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श्री भगवान सूर्य आरती
7 पाठ

श्री सूर्य देव की पावन आरती - ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन / भैरवी शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek.Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री सूर्य देव की पावन आरती - ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म में भगवान सूर्य देव को 'प्रत्यक्ष देव' माना गया है, क्योंकि वे एकमात्र ऐसे देवता हैं जिन्हें हम प्रतिदिन अपनी आँखों से देख सकते हैं। सूर्य देव न केवल प्रकाश के पुंज हैं, बल्कि वे समस्त चराचर जगत की आत्मा और ऊर्जा के अक्षय स्रोत भी हैं। उनकी उपासना के लिए 'ॐ जय सूर्य भगवान' की आरती का विशेष महत्व है। यह आरती भक्त के जीवन से अज्ञानता के अंधकार को दूर कर उसे ज्ञान, स्वास्थ्य और समृद्धि के प्रकाश की ओर ले जाती है। रविवार के दिन, जो सूर्य देव को समर्पित है, इस आरती का गान करने से व्यक्ति के कुंडली के दोष शांत होते हैं और उसे समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल (Lyrics in Hindi)

ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान।
जगत के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूप ॥ ॐ जय...

सप्त अश्व रथ साजे, निर्मल किरणें धारे।
कश्यप नंदन प्यारे, तुम हो जग के उजियारे ॥ ॐ जय...

शंख चक्र गदा धारी, मस्तक मुकुट विराजे।
कुंडल कानन सोहे, छवि अति मनभावन साजे ॥ ॐ जय...

अंधकार के नाशक, तुम हो तेज पुंज स्वामी।
भक्तों के दुख हरता, तुम हो अंतर्यामी ॥ ॐ जय...

रोग शोक सब मिटते, जो तुमको ध्याते।
धन धान्य सुख संपत्ति, वे नर पा जाते ॥ ॐ जय...

वेद पुराण बखानें, महिमा अमित तुम्हारी।
ऋषि मुनि ध्यान लगावें, शरण गहे नर नारी ॥ ॐ जय...

भानु भास्कर आदित्य, रवि दिनकर नाम तुम्हारे।
सब देवों में श्रेष्ठ, तुम हो प्राण हमारे ॥ ॐ जय...

सूर्य देव की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत 'भक्ति' मनवांछित, फल निश्चय पावे ॥ ॐ जय...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

सूर्य देव की यह आरती उनके विराट स्वरूप और उनकी कृपा का विस्तृत वर्णन करती है। यहाँ प्रत्येक पंक्ति का गहन आध्यात्मिक अर्थ दिया गया है:

1. ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान: इस पंक्ति में भक्त सूर्य देव की जय-जयकार करता है। 'दिनकर' का अर्थ है दिन करने वाला। सूर्य के उदय होते ही सृष्टि में चेतना का संचार होता है।

2. जगत के नेत्रस्वरूपा, तुम हो त्रिगुण स्वरूप: वेदों में सूर्य को 'चक्षोः सूर्यो अजायत' कहा गया है, अर्थात वे ईश्वर के नेत्र हैं। वे सत्व, रज और तम—इन तीनों गुणों के स्वामी हैं और सृष्टि के संचालन में संतुलन बनाए रखते हैं।

3. सप्त अश्व रथ साजे, निर्मल किरणें धारे: सूर्य देव सात घोड़ों वाले रथ पर सवार हैं। ये सात घोड़े सप्ताह के सात दिनों और प्रकाश के सात रंगों (VIBGYOR) के प्रतीक हैं। उनकी किरणें अत्यंत निर्मल और पवित्र हैं जो पृथ्वी को शुद्ध करती हैं।

4. कश्यप नंदन प्यारे, तुम हो जग के उजियारे: पौराणिक कथाओं के अनुसार सूर्य देव महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र हैं। वे पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशित करने वाले एकमात्र स्रोत हैं।

5. शंख चक्र गदा धारी, मस्तक मुकुट विराजे: सूर्य देव का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी है। वे भगवान विष्णु के समान ही शंख, चक्र और गदा धारण करते हैं, जो उनकी रक्षात्मक और संहारक शक्तियों का प्रतीक है।

6. अंधकार के नाशक, तुम हो तेज पुंज स्वामी: सूर्य देव केवल भौतिक अंधकार ही नहीं, बल्कि अज्ञान रूपी मानसिक अंधकार का भी नाश करते हैं। वे तेज के पुंज हैं जिनसे समस्त देवी-देवता भी शक्ति प्राप्त करते हैं।

7. रोग शोक सब मिटते, जो तुमको ध्याते: विज्ञान भी मानता है कि सूर्य की किरणें रोगों का नाश करती हैं। आध्यात्मिक रूप से सूर्य की उपासना से चर्म रोग, नेत्र रोग और मानसिक अवसाद दूर होते हैं।

8. भानु भास्कर आदित्य, रवि दिनकर नाम तुम्हारे: सूर्य देव के अनेक नाम हैं, और प्रत्येक नाम उनकी एक विशिष्ट शक्ति को दर्शाता है। जैसे 'भास्कर' का अर्थ है प्रकाश फैलाने वाला और 'आदित्य' का अर्थ है अदिति का पुत्र।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

सूर्य देव की आरती का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और दार्शनिक भी है। हिंदू धर्म के 'पंचदेवों' में सूर्य देव का स्थान प्रमुख है। वे 'कर्मसाक्षी' हैं, अर्थात वे हमारे द्वारा किए गए प्रत्येक कर्म को देखते हैं।

वैदिक महत्व

ऋग्वेद में सूर्य को 'जगतस्तस्थुषश्च' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे चर और अचर जगत की आत्मा हैं। गायत्री मंत्र, जो हिंदू धर्म का सबसे पवित्र मंत्र है, वह भी सूर्य देव (सविता) को ही समर्पित है। आरती के माध्यम से हम उसी वैदिक ऊर्जा को अपने भीतर आत्मसात करने का प्रयास करते हैं।

पौराणिक संदर्भ

पुराणों के अनुसार, सूर्य देव की उपासना से ही भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ किया था। महाभारत में कर्ण और कुंती ने सूर्य देव की आराधना से ही विशेष शक्तियां प्राप्त की थीं। सूर्य देव की आरती करने से व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का विकास होता है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

सूर्य देव की आरती का पूर्ण फल तभी मिलता है जब इसे सही विधि और शुद्ध मन से किया जाए। यहाँ चरण-दर-चरण विधि दी गई है:

  • स्नान और शुद्धि: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें।
  • अर्घ्य दान: आरती से पहले तांबे के पात्र में जल, अक्षत, लाल चंदन और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय जल की धारा के बीच से सूर्य देव के दर्शन करें।
  • स्थान का चयन: आरती संभव हो तो खुले स्थान पर सूर्य के सम्मुख खड़े होकर करें। यदि घर के मंदिर में कर रहे हैं, तो मुख पूर्व दिशा की ओर रखें।
  • दीपक प्रज्वलित करना: तांबे या पीतल के दीपक में शुद्ध घी का दीपक जलाएं। आप कपूर का उपयोग भी कर सकते हैं।
  • आरती की प्रक्रिया: दीपक को सूर्य देव की प्रतिमा या प्रत्यक्ष सूर्य के सामने सात बार घुमाएं। पहले चरणों की ओर चार बार, फिर नाभि की ओर दो बार और अंत में मुख मंडल की ओर एक बार घुमाएं।
  • मंत्रोच्चार: आरती के दौरान 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' का मानसिक जाप करते रहें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

सूर्य देव की पूजा में तांबे की वस्तुओं का विशेष महत्व है। आरती की थाली में निम्नलिखित सामग्री होनी चाहिए:

सामग्री महत्व
तांबे की थाली सूर्य देव की प्रिय धातु, ऊर्जा का सुचालक।
शुद्ध घी का दीपक सात्विक ऊर्जा और प्रकाश का प्रतीक।
लाल चंदन और कुमकुम तेज और सौभाग्य के लिए।
लाल पुष्प (गुड़हल) सूर्य देव को अत्यंत प्रिय।
कपूर वातावरण की शुद्धि और नकारात्मकता का नाश।
शंख और घंटी दिव्य ध्वनि जो एकाग्रता बढ़ाती है।

राग, ताल एवं गायन समय

सूर्य देव की आरती का गायन यदि शास्त्रीय पद्धति से किया जाए, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

राग: इस आरती के लिए 'राग भैरवी' या 'राग कल्याण' सबसे उपयुक्त माना जाता है। सुबह के समय राग भैरवी मन को शांति और ऊर्जा प्रदान करती है।

ताल: यह आरती सामान्यतः 'कहरवा ताल' (8 मात्रा) में गाई जाती है, जो एक मध्यम लय प्रदान करती है।

समय: सूर्य देव की आरती का सर्वश्रेष्ठ समय सूर्योदय (प्रातः काल) है। संध्या के समय सूर्यास्त से ठीक पहले भी आरती की जा सकती है, जिसे 'संध्या वंदन' का हिस्सा माना जाता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से सूर्य देव की आरती करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • आरोग्य की प्राप्ति: सूर्य देव 'आरोग्यं भास्करदिच्छेत' के अनुसार स्वास्थ्य के देवता हैं। उनकी आरती से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  • मानसिक स्पष्टता: सूर्य बुद्धि के कारक हैं। उनकी कृपा से निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है और भ्रम दूर होता है।
  • सामाजिक प्रतिष्ठा: कुंडली में सूर्य मजबूत होने से व्यक्ति को यश, कीर्ति और सरकारी कार्यों में सफलता मिलती है।
  • नकारात्मकता का नाश: जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार भाग जाता है, वैसे ही आरती के प्रभाव से घर की नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता का नाश होता है।
  • आत्मविश्वास में वृद्धि: सूर्य देव की ऊर्जा व्यक्ति के भीतर साहस और निडरता का संचार करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

सूर्य देव की आरती किस दिशा में मुख करके करनी चाहिए?

सूर्य देव की आरती हमेशा पूर्व दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए, क्योंकि सूर्य इसी दिशा से उदित होते हैं। शाम के समय पश्चिम दिशा की ओर मुख किया जा सकता है।

क्या महिलाएं सूर्य देव को अर्घ्य दे सकती हैं और आरती कर सकती हैं?

हाँ, शास्त्रानुसार महिलाएं भी पूर्ण श्रद्धा के साथ सूर्य देव को अर्घ्य दे सकती हैं और उनकी आरती कर सकती हैं। यह उनके सौभाग्य और स्वास्थ्य के लिए अत्यंत शुभ है।

रविवार के दिन सूर्य आरती का क्या विशेष महत्व है?

रविवार सूर्य देव का वार है। इस दिन आरती करने और व्रत रखने से सूर्य जनित दोष (जैसे पितृ दोष या कमजोर सूर्य) का निवारण होता है और मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।

सूर्य आरती के लिए कौन सा दीपक श्रेष्ठ है?

सूर्य देव की आरती के लिए तांबे के दीपक में शुद्ध गाय के घी का उपयोग करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है। यदि तांबे का दीपक न हो, तो मिट्टी का नया दीपक भी उपयोग किया जा सकता है।

निष्कर्ष: भगवान सूर्य देव की आरती केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ जुड़ने का एक माध्यम है। जो भक्त प्रतिदिन पूर्ण विश्वास के साथ 'ॐ जय सूर्य भगवान' का गान करते हैं, उनका जीवन सूर्य की भांति चमकने लगता है। आइए, हम सब मिलकर उस परम तेजस्वी देव की शरण में चलें और अपने जीवन को धन्य बनाएं।

१. श्री सूर्य देव की पावन आरती - ॐ जय सूर्य भगवान, जय हो दिनकर भगवान: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री भगवान सूर्य के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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