॥ श्री दधिमती माता की आरती - जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★माँ दधिमती आदि शक्ति महालक्ष्मी और ब्राह्मी का ही एक अत्यंत तेजस्वी और जागृत स्वरूप हैं, जो विशेष रूप से दधीच ऋषि के कुल और समस्त ब्राह्म समाज तथा सनातन धर्मावलंबियों की आराध्य देवी के रूप में पूजित हैं। 'श्री दधिमती माता की आरती - जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता' का गान करने से भक्तों के जीवन के समस्त अंधकार दूर होते हैं, सुख-समृद्धि का वास होता है और मां की असीम कृपा प्राप्त होती है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम माँ दधिमती की आरती के संपूर्ण बोल, हर एक पंक्ति का गूढ़ भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि, आवश्यक सामग्री तथा इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता।
दधीच ऋषि की कुलदेवी, संकट को घाता॥ टेक॥
शुंभ-निशुंभ विदारिणी, महिषासुर घाती।
ब्रह्म विष्णु शिव सेविनी, जग की सुखदाता॥ जय दधिमती माता...॥
श्वेत वाहन पर विराजे, त्रिशूल हाथ सोहे।
भक्तन के दुःख हरती, मनमोहन मोहे॥ जय दधिमती माता...॥
दधिमती नाम तुम्हारा, पावन जो ध्यावे।
मनवांछित फल पावे, संकट नहिं आवे॥ जय दधिमती माता...॥
गोमती तट विराजे, धाम तुम्हारा सुंदर।
दर्शन मात्र से कटते, पातक के फंदे॥ जय दधिमती माता...॥
धूप दीप नैवेद्य सजाकर, आरती जो गावे।
चरणों में शीश नवावे, भवसागर तरे॥ जय दधिमती माता...॥
जो जन श्रद्धा से ध्यावे, आरती नित गावे।
दास कहे वह नर सीधे, बैकुंठ को जावे॥ जय दधिमती माता...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
जय दधिमती माता, मैया जय दधिमती माता - इस प्रथम पंक्ति में माँ दधिमती की जयकार करते हुए भक्त उन्हें प्रणाम करता है और उनके चरणों में अपनी पूर्ण श्रद्धा समर्पित करता है।
दधीच ऋषि की कुलदेवी, संकट को घाता - महामहर्षि दधीच के वंश और उनके द्वारा स्थापित इस दिव्य शक्ति का स्मरण किया गया है जो अपने भक्तों के सभी प्रकार के संकटों और कष्टों का नाश करती हैं।
शुंभ-निशुंभ विदारिणी, महिषासुर घाती - माँ दधिमती साक्षात आदिशक्ति दुर्गा का ही स्वरूप हैं, जिन्होंने महादैत्यों और असुरों जैसे शुंभ, निशुंभ और महिषासुर का वध करके देवताओं और ब्रह्मांड की रक्षा की थी।
ब्रह्म विष्णु शिव सेविनी, जग की सुखदाता - ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव जिनकी सेवा और आराधना करते हैं तथा जो संपूर्ण संसार को सुख और वैभव प्रदान करने वाली हैं।
श्वेत वाहन पर विराजे, त्रिशूल हाथ सोहे - माँ का यह रूप अत्यंत मनमोहक है, वे अपने श्वेत वाहन पर विराजमान हैं और उनके हाथों में त्रिशूल जैसे दिव्य अस्त्र सुशोभित होते हैं।
भक्तन के दुःख हरती, मनमोहन मोहे - अपने सच्चे भक्तों के दुखों का निवारण करना उनका स्वभाव है और उनका यह स्वरूप भक्तों के मन को मोह लेता है।
दधिमती नाम तुम्हारा, पावन जो ध्यावे - जो भी साधक सच्चे मन से माँ के पावन नाम का स्मरण और ध्यान करता है।
मनवांछित फल पावे, संकट नहिं आवे - उसे अपने जीवन में सभी मनचाहे फलों की प्राप्ति होती है और उसके समीप कोई संकट या बाधा नहीं आ सकती।
गोमती तट विराजे, धाम तुम्हारा सुंदर - माँ दधिमती का ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिर गोमती नदी के तट पर स्थित है, जो अत्यंत भव्य और रमणीय है।
दर्शन मात्र से कटते, पातक के फंदे - माँ के इस पवित्र धाम में केवल दर्शन मात्र से ही मनुष्यों के पूर्वजन्मों के पापों और बंधनों का नाश हो जाता है।
धूप दीप नैवेद्य सजाकर, आरती जो गावे - जो भी भक्त श्रद्धा भाव से धूप, दीप, नैवेद्य और पंचोपचार से माँ की आरती करता है।
चरणों में शीश नवावे, भवसागर तरे - वह माँ के चरणों में अपना मस्तक झुकाकर इस संसार रूपी भवसागर को आसानी से पार कर जाता है और मोक्ष को प्राप्त होता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में माँ दधिमती का स्थान अत्यंत उच्च और विशिष्ट है। पुराणों के अनुसार, दधिमती माता का प्रकटोत्सव और उनका इतिहास महर्षि दधीच के जीवन से जुड़ा हुआ है। दधीच ऋषि ने लोक कल्याण के लिए अपनी अस्थियों का दान किया था, जिससे देवराज इंद्र का वज्र बना था। उसी महान ऋषि के कुल और तेज से माँ दधिमती प्रकट हुईं। राजस्थान के नागौर जिले के जायल क्षेत्र में स्थित दधिमती माता का मंदिर देश के प्राचीनतम शक्तिपीठों में गिना जाता है। यहाँ माता की मूर्ति प्राकृतिक रूप से प्रकट (स्वयंभू) मानी जाती है।
दधिमती माता की आरती का गान करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मान्यता है कि जो परिवार नियमित रूप से इस आरती का पाठ करता है, उस पर माँ की कृपा सदैव बनी रहती है। यह आरती विशेष रूप से नवरात्रि, दधिमती जयंती और प्रत्येक मंगलवार तथा शुक्रवार को सामूहिक रूप से गाने का विशेष महत्व है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
आरती करने की एक निश्चित सनातन पद्धति होती है जिसका पालन करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
- सबसे पहले प्रातकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें और माँ दधिमती की मूर्ति या चित्र के समक्ष आसन बिछाकर बैठें।
- माँ के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक और कपूर प्रज्वलित करें।
- पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन और नैवेद्य अर्पित करें।
- हाथ में पुष्प लेकर एकाग्र चित्त से 'श्री दधिमती माता की आरती' का सस्वर गान करें।
- आरती पूर्ण होने के बाद माता को भोग लगाएं और आरती की थाल को पूरे परिवार में घुमाकर सभी लोग आँखों से लगाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
आरती को विधि-विधान से संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:
- शुद्ध पीतल या तांबे की आरती की थाल
- गाय के शुद्ध घी का दीपक (या कपूर दान)
- रोली, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल) और लाल पुष्प
- धूपबत्ती और अगरबत्ती
- नैवेद्य के रूप में मिष्ठान, फल या खीर का भोग
- शंख और घंटी (जो आरती के समय बजाए जाते हैं)
- जल से भरा आचमन पात्र
राग, ताल एवं गायन समय
श्री दधिमती माता की आरती को यदि शास्त्रीय सुगम संगीत के नियमों के अनुसार गाया जाए तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। इस आरती को मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन की स्वर लहरियों में गाया जाता है, जो मन को असीम शांति और भक्ति रस से भर देते हैं। इसे ताल कहरवा (8 मात्रा) में आसानी से गाया जा सकता है। आरती का सर्वोत्तम गायन समय प्रातःकाल मंगला आरती के समय (सुबह 5 से 7 बजे के बीच) या संध्याकालीन बेला में (शाम 6 से 8 बजे के बीच) अत्यंत फलदायी माना गया है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री दधिमती माता की आरती करने से साधक को निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- शत्रु नाश एवं सुरक्षा: माँ के त्रिशूल धारी स्वरूप के स्मरण से शत्रुओं का भय समाप्त होता है और जीवन में सुरक्षा चक्र बनता है।
- पारिवारिक सुख-शांति: घर-परिवार में क्लेश समाप्त होकर आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ता है।
- आरोग्य लाभ: माता के आशीर्वाद से शारीरिक बीमारियां और मानसिक तनाव दूर होते हैं।
- समृद्धि और वैभव: व्यापार, नौकरी और कार्यक्षेत्र में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और आर्थिक उन्नति के मार्ग खुलते हैं।