॥ श्री बटुक भैरव जी की पावन आरती - ॐ जय बटुक देवा: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★सनातन धर्म में भगवान श्री बटुक भैरव जी को देवाधिदेव महादेव शिव का ही बाल स्वरूप और रुद्र अवतार माना जाता है। काल के अधिपति और दुष्टों का संहार करने वाले भैरव जी के अनेक स्वरूप हैं, जिनमें 'बटुक भैरव' या 'आनंद भैरव' का स्वरूप अत्यंत सौम्य, कृपालु और शीघ्र फलदायी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि कलियुग में भैरव उपासना अतिशीघ्र साधक के कष्टों का निवारण करती है। जिस घर में नियमित रूप से श्री बटुक भैरव जी की पावन आरती 'ॐ जय बटुक देवा' का गान और पूजन होता है, वहाँ नकारात्मक शक्तियां, अकाल मृत्यु का भय, शत्रुओं की बाधा और दरिद्रता कभी प्रवेश नहीं कर सकती। Bhaktilok.in के इस विशेष और विस्तृत आलेख में हम आपके लिए लेकर आए हैं श्री बटुक भैरव जी की संपूर्ण आरती, उसके शब्द-शः भावार्थ, सटीक पूजा विधि, सामग्री और इसके अचूक आध्यात्मिक लाभों का संपूर्ण संग्रह।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
ॐ जय बटुक देवा, प्रभु जय बटुक देवा।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥ ॐ जय...॥
वलित जटा तट शोभित, चंद्रमौली धारी।
त्रिभुवन के तुम स्वामी, संकट हारी भारी॥ ॐ जय...॥
दीनन के प्रतिपालक, जय जय सुखकारी।
अमित तेज बलशाली, त्रिभुवन के अधिकारी॥ ॐ जय...॥
डमरू त्रिशूल विराजे, हाथ में सोहै भाला।
मुंडमाल गले शोभित, नागेश्वर माला॥ ॐ जय...॥
श्वेत श्वान विराजे, वाहन अति सुंदर।
भक्तन के हितकारी, गामी तुम भू पर॥ ॐ जय...॥
अष्ट सिद्धि नव निधि के, दाता तुम स्वामी।
पाप विमोचन हारे, अंतर्यामी॥ ॐ जय...॥
काल रूप भय भंजन, जग के तुम त्राता।
धर्म अधर्म विचारों, सबके सुखदाता॥ ॐ जय...॥
जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे।
वांछित फल पावे सो, भवसागर तर जावे॥ ॐ जय...॥
बटुक नाथ की आरती, जो कोई नर गावे।
कहें दास शरणागत, सुख संपत्ति पावे॥ ॐ जय...॥
ॐ जय बटुक देवा, प्रभु जय बटुक देवा।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥ ॐ जय बटुक देवा॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
भगवान श्री बटुक भैरव जी की यह आरती अत्यंत भावपूर्ण और गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण है। इस आरती की प्रत्येक पंक्ति का गहरा अर्थ है, जिसे समझने से साधक की भक्ति और अधिक प्रगाढ़ होती है:
प्रथम पद: 'ॐ जय बटुक देवा, प्रभु जय बटुक देवा। भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर देवा॥' - इस प्रथम पंक्ति में साधक भगवान बटुक भैरव की जयकार करते हुए उन्हें पुकारता है कि हे प्रभु! आप बटुक (बाल) रूप में विराजमान होकर अपने शरण में आने वाले समस्त भक्तों के बड़े से बड़े संकटों और बाधाओं को पलभर में हर लेते हैं।
द्वितीय पद: 'वलित जटा तट शोभित, चंद्रमौली धारी। त्रिभुवन के तुम स्वामी, संकट हारी भारी॥' - भगवान शिव की तरह ही बटुक भैरव की जटाएं अत्यंत सुशोभित हैं और उनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है। आप तीनों लोकों (स्वर्ग, पाताल और मृत्युलोक) के स्वामी हैं और भारी से भारी संकटों को चुटकियों में समाप्त करने वाले हैं।
तृतीय पद: 'दीनन के प्रतिपालक, जय जय सुखकारी। अमित तेज बलशाली, त्रिभुवन के अधिकारी॥' - आप गरीबों, असहायों और शरणार्थियों के पालनहार हैं। आपकी जय हो, क्योंकि आप सबको सुख प्रदान करते हैं। आपका तेज असीम है और आपके पास अनंत बल है। आप संपूर्ण ब्रह्मांड के सच्चे अधिकारी और संचालक हैं।
चतुर्थ पद: 'डमरू त्रिशूल विराजे, हाथ में सोहै भाला। मुंडमाल गले शोभित, नागेश्वर माला॥' - आपके एक हाथ में डमरू और त्रिशूल सुशोभित है तथा दूसरे हाथ में भाला शोभा पा रहा है। आपके गले में मुंडों की माला और सर्पों (नागेश्वर) का हार आपके रौद्र एवं योगेश्वर स्वरूप को प्रकट करता है, जो भक्तों को सुरक्षा प्रदान करता है।
पंचम पद: 'श्वेत श्वान विराजे, वाहन अति सुंदर। भक्तन के हितकारी, गामी तुम भू पर॥' - आपका वाहन श्वेत रंग का कुत्ता (श्वान) है, जो आपका अतिप्रिय वाहन है। आप अपने भक्तों के कल्याण के लिए इस पृथ्वी लोक पर विचरण करते हैं और उनकी रक्षा करते हैं।
षष्ठ पद: 'अष्ट सिद्धि नव निधि के, दाता तुम स्वामी। पाप विमोचन हारे, अंतर्यामी॥' - आप हनुमान जी और शिवजी की भांति साधक को अष्ट सिद्धियां और नौ निधियां प्रदान करने वाले स्वामी हैं। आप समस्त पापों का नाश करने वाले और सभी के मन की बात जानने वाले अंतर्यामी हैं।
सप्तम पद: 'काल रूप भय भंजन, जग के तुम त्राता। धर्म अधर्म विचारों, सबके सुखदाता॥' - आप महाकाल का स्वरूप हैं जो मृत्यु और भय का नाश करते हैं। आप इस संसार की रक्षा करने वाले त्राता हैं। आप धर्म और अधर्म का विवेक करने वाले तथा सबको परम सुख देने वाले हैं।
अष्टम पद: 'जो जन आरती गावे, नित प्रति मन लावे। वांछित फल पावे सो, भवसागर तर जावे॥' - जो भी मनुष्य पूरी श्रद्धा, नियम और मन लगाकर इस पावन आरती का गान करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है और अंत में इस भवसागर से तर जाता है (मोक्ष को प्राप्त होता है)।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
पौराणिक ग्रंथों और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, भगवान बटुक भैरव की उपासना विशेषकर अष्टमी तिथि (विशेषकर कालाष्टमी) और मंगलवार या रविवार के दिन अत्यंत फलदायी मानी जाती है। शिव पुराण और दुर्गा सप्तशती में भैरव जी के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। बटुक भैरव भगवान शिव का वह बाल स्वरूप हैं, जो अत्यंत सौम्य होने के साथ-साथ दुष्ट शक्तियों के लिए साक्षात काल रूप हैं।
ऐसी मान्यता है कि माता शक्तिपीठों की रक्षा का भार भगवान भैरव को ही सौंपा गया है। इसलिए बिना भैरव दर्शन के माता शक्ति के दर्शन पूर्ण नहीं माने जाते हैं। बटुक भैरव की आरती करने से राहु, केतु और शनि जैसे क्रूर ग्रहों के अशुभ प्रभाव (पीड़ा) समाप्त हो जाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, और नकारात्मक ऊर्जाएं बटुक भैरव के नाम मात्र से दूर भाग जाती हैं। साधक को मानसिक दृढ़ता, निर्भीकता और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
भगवान बटुक भैरव जी की आरती और पूजा विधि अत्यंत सरल है, परंतु इसमें अनुशासन और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक होता है:
- समय का चयन: बटुक भैरव जी की आरती मुख्य रूप से प्रातः काल स्नान के पश्चात या संध्या काल (प्रदोष काल) में करनी चाहिए। रात्रि के समय (विशेषकर निशीथ काल यानी मध्य रात्रि) भैरव साधना का विशेष महत्व है।
- स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। अपने आसन पर बैठकर आचमन करें और शुद्ध वस्त्र धारण करें।
- विग्रह स्थापना: लकड़ी की चौकी पर लाल या काला आसन बिछाकर बटुक भैरव जी की प्रतिमा, यंत्र या तस्वीर स्थापित करें।
- संकल्प और पूजन: सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। इसके पश्चात बटुक भैरव जी को सिंदूर, चमेली का तेल, अक्षत, लाल फूल, रोली, और जनेऊ अर्पित करें।
- नैवेद्य भोग: भैरव जी को मीठी रोटी, गुड़, पताशा, उड़द के बड़े या मदिरा (तांत्रोक्त पद्धति में) अथवा सात्विक रूप में दूध, मावे की मिठाई और फल का भोग लगाएं।
- आरती गान: घी का दीपक और कपूर जलाकर दोनों हाथों से थाल थामकर 'ॐ जय बटुक देवा' आरती का सस्वर गान करें। आरती के पश्चात शंख और घंटी अवश्य बजाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
पूजन और आरती को पूर्णता प्रदान करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियां थाली में अवश्य होनी चाहिए:
- पूजा थाली: पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली।
- दीपक: गाय के घी का या चमेली के तेल का दीपक (दीपक में रुई की बत्ती लाल या सफेद हो सकती है)।
- कपूर: शुद्ध भीमसेनी कपूर आरती की प्रज्वलन और वातावरण को शुद्ध करने के लिए।
- धूप और अगरबत्ती: सुगंधित गूगल या लोबान की धूप, जो नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है।
- पुष्प और माला: लाल रंग के फूल (जैसे गुड़हल या गुलाब) तथा बटुक भैरव जी के लिए विशेष रूप से प्रिय पुष्प।
- घंटी और शंख: आरती के दौरान सकारात्मक ध्वनि उत्पन्न करने और देवताओं का आह्वान करने के लिए घंटी और शंख अनिवार्य हैं।
- रोली, सिंदूर और अक्षत: तिलक लगाने के लिए।
राग, ताल एवं गायन समय
संगीत और भक्ति का गहरा नाता है। श्री बटुक भैरव जी की आरती को गाते समय यदि उचित राग और ताल का ध्यान रखा जाए, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:
- उपयुक्त राग: इस आरती को 'राग भैरवी', 'राग कल्याण' या 'राग यमन' की धुनों में अत्यंत लयबद्ध तरीके से गाया जा सकता है। यह राग मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करते हैं।
- ताल: इसे कहरवा ताल (8 बीट) या दादरा ताल (6 बीट) पर आसानी से गाया जा सकता है, जिससे तालमेल और भक्ति का प्रवाह बना रहता है।
- गायन का सर्वोत्तम समय: संध्याकालीन बेला, कालाष्टमी का दिन, या रात्रि 8 बजे के पश्चात का समय इस आरती के गायन के लिए अत्यंत उत्तम माना गया है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नियमित रूप से श्री बटुक भैरव जी की आरती करने वाले साधक के जीवन में चमत्कारी बदलाव आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और व्यावहारिक लाभ निम्नलिखित हैं:
- निर्भीकता और साहस: जो व्यक्ति नियमित बटुक भैरव की आरती करता है, उसके मन से मृत्यु का भय, अज्ञात भय और शत्रुओं का डर हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
- नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर की नकारात्मक शक्तियां, बुरी नजर, तंत्र-मंत्र बाधाएं और पितृ दोष शांत होते हैं।
- आर्थिक समृद्धि: कर्ज से मुक्ति पाने और व्यापार में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए भैरव साधना अचूक है।
- कालसर्प एवं ग्रह शांति: राहु-केतु के दुष्प्रभावों और शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या के कष्टों में भारी राहत मिलती है।
- मोक्ष और सिद्धि: साधक को आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति और अंत में परम गति की प्राप्ति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
क्या महिलाएं श्री बटुक भैरव जी की आरती और पूजा कर सकती हैं?
हाँ, महिलाएं बिल्कुल श्री बटुक भैरव जी की सात्विक पूजा और आरती कर सकती हैं। बटुक भैरव भगवान शिव का बाल स्वरूप हैं, इसलिए उनकी पूजा अत्यंत सौम्य और माता के लाडले के रूप में की जाती है। हालांकि, तांत्रिक अनुष्ठानों में कुछ विशेष नियम होते हैं, लेकिन गृहस्थ जीवन में सात्विक आरती पूर्णतः वर्जित नहीं है, बल्कि अत्यंत मंगलकारी है।
बटुक भैरव जी की आरती के समय कौन सा भोग लगाना चाहिए?
बटुक भैरव जी को मीठी पूरी, खीर, गुड़-चने का प्रसाद, उड़द के बड़े, और फलों का भोग अत्यंत प्रिय है। विशेष अवसरों पर आप उन्हें चूरमा या मालपुए का भी भोग लगा सकते हैं।
कालाष्टमी के दिन बटुक भैरव की आरती का क्या महत्व है?
प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालाष्टमी कहा जाता है। इस दिन भगवान बटुक भैरव की विशेष पूजा और रात्रि में 'ॐ जय बटुक देवा' आरती करने से भगवान अतिशीघ्र प्रसन्न होते हैं और साधक के समस्त कष्टों का निवारण करते हैं।
क्या बटुक भैरव की आरती घर पर की जा सकती है?
निश्चित रूप से! बटुक भैरव जी की सात्विक आरती घर पर प्रतिदिन करने से घर की रक्षा होती है और घर में सुख-शांति तथा सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।