॥ श्री बृहस्पति देव की आरती: जय बृहस्पति देवा - गुरुवार व्रत की संपूर्ण आरती एवं विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन धर्म में बृहस्पति देव को देवताओं के गुरु (देवगुरु) के रूप में पूजा जाता है। वे बुद्धि, ज्ञान, दर्शन, और धर्म के अधिष्ठाता देव हैं। ज्योतिष शास्त्र में इन्हें 'गुरु' ग्रह के रूप में जाना जाता है, जो नवग्रहों में सबसे शुभ और प्रभावशाली माने जाते हैं। बृहस्पति देव की आरती 'जय बृहस्पति देवा' मुख्य रूप से गुरुवार के व्रत के समापन पर गाई जाती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, बृहस्पति देव महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं। उनकी आराधना से मनुष्य को मानसिक शांति, उत्तम स्वास्थ्य, और अपार धन-संपत्ति प्राप्त होती है। इस आरती की रचना पारंपरिक भक्ति काल के संतों द्वारा की गई मानी जाती है, जिसमें गुरु की महिमा का गुणगान अत्यंत सरल किंतु प्रभावशाली शब्दों में किया गया है। यह आरती साधक के भीतर सात्विक गुणों का विकास करती है और अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
जय बृहस्पति देवा, ओम जय बृहस्पति देवा ।
छिन छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा ॥ ओम जय बृहस्पति देवा...तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी ।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ ओम जय बृहस्पति देवा...चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हारी ।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भारी ॥ ओम जय बृहस्पति देवा...तन, मन, धन अर्पण कर, जो शरण पड़े ।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े ॥ ओम जय बृहस्पति देवा...दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी ।
पाप दोष सब हरता, भव बंधन हारी ॥ ओम जय बृहस्पति देवा...सकल मनोरथ दायक, सब संशय टारे ।
विषय विकार मिटाओ, संतन के प्यारे ॥ ओम जय बृहस्पति देवा...जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे ।
जेष्ठानंद आनंद, सो निश्चय पावे ॥ ओम जय बृहस्पति देवा...
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
बृहस्पति देव की इस आरती का प्रत्येक पद आध्यात्मिक रहस्यों से भरा हुआ है। यहाँ इसका विस्तृत भावार्थ प्रस्तुत है:
प्रथम पद: जय बृहस्पति देवा...
इस पंक्ति में भक्त अपने आराध्य देवगुरु बृहस्पति की जय-जयकार करता है। 'छिन छिन भोग लगाऊं' का अर्थ है कि भक्त निरंतर प्रभु का स्मरण करते हुए उन्हें कदली (केला) और मेवे का भोग अर्पित करना चाहता है। गुरुवार के व्रत में केले के वृक्ष की पूजा और केले का विशेष महत्व है, जो बृहस्पति देव की प्रिय वस्तु मानी जाती है।
द्वितीय पद: तुम पूर्ण परमात्मा...
यहाँ बृहस्पति देव को केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि साक्षात 'पूर्ण परमात्मा' और 'अंतर्यामी' के रूप में स्वीकार किया गया है। वे जगत के पिता और ईश्वर हैं, जो प्रत्येक जीव के हृदय की बात जानते हैं। यह पद अद्वैत दर्शन को दर्शाता है जहाँ गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं माना गया है।
तृतीय पद: चरणामृत निज निर्मल...
गुरु के चरणों का अमृत (चरणामृत) अत्यंत निर्मल और पवित्र होता है। यह सभी पापों (पातक) का नाश करने वाला है। भक्त प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, आप सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं, मुझ पर अपनी असीम कृपा बनाए रखें।
चतुर्थ पद: तन, मन, धन अर्पण कर...
यह पद पूर्ण शरणागति का संदेश देता है। जो भक्त अपना सर्वस्व (तन, मन और धन) ईश्वर को समर्पित कर देता है, भगवान स्वयं उसके द्वार पर आकर उसे दर्शन देते हैं और उसके कष्टों का निवारण करते हैं।
पंचम पद: दीनदयाल दयानिधि...
बृहस्पति देव को 'दयानिधि' (दया का खजाना) कहा गया है। वे अपने भक्तों के हित के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। वे सांसारिक बंधनों और पापों से मुक्ति दिलाने वाले एकमात्र देव हैं।
षष्ठ पद: सकल मनोरथ दायक...
गुरु की कृपा से मन के सभी संशय (संदेह) दूर हो जाते हैं। वे हमारे भीतर के विषय-विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह) को मिटाकर हमें संतों जैसा पवित्र जीवन प्रदान करते हैं।
सप्तम पद: जो कोई आरती तेरी...
आरती के फलश्रुति भाग में कहा गया है कि जो भी मनुष्य प्रेम और श्रद्धा के साथ इस आरती का गान करता है, उसे 'जेष्ठानंद' यानी परम आनंद की प्राप्ति होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है।
गायन का राग, ताल एवं धुन
बृहस्पति देव की आरती का गायन शास्त्रीय और सुगम संगीत के समन्वय से किया जाता है। संगीत के दृष्टिकोण से इसका विवरण निम्नलिखित है:
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| मुख्य राग | राग बिलावल (सभी शुद्ध स्वर) या राग यमन |
| ताल | कहरवा ताल (8 मात्राएं) |
| लय | मध्य लय (Medium Tempo) |
| भाव | भक्ति और शांति रस |
राग बिलावल का उपयोग इसलिए किया जाता है क्योंकि यह राग अत्यंत सात्विक और प्रसन्नता देने वाला माना जाता है। गुरुवार के दिन सुबह या संध्या काल में इस राग में आरती गाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
आरती केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि एक संपूर्ण अनुष्ठान है। बृहस्पति देव की आरती करते समय निम्नलिखित विधि का पालन करना चाहिए:
- पीले वस्त्र धारण करें: गुरुवार का दिन पीले रंग को समर्पित है, इसलिए पूजा और आरती के समय पीले वस्त्र पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- दीपक की तैयारी: शुद्ध घी का दीपक जलाएं। यदि संभव हो तो पीतल के दीपक का उपयोग करें। दीपक में रुई की बत्ती के साथ थोड़ा सा केसर या हल्दी डालना शुभ होता है।
- थाली घुमाने का क्रम: आरती की थाली को भगवान की प्रतिमा के सामने 'ॐ' की आकृति बनाते हुए घुमाएं। सबसे पहले चरणों की चार बार, नाभि की दो बार, मुख की एक बार और अंत में पूरे शरीर की सात बार आरती उतारनी चाहिए।
- पीले पुष्प और अक्षत: आरती के दौरान हाथ में पीले फूल और हल्दी से रंगे हुए अक्षत रखें और आरती पूर्ण होने पर उन्हें भगवान के चरणों में अर्पित करें।
- प्रसाद वितरण: आरती के बाद चने की दाल और गुड़ का प्रसाद वितरित करें।
कर्पूर का महत्व व फलश्रुति
आरती के अंत में 'कर्पूरगौरं करुणावतारं' मंत्र का जाप किया जाता है। कपूर (Camphor) का जलना इस बात का प्रतीक है कि जैसे कपूर बिना कोई अवशेष छोड़े जल जाता है, वैसे ही भक्त का अहंकार भी ईश्वर की भक्ति में विलीन हो जाना चाहिए।
फलश्रुति (Benefits):
- बृहस्पति देव की नियमित आरती से कुंडली में गुरु दोष समाप्त होता है।
- विद्यार्थियों को एकाग्रता और उच्च शिक्षा में सफलता प्राप्त होती है।
- विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और सुखद वैवाहिक जीवन की प्राप्ति होती है।
- आर्थिक तंगी दूर होती है और व्यापार में उन्नति के मार्ग खुलते हैं।
Frequently Asked Questions (FAQs)
प्रश्न 1: बृहस्पति देव की आरती किस समय करनी चाहिए?
उत्तर: बृहस्पति देव की आरती मुख्य रूप से गुरुवार को सूर्योदय के समय या संध्या काल में करनी चाहिए। यदि आपने गुरुवार का व्रत रखा है, तो कथा के पश्चात आरती करना अनिवार्य है।
प्रश्न 2: क्या महिलाएं बृहस्पति देव की आरती कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, महिलाएं पूर्ण श्रद्धा के साथ बृहस्पति देव की पूजा और आरती कर सकती हैं। गुरुवार का व्रत महिलाओं के लिए विशेष रूप से सुखद वैवाहिक जीवन के लिए फलदायी माना जाता है।
प्रश्न 3: आरती के समय पीले रंग का क्या महत्व है?
उत्तर: पीला रंग बृहस्पति ग्रह का प्रतीक है। यह रंग ज्ञान, संपन्नता और सात्विकता को दर्शाता है। इसलिए आरती में पीले फूल, पीले वस्त्र और पीले चंदन का प्रयोग किया जाता है।
प्रश्न 4: क्या बिना व्रत रखे भी यह आरती की जा सकती है?
उत्तर: अवश्य। यदि आप व्रत नहीं भी रख पा रहे हैं, तो केवल श्रद्धापूर्वक आरती करने और गुरु देव का ध्यान करने से भी मानसिक शांति और बुद्धि की प्राप्ति होती है।
प्रश्न 5: आरती के बाद कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
उत्तर: आरती के बाद 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। इसके अतिरिक्त क्षमा प्रार्थना भी करनी चाहिए ताकि पूजा में हुई किसी भी त्रुटि के लिए ईश्वर से क्षमा मिल सके।