि-मुनि उनकी महिमा का गान करते हैं।

"ऋषि दधीचि की भगिनी, शक्ति अवतारा। भक्तन के हितकारी, भव से तू तारा॥"
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता दधिमती महान त्यागी महर्षि दधीचि की बहन (भगिनी) और आदिशक्ति दुर्गा का ही प्रत्यक्ष अवतार हैं। वे अपने भक्तों के कल्याण के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं और उन्हें इस भवसागर से पार लगाती हैं।

"धूप दीप नैवेद्यम, चरणन में लाई। दरश दिखाओ मैया, बिगड़ी बनाओ आई॥"
भक्त अत्यंत भावुक होकर माता के चरणों में धूप, दीप और मिष्ठान्न (नैवेद्य) अर्पित करता है और प्रार्थना करता है कि हे मैया! हमें अपने दिव्य दर्शन दें और हमारे जीवन के सभी बिगड़े कार्यों को संवार दें।

"जो जन तेरी आरती, प्रेम से गावे। सुख-संपत्ति पावे, भव भय मिट जावे॥"
आरती के समापन चरण में इस बात का आश्वासन दिया गया है कि जो भी मनुष्य सच्चे प्रेम, निष्ठा और भक्ति भाव से माता दधिमती की इस पावन आरती का गान करता है, वह जीवन में सभी प्रकार के भौतिक सुख, ऐश्वर्य और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करता है। उसके सारे भय हमेशा के लिए मिट जाते हैं।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सनातन संस्कृति में माता दधिमती का इतिहास अति प्राचीन है। इनका मुख्य मंदिर राजस्थान के नागौर जिले के गोटन क्षेत्र में स्थित है, जिसे 'दधिमती माता मंदिर' के नाम से जाना जाता है। यह भारत के प्राचीनतम शक्तिपीठों में से एक है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, दधिमती माता का प्राकट्य माघ शुक्ल सप्तमी (रथ सप्तमी) के दिन हुआ था। इसलिए इस तिथि का माता के भक्तों के लिए विशेष महत्व है। महर्षि दधीचि, जिन्होंने लोक कल्याण हेतु अपनी अस्थियों का दान कर दिया था, उनकी भगिनी (बहन) के रूप में माता दधिमती प्रकट हुईं। माता ने यहाँ विकराल असुर विशालाक्ष का वध किया था।

इस आरती का पाठ करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि माता की विशेष कृपा से रिद्धि-सिद्धि और वंश की वृद्धि होती है। विशेष तौर पर दधिवाल ब्राह्मण समाज और इस क्षेत्र के अन्य अनुयायी अपनी हर शुभ बेला पर माता की आरती अवश्य करते हैं।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. शुद्धता एवं प्रात:स्नान: आरती करने से पूर्व स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ, धुले हुए वस्त्र (विशेषकर लाल, पीले या श्वेत वस्त्र) धारण करें।
  2. स्थान की पवित्रता: पूजा स्थल या मंदिर को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। माता की मूर्ति या तस्वीर को चौकी पर स्थापित करें।
  3. दीपक प्रज्वलन: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। यदि संभव हो तो अखंड ज्योति या कपूर की आरती का भी प्रबंध करें।
  4. पूजन सामग्री अर्पण: माता को रोली, अक्षत (अखंड चावल), लाल पुष्प, सिंदूर, धूप, और नैवेद्य (फल या मिठाई) अर्पित करें।
  5. आरती गान: हाथ में आरती की थाल लेकर पूरे उल्लास, ताल और सुर के साथ 'जय दधिमती माता' का गान करें।
  6. प्रदक्षिणा और क्षमा प्रार्थना: आरती के पश्चात थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कम से कम तीन बार घुमाएं, फिर सभी भक्तों में प्रसाद वितरित करें और अंत में भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

माता दधिमती की आरती को पूर्ण और विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री थाल में अवश्य होनी चाहिए:

  • आरती की थाल: पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: शुद्ध गाय के घी का दीपक (इसमें कपास की बत्ती या मौली की बत्ती का उपयोग करें)।
  • कपूर: शुद्ध कपूर जो वातावरण को सुगंधित और पवित्र करता है।
  • घंटी और शंख: आरती के समय नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाने और सकारात्मक स्पंदन के लिए घंटी बजाना अनिवार्य माना गया है। शंखनाद से पूजा का वातावरण दिव्य बनता है।
  • पुष्प और अक्षत: माता पर चढ़ाने के लिए ताजे लाल फूल और बिना टूटे हुए चावल।
  • धूपबत्ती या अगरबत्ती: सुगंधित धूप जो मन को एकाग्र करती है।

राग, ताल एवं गायन समय

भक्ति संगीत में भावों की प्रधानता होती है। श्री दधिमती माता की आरती को यदि पारंपरिक धुनों और शास्त्रीय रागों में गाया जाए, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:

  • सर्वोत्तम राग: इस आरती को 'राग कल्याण', 'राग यमन' या 'राग भैरवी' की धुनों में अत्यंत मधुरता के साथ गाया जा सकता है।
  • ताल: कहवा (8 मात्रा) या दादरा (6 मात्रा) ताल में इसका गायन बहुत ही कर्णप्रिय और लयबद्ध होता है।
  • गायन का समय: इस आरती को प्रातः काल सूर्योदय के समय (विशेषकर मंगला आरती) और संध्या काल (संध्या आरती) के समय गाना सबसे उत्तम फलदायी माना गया है। माघ शुक्ल सप्तमी के पावन पर्व पर विशेष गायन का विधान है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से श्री दधिमती माता की आरती करने वाले साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शत्रु बाधा का नाश: माता के हाथों में सुशोभित त्रिशूल और खड़ग भक्तों के सभी शत्रुओं और आंतरिक विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) का नाश करते हैं।
  • पारिवारिक सुख-शांति: घर में माता की कृपा से कलह का नाश होता है और सुख, समृद्धि तथा शांति का वास होता है।
  • स्वास्थ्य और आरोग्य: महर्षि दधीचि की कुलदेवी और शक्तिस्वरूपा माता की कृपा से आरोग्यता की प्राप्ति होती है, गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है।
  • मनोवांछित फल की प्राप्ति: जो भक्त सच्चे मन से माता के चरणों में अपनी अर्जी लगाता है, माता उसकी हर मनोकामना को पूर्ण करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: श्री दधिमती माता का मुख्य मंदिर कहाँ स्थित है?
उत्तर: श्री दधिमती माता का प्राचीन और मुख्य मंदिर राजस्थान के नागौर जिले के गोटन कस्बे के पास 'दधिमती माता मंदिर' (दधिमाता) के रूप में स्थित है, जो देश-विदेश के श्रद्धालुओं का प्रमुख आस्था केंद्र है।

प्रश्न: दधिमती माता किसकी अवतार मानी जाती हैं?
उत्तर: माता दधिमती को महर्षि दधीचि की भगिनी (बहन) और आदि शक्ति महालक्ष्मी तथा चंडी का संयुक्त स्वरूप माना जाता है।

प्रश्न: दधिमती माता की आरती कब करनी चाहिए?
उत्तर: माता की आरती प्रतिदिन सुबह और शाम के समय करनी चाहिए। विशेषकर माघ शुक्ल सप्तमी (रथ सप्तमी) और नवरात्रि के दिनों में इसका विशेष अनुष्ठान किया जाता है।

प्रश्न: क्या घर पर भी दधिमती माता की आरती की जा सकती है?
उत्तर: हाँ, आप अपने घर के पूजा स्थल पर माता की तस्वीर या विग्रह स्थापित करके विधि-विधान से यह आरती प्रतिदिन कर सकते हैं।

१. श्री दधिमती माता की पावन आरती - जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री दधिमती माता के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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