॥ माता वैष्णो देवी जी की आरती - जय वैष्णवी माता मैया जय वैष्णवी माता हाथ जोड़ तेरे आगे आरती मैं गाता ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन संस्कृति और शाक्त परंपरा में माँ वैष्णो देवी त्रिकूट पर्वत पर विराजमान आदि शक्ति महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली का सम्मिलित एवं साकार स्वरूप हैं। जम्मू-कश्मीर की पावन वादियों में स्थित त्रिकूट पर्वत पर स्थित यह दरबार संपूर्ण ब्रह्मांड की आस्था का केंद्र है। 'जय वैष्णवी माता मैया जय वैष्णवी माता' यह परम पवित्र आरती माता के दरबार में नित्य प्रति होने वाली संध्या और प्रातकालीन आराधना का प्राण है। इस आरती की रचना पारंपरिक संत-साहित्यों और लोक-आस्था के समन्वय से हुई है। हालांकि इसके मूल रचयिता के नाम को लेकर अलग-अलग मत हैं, किंतु सदियों से यह आरती अनवरत रूप से गुरु-शिष्य परंपरा और मौखिक संस्कृति के माध्यम से जन-जन के कंठ में विराजित रही है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में भगवान श्रीराम की आराधना के लिए आदि शक्ति ने वैष्णवी रूप में अवतार लिया था। भैरवनाथ के साथ हुए संघर्ष और अंततः उसे मोक्ष प्रदान करने के बाद माता ने त्रिकूट पर्वत की गुफा में अंतर्ध्यान होकर भक्तों को त्रिशक्ति रूप में दर्शन देना प्रारंभ किया। इस आरती का प्रत्येक शब्द माँ के इसी अलौकिक पराक्रम, वात्सल्य और करुणा का गुणगान करता है। जब भक्त संध्या वेला में अथवा प्रातःकाल त्रिकूट पर्वत पर या अपने घरों में इस आरती को गाते हैं, तो पूरा वातावरण दिव्यता और चैतन्य से भर जाता है। आरती का उद्देश्य केवल धूप-दीप घुमाना नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के अंधकार को माँ के ज्ञान रूपी प्रकाश से आलोकित करना है।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
जय वैष्णवी माता, मैया जय वैष्णवी माता।
हाथ जोड़ तेरे आगे, आरती मैं गाता॥ जय...॥
शेषशायिनी नृसिंहानी, कलि कलुष हरानी।
त्रिगुणात्मिका जगदम्बे, सबकी महारानी॥ जय...॥
सिंहासन पर बैठी, ज्योति तुम्हारी जागे।
भक्त जनों के संकट, पल में दूर भागे॥ जय...॥
ब्रह्मा, विष्णु, शिवजी, सेवा नित करते।
वेद पुराण बखाने, सब संकट हरते॥ जय...॥
पान सुपारी सिंदूर, ध्वजा नारियल प्यारा।
दर दर्शन को आते, जगत् का उजियारा॥ जय...॥
चरणामृत जो पीवे, भवसागर तरे।
दास तुम्हारे माता, दुख कभी ना धरे॥ जय...॥
कालचक्र से जो डरे, शरण तुम्हारी आए।
मैया कृपा कटाक्ष से, अभयदान पाए॥ जय...॥
जय वैष्णवी माता, मैया जय वैष्णवी माता।
हाथ जोड़ तेरे आगे, आरती मैं गाता॥ जय...॥
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
आरती की प्रथम पंक्ति 'जय वैष्णवी माता, मैया जय वैष्णवी माता। हाथ जोड़ तेरे आगे, आरती मैं गाता' में भक्त अपनी पूर्ण समर्पण और विनम्रता का भाव प्रकट करता है। दोनों हाथों को जोड़कर माँ के श्रीचरणों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना इस बात का प्रतीक है कि जीव अपने अहंकार का त्याग कर शरणागत हो चुका है।
'शेषशायिनी नृसिंहानी, कलि कलुष हरानी। त्रिगुणात्मिका जगदम्बे, सबकी महारानी' - इस पद में माँ के आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन है। 'शेषशायिनी' का अर्थ है जो भगवान विष्णु की योगनिद्रा और अनंत शेषनाग से जुड़ी हैं, 'नृसिंहानी' यानी नृसिंह भगवान की शक्ति, और 'कलि कलुष हरानी' का अर्थ है कलियुग के समस्त पापों और विकारों को हरने वाली। माँ त्रिगुणात्मिका (सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे और युक्त) हैं और इस संपूर्ण ब्रह्मांड की जगदम्बे महारानी हैं।
'सिंहासन पर बैठी, ज्योति तुम्हारी जागे। भक्त जनों के संकट, पल में दूर भागे' - त्रिकूट पर्वत की गुफा में पिंडी रूप में विराजमान माँ की अलौकिक ज्योति के दर्शन मात्र से भक्तों के जन्म-जन्म के संकट और कष्ट क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।
'ब्रह्मा, विष्णु, शिवजी, सेवा नित करते। वेद पुराण बखाने, सब संकट हरते' - इस स्तुति में ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे त्रिदेव भी जिस शक्ति की आराधना में लीन रहते हैं, उस आदिशक्ति के यश का गान वेद और पुराण भी करते हैं।
'पान सुपारी सिंदूर, ध्वजा नारियल प्यारा। दर दर्शन को आते, जगत् का उजियारा' - माँ वैष्णो देवी के पूजन में लाल चुनरी, नारियल, पान, सुपारी और सिंदूर का विशेष महत्व है। जो भक्त सच्चे मन से उनके दरबार में हाजिरी लगाते हैं, उनके जीवन में माँ प्रकाश भर देती हैं।
'चरणामृत जो पीवे, भवसागर तरे। दास तुम्हारे माता, दुख कभी ना धरे' - माँ के चरणों का अमृत (चरणामृत) आधि-व्याधि और संसार रूपी सागर से पार लगाने वाला है। जो भी इस दरबार का दास बन जाता है, उसे कभी दुखों का संताप नहीं घेरता।
'कालचक्र से जो डरे, शरण तुम्हारी आए। मैया कृपा कटाक्ष से, अभयदान पाए' - मृत्यु और काल के भय से भयभीत जीव जब माँ की शरण में आता है, तो माँ की एक मात्र कृपा दृष्टि (कटाक्ष) से उसे अभयदान प्राप्त होता है और वह सारे भयों से मुक्त हो जाता है।
गायन का राग, ताल एवं धुन
माता वैष्णो देवी की यह आरती संगीत की दृष्टि से बेहद मधुर, ऊर्जावान और भक्तिरस से परिपूर्ण है। इस आरती का गायन मुख्यतः 'राग यमन' या 'राग बिलावल' में किया जाता है, जो संध्या बेला और प्रातः काल की ऊर्जा के अनुकूल है।
- ताल: कहवा (८ मात्रा) या दादरा (६ मात्रा) ताल, जिस पर झांझ, मंजीरा और ढोलक की थाप आसानी से बैठती है।
- लय: मध्यम लय (मध्य गति), ताकि श्रद्धालु आसानी से सम पर ताली बजाते हुए स्वर मिला सकें।
- आरोह-अवरोह: सा ग म प ध सां / सां नि ध प म ग रि सा (राग यमन के शास्त्रीय ढांचे के अनुसार)।
- वाद्य यंत्र: हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, शंख और घंटी इस आरती के सजीव गायन में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
आरती उतारने की एक निश्चित शास्त्रीय और तांत्रिक विधि होती है, जिससे पूजन का पूर्ण फल प्राप्त होता है:
- सबसे पहले पीतल या तांबे की स्वच्छ थाली में कपूर, शुद्ध घी का दीपक (कम से कम पाँच बत्तियों वाला), चंदन, कुमकुम, अक्षत, पुष्प और धूपबत्ती सजाएं।
- आरती प्रारंभ करने से पूर्व शंखनाद करें, जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।
- आरती गाते समय थाली को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाना चाहिए।
- चरणों की ओर ४ बार, नाभि या हृदय की ओर २ बार और मुखमंडल की ओर १ बार - कुल मिलाकर इस प्रकार घुमाएं कि पूर्ण ब्रह्मांडीय चक्र (ॐकार स्वरूप) बन जाए।
- आरती पूर्ण होने के बाद दोनों हथेलियों को प्रज्वलित ज्योति के ऊपर से फेरकर अपनी आँखों और मस्तक पर लगाएं (इसे ज्योति लेना कहते हैं)।
- तत्पश्चात उपस्थित सभी भक्तों में आचमन और चरणामृत वितरित करें।
कर्पूर गौरम का महत्व व फलश्रुति
आरती के अंत में 'कर्पूर गौरम करुणावतारम्' या शांति मंत्र का पाठ किया जाता है। कपूर की विशेषता यह है कि वह बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह जलकर प्रज्वलित हो जाता है। इसी प्रकार, एक सच्चे भक्त का अहंकार भी माँ की भक्ति की अग्नि में पूर्णतः भस्म होकर दिव्यता में विलीन हो जाना चाहिए।
फलश्रुति: जो भी भक्त नित्य नियम से त्रिकूटवासिनी माँ वैष्णो देवी की इस पावन आरती का श्रवण, पठन या गायन करता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। उसके घर में सुख, शांति, ऐश्वर्य और आरोग्य का वास होता है तथा अंत समय में उसे माँ के चरणों में स्थान प्राप्त होता है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
प्रश्न १: माता वैष्णो देवी की आरती का पाठ किस समय करना सबसे उत्तम माना जाता है?
उत्तर: माता वैष्णो देवी की आरती प्रातःकाल सूर्योदय के समय और संध्या बेला (प्रदोष काल) में करना सबसे श्रेष्ठ और फलदायी माना जाता है।
प्रश्न २: क्या घर पर बिना पिंडी या मूर्ति के भी यह आरती गाई जा सकती है?
उत्तर: हाँ, यदि आपके घर में माँ वैष्णो देवी की तस्वीर या स्वरूप है, तो आप पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ यह आरती कर सकते हैं। माँ भाव की भूखी हैं।
प्रश्न ३: आरती करते समय थाली में किन सामग्रियों का होना अनिवार्य है?
उत्तर: आरती की थाली में शुद्ध घी का दीपक, कपूर, धूपबत्ती, रोली, अक्षत (अखंड चावल), ताजे पुष्प और लाल चुनरी या नारियल होना अनिवार्य माना गया है।
प्रश्न ४: इस आरती को गाने से कौन से विशेष लाभ प्राप्त होते हैं?
उत्तर: इस आरती के नित्य गान से मानसिक शांति, संकटों से मुक्ति, भय का नाश तथा माँ वैष्णो देवी की असीम कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।