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श्री श्री दत्तात्रेय भगवान आरती
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श्री दत्तात्रेय भगवान की आरती - ॐ जय गुरु दत्ता, स्वामी जय गुरु दत्ता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग कल्याण / यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Suraj.Kumar.Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ श्री दत्तात्रेय भगवान की आरती - ॐ जय गुरु दत्ता, स्वामी जय गुरु दत्ता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

सनातन धर्म में त्रिदेवों—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—के संयुक्त अवतार भगवान श्री दत्तात्रेय को आदियोगी, प्रथम गुरु और परब्रह्म का साक्षात स्वरूप माना जाता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रकट हुए भगवान दत्तात्रेय की स्तुति और उनकी आरती का गायन साधक के जीवन के समस्त भौतिक बंधनों को काटकर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। उनकी प्रसिद्ध आरती 'ॐ जय गुरु दत्ता, स्वामी जय गुरु दत्ता' का गान करने मात्र से साधक को त्रिदेवों के आशीर्वाद के साथ-साथ अद्भूत शांति और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति होती है।

सम्पूर्ण आरती मूल बोल

ॐ जय गुरु दत्ता, स्वामी जय गुरु दत्ता।
त्रिगुणात्मक ब्रह्मा विष्णु महेशा, अवधूत दत्ता॥
ॐ जय गुरु दत्ता...

अनसूया अत्रि के आंगन, प्रगट भए स्वामी।
संसार के दुखहर्ता, तुम हो अंतर्यामी॥
ॐ जय गुरु दत्ता...

छह भुजा तीन मुख सोहे, कर त्रिशूल धाता।
गायन सुर मुनि गावें, जय जय सुखदाता॥
ॐ जय गुरु दत्ता...

काम क्रोध मद लोभ, सब तुमने जीते।
भक्तन के हितकारी, प्रेम सुधा पीते॥
ॐ जय गुरु दत्ता...

गाय और श्वान संग, तिहरे रूप धारे।
दीनन की प्रतिपालक, भवसागर तारे॥
ॐ जय गुरु दत्ता...

जो जन आरती गावें, ध्यान धरे मन में।
पाप कटे सब उसके, बसत सदा मन में॥
ॐ जय गुरु दत्ता...

आरती का सरल हिंदी भावार्थ एवं प्रत्येक पंक्ति का अर्थ

भगवान दत्तात्रेय की यह आरती अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को समेटे हुए है। इसके प्रत्येक शब्द में त्रिदेवों की शक्ति और गुरुतत्व की महिमा का बखान किया गया है।

प्रथम छंद का भावार्थ

'ॐ जय गुरु दत्ता, स्वामी जय गुरु दत्ता। त्रिगुणात्मक ब्रह्मा विष्णु महेशा, अवधूत दत्ता॥' - इस प्रथम पंक्ति में भक्त भगवान दत्तात्रेय को 'गुरु दत्त' के रूप में संबोधित करते हुए उनकी जयकार करता है। दत्तात्रेय भगवान त्रिगुणात्मक हैं अर्थात वे स्वयं ब्रह्मा (सृष्टि कर्ता), विष्णु (पालनकर्ता) और महेश (संहारकर्ता) का संयुक्त रूप हैं। 'अवधूत' वह संत कहलाता है जो संसार के सभी बंधनों, अहंकार और द्वैत भाव से मुक्त होकर केवल परब्रह्म में लीन रहता है।

द्वितीय छंद का भावार्थ

'अनसूया अत्रि के आंगन, प्रगट भए स्वामी। संसार के दुखहर्ता, तुम हो अंतर्यामी॥' - यहाँ महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के परम तप के फलस्वरूप उनके घर पुत्र रूप में प्रकट हुए भगवान दत्तात्रेय की कथा का स्मरण किया गया है। वे संपूर्ण संसार के दुखों को हरने वाले और हर जीव के मन की बात जानने वाले अंतर्यामी हैं।

तृतीय एवं चतुर्थ छंद का भावार्थ

'छह भुजा तीन मुख सोहे, कर त्रिशूल धाता।' दत्तात्रेय भगवान के तीन मुख तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी छह भुजाएं उनके अनंत सामर्थ्य को दर्शाती हैं। उनके हाथ में त्रिशूल और डमरू आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक हैं। काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी आंतरिक वृत्तियों को उन्होंने पूरी तरह जीत लिया है और वे अपने भक्तों पर प्रेम रूपी सुधा (अमृत) की वर्षा करते हैं।

पंचम एवं षष्ठ छंद का भावार्थ

'गाय और श्वान संग, तिहरे रूप धारे।' दत्तात्रेय भगवान के साथ चार वेद रूपी चार कुत्ते और पृथ्वी रूपी कामधेनु गाय हमेशा विद्यमान रहती है, जो प्रकृति और वेदों के साथ उनके अनन्य संबंध को दर्शाती है। जो भी भक्त सच्चे मन से इस आरती का गान करता है और उनका ध्यान करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भवसागर से तर जाता है।

आरती का धार्मिक एवं पौराणिक महत्व

हिंदू पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान दत्तात्रेय को गुरुओं का गुरु (परम गुरु) माना जाता है। गुरुचरित्र और स्कंद पुराण में दत्तात्रेय भगवान की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा को 'दत्तात्रेय जयन्ती' के रूप में मनाया जाता है।

दत्तात्रेय भगवान ने प्रकृति से 24 गुरु बनाए थे, जिसमें पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा, हाथी, दीमक, मछली, पिंगला वैश्या, कुररी पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, तीर बनाने वाला, सर्प, मकड़ी और भृंग कीट शामिल हैं। उनकी आरती गाने से मनुष्य को प्रकृति के हर कण से ज्ञान प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है। यह आरती मानसिक तनाव, भय, अनिश्चितता और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में अत्यंत प्रभावशाली मानी गई है।

आरती करने की सही विधि एवं नियम (Puja & Aarti Vidhi)

  1. स्थान की शुद्धि: पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। आसन पर बैठकर ध्यान करें।
  2. विग्रह स्थापना: भगवान दत्तात्रेय की मूर्ति या तस्वीर के सामने घी का दीपक और धूपबत्ती प्रज्वलित करें।
  3. पुष्प और नैवेद्य: भगवान को पीले पुष्प, अक्षत (चावल), रोली और सात्विक भोग (विशेषकर बेसन के लड्डू या फल) अर्पित करें।
  4. आरती का क्रम: प्रज्वलित कपूर और दीपक की थाल को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) कम से कम सात बार भगवान के चारों ओर घुमाएं।
  5. जयकारा और क्षमायाथन: आरती समाप्त होने के बाद शंख और घंटी बजाएं, भगवान की परिक्रमा करें और अंत में भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

आरती के समय आवश्यक सामग्री (थाल, दीपक, कपूर, घंटी, शंख)

एक आदर्श और प्रभावशाली आरती संपन्न करने के लिए निम्नलिखित पूजन सामग्री का होना अनिवार्य है:

  • पूजा की थाल: पीतल, तांबे या चांदी की स्वच्छ थाली।
  • दीपक: गाय के शुद्ध घी का दीपक या मिट्टी का दीया जिसमें कपास की बत्ती हो।
  • कपूर: शुद्ध भीमसेनी कपूर जो आरती की थाल में प्रज्वलित किया जाता है।
  • घंटी और शंख: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने और सकारात्मक ध्वनि कंपन (Vibration) के लिए पीतल की घंटी और दक्षिणावर्ती शंख।
  • पुष्प और रोली: ताजे पुष्प (विशेषतः पीले गेंदे के फूल) और रोली-चंदन।

राग, ताल एवं गायन समय

भगवान दत्तात्रेय की आरती का गायन मुख्य रूप से राग कल्याण या राग यमन में किया जाता है, जो मन को शांति और दिव्यता प्रदान करता है। इसे कहवा या दादरा ताल (ताल की मध्यम गति) में गाया जा सकता है।

गाय का उपयुक्त समय: इस आरती को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में (सूर्योदय से पूर्व) या संध्याकाल (प्रदोष काल) में गाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। विशेषकर गुरुवार के दिन दत्तात्रेय भगवान का स्मरण करते हुए यह आरती करने से गुरु दोष शांत होता है।

दैनिक जीवन में आध्यात्मिक लाभ एवं फलश्रुति

नियमित रूप से भगवान दत्तात्रेय की आरती करने से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:

  • गुरु कृपा प्राप्ति: जीवन में सही मार्गदर्शन और सच्चे गुरु की प्राप्ति होती है।
  • मानसिक शांति: तनाव, चिंता और अवसाद से मुक्ति मिलती है तथा मन में स्थिरता आती है।
  • त्रिमूर्ति का आशीर्वाद: ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं की कृपा एक साथ प्राप्त होती है।
  • कर्म बंधन से मुक्ति: अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित होता है और मोक्ष का द्वार खुलता है।
  • नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर का वातावरण पवित्र और सकारात्मक बनता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

१. श्री दत्तात्रेय भगवान की आरती - ॐ जय गुरु दत्ता, स्वामी जय गुरु दत्ता: संपूर्ण बोल, भावार्थ एवं पूजा विधि का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री श्री दत्तात्रेय भगवान के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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