पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री माता अन्नपूर्णा आरती
15 पाठ

श्री अन्नपूर्णा माता आरती: माता अन्नपूर्णा की संपूर्ण आरती, विधि और कृपा प्राप्ति के मंत्र

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग बिलावल / राग यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Roshan Lal Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री अन्नपूर्णा माता आरती: माता अन्नपूर्णा की संपूर्ण आरती, विधि और कृपा प्राप्ति के मंत्र ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

सनातन संस्कृति में माता अन्नपूर्णा को जगत की पोषणकर्ता, संहारक शिव की अर्धांगिनी और अन्न की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। 'अन्नपूर्णा' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—'अन्न' यानी भोजन और 'पूर्णा' यानी जो परिपूर्ण है। काशी नगरी को माता अन्नपूर्णा की राजधानी माना जाता है, जहाँ स्वयं महादेव भिक्षा मांगते हैं और माता पूरे ब्रह्मांड का पेट भरती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय जब काशी में अकाल पड़ा और अन्न का एक-एक दाना दुर्लभ हो गया, तब समस्त प्राणियों की पीड़ा देखकर माता पार्वती ने अन्नपूर्णा का स्वरूप धारण किया। भगवान शिव ने स्वयं भिक्षुक बनकर माता अन्नपूर्णा के दरबार से भिक्षा प्राप्त की और संसार को यह संदेश दिया कि अन्न ब्रह्म है और इसका आदर करना ही वास्तविक साधना है।

माता अन्नपूर्णा की यह पावन आरती न केवल गृहस्थों के घरों में अन्न-धन की बरकत लाती है, बल्कि साधक के भीतर कृतज्ञता का भाव भी जागृत करती है। इस आरती की रचना महान संतों और आचार्यों द्वारा की गई है, जो काशी की священ परंपरा का हिस्सा रही है। इस आरती का नियमित गान करने से घर में कभी भी अन्न की कमी नहीं होती और रसोईघर में साक्षात माँ अन्नपूर्णा का वास बना रहता है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

जय देवी जय देवी, जय अन्नपूर्णा।

संसार की साधिनी, जग की कल्याणा॥

ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सेवा नित करते।

नर-नारी सब मिलकर, ध्यान तुम्हारा धरते॥

जय देवी जय देवी...

रत्नजटित सिंहासन, अद्भुत छबि छाई।

सुंदर मुकुट माथे, शोभा अति भाई॥

श्वेत वस्त्र पहने, हाथों में झोली।

भक्तन की इच्छा पूरी, करती हो भोली॥

जय देवी जय देवी...

काशी पुरी आपकी, राजधानी प्यारी।

देव मुनि जन गावें, महिमा अति न्यारी॥

जो जन शरण तुम्हारी, आवे सुख पावे।

दरिद्रता भागे और, वैभव घर आवे॥

जय देवी जय देवी...

अन्न दान महादान, जो नर है करते।

ते यम की यातना से, बिल्कुल नहीं डरते॥

भोग लगै छप्पन भोग, मिष्ठान्न सुहावे।

माता के प्रसाद से, सब तृप्त हो जावे॥

जय देवी जय देवी...

आरती जो कोई गावे, नित प्रति सवेरे।

कट जावें पाप सारे, मिट जावें अंधेरे॥

अन्नपूर्णा माता की, कृपा बनी रहे।

भक्तजन प्रेम से अब, जयकारा कहें॥

जय देवी जय देवी, जय अन्नपूर्णा।

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

आरती के प्रथम पद में भक्त माता की वंदना करते हुए कहते हैं—हे माता अन्नपूर्णा! आपकी जय हो। आप इस संसार के पालन और संचालन की साधिनी हैं और संपूर्ण जगत का कल्याण करने वाली हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव भी आपकी नित-प्रति सेवा करते हैं और समस्त नर-नारी मिलकर आपका ध्यान करते हैं। भाव यह है कि सृजन, पालन और संहार करने वाली त्रिमूर्ति भी अन्न और ऊर्जा के लिए माता के अधीन है।

द्वितीय पद में माता के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। आपका सिंहासनरत्नजटित है, जिस पर आपकी अलौकिक छवि सुशोभित होती है। मस्तक पर सुंदर मुकुट आपकी शोभा को और अधिक बढ़ाता है। श्वेत वस्त्र धारण किए और हाथों में अन्न की झोली लिए हुए आप अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं सहज ही पूर्ण कर देती हैं।

तृतीय पद में काशी नगरी की महिमा का बखान है। आपकी प्रिय राजधानी काशी पुरी है, जहाँ देव और मुनिजन आपकी महिमा का गान करते हैं। जो भी मनुष्य आपकी शरण में आता है, वह सभी प्रकार के सुख प्राप्त करता है। आपके आशीर्वाद से घर की दरिद्रता दूर होती है और स्थायी वैभव का वास होता है।

चतुर्थ पद में अन्न दान के महत्व को दर्शाया गया है। जो लोग अन्न दान का महाव्रत निभाते हैं और जीवों को भोजन कराते हैं, वे यमराज की यातनाओं से मुक्त हो जाते हैं। जब माता को छप्पन भोग और मिष्ठान्न अर्पित किए जाते हैं, तो उनके प्रसाद मात्र से संपूर्ण सृष्टि तृप्त हो जाती है।

पंचम पद में आरती के फल की स्तुति की गई है। जो भी भक्त प्रतिदिन सवेरे उठकर माता की इस आरती का गान करता है, उसके समस्त पाप और जीवन के अंधकार नष्ट हो जाते हैं। माता अन्नपूर्णा की कृपा उसके परिवार पर सदैव बनी रहती है।

गायन का राग, ताल एवं धुन

माता अन्नपूर्णा की आरती का गायन मुख्य रूप से **राग बिलावल** या **राग यमन** में किया जाता है। राग बिलावल प्रातःकालीन और शांत रस प्रदान करने वाला राग है, जो मन में सात्विकता और पवित्रता का संचार करता है। इस आरती की लय मध्यलय (त्रिताल - 16 मात्रा) में रखी जाती है, जिससे इसे समवेत स्वर में आसानी से गाया जा सके। ढोलक, मंजीरा, और हारमोनियम के साथ जब इस आरती को गाया जाता है, तो रसोईघर और पूजा स्थल का वातावरण पूरी तरह से दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

  • शुद्धता: आरती करने से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। रसोईघर या पूजा स्थान को भली-भांति साफ कर लें क्योंकि माता अन्नपूर्णा का विशेष वास रसोई में माना जाता है।
  • दीप प्रज्वलन: गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। यदि संभव हो तो मिट्टी के दीपक का प्रयोग करें या पीतल की थाली का उपयोग करें।
  • थाली सजावट: आरती की थाली में कुमकुम, अक्षत, पुष्प, कपूर और घंटी रखें।
  • आरती घुमाने का क्रम:
    1. सबसे पहले माता के चरणों की ओर 4 बार दीप घुमाएं।
    2. नाभि या हृदय चक्र की ओर 2 बार घुमाएं।
    3. मुख मंडल की ओर 7 बार घुमाएं।
    4. अंत में संपूर्ण शरीर की ओर 3 बार पूर्ण वर्तुल (Circle) में आरती घुमाएं।
  • प्रसाद वितरण: आरती के पश्चात दोनों हाथों से आरती की लौ को अपने मस्तक से लगाएं और उपस्थित सभी लोगों में सात्विक प्रसाद (खीर, हलवा या फल) वितरित करें।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

आरती के अंत में कपूर जलाने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। कपूर जिस प्रकार बिना कोई अवशेष छोड़े पूर्णतः जल जाता है, उसी प्रकार साधक के अहंकार और वासनाएं भी माता की भक्ति की अग्नि में भस्म हो जानी चाहिए। कपूर की सुगंध वातावरण के सूक्ष्म नकारात्मक तत्वों को नष्ट कर देती है।

फलश्रुति

जो श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और नियम के साथ माता अन्नपूर्णा की इस आरती का पाठ और श्रवण करता है, उसके घर में कभी भी अन्न, धन और वस्त्र का अभाव नहीं होता। उसके अतिथियों का हमेशा सत्कार होता है और अन्न की बर्बादी रुकती है। माता की कृपा से उसे इहलोक में सुख-समृद्धि और परलोक में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

१. श्री अन्नपूर्णा माता आरती: माता अन्नपूर्णा की संपूर्ण आरती, विधि और कृपा प्राप्ति के मंत्र का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री माता अन्नपूर्णा के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री माता अन्नपूर्णा जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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