पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री एकादशी माता आरती
18 पाठ

ॐ जय एकादशी माता (एकादशी व्रत की मंगल आरती) (विशेष संस्करण #112)

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग बिलावल शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Deepak Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ ॐ जय एकादशी माता (एकादशी व्रत की मंगल आरती) (विशेष संस्करण #112) ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

एकादशी व्रत की मंगल आरती और उसका पौराणिक महत्व

हिन्दू सनातन धर्म में एकादशी व्रत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वर्ष भर में आने वाली चौबीस (या मलमास के कारण छब्बीस) एकादशियाँ भगवान विष्णु को अति प्रिय हैं। एकादशी तिथि को स्वयं श्री हरि विष्णु की शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। पद्म पुराण, भविष्योत्तर पुराण और स्कंद पुराण में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि एकादशी माता की कृपा से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे अंत में वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।

एकादशी व्रत के अनुष्ठान और रात्रि जागरण के उपरान्त द्वादशी तिथि के दिन व्रत के पूर्ण होने पर माँ एकादशी की आरती करने का विधान है। 'ॐ जय एकादशी माता' आरती का गायन करने से घर में सुख, शांति, समृद्धि और सात्विक ऊर्जा का संचार होता है। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि यह भौतिक बंधनों से मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का एक महामार्ग है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

ॐ जय एकादशी, माता एकादशी।
सतगीत गावत नर, नर नारी सब मिलकर॥ ॐ जय...

विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति तुम देती।
धन धान्य सुख सम्पत्ति, घर घर में भर देती॥ ॐ जय...

मुर दैत्य संहारक, तुम हो जननी माता।
भक्तन की प्रतिपालक, तुम हो सुखदाता॥ ॐ जय...

मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की, उत्पन्ना कहलाई।
शुक्ल पक्ष में मोक्षदा, भव से पार लगाई॥ ॐ जय...

पौष कृष्ण पक्ष की सफला, एकादशी आवे।
शुक्ल पक्ष में पुत्रदा, सब मन वांछित पावे॥ ॐ जय...

षटतिला माघ कृष्ण पक्ष की, पाप विनाशक भारी।
जया शुक्ल पक्ष की, गावत नर नारी॥ ॐ जय...

विजया फाल्गुन कृष्ण पक्ष की, निश्चय जय करती।
आमला शुक्ल पक्ष में, हर कष्ट हर लेती॥ ॐ जय...

पापमोचनी चैत्र कृष्ण पक्ष, सुख सम्पत्ति दाता।
कमला शुक्ल पक्ष में, जग की हो माता॥ ॐ जय...

वरथिनी वैशाख कृष्ण पक्ष, भव भय हर लेती।
मोहिनी शुक्ल पक्ष में, हर इच्छा भर देती॥ ॐ जय...

अपरा ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की, पातक सब हरती।
निर्जला शुक्ल पक्ष की, सब गति सुधर करती॥ ॐ जय...

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

प्रथम पद:
ॐ जय एकादशी, माता एकादशी। सतगीत गावत नर, नर नारी सब मिलकर॥
भावार्थ: हे माता एकादशी! आपकी जय हो। सभी पुरुष और स्त्रियाँ मिलकर आपके पवित्र गीत और यश का गान करते हैं। आपके चरणों में हमारी बारंबार वंदना है।

द्वितीय पद:
विष्णु पूजा व्रत को धारण कर, शक्ति तुम देती। धन धान्य सुख सम्पत्ति, घर घर में भर देती॥
भावार्थ: हे माँ! भगवान विष्णु के प्रिय इस व्रत को धारण करने की शक्ति आप ही अपने भक्तों को प्रदान करती हैं। आपके आशीर्वाद से साधक के घर में धन, धान्य, सुख और वैभव की कभी कमी नहीं होती।

तृतीय पद:
मुर दैत्य संहारक, तुम हो जननी माता। भक्तन की प्रतिपालक, तुम हो सुखदाता॥
भावार्थ: पौराणिक कथा के अनुसार मुर नामक दैत्य का संहार करने वाली शक्ति एकादशी ही है। आप हम सबकी माता हैं, जो अपने भक्तों का पालन-पोषण करती हैं और उन्हें समस्त सुख प्रदान करती हैं।

चतुर्थ पद:
मार्गशीर्ष के कृष्ण पक्ष की, उत्पन्ना कहलाई। शुक्ल पक्ष में मोक्षदा, भव से पार लगाई॥
भावार्थ: मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'उत्पन्ना' के रूप में प्रकट हुई, और इसी मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी 'मोक्षदा' कहलाई जो भक्तों को भवसागर से पार लगाती है।

गायन का राग, ताल एवं धुन

इस आरती का गायन सामान्यतः राग बिलावल या राग यमन में किया जाता है, जो मन में सात्विक भाव, शांति और उल्लास का संचार करते हैं। ताल की दृष्टि से इसे कहरवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा) में आसानी से गाया जा सकता है। आरती की लय धीमी से मध्यम (मध्यलय) रखी जाती है ताकि प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट हो सके और श्रोता व गायक दोनों तन्मयता का अनुभव कर सकें।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

  • स्थापना: एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता एकादशी की प्रतिमा या चित्र के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • थाली की सजावट: पूजा की थाली में कुमकुम, अक्षत (अतूट चावल), पुष्प, धूप और कपूर रखें।
  • घुमाने का क्रम: आरती गाते समय थाली को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाया जाता है।
  • संख्या: सर्वप्रथम भगवान के चरणों में 4 बार, नाभि क्षेत्र में 2 बार और मुख मंडल की ओर 7 बार (कुल 14 बार या पूर्ण चक्र) थाली घुमाई जाती है।
  • आचमन: आरती समाप्त होने के बाद दोनों हाथों से कपूर की जोत को आँखों और मस्तक पर स्पर्श करें तथा आचमन करें।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

आरती के अंत में गाए जाने वाले 'कर्पूरगौरं करुणावतारम्' मंत्र और कपूर जलाने का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। कपूर जिस प्रकार बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह जल जाता है, उसी प्रकार साधक के अहंकार, वासनाएं और अज्ञान भी इस दिव्य ज्ञान की अग्नि में भस्म हो जाने चाहिए।

फलश्रुति: जो भी भक्त सच्चे मन और नियमपूर्वक एकादशी व्रत रखकर इस पावन आरती का पाठ करता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। उसे अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है और अंत में विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

१. ॐ जय एकादशी माता (एकादशी व्रत की मंगल आरती) (विशेष संस्करण #112) का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री एकादशी माता के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री एकादशी माता जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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