॥ श्री भुवनेश्वर भगवान की आरती - ॐ जय भुवनेश्वर देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★देवाधिदेव महादेव के परम पावन स्वरूप त्रिभुवनेश्वर अर्थात भगवान भुवनेश्वर की आरती संपूर्ण चराचर जगत में आध्यात्मिक प्रकाश, पाप-शमन और मनोवांछित फल प्रदान करने वाली मानी गई है। ओडिशा की पावन धरा एकाम्र क्षेत्र (भुवनेश्वर) में श्री हरि और हर (विष्णु और शिव) के संयुक्त स्वरूप के रूप में पूजित भगवान लिंगराज-भुवनेश्वर की नित्य आरती करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के संकट, दारिद्र्य और अज्ञान का नाश होता है। इस प्रामाणिक लेख में भगवान भुवनेश्वर की दिव्य आरती, उसका गूढ़ आध्यात्मिक भावार्थ, षोडशोपचार आरती विधि और फलश्रुति प्रस्तुत की गई है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
॥ श्री भुवनेश्वर भगवान की आरती ॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा।
त्रिभुवन पालक शंकर, त्रिभुवन पालक शंकर, हरहु सकल क्लेशा॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
भाल विशाल विराजे, शशि की शुभ्र कला।
गंगा जटा में सोहे, गल मुंडन की माला॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
हरि-हर रूप मनोहर, एकाम्र धाम बसे।
बिंदु सरोवर तीरे, पावन दरश लसे॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
कर त्रिशूल डमरू धर, वृषभ सवारी करे।
भक्तन के हितकारी, भव-भय दूर हरे॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
अंग भभूत रमाये, बाघांबर परिधान।
सुर-नर-मुनि-गंधर्वा, करत चरण ध्यान॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, गुण गावत निशिदिन।
जो जन शरण तुम्हारी, संकट रहे न तिन॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
दीनदयाल कृपालु, तुम हो जग के तात।
अक्षय सुख-संपत्ति दो, काटो यम के पात॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
आरती भुवनेश्वर जी की, जो कोई नर गावे।
कहत सकल शिव-भक्ता, मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
स्वामी जय भुवनेश्वर देवा, प्रभु जय भुवनेश्वर देवा।
त्रिभुवन पालक शंकर, हरहु सकल क्लेशा॥
ॐ जय भुवनेश्वर देवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान भुवनेश्वर की आरती केवल संगीतमय पदों का संकलन नहीं है, अपितु यह वेद-वेदांगों में वर्णित औपनिषदिक शिव-तत्त्व का साकार स्तुति-गान है। नीचे इस आरती की प्रत्येक पंक्ति का विशद एवं आध्यात्मिक भावार्थ प्रस्तुत है:
प्रथम पद: स्तुति एवं क्लेश-निवारण प्रार्थना
"ॐ जय भुवनेश्वर देवा, स्वामी जय भुवनेश्वर देवा। त्रिभुवन पालक शंकर, हरहु सकल क्लेशा॥"
भावार्थ: हे संपूर्ण ब्रह्मांड के अधिपति, तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्त्य और पाताल) का संचालन और पालन करने वाले भगवान भुवनेश्वर! आपकी सदा जय हो। हे कल्याणकारी शंकर! आप चराचर जगत के संरक्षक हैं। हे प्रभु, हम सांसारिक दुखों, त्रिविध तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) तथा समस्त मानसिक व शारीरिक क्लेशों से घिरे हैं। अपनी कृपादृष्टि से हमारे समस्त कष्टों का तुरंत निवारण कीजिए।
द्वितीय पद: दिव्य रूप एवं आभूषणों का दर्शन
"भाल विशाल विराजे, शशि की शुभ्र कला। गंगा जटा में सोहे, गल मुंडन की माला॥"
भावार्थ: भगवान भुवनेश्वर का स्वरूप अद्वितीय और अलौकिक है। उनके चौड़े और दिव्य ललाट पर द्वितीया का शीतल चंद्रमा सुशोभित है, जो ज्ञान और शीतलता का प्रतीक है। उनकी जटाओं में पतित-पावनी मां गंगा प्रवाहित हो रही हैं, जो जीवों का उद्धार करती हैं। उनके गले में मुंडों की माला इस बात का बोध कराती है कि काल भी उनके अधीन है और वे समय व मृत्यु के स्वामी महाकाल हैं।
तृतीय पद: हरि-हर रूप एवं एकाम्र क्षेत्र की महिमा
"हरि-हर रूप मनोहर, एकाम्र धाम बसे। बिंदु सरोवर तीरे, पावन दरश लसे॥"
भावार्थ: भुवनेश्वर के श्री लिंगराज मंदिर में भगवान शिव और भगवान विष्णु का अभेद रूप, जिसे 'हरि-हर' कहा जाता है, प्रतिष्ठित है। वे पावन एकाम्र क्षेत्र (प्राचीन भुवनेश्वर) में निवास करते हैं। पवित्र बिंदु सरोवर के तट पर विराजमान भगवान का दर्शन मात्र से प्राणी के सहस्रों जन्मों के पाप धुल जाते हैं और चित्त में शांति का प्राकट्य होता है।
चतुर्थ पद: आयुध एवं अभयदान
"कर त्रिशूल डमरू धर, वृषभ सवारी करे। भक्तन के हितकारी, भव-भय दूर हरे॥"
भावार्थ: प्रभु के हाथों में त्रिशूल है, जो तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) के संतुलन का प्रतीक है, और डमरू नादब्रह्म का उद्घोषक है। वे धर्म के प्रतीक नंदी बैल (वृषभ) पर आरूढ़ हैं। भगवान शिव अपने अनन्य भक्तों के परम हितैषी हैं और वे जन्म-मरण के सांसारिक भय (भव-भय) को पल भर में हर लेते हैं।
पंचम एवं षष्ठ पद: विरक्ति एवं देवताओं द्वारा वंदना
"अंग भभूत रमाये, बाघांबर परिधान... ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, गुण गावत निशिदिन॥"
भावार्थ: प्रभु अपने संपूर्ण शरीर पर भस्म लगाए हुए हैं, जो जगत की नश्वरता का संदेश देती है। उन्होंने व्याघ्रचर्म धारण किया हुआ है, जो अहंकार और वासनाओं पर विजय का प्रतीक है। देव, दानव, ऋषि-मुनि और गंधर्व निरंतर उनके चरणों का ध्यान करते हैं। त्रिदेव भी आपके अनिर्वचनीय स्वरूप का गुणगान करते हैं। जो भी प्राणी आपकी शरण में आता है, वह समस्त संकटों से मुक्त हो जाता है।
सप्तम एवं अष्टम पद: फलश्रुति
"दीनदयाल कृपालु, तुम हो जग के तात... कहत सकल शिव-भक्ता, मनवांछित फल पावे॥"
भावार्थ: हे दीनों पर दया करने वाले परमपिता! आप इस सृष्टि के पिता हैं। हमें अक्षय सुख, भक्ति और सद्बुद्धि प्रदान कीजिए तथा यमराज के पाश (मृत्यु और भय) से मुक्ति दीजिए। जो भी श्रद्धालु एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इस आरती का गायन करता है, वह संसार के समस्त सुखों को भोगकर अंत में परम पद प्राप्त करता है।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
हिंदू धर्मग्रंथों, विशेषकर 'एकाम्र पुराण', 'शिव पुराण' और 'स्कंद पुराण' में भगवान भुवनेश्वर की अपार महिमा वर्णित है। भुवनेश्वर का शाब्दिक अर्थ है—'भुवनानाम् ईश्वरः' अर्थात तीनों भुवनों के एकमात्र स्वामी।
- हरि-हर समन्वय का प्रतीक: भुवनेश्वर में लिंगराज स्वरूप में शिव और विष्णु दोनों समाहित हैं। यहाँ बिल्वपत्र के साथ-साथ तुलसी दल भी अर्पित किए जाने की अद्वितीय परंपरा है। इसलिए इस आरती का गायन करने से साधक को एक साथ महादेव शिव और श्रीहरि विष्णु दोनों की सम्मिलित कृपा प्राप्त होती है।
- पंचमहाभूतों की शुद्धि: आरती के समय प्रज्वलित दीपक, धूप, शंखध्वनि और कर्पूर का धुआं वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और साधक के सूक्ष्म शरीर के पंच-तत्वों को संतुलित करता है।
- कालसर्प एवं ग्रह दोष निवारण: भगवान भुवनेश्वर की नित्य आरती करने से कुंडली के राहू-केतु जनित दोष, कालसर्प दोष तथा शनि की साढ़ेसाती के नकारात्मक प्रभाव शांत होते हैं।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
शास्त्रों के अनुसार किसी भी देवता की आरती करते समय कुछ शास्त्रीय नियमों का पालन अनिवार्य है, जिससे पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
पूर्व तैयारी एवं शुद्धि
आरती करने से पूर्व स्नानादि से निवृत्त होकर श्वेत या पीले स्वच्छ वस्त्र धारण करें। आरती का स्थान पूर्णतः स्वच्छ और गंगाजल से पवित्र होना चाहिए। भगवान भुवनेश्वर की प्रतिमा या शिवलिंग के समक्ष पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके खड़े हों।
थाल घुमाने का शास्त्रीय क्रम
आरती की थाली को भगवान के विग्रह के सम्मुख 'ॐ' (प्रणव) की आकृति बनाते हुए घड़ी की दिशा (क्लॉकवाइज) में घुमाना चाहिए:
- चरणों में: सबसे पहले आरती की थाली को भगवान के श्रीचरणों में चार (4) बार घुमाएं।
- नाभि प्रदेश में: तदुपरांत भगवान की नाभि के समक्ष दो (2) बार घुमाएं।
- मुखमंडल पर: इसके पश्चात भगवान के दिव्य मुखारविंद के सामने एक (1) बार घुमाएं।
- समस्त विग्रह पर: अंत में भगवान के संपूर्ण श्रीअंग पर सात (7) बार घुमाएं।
इस प्रकार कुल चौदह बार आरती घुमाने का विधान शास्त्रों में सर्वोपरि माना गया है।
आरती के उपरांत मंत्र पुष्पांजलि एवं क्षमा प्रार्थना
आरती संपन्न होने के पश्चात आचमन पात्र से जल लेकर थाली के चारों ओर तीन बार जल घुमाकर भूमि पर छोड़ें (इसे नीराजन अर्पण कहते हैं)। इसके पश्चात दोनों हाथों से आरती की लौ को स्पर्श कर अपने मस्तक, नेत्र और हृदय पर लगाएं। अंत में 'कर्पूरगौरं करुणावतारं' मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान को पुष्पांजलि अर्पित करें और पूजा में अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा याचना करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
भगवान भुवनेश्वर की आरती के लिए प्रयुक्त होने वाली सामग्रियां शुद्ध, सात्विक और शास्त्रीय दृष्टि से उपयुक्त होनी चाहिए:
| सामग्री | महत्व एवं उपयोग |
|---|---|
| आरती की थाल | पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली, जिस पर कुंकुम से स्वास्तिक बना हो। |
| पंचमुखी अथवा एकमुखी दीपक | शुद्ध गाय के घी का दीपक, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। |
| भीमसेनी कर्पूर | शुद्ध कपूर, जिसकी सुगंध वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर वातावरण को सात्विक बनाती है। |
| पूजा घंटी (गरुड़ घंटी) | आरती के समय निरंतर लयबद्ध घंटी बजाने से देवी-देवता आकर्षित होते हैं और आसुरी शक्तियां दूर भागती हैं। |
| दक्षिणावर्ती / वामावर्ती शंख | आरती के प्रारंभ और समापन पर तीन बार शंखनाद करना ब्रह्मांडीय ओंकार ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है। |
| बिल्वपत्र एवं श्वेत पुष्प | भगवान शिव को अत्यंत प्रिय त्रिनेत्र रूपी तीन पत्तियों वाले अखंडित बेलपत्र और सुगंधित पुष्प। |
| जल कलश एवं आचमनी | आरती शांत करने और नीराजन अनुष्ठान हेतु शुद्ध गंगाजल युक्त लोटा। |
राग, ताल एवं गायन समय
भगवान भुवनेश्वर की आरती को शास्त्रीय संगीत के नियमों के अनुसार गाना अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
- राग: इस आरती का गायन मुख्य रूप से राग कल्याण (यमन) अथवा राग बिलावल में किया जाता है। संध्याकालीन आरती के लिए राग यमन अत्यंत शांत और भक्तिभाव जाग्रत करने वाला होता है।
- ताल: आरती का गायन मुख्यतः कहरवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा) में धीमी गति से प्रारंभ होकर क्रमशः मध्य गति में किया जाता है।
- सर्वश्रेष्ठ समय:
- प्रातःकाल (मंगला आरती): ब्रह्ममुहूर्त से सूर्योदय के मध्य (प्रातः 4:30 से 6:00 बजे)।
- संध्याकाल (प्रदोष काल): सूर्यास्त के समय (संध्या 6:30 से 7:30 बजे)। विशेष रूप से सोमवार, महाशिवरात्रि और प्रत्येक मास के प्रदोष व्रत के दिन संध्या आरती का अनंत गुना फल मिलता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
जो श्रद्धालु नियमित रूप से घर पर अथवा मंदिर में भगवान भुवनेश्वर की आरती का श्रवण और कीर्तन करते हैं, उन्हें निम्नलिखित आध्यात्मिक और लौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- मानसिक शांति और तनाव मुक्ति: भगवान शिव आशुतोष हैं। उनकी आरती में ध्यान केंद्रित करने से चंचल मन शांत होता है, अवसाद दूर होता है और आंतरिक प्रसन्नता मिलती है।
- पारिवारिक सौहार्द एवं गृह-क्लेश नाश: जिस घर में नित्य कर्पूर जलाकर भगवान भुवनेश्वर की आरती होती है, वहाँ से वास्तु दोष, नजर दोष और गृह क्लेश स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
- आरोग्य एवं दीर्घायु: शिव तत्त्व अमृतमय है। 'महामृत्युंजय' स्वरूप भुवनेश्वर की आराधना से असाध्य रोगों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है।
- हरि और हर की संयुक्त कृपा: चूँकि भुवनेश्वर लिंगराज साक्षात हरि-हर हैं, अतः इनकी आरती करने से भगवान नारायण की कृपा से लक्ष्मी-वैभव और भगवान शंकर की कृपा से वैराग्य तथा मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।