॥ श्री भगवान परशुराम जी की आरती - ॐ जय परशुराम देवा, स्वामी जय परशुराम देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★भगवान परशुराम सनातन धर्म के अमर (चिंरजीवी) और भगवान विष्णु के छठे आवेशावतार हैं। महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर जन्मे भगवान परशुराम शौर्य, न्याय, धर्म, विद्या और तपस्या के अद्वितीय प्रतीक हैं। भगवान शिव द्वारा प्रदत्त 'परशू' (फरसा) धारण करने के कारण ही उनका नाम 'परशुराम' पड़ा। सनातन परंपरा में भगवान परशुराम की पूजा विशेष रूप से अक्षय तृतीया, परशुराम जयंती और ब्राह्मण समाज के उत्सवों पर विधि-विधान से की जाती है। भगवान परशुराम की आरती का गान करने मात्र से मनुष्य के जीवन के सभी संकट, भय और बाधाएं दूर होती हैं तथा साधક को अमोघ बल, बुद्धि एवं आत्मबल की प्राप्ति होती है। Bhaktilok.in के इस पावन आलेख में हम भगवान परशुराम जी की सम्पूर्ण आरती, उसका गूढ़ भावार्थ, पूजा की शास्त्रीय विधि और इसके अनन्त आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल
ॐ जय परशुराम देवा, स्वामी जय परशुराम देवा।
जननी रेणुका तात जमदग्नि, संकट हर देवा॥ ॐ जय...॥
भृगु कुल उद्दीपक, त्रैलोक्य विख्याता।
सहस्रबाहु मर्दन, क्षत्रिय कुल ज्ञाता॥ ॐ जय...॥
हाथ में फरसा सोहे, कन्धे पर तूणिर।
भक्तन के प्रतिपालक, दुष्टन के हंता वीर॥ ॐ जय...॥
महादेव प्रिय भक्त, शिव धनुष धरेता।
विद्या बुद्धि दाता, भव भय निकेतता॥ ॐ जय...॥
अक्षय तृतीया प्रगटे, पृथ्वी भार हरेता।
धर्म की स्थापना की, अधर्म को हनेता॥ ॐ जय...॥
जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे।
वांछित फल पावे, सब दुःख मिट जावे॥ ॐ जय...॥
परशुराम जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कह 'दास' सिमरन ते, परम गति पावे॥ ॐ जय...॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान परशुराम की यह दिव्य आरती केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह उनके महान व्यक्तित्व, उनके द्वारा किए गए लोकोपयोगी कार्यों और उनके दिव्य स्वरूप का सजीव चित्रण है। आइए इस आरती के प्रत्येक पद के गहरे भावार्थ को समझते हैं:
प्रथम पद: "ॐ जय परशुराम देवा, स्वामी जय परशुराम देवा। जननी रेणुका तात जमदग्नि, संकट हर देवा॥"
अर्थ: हे प्रभु! आपकी जय हो, हे स्वामी परशुराम आपकी जय हो। आपकी माता का नाम रेणुका और आपके पिता का नाम महर्षि जमदग्नि है। आप अपने भक्तों के सभी संकटों को हरने वाले और उनका कल्याण करने वाले परमेश्वर हैं।
द्वितीय पद: "भृगु कुल उद्दीपक, त्रैलोक्य विख्याता। सहस्रबाहु मर्दन, क्षत्रिय कुल ज्ञाता॥"
अर्थ: आप महर्षि भृगु के महान कुल को प्रदीप्त करने वाले सूर्य के समान हैं। आपकी कीर्ति तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्च और पाताल) में विख्यात है। अत्याचारी सहस्रबाहु के अहंकार का मर्दन करने वाले और समस्त शास्त्रों व शस्त्रों के ज्ञाता आप ही हैं।
तृतीय पद: "हाथ में फरसा सोहे, कन्धे पर तूणिर। भक्तन के प्रतिपालक, दुष्टन के हंता वीर॥"
अर्थ: आपके एक हाथ में दिव्य फरसा सुशोभित होता है और आपके कंधे पर बाणों से भरा तूणिर (तरकश) सुसज्जित है। आप अपने शरणागत भक्तों का पालन-पोषण करने वाले और पृथ्वी पर पल रहे दुष्टों एवं अधर्मियों का संहार करने वाले वीर योद्धा हैं।
चतुर्थ पद: "महादेव प्रिय भक्त, शिव धनुष धरेता। विद्या बुद्धि दाता, भव भय निकेतता॥"
अर्थ: आप देवाधिदेव महादेव के परम प्रिय भक्त हैं और भगवान शिव से ही आपको दिव्य परशु प्राप्त हुआ था। आप अपने उपासकों को विद्या, बुद्धि और विवेक प्रदान करते हैं तथा संसार के जन्म-मरण एवं भय रूपी बंधनों को नष्ट करने वाले हैं।
पंचम पद: "अक्षय तृतीया प्रगटे, पृथ्वी भार हरेता। धर्म की स्थापना की, अधर्म को हनेता॥"
अर्थ: आपका प्राकट्य वैशाख मास की अक्षय तृतीया तिथि को हुआ था। आपने पृथ्वी पर जब-जब अधर्म और अत्याचार बढ़ा, तब-तब उसके भार को उतारा और धर्म की पुनर्स्थापना की।
षष्ठ पद: "जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे। वांछित फल पावे, सब दुःख मिट जावे॥"
अर्थ: जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा, पवित्र मन और एकाग्रता के साथ भगवान परशुराम की इस आरती का गान करता है, वह अपनी समस्त मनोकामनाओं (वांछित फल) को प्राप्त करता है और उसके जीवन के सभी दुःख सदा के लिए समाप्त हो जाते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
सनातन संस्कृति में भगवान परशुराम सप्तर्षियों में गिने जाने वाले और चिरंजीवी (अमर) महापुरुष हैं। वे त्रेतायुग (रामायण काल) और द्वापरयुग (महाभारत काल) दोनों में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहे हैं। भगवान श्रीराम को अपने दिव्य शिवधनुष की परीक्षा लेने के लिए प्रेरित करना और द्वापर युग में कर्ण एवं भीष्म पितामह को अस्त्र-शस्त्र की उच्च कोटि की शिक्षा देना भगवान परशुराम की महानता को दर्शाता है।
ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम आज भी महेंद्र पर्वत पर तपस्यारत हैं और कलयुग के अंत में वे कल्कि भगवान के गुरु के रूप में प्रकट होकर धर्म की पुनः स्थापना करेंगे। ऐसे परम तेजस्वी भगवान परशुराम की आरती करने से साधक के भीतर साहस, निर्भीकता, तेजस्विता और सदाचार का संचार होता है। विशेषकर ब्राह्मण समाज और क्षत्रिय समाज में परशुराम आरती का विशेष विधान है क्योंकि वे ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी क्षात्रधर्म (युद्ध कौशल) के सर्वोच्च आचार्य बने, जो यह सिखाता है कि ज्ञान और बल का समन्वय ही श्रेष्ठ जीवन का आधार है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
- ब्रह्ममुहूर्त या संध्याकाल: भगवान परशुराम की पूजा और आरती प्रातः काल स्नान-ध्यान के पश्चात अथवा संध्या के समय गोधूलि बेला में करनी चाहिए।
- शुद्धता एवं आसन: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। स्वयं स्नान करके स्वच्छ (पीले या श्वेत) वस्त्र धारण करें और कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
- प्रतिमा स्थापना: एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर भगवान परशुराम की चित्र या मूर्ति स्थापित करें। यदि संभव हो तो उनके साथ भगवान विष्णु का भी ध्यान करें।
- षोडशोपचार या पंचोपचार पूजन: भगवान को रोली, अक्षत, पीले पुष्प, चन्दन, जनेऊ, धूप, दीप और नैवेद्य (फल एवं मिष्ठान) अर्पित करें।
- आरती का गान: घी का दीपक और कपूर प्रज्वलित कर दोनों हाथों से आरती की थाली पकड़ें। श्रद्धा भाव से 'ॐ जय परशुराम देवा' का मधुर गायन करते हुए clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कम से कम चार बार आरती घुमाएं।
- प्रदक्षिणा एवं पुष्पांजलि: आरती के पश्चात भगवान की परिक्रमा करें और साष्टांग प्रणाम करके क्षमा प्रार्थना करें। अंत में चरणामृत और प्रसाद सभी में वितरित करें।
आरती के समय आवश्यक सामग्री
भगवान परशुराम की आरती को विधिवत संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री का होना अत्यंत आवश्यक है:
- थाल (पूपन थाली): तांबे, पीतल या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: गाय के शुद्ध घी का दीपक अथवा तिल के तेल का दीपक।
- कपूर: आरती की दिव्यता और सुगंध बढ़ाने के लिए शुद्ध कपूर।
- घंटी (Ghanti): नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मकता लाने के लिए पीतल की घंटी।
- शंख (Shankh): आरती के प्रारंभ और अंत में शंखनाद करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
- पुष्प एवं अक्षत: ताजे पीले फूल और बिना टूटे हुए साबुत चावल (अक्षत)।
- धूपबत्ती एवं अगरबत्ती: वातावरण को सुगंधित करने के लिए प्राकृतिक धूप।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत शास्त्र के अनुसार भगवान परशुराम की आरती का गायन राग कल्याण अथवा राग यमन में करना अत्यंत आनंददायक और ऊर्जावान होता है। इसकी ताल 'कहरवा' या 'दादरा' (8 या 6 मात्राओं की ताल) होती है, जिसे सरलता से ताली बजाकर गाया जा सकता है। आरती का सबसे उपयुक्त समय संध्याकाल (संध्या वंदन के समय) या अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर रात्रि के प्रथम पहर में माना गया है। इसके गान से मन शांत होता है और अंतःकरण में आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह होता है.
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से भगवान परशुराम की आरती करने के अनगिनत आध्यात्मिक और मानसिक लाभ हैं:
- शौर्य एवं आत्मबल की प्राप्ति: जो व्यक्ति प्रतिदिन परशुराम आरती गाता है, उसके भीतर भय का नाश होता है और अदम्य साहस एवं आत्मबल जागृत होता है।
- क्रोध पर नियंत्रण: यद्यपि भगवान परशुराम को क्रोधी स्वभाव का माना जाता है, किंतु उनकी पूजा करने से साधक को अपने क्रोध और आवेगों पर नियंत्रण रखने की अद्भुत शक्ति मिलती है।
- शत्रु बाधा से मुक्ति: गुप्त एवं प्रकट शत्रुओं द्वारा उत्पन्न की गई सभी बाधाएं और षड्यंत्र स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
- विद्या और बुद्धि में वृद्धि: विद्यार्थी वर्ग यदि इस आरती का पाठ करे तो उसकी स्मरण शक्ति, बौद्धिक क्षमता और निर्णय लेने की क्षमता में तीव्र विकास होता है।
- वंश वृद्धि एवं आरोग्यता: परिवार में सुख-शांति, आरोग्यता और वंश की निरंतर उन्नति बनी रहती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
भगवान परशुराम की आरती किस दिन करना सबसे उत्तम होता है?
भगवान परशुराम की आरती प्रतिदिन सुबह और शाम की जा सकती है, किंतु वैशाख मास की 'अक्षय तृतीया' (जो उनकी प्रकटोत्सव तिथि है) और प्रत्येक मंगलवार या प्रदोष व्रत के दिन उनकी विशेष आरती करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
क्या महिलाएं भगवान परशुराम की पूजा और आरती कर सकती हैं?
हाँ, बिल्कुल। सनातन धर्म में भगवान विष्णु के सभी अवतारों की पूजा हर कोई कर सकता है। माता रेणुका के पुत्र होने के कारण भगवान परशुराम मातृ-भक्त भी हैं, अतः महिलाएं पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ उनकी आरती कर सकती हैं।
भगवान परशुराम के हाथ में जो फरसा है, उसका क्या प्रतीकात्मक अर्थ है?
भगवान परशुराम का फरसा केवल युद्ध का अस्त्र नहीं है, बल्कि यह अन्याय, अहंकार, अधर्म और पापकर्मों को काटने का प्रतीक है। यह ज्ञान के द्वारा अज्ञानता के आवरण को चीरने का भी द्योतक है.
परशुराम जी की आरती गाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
आरती गाते समय आपका मन पूरी तरह पवित्र और भगवान में लीन होना चाहिए। उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए तथा दीप प्रज्वलित करते समय मानसिक रूप से भगवान परशुराम का ध्यान करना चाहिए। आरती के अंत में शंख बजाना और घंटी बजाना अनिवार्य रूप से करना चाहिए।