पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री चित्रगुप्त महाराज आरती
8 पाठ

श्री चित्रगुप्त महाराज की पावन आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन / भैरवी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री चित्रगुप्त महाराज की पावन आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

श्री चित्रगुप्त महाराज, जो साक्षात धर्मराज के लेखपाल और सृष्टि के समस्त कर्मों के लेखा-जोखा रखने वाले देव हैं, उनकी आराधना का विशेष महत्व है। 'ॐ जय चित्रगुप्त देवा' आरती का गायन न केवल मन को शांति प्रदान करता है, बल्कि हमें अपने कर्मों के प्रति सचेत भी करता है। इस लेख में हम चित्रगुप्त महाराज की आरती, उसके गूढ़ अर्थ और पूजा की शास्त्रीय विधि का विस्तार से वर्णन करेंगे।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा।
पाप-पुण्य के लेखा, तुम ही हो देवा॥ ॐ जय...

यमपुरी के तुम स्वामी, न्याय के हो दाता।
कर्मों का फल देने, तुम ही हो विधाता॥ ॐ जय...

कलम हाथ में सोहे, द्वात लिए कर में।
सृष्टि का हर लेखा, अंकित है मन में॥ ॐ जय...

ब्रह्मा के तुम अंश हो, धर्मराज के साथी।
भक्तों के तुम रक्षक, दुख के हो घाती॥ ॐ जय...

जो कोई तुमको ध्यावे, सुख-संपत्ति पावे।
यम के भय से छूटे, भव से तर जावे॥ ॐ जय...

चित्रगुप्त की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत 'भक्तलोक' स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

आरती की प्रथम पंक्ति 'ॐ जय चित्रगुप्त देवा' में हम प्रभु की जयकार करते हैं। चित्रगुप्त महाराज को 'पाप-पुण्य का लेखा' रखने वाला कहा गया है, जिसका अर्थ है कि हमारे हर छोटे-बड़े कर्म का हिसाब उनके पास सुरक्षित है। 'यमपुरी के तुम स्वामी' का अर्थ है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा का जो न्याय होता है, उसमें चित्रगुप्त जी की भूमिका सर्वोपरि है। वे न्याय के साक्षात देवता हैं। 'कलम हाथ में सोहे' पंक्ति उनके स्वरूप का वर्णन करती है, जहाँ वे लेखनी और स्याही (द्वात) धारण किए हुए हैं, जो ज्ञान और कर्म की शुद्धता का प्रतीक है। अंत में, जो भक्त उनकी शरण में आता है, वह यम के भय से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। यह आरती हमें यह सिखाती है कि हम अपने जीवन में जो भी कर्म करें, वे धर्म के अनुकूल हों, क्योंकि चित्रगुप्त महाराज की दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चित्रगुप्त महाराज का जन्म भगवान ब्रह्मा की काया से हुआ था, इसीलिए उनके वंशजों को 'कायस्थ' कहा जाता है। वे धर्मराज यम के सचिव हैं और ब्रह्मांड के समस्त जीवों के कर्मों का 'चित्रगुप्त' (गुप्त चित्र) रखते हैं। उनकी पूजा करने से मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजगता प्राप्त होती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को 'चित्रगुप्त पूजा' या 'यम द्वितीया' के रूप में मनाया जाता है, जो भाई-बहन के प्रेम और लेखनी के पूजन का महापर्व है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

आरती करने के लिए सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर चित्रगुप्त महाराज का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें अक्षत, पुष्प, चंदन और धूप-दीप अर्पित करें। भोग के रूप में मिष्ठान या फल चढ़ाएं। इसके बाद घी का दीपक जलाकर श्रद्धापूर्वक आरती करें। आरती के समय घंटी और शंख का नाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

  • शुद्ध घी का दीपक (पंचमुखी हो तो उत्तम)
  • कपूर (आरती के अंत में जलाने हेतु)
  • धूप, अगरबत्ती और चंदन
  • ताजे पुष्प (विशेषकर गेंदा या कमल)
  • अक्षत (बिना टूटे चावल)
  • मिष्ठान या नैवेद्य
  • शंख और घंटी

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से चित्रगुप्त महाराज की आरती करने से व्यक्ति के जीवन में अनुशासन आता है। यह आरती हमें स्मरण कराती है कि हमारे कर्म ही हमारा भविष्य निर्धारित करते हैं। इससे मानसिक शांति, कार्यों में सफलता और मृत्यु के पश्चात सद्गति की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री चित्रगुप्त महाराज की पावन आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री चित्रगुप्त महाराज के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री श्री चित्रगुप्त महाराज जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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