॥ श्री बगलामुखी माता की आरती - ॐ जय बगलामुखी माता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★दश महाविद्याओं में आठवीं परम कल्याणकारी शक्ति के रूप में पूजित माँ बगलामुखी, जिन्हें जगन्माता पीताम्बरा भी कहा जाता है, स्तंभन शक्ति की साक्षात अधिष्ठात्री देवी हैं। 'ॐ जय बगलामुखी माता' की दिव्य आरती केवल एक भक्ति-गान नहीं, अपितु साधक के अंतःकरण में छिपे काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर जैसे आंतरिक रिपुओं और जीवन के बाह्य शत्रुओं, घोर आपदाओं, वाक्-दोषों तथा संशयों का पूर्णतः स्तंभन करने वाला अमोघ ब्रह्मास्त्र है। जब साधक श्रद्धा और विधिपूर्वक शुद्ध मन से माँ की यह आरती करता है, तो उसके जीवन के समस्त अमंगल विनष्ट हो जाते हैं और उसे अचल विजय, आत्मबल एवं परम शांति की प्राप्ति होती है।
सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)
॥ श्री बगलामुखी माता जी की आरती ॥
ॐ जय बगलामुखी माता, मैया जय बगलामुखी माता।
असुर निकंदन कारिणी, सुख सम्पति दाता॥
ॐ जय बगलामुखी माता...॥
पीताम्बर तन सोहे, स्वर्ण मुकुट शीशा।
त्रिनयनी भाल विराजे, वंदित जगदीशा॥
ॐ जय बगलामुखी माता...॥
सौराष्ट्र के तीरे, प्रगटीं कल्याणी।
सृष्टि प्रलय निवारक, ब्रह्मास्त्र रानी॥
ॐ जय बगलामुखी माता...॥
जिह्वा शत्रु संहारे, मुदगर कर धारे।
वाक्-स्तंभन की देवी, सब संकट टारे॥
ॐ जय बगलामुखी माता...॥
सुधा सिन्धु के भीतर, मणिमय दीप सुहाय।
पीत कमल पर बैठीं, सुर-नर ध्यावत आय॥
ॐ जय बगलामुखी माता...॥
पीत वस्त्र प्रिय माता, हल्दी भोग चढ़े।
जो जन शरण तिहारी, विघ्न न पास अड़े॥
ॐ जय बगलामुखी माता...॥
विद्या बुद्धि प्रदाता, जय पीताम्बरा माँ।
शत्रु भय हर लीजे, दीजै सुख-सीमा॥
ॐ जय बगलामुखी माता...॥
प्रेम सहित जो ध्यावे, आरती नित गावे।
कहत भक्त कुल सारे, मनवांछित पावे॥
ॐ जय बगलामुखी माता, मैया जय बगलामुखी माता।
असुर निकंदन कारिणी, सुख सम्पति दाता॥
॥ ॐ ह्लीं बगलामुख्यै नमः ॥
आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ
माँ बगलामुखी की आरती की प्रत्येक पंक्ति तांत्रिक और वैदिक दर्शन के गूढ़ रहस्यों को समेटे हुए है। इसके प्रत्येक शब्द का आध्यात्मिक और दार्शनिक भावार्थ अत्यंत पावन और चमत्कारी है:
प्रथम छंद: स्वरूप एवं महिमा गान
"ॐ जय बगलामुखी माता, मैया जय बगलामुखी माता। असुर निकंदन कारिणी, सुख सम्पति दाता॥"
भावार्थ: हे प्रणवरूपिणी कल्याणमयी माँ बगलामुखी! आपकी सर्वदा जय हो। आप आसुरी प्रवृत्तियों, दुष्ट शक्तियों तथा अधर्मी तत्वों का समूल नाश (निकंदन) करने वाली हैं। आप अपने शरणागत भक्तों को संसार के समस्त लौकिक सुख, ऐश्वर्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संपत्ति प्रदान करने वाली करुणामयी जननी हैं।
द्वितीय छंद: अलौकिक शृंगार एवं तेज
"पीताम्बर तन सोहे, स्वर्ण मुकुट शीशा। त्रिनयनी भाल विराजे, वंदित जगदीशा॥"
भावार्थ: हे माता! आपके दिव्य विग्रह पर स्वर्णिम आभा से युक्त पीताम्बर वस्त्र सुशोभित हो रहे हैं और आपके मस्तक पर रत्नजड़ित स्वर्ण मुकुट शोभायमान है। आपके ललाट पर तीन दिव्य नेत्र (त्रिनेत्र) भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों के नियंत्रण और ज्ञान के प्रतीक बनकर दमक रहे हैं। समस्त ब्रह्मांड के स्वामी महादेव तथा जगदीश्वर भी आपकी वंदना करते हैं।
तृतीय छंद: अवतरण और ब्रह्मास्त्र शक्ति
"सौराष्ट्र के तीरे, प्रगटीं कल्याणी। सृष्टि प्रलय निवारक, ब्रह्मास्त्र रानी॥"
भावार्थ: सतयुग काल में जब संपूर्ण सृष्टि में भयंकर महातूफान और प्रलय उपस्थित हुआ था, तब देवताओं की रक्षा हेतु आप सौराष्ट्र के हरिद्रा सरोवर के तट पर अवतरित हुईं। आप ब्रह्मा के तप से आविर्भूत महाब्रह्मास्त्र विद्या की साक्षात स्वामिनी हैं, जिन्होंने एक क्षण में प्रलयंकारी तूफान को शांत कर चराचर जगत का संकट निवारण किया था।
चतुर्थ छंद: स्तंभन शक्ति और मुदगर का रहस्य
"जिह्वा शत्रु संहारे, मुदगर कर धारे। वाक्-स्तंभन की देवी, सब संकट टारे॥"
भावार्थ: माँ के रूप में एक हाथ में शत्रु की जिह्वा खींचते हुए और दूसरे हाथ में मुदगर (गदा) प्रहार हेतु धारण किया हुआ दृश्य यह दर्शाता है कि देवी दुष्टों की कुत्सित वाणी, उनके द्वेषपूर्ण विचारों और कुचक्रों का स्तंभन कर देती हैं। आप सत्य और न्याय के पक्ष में असत्य को जड़ से उखाड़ फेंकती हैं और साधक के सभी कायिक, वाचिक तथा मानसिक संकटों को हर लेती हैं।
पंचम छंद: सुधा सिंधु और स्वर्णिम आसन
"सुधा सिन्धु के भीतर, मणिमय दीप सुहाय। पीत कमल पर बैठीं, सुर-नर ध्यावत आय॥"
भावार्थ: अमृत के महासागर (सुधा सिंधु) के मध्य स्थित मणियों के दिव्य द्वीप पर, स्वर्ण और पीले कमलों के भव्य सिंहासन पर माँ पीताम्बरा विराजमान हैं। उनके इस अलौकिक, प्रशांत और दीप्तिमान रूप का ध्यान देव, यक्ष, गंधर्व और मानव सब हाथ जोड़कर करते हैं ताकि उन्हें अमृतमयी कृपा प्राप्त हो सके।
षष्ठ छंद: पीत रंग का महत्व एवं समर्पण
"पीत वस्त्र प्रिय माता, हल्दी भोग चढ़े। जो जन शरण तिहारी, विघ्न न पास अड़े॥"
भावार्थ: माँ बगलामुखी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है; वे पीत पुष्प, पीत वस्त्र और हरिद्रा (हल्दी) के नैवेद्य से प्रसन्न होती हैं। जो भी निष्पाप भक्त अपने अहंकार को त्यागकर माता की शरण में आ जाता है, कोई भी विघ्न, बाधा, तंत्र-मंत्र का दोष अथवा कालभय उसके निकट भी नहीं फटक सकता।
सप्तम छंद: बुद्धि प्रदाता और विजय का वरदान
"विद्या बुद्धि प्रदाता, जय पीताम्बरा माँ। शत्रु भय हर लीजे, दीजै सुख-सीमा॥"
भावार्थ: हे पीताम्बरा माँ! आप केवल शत्रुओं का नाश ही नहीं करतीं, बल्कि अपने भक्तों को प्रखर प्रज्ञा, आत्मज्ञान और पराविद्या प्रदान करती हैं। हमारे समस्त ज्ञात और अज्ञात भय, दुर्बलताओं और चिंताओं को समाप्त कर हमें परम सुख, विजय और अखंड आनंद प्रदान कीजिए।
अंतिम छंद: फलश्रुति
"प्रेम सहित जो ध्यावे, आरती नित गावे। कहत भक्त कुल सारे, मनवांछित पावे॥"
भावार्थ: जो भी साधक शुद्ध हृदय और अनन्य प्रेमभाव से प्रतिदिन माँ बगलामुखी की इस पावन आरती का गायन करता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सहज प्राप्ति होती है तथा उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व
स्वतंत्र तंत्र, रुद्रयामल और सांख्य तंत्र के अनुसार माँ बगलामुखी का प्राकट्य ब्रह्मांड के अस्तित्व की रक्षा हेतु हुआ था। पौराणिक आख्यानों में वर्णन है कि सतयुग में एक समय ऐसा भीषण वात-क्षोभ (विनाशकारी चक्रवाती तूफान) उठा जिससे तीनों लोकों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया। तब भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के तट पर महातपस्या की। श्रीहरि की तपस्या से संतुष्ट होकर सरोवर के मध्य से तेजपुंज के रूप में भगवती बगलामुखी प्रकट हुईं।
देवी ने अपने स्तंभन बल से उस प्रलयंकारी तूफान को एक क्षण में रोककर सृष्टि को जीवनदान दिया। इसलिए बगलामुखी को 'स्तंभन कारिणी' और 'ब्रह्मास्त्र विद्या' कहा जाता है। महाभारत काल में भी पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर कौरवों की विशाल सेना के स्तंभन हेतु माँ बगलामुखी की आराधना की थी। तंत्र शास्त्र में माँ की आरती को अत्यंत जाग्रत माना गया है; यह साधक के शत्रुओं की नकारात्मक ऊर्जा, षड्यंत्र और दुर्भावना को पूर्णतः शांत और निष्प्रभावी कर देती है।
आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)
माँ बगलामुखी की पूजा और आरती अत्यंत अनुशासित और पवित्र वातावरण में की जानी चाहिए। पीताम्बरा साधना में नियमों की शुद्धता का विशेष महत्व है:
- शुद्धि और वस्त्र: आरती करने से पूर्व साधक को स्नान कर पूर्णतः शुद्ध होना चाहिए। पूजा में केवल पीले रंग के वस्त्र (पीली धोती, कुर्ता या साड़ी) ही धारण करने चाहिए। काले, नीले या मलिन वस्त्रों का पूर्णतः त्याग करें।
- दिशा और आसन: माँ बगलामुखी की पूजा के लिए पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठना श्रेष्ठ माना गया है। साधक को पीले रंग के ऊनी अथवा कुशा के आसन पर बैठना चाहिए।
- वेदी की स्थापना: लकड़ी की चौकी पर पीला रेशमी कपड़ा बिछाकर माँ बगलामुखी का चित्र अथवा प्राण-प्रतिष्ठित यंत्र स्थापित करें। देवी को गंगाजल और हल्दी मिले जल से प्रतीकात्मक आचमन कराएं।
- दीप प्रज्ज्वलन: आरती के लिए पीतल या तांबे के दीपक का प्रयोग करें। दीपक में गाय का शुद्ध घी अथवा विशुद्ध तिल या सरसों का तेल डाला जा सकता है। इसमें पीली बत्ती (कपास में हल्दी लगाकर तैयार की गई) का उपयोग करना सर्वोत्तम माना जाता है।
- आरती का परिक्रमण: दीपक को हाथ में लेकर माँ के सम्मुख क्लॉकवाइज़ (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएं। सर्वप्रथम चार बार चरणों में, दो बार नाभि कमल पर, एक बार मुखारविंद पर और अंत में सात बार माँ के संपूर्ण विग्रह पर दीपक को घुमाकर आरती पूर्ण करें।
- आचमन और समर्पण: आरती समाप्ति के पश्चात एक आचमनी में जल लेकर आरती की थाल के चारों ओर घुमाकर भूमि पर छोड़ें और स्वयं दोनों हाथों से आरती की पवित्र ज्योति का स्पर्श कर अपने नेत्रों तथा मस्तक पर लगाएं।
आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)
माँ बगलामुखी की आरती की थाली विशेष रूप से पीत वर्ण (पीले रंग) की वस्तुओं से सज्जित होनी चाहिए:
| सामग्री का नाम | विशेष विवरण एवं उपयोग |
|---|---|
| पीतल की थाली | स्वर्ण सदृश पीतल की स्वच्छ थाल, जिस पर कुंकुम अथवा हल्दी से 'ह्लीं' बीज मंत्र अंकित हो। |
| पंचमुखी/एकमुखी दीपक | पीतल का दीपक, जिसमें गाय का शुद्ध घृत या तिल का तेल एवं पीली रुई की बत्ती लगी हो। |
| भीमसेनी कपूर | शुद्ध कपूर की टिकिया, जो नकारात्मक शक्तियों और वास्तुदोषों का दहन करती है। |
| पीत पुष्प एवं माला | गेंदे के ताजे पीले फूल, कनेर अथवा पीले गुलाब के पुष्प। |
| हरिद्रा (हल्दी) एवं अक्षत | हल्दी की गांठ, पिसी हुई हल्दी और हल्दी से रंगे हुए पीले अक्षत। |
| पीला नैवेद्य (भोग) | बेसन के लड्डू, बूंदी, केसरिया खीर, पके हुए पीले केले या आम। |
| घंटी एवं शंख | पीतल की गरुड़ घंटी और दक्षिणावर्ती अथवा सामान्य शंख, जिनकी मंगल ध्वनि आसुरी तत्वों को दूर रखती है। |
राग, ताल एवं गायन समय
माँ बगलामुखी की आरती का गायन एक दिव्य और गंभीर वातावरण की सृष्टि करता है। संगीत और तंत्र शास्त्र के समन्वय से इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है:
- शास्त्रीय राग: यह आरती मुख्य रूप से राग कल्याण अथवा राग यमन में गाई जाती है। यह राग अंतःकरण को स्थिर, शांत और एकाग्र बनाता है, जो स्तंभन विद्या की मूल आवश्यकता है।
- ताल: आरती का गायन प्रायः तीनताल या पारंपरिक कहरवा ताल (८ मात्रा) में मध्यम लय के साथ किया जाता है। घंटी और करताल की गति मध्यम होनी चाहिए, न बहुत तीव्र और न ही अति धीमी।
- श्रेष्ठ समय: माँ बगलामुखी की आरती का सर्वोत्तम समय सांध्य काल (गोधूलि वेला) अथवा निशीथ काल (रात्रि ९:०० से १२:०० बजे के मध्य) माना जाता है। गुरुवार और चतुर्दशी या नवरात्रि की रात्रियों में इसका गायन अमोघ फल देता है।
दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति
नित्य श्रद्धापूर्वक माँ पीताम्बरा की आरती करने से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:
- शत्रु एवं विरोधियों का स्तंभन: यदि कोई अकारण शत्रुता रखता हो, झूठे मुकदमों में फंसा रहा हो या जीवन में षड्यंत्र रच रहा हो, तो माँ की आरती से विरोधी की कुत्सित बुद्धि का स्तंभन हो जाता है और साधक निर्भय बनता है।
- वाक्-सिद्धि एवं आत्मविश्वास: माँ बगलामुखी वाक्-शक्ति की स्वामिनी हैं। आरती के नियमित पाठ से वाणी दोष दूर होते हैं, व्यक्तित्व प्रभावशाली बनता है और वाद-विवाद, साक्षात्कार तथा जनसंवाद में विजय प्राप्त होती है।
- तंत्र बाधा एवं नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर-परिवार में छाया हुआ अज्ञात भय, नजर दोष, मारण-उच्चाटन जैसी तांत्रिक नकारात्मकताएं कपूर की आरती और शंख ध्वनि से तत्काल भस्म हो जाती हैं।
- ऋण मुक्ति एवं आर्थिक स्थिरता: पीताम्बरा स्वरूप श्री और लक्ष्मी का भी द्योतक है। आरती के प्रभाव से व्यापार में आई रुकावटें, भारी कर्ज और आर्थिक संकट दूर होकर स्थिर समृद्धि प्राप्त होती है।
- आंतरिक शत्रुओं पर विजय: तंत्र का वास्तविक लक्ष्य मोक्ष है। माँ बगलामुखी साधक के भीतर के भय, संशय, क्रोध और वासना का स्तंभन कर उसे आत्मज्ञानी और स्थिरप्रज्ञ बनाती हैं।