पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री श्री द्वारकाधीश भगवान आरती
7 पाठ

श्री बल्लभ संप्रदाय एवं गोकुल के ठाकुर श्री द्वारकाधीश जी की पावन आरती - ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु, जय श्री द्वारकाधीश: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री बल्लभ संप्रदाय एवं गोकुल के ठाकुर श्री द्वारकाधीश जी की पावन आरती - ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु, जय श्री द्वारकाधीश: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन संस्कृति और पुष्टि मार्ग (श्री बल्लभ संप्रदाय) के अंतर्गत भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप श्री द्वारकाधीश जी की उपासना का अनंत आध्यात्मिक महत्व है। गोकुल और ब्रजमंडल की पावन भूमि पर विराजित ठाकुर श्री द्वारकाधीश जी केवल द्वारका के राजा ही नहीं, अपितु पुष्टि मार्ग के भक्तों के प्राण-धन और सर्वस्व हैं। महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित इस अद्वैत एवं शुद्धाद्वैत परंपरा में भगवान की सेवा 'रागात्मिका भक्ति' के रूप में की जाती है, जहाँ आराध्य के साथ वात्सल्य, सख्य और कांता भाव से संबंध जोड़ा जाता है। श्री द्वारकाधीश जी की आरती का गान करने मात्र से साधक के जीवन के समस्त संताप दूर हो जाते हैं और उसे भगवान के साक्षात दिव्य स्वरूप के दर्शन का अनुभव होता है। यह पावन आरती न केवल भगवान की स्तुति है, बल्कि जीव और ब्रह्म के मिलन का एक अत्यंत सुमधुर और पवित्र उत्सव है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु, जय श्री द्वारकाधीश।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करीश॥ ॐ जय...

रत्न जड़ित सिंहासन, अति सुंदर तेरी छबि।
देखत रूप तुम्हारा, मोहित होवे सब छवि॥
ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु...

पीतांबर पैहने हो, मुकुट सिर सोहत है।
बंसी की मधुर तान से, जग सारा मोहत् है॥
ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु...

कुंडल की झिलमिल से, नैन बड़े प्यारे हैं।
गोकुल के राजा तुम, त्रिभुवन के न्यारे हैं॥
ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु...

रुक्मिणी सत्यभामा, संग में बिराजैं हैं।
ग्वाल बाल संगी सब, मन को सुहावैं हैं॥
ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु...

अतुलित बल के धाम तुम, संकट हरैया हो।
अधम से अधम तारे, भवसागर तरैया हो॥
ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु...

जो जन आरती गावे, ध्यान धरे मन में।
बाधा सब कट जावे, आनंद हो तन में॥
ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु...

आरती जो कोई गावे, प्रेम सहित मन से।
पाप कटे सब उसके, छूट बंधन से॥
ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

श्री द्वारकाधीश जी की यह आरती अत्यंत सरल किंतु गहन आध्यात्मिक भावों से परिपूर्ण है। इस आरती की हर एक पंक्ति पुष्टि मार्ग के भक्तों के हृदय के उद्गार को व्यक्त करती है:

  • प्रथम पंक्ति (ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु...): हम सर्वशक्तिमान, शरणागतवत्सल प्रभु श्री द्वारकाधीश की वंदना करते हैं। हे प्रभु! आप अपने भक्तों के सभी प्रकार के भौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक संकटों को पल भर में हर लेते हैं।
  • श्रृंगार एवं रूप वर्णन: प्रभु के बैठने का सिंहासन अमूल्य रत्नों से जड़ा हुआ है और उस पर आपका अलौकिक रूप अत्यंत शोभायमान है। आपके इस दिव्य सौंदर्य को देखकर त्रिभुवन की समस्त सुंदरता लज्जित हो जाती है।
  • वस्त्र एवं आभूषण: आपने शरीर पर पीतांबर (पीले वस्त्र) धारण किए हैं, सिर पर मयूर पंखों से सुसज्जित मुकुट शोभा दे रहा है और आपकी मुरली की तान संपूर्ण ब्रह्मांड को मंत्रमुग्ध कर देती है।
  • निसर्ग एवं परिवार: आपके कानों के कुंडल आपके सुंदर नेत्रों की शोभा बढ़ा रहे हैं। आप गोकुल के राजा हैं और आपका स्वरूप समस्त संसार से विलक्षण है। माता रुक्मिणी और सत्यभामा आपके वामांग में विराजित हैं और गोकुल के ग्वाल-बाल आपकी सेवा में तत्पर हैं।
  • फलश्रुति भाव: जो भी भक्त प्रेम, श्रद्धा और भावभंगिमा के साथ इस आरती का गान करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भवसागर के बंधनों से मुक्त होकर अंत में परम धाम को प्राप्त होता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

पुष्टि मार्ग अथवा श्री बल्लभ संप्रदाय में सेवा का स्वरूप अत्यंत विलक्षण है। यहाँ अष्टयाम की सेवा होती है, जिसमें मंगला, शृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या आरती और शयन दर्शन सम्मिलित हैं। इसमें संध्या आरती और शृंगार आरती का विशेष महत्व माना गया है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण का वह स्वरूप हैं जो राजाधिराज के रूप में धर्म, न्याय और भक्तों की रक्षा का भार उठाते हैं। गोकुल में विराजित श्री द्वारकाधीश का यह मंदिर पुष्टि मार्ग के तृतीया पीठ के अंतर्गत आता है। इस पावन स्थल पर आरती करने से पितृ दोष, ग्रह बाधा और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। ऐसा विश्वास है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से द्वारकाधीश की आरती करता है, उसे सीधे ब्रज रज और वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम

भगवान श्री द्वारकाधीश की आरती को विधि-विधान के साथ करना अत्यंत फलदायी होता है:

  1. शुद्धता एवं पवित्रता: प्रातःकाल अथवा संध्याकाल में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र (विशेषकर पीले या श्वेत वस्त्र) धारण करें।
  2. स्थान की शुद्धि: मंदिर या पूजा गृह को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। आसान पर बैठकर मन को शांत करें।
  3. दीपक प्रज्वलन: घी या चमेली के तेल का दीपक प्रज्वलित करें। कपूर की आरती भी साथ में करें।
  4. आर्थिक क्रम (आरती की थाल घुमाने की दिशा): आरती को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाना चाहिए। सर्वप्रथम भगवान के चरणों में 4 बार, नाभि क्षेत्र में 2 बार, मुख मंडल पर 1 बार और अंत में पूरे शरीर पर 7 बार आरती घुमाई जाती है।
  5. घंटी एवं शंखनाद: आरती के समय अनवरत घंटी बजानी चाहिए और आरती के अंत में शंखनाद करना नकारात्मक ऊर्जा का नाश करता है।

आरती के समय आवश्यक सामग्री

श्री द्वारकाधीश जी की आरती को पूर्णता प्रदान करने के लिए निम्नलिखित सामग्रियां थाल में होनी चाहिए:

  • चांदी, पीतल या तांबे की स्वच्छ आरती की थाली।
  • शुद्ध गाय का घी और रुई की बत्तियां।
  • कपूर की टिकिया (आरती में कपूर प्रज्वलन का विशेष महत्व है)।
  • कुमकुम, अक्षत (अखंडित चावल) और पुष्प।
  • ताजे फूलों की माला और तुलसी दल।
  • पंचामृत या श्रीखंडी भोग/मिश्री-माखन का प्रसाद।
  • पीतल की घंटी और दक्षिणावर्ती शंख।

राग, ताल एवं गायन समय

पुष्टि मार्ग की परंपरा में संगीत का बहुत बड़ा स्थान है। श्री द्वारकाधीश जी की आरती का गान मुख्य रूप से राग कल्याण अथवा राग यमन में किया जाता है, जो संध्या कालीन बेला के लिए अत्यंत उपयुक्त माना गया है। इसकी ताल त्रिताल या दादरा होती है, जो भक्तों को झूमने पर विवश कर देती है। संध्या आरती का उपयुक्त समय सूर्यास्त के तुरंत बाद (संध्या बेला) का होता है, जब गोधूली बेला में भगवान की गौ-सेवा का स्मरण किया जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नित्य प्रति श्री द्वारकाधीश जी की इस पावन आरती का गान और श्रवण करने से साधक को निम्नलिखित अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति: मन का भटकाव दूर होता है और चित्त में एकाग्रता एवं स्थिरता आती है।
  • संकट निवारण: व्यवसायिक बाधाएं, पारिवारिक कलह और कर्ज के बोझ से मुक्ति मिलती है।
  • भक्ति भाव की वृद्धि: हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम (पुष्टि भक्ति) जागृत होती है।
  • नकारात्मकता का नाश: घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर सकारात्मक एवं दैवीय ऊर्जा का संचार होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री द्वारकाधीश जी की आरती प्रतिदिन किस समय करनी चाहिए?

श्री द्वारकाधीश जी की आरती मुख्य रूप से प्रातःकाल श्रृंगार दर्शन के समय और संध्याकाल में सूर्यास्त के तुरंत बाद करनी चाहिए। यह समय भगवान की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

क्या इस आरती को कोई भी गृहस्थ अपने घर पर कर सकता है?

हाँ, बिल्कुल। पुष्टि मार्ग के अनुयायी और अन्य सभी वैष्णवजन अपने घर के मंदिर में भगवान श्री द्वारकाधीश के विग्रह या चित्र के समक्ष इस आरती को विधि-विधान से गा सकते हैं।

आरती के दौरान किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?

आरती करते समय मन में किसी प्रकार का द्वेष या अशांति नहीं होनी चाहिए। आरती की थाली को श्रद्धापूर्वक घुमाएं और आरती समाप्त होने के बाद दोनों हाथों से उसकी ज्योति को अपनी आँखों और मस्तक पर लगाएं।

श्री बल्लभ संप्रदाय में द्वारकाधीश जी की सेवा का क्या महत्व है?

श्री बल्लभ संप्रदाय (पुष्टि मार्ग) में भगवान श्रीकृष्ण के बाल और युवा स्वरूपों की सेवा प्राण-प्रिय मानी जाती है। गोकुल के ठाकुर द्वारकाधीश जी भक्तों के सखा और पालक दोनों रूपों में पूजे जाते हैं, जिससे साधक को सहज ही मुक्ति और भक्ति दोनों प्राप्त हो जाती हैं।

१. श्री बल्लभ संप्रदाय एवं गोकुल के ठाकुर श्री द्वारकाधीश जी की पावन आरती - ॐ जय द्वारकाधीश प्रभु, जय श्री द्वारकाधीश: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री द्वारकाधीश भगवान के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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