॥ श्री अर्धनारीश्वर जी की आरती: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन सनातन वैदिक संस्कृति में 'अर्धनारीश्वर' रूप केवल एक पौराणिक कल्पना मात्र नहीं है, अपितु यह ब्रह्मांड की मूल संरचना, पुरुष (शिव) और प्रकृति (शक्ति) के शाश्वत एवं अविभाज्य संबंध का द्योतक है। शिव के बिना शक्ति निष्क्रिय है और शक्ति के बिना शिव स्पंदहीन हैं। जब आदि देव महादेव ने सृष्टि के विस्तार और जीवों के कल्याण हेतु अपनी देह के आधे भाग में जगत जननी माँ जगदम्बा (पार्वती) को स्थान दिया, तब अर्धनारीश्वर स्वरूप का प्राकट्य हुआ। इस स्वरूप का दर्शन यह सिखाता है कि नर और नारी, पुरुष और प्रकृति एक ही परम ब्रह्म के दो पहलू हैं। इनके बीच कोई भेद नहीं है।
अर्धनारीश्वर स्वरूप की उपासना वैदिक काल से ही चली आ रही है, और पुराणों में विशेषकर शिव पुराण, लिंग पुराण तथा स्कंद पुराण में इस रूप की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। अर्धनारीश्वर जी की आरती का गायन करते समय साधक न केवल शिव की करुणा और वैराग्य को आत्मसात करता है, बल्कि माँ पार्वती की ममता, स्नेह और सृजन शक्ति को भी प्रणाम करता है। इस आरती की रचना विभिन्न संतों और आचार्यों द्वारा की गई लोक परंपराओं से हुई है, जो मंदिरों और घरों में विशेषकर प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि और नवरात्रि के पावन अवसरों पर गाई जाती है। इसके गायन से गृहस्थ जीवन में संतुलन, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
जय अर्धनारीश्वर देवा, प्रभु जय अर्धनारीश्वर देवा।
शिव शंभू त्रिपुरारी, माता जग सेवा॥ टेक॥
आधा अंग भभूत रमाए, आधा अंग सजें उपटन।
एक नयन करुणा बरसाए, एक नयन अंजन॥
जय अर्धनारीश्वर देवा...
वाम भाग शोभे जगजननी, दक्षिण शंभू विराजे।
गले रुद्राक्ष मुण्ड माला, मस्तक बिंदी साजे॥
जय अर्धनारीश्वर देवा...
एक हाथ त्रिशूल विराजे, एक हाथ कुमकुम सोहे।
डमरू की ध्वनि बाजे, पायल की झनकार मोहे॥
जय अर्धनारीश्वर देवा...
वृषभ वाहन पर शिव बैठे, सिंह वाहन माता।
दोनों का मिलन अद्भुत, तीनों जग ज्ञाता॥
जय अर्धनारीश्वर देवा...
जो जन इस आरती को गावे, नित प्रति ध्यान लगावे।
सुख सम्पत्ति घर आवे, अंत मुक्ति पावे॥
जय अर्धनारीश्वर देवा...
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
प्रथम पद:
जय अर्धनारीश्वर देवा, प्रभु जय अर्धनारीश्वर देवा। शिव शंभू त्रिपुरारी, माता जग सेवा॥
भावार्थ: हे अर्धनारीश्वर देव! आपकी जय हो। आप ही देवाधिदेव शिव शंभू हैं जो त्रिपुरारी कहलाते हैं, और साथ ही आप ही जगत की सेवा करने वाली माता (पार्वती) हैं। आपके इस संयुक्त स्वरूप को हमारा कोटि-कोटि नमन है।
द्वितीय पद:
आधा अंग भभूत रमाए, आधा अंग सजें उपटन। एक नयन करुणा बरसाए, एक नयन अंजन॥
भावार्थ: इस दिव्य स्वरूप की विशेषता यह है कि आपके शरीर का आधा भाग श्मशान की भस्म से सुसज्जित है (जो शिव का रूप है) और आधा भाग उबटन तथा श्रृंगार से सजा है (जो माता पार्वती का रूप है)। एक नेत्र में शिव की असीम करुणा है, तो दूसरे नेत्र में माता का काजल सुशोभित है।
तृतीय पद:
वाम भाग शोभे जगजननी, दक्षिण शंभू विराजे। गले रुद्राक्ष मुण्ड माला, मस्तक बिंदी साजे॥
भावार्थ: शरीर के बाएं भाग में संपूर्ण जगत की जननी माँ पार्वती विराजमान हैं और दाहिने भाग में भगवान शंभू बैठे हैं। गले में जहाँ एक ओर रुद्राक्ष और मुण्डों की माला है, वहीं मस्तक पर माँ के श्रृंगार स्वरूप सुंदर बिंदी और शिव के मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है।
चतुर्थ पद:
एक हाथ त्रिशूल विराजे, एक हाथ कुमकुम सोहे। डमरू की ध्वनि बाजे, पायल की झनकार मोहे॥
भावार्थ: आपके हाथों की विविधता भी अनूठी है—एक हाथ में प्रलय और रक्षा का प्रतीक त्रिशूल है, तो दूसरे हाथ में सौभाग्य का प्रतीक कुमकुम है। आपके आनंद से एक ओर डमरू की गंभीर गूंज उठती है, तो दूसरी ओर चरणों में बंधी पायल की मधुर झनकार मन को मोह लेती है।
पंचम पद:
वृषभ वाहन पर शिव बैठे, सिंह वाहन माता। दोनों का मिलन अद्भुत, तीनों जग ज्ञाता॥
भावार्थ: भगवान शिव का वाहन नंदी (वृषभ) है और माता का वाहन सिंह (शेर) है। इन दोनों विरोधी स्वभाव के वाहनों और शक्तियों का यह अद्भुत मिलन इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति और पुरुष के समन्वय से ही तीनों लोकों का संचालन होता है और आप सब कुछ जानने वाले हैं।
षष्ठ पद:
जो जन इस आरती को गावे, नित प्रति ध्यान लगावे। सुख सम्पत्ति घर आवे, अंत मुक्ति पावे॥
भावार्थ: जो भी मनुष्य निष्ठापूर्वक इस आरती का गान करता है और निरंतर इस युगल स्वरूप का ध्यान करता है, उसके घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गायन का राग, ताल एवं धुन
श्री अर्धनारीश्वर जी की आरती का संगीत पक्ष अत्यंत साधनापूर्ण और गंभीर है। चूँकि यह आरती शिव (गंभीर एवं शांत रस) और शक्ति (उत्साह एवं श्रृंगार रस) दोनों का मिश्रण है, इसलिए इसके गायन के लिए शास्त्रीय संगीत में विशेष रागों का चयन किया जाता है:
- प्रमुख राग: राग भैरवी, राग यमन और राग बिलावल। राग भैरवी इस आरती के भक्ति भाव को गाढ़ा करती है, जबकि यमन और बिलावल इसमें संध्या कालीन शीतलता और दिव्यता का संचार करते हैं।
- ताल: कहहरवा (८ मात्रा) या दादरा (६ मात्रा) ताल में इस आरती का गायन अत्यंत लयबद्ध और सुखद होता है, जिसे आसानी से आम जनमानस भी गा सकता है।
- लय: मध्य लय (Medium Tempo)। आरती न तो बहुत धीमी होनी चाहिए और न ही बहुत तीव्र, ताकि चित्त एकाग्र रह सके।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
आरती करने की एक निश्चित शास्त्रीय पद्धति होती है, जिससे पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
- पवित्रता और आसन: स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।
- दीप प्रज्वलन: शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। साथ ही धूपबत्ती और कपूर जलाएं।
- थाली की सजावट: आरती की थाली में कुमकुम, अक्षत, पुष्प, रोली और कपूर प्रज्वलित दीया रखें।
- आरती घुमाने का सही क्रम:
- सबसे पहले भगवान के चरणों में दीपक को चार बार घुमाएं (प्रतीकात्मक रूप से पृथ्वी तत्व को नमन)।
- इसके पश्चात नाभि क्षेत्र में दो बार दीपक घुमाएं (जल तत्व)।
- मुख और हृदय स्थल के पास तीन बार दीपक घुमाएं (अग्नि और वायु तत्व)।
- अंत में भगवान के पूरे शरीर पर सात बार पूर्ण वर्तुल (Circle) में थाली घुमाएं (आकाश तत्व)।
- आचमन और समर्पण: आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हाथों से आरती की ज्योति लें और अपनी आँखों व मस्तक से लगाएं। इसके पश्चात भगवान को जल समर्पित कर क्षमा प्रार्थना करें।
कर्पूर का महत्व व फलश्रुति
आरती के अंत में गाए जाने वाले 'कर्पूरगौरं करुणावतारम्' मंत्र और कपूर जलाने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। कपूर जब जलता है, तो वह बिना कोई अवशेष छोड़े पूर्णतः विलीन हो जाता है। इसी प्रकार, साधक का अहंकार और उसकी वासनाएं भी दिव्य ज्ञान की अग्नि में जलकर नष्ट हो जानी चाहिए, यही कपूर जलाने का वास्तविक संदेश है।
फलश्रुति: अर्धनारीश्वर स्वरूप की इस आरती का नियमित पाठ करने से पति-पत्नी के बीच प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है, गृहस्थ जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, और कुंडली में चंद्रमा तथा सूर्य से संबंधित दोष शांत होते हैं। साधक को आरोग्य, ऐश्वर्य, मानसिक स्थिरता और अंत में शिव-शक्ति के लोक (कैलाश) की प्राप्ति होती है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
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प्रश्न: अर्धनारीश्वर स्वरूप की पूजा मुख्य रूप से किस दिन करनी चाहिए?
उत्तर: अर्धनारीश्वर स्वरूप की पूजा के लिए महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत, सोमवार का दिन और नवरात्रि के विशेष दिन अत्यंत उत्तम माने जाते हैं। इसके अलावा दैनिक संध्या पूजन में भी इस आरती का गायन किया जा सकता है। -
प्रश्न: क्या महिला और पुरुष दोनों इस आरती का पाठ कर सकते हैं?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल। अर्धनारीश्वर रूप स्त्री और पुरुष की समानता और एकात्मकता का प्रतीक है, इसलिए इसे हर आयु वर्ग और लिंग के लोग पूरी श्रद्धा के साथ गा सकते हैं। -
प्रश्न: इस आरती को गाने का सबसे सही समय कौन सा है?
उत्तर: संध्याकाल (प्रदोष काल) या प्रातःकाल की पूजा के समय इस आरती का गायन करना सबसे अधिक फलदायी माना गया है। -
प्रश्न: अर्धनारीश्वर आरती के पाठ से मानसिक शांति कैसे मिलती है?
उत्तर: यह आरती शिव के वैराग्य और शक्ति की चेतना का संतुलन बनाती है, जिससे मन के भीतर चल रहे द्वंद्व, तनाव और नकारात्मक विचार शांत होते हैं और असीम मानसिक शांति की अनुभूति होती है।