॥ श्री चित्रगुप्त महाराज की पावन आरती - ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★श्री चित्रगुप्त महाराज, जो साक्षात धर्मराज के लेखपाल और सृष्टि के समस्त कर्मों के लेखा-जोखा रखने वाले देव हैं, उनकी आराधना का विशेष महत्व है। 'ॐ जय चित्रगुप्त देवा' आरती का गायन न केवल मन को शांति प्रदान करता है, बल्कि हमें अपने कर्मों के प्रति सचेत भी करता है। इस लेख में हम चित्रगुप्त महाराज की आरती, उसके गूढ़ अर्थ और पूजा की शास्त्रीय विधि का विस्तार से वर्णन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय चित्रगुप्त देवा, स्वामी जय चित्रगुप्त देवा।
पाप-पुण्य के लेखा, तुम ही हो देवा॥ ॐ जय...
यमपुरी के तुम स्वामी, न्याय के हो दाता।
कर्मों का फल देने, तुम ही हो विधाता॥ ॐ जय...
कलम हाथ में सोहे, द्वात लिए कर में।
सृष्टि का हर लेखा, अंकित है मन में॥ ॐ जय...
ब्रह्मा के तुम अंश हो, धर्मराज के साथी।
भक्तों के तुम रक्षक, दुख के हो घाती॥ ॐ जय...
जो कोई तुमको ध्यावे, सुख-संपत्ति पावे।
यम के भय से छूटे, भव से तर जावे॥ ॐ जय...
चित्रगुप्त की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत 'भक्तलोक' स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय...
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
आरती की प्रथम पंक्ति 'ॐ जय चित्रगुप्त देवा' में हम प्रभु की जयकार करते हैं। चित्रगुप्त महाराज को 'पाप-पुण्य का लेखा' रखने वाला कहा गया है, जिसका अर्थ है कि हमारे हर छोटे-बड़े कर्म का हिसाब उनके पास सुरक्षित है। 'यमपुरी के तुम स्वामी' का अर्थ है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा का जो न्याय होता है, उसमें चित्रगुप्त जी की भूमिका सर्वोपरि है। वे न्याय के साक्षात देवता हैं। 'कलम हाथ में सोहे' पंक्ति उनके स्वरूप का वर्णन करती है, जहाँ वे लेखनी और स्याही (द्वात) धारण किए हुए हैं, जो ज्ञान और कर्म की शुद्धता का प्रतीक है। अंत में, जो भक्त उनकी शरण में आता है, वह यम के भय से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। यह आरती हमें यह सिखाती है कि हम अपने जीवन में जो भी कर्म करें, वे धर्म के अनुकूल हों, क्योंकि चित्रगुप्त महाराज की दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चित्रगुप्त महाराज का जन्म भगवान ब्रह्मा की काया से हुआ था, इसीलिए उनके वंशजों को 'कायस्थ' कहा जाता है। वे धर्मराज यम के सचिव हैं और ब्रह्मांड के समस्त जीवों के कर्मों का 'चित्रगुप्त' (गुप्त चित्र) रखते हैं। उनकी पूजा करने से मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति सजगता प्राप्त होती है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को 'चित्रगुप्त पूजा' या 'यम द्वितीया' के रूप में मनाया जाता है, जो भाई-बहन के प्रेम और लेखनी के पूजन का महापर्व है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम
आरती करने के लिए सर्वप्रथम स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर चित्रगुप्त महाराज का चित्र या प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें अक्षत, पुष्प, चंदन और धूप-दीप अर्पित करें। भोग के रूप में मिष्ठान या फल चढ़ाएं। इसके बाद घी का दीपक जलाकर श्रद्धापूर्वक आरती करें। आरती के समय घंटी और शंख का नाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
- शुद्ध घी का दीपक (पंचमुखी हो तो उत्तम)
- कपूर (आरती के अंत में जलाने हेतु)
- धूप, अगरबत्ती और चंदन
- ताजे पुष्प (विशेषकर गेंदा या कमल)
- अक्षत (बिना टूटे चावल)
- मिष्ठान या नैवेद्य
- शंख और घंटी
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से चित्रगुप्त महाराज की आरती करने से व्यक्ति के जीवन में अनुशासन आता है। यह आरती हमें स्मरण कराती है कि हमारे कर्म ही हमारा भविष्य निर्धारित करते हैं। इससे मानसिक शांति, कार्यों में सफलता और मृत्यु के पश्चात सद्गति की प्राप्ति होती है।