॥ माता सरस्वती जी की आरती - जय सरस्वती माता मैया जय सरस्वती माता सद्गुण वैभव शालिनी त्रिभुवन विख्याता ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन संस्कृति में माता सरस्वती को वाग्देवी, शारदा, वीणावादिनी और ब्रम्हा की सहधर्मिणी के रूप में पूजा जाता है। वे समस्त विद्याओं, कलाओं, संगीत, बुद्धि, विवेक और चेतना की आदि स्रोता हैं। 'जय सरस्वती माता' यह आरती सनातन धर्म के उन पावन और जन-गण-मन में रचे-बसे भजनों में से एक है, जिसे सुनते ही मन में एक अलौकिक शांति और ज्ञान के प्रकाश का आभास होने लगता है। इस आरती की रचना किसने और कब की, इसके बारे में यद्यपि लोक-साहित्य और मौखिक परंपराओं में भिन्न-भिन्न मत मिलते हैं, किंतु इसकी काव्यात्मक सुंदरता, छंदबद्धता और तन्मयता यह सिद्ध करती है कि यह किसी उच्च कोटि के संत, साधक या वाग्देवी के अनन्य उपासक द्वारा रची गई है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब प्रजापिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो उन्हें चारों ओर एक मूकता, नीरवता और अज्ञान का साम्राज्य दिखाई दिया। तब ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़क कर माता सरस्वती का आह्वान किया। माता सरस्वती श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, हाथों में वीणा और पुस्तक लिए प्रकट हुईं। जैसे ही उन्होंने वीणा के तारों पर अपनी उंगलियां फेरीं, सृष्टि के हर जीव को वाणी, स्वर, लय और चेतना प्राप्त हुई। तभी से विद्या और बुद्धि की प्राप्ति के लिए माता सरस्वती की वंदना और उनकी आरती का विधान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। बसंत पंचमी के पावन अवसर पर विशेष रूप से इस आरती का गान किया जाता है, जिससे साधक के जीवन से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और ज्ञान का प्रकाश फैलता है।
सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल
यहाँ माता सरस्वती जी की संपूर्ण आरती प्रस्तुत है, जिसका गान करने से बुद्धि, स्मरण शक्ति और वैचारिक पवित्रता की प्राप्ति होती है:
जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥ (जय सरस्वती माता…)
चन्द्रवदनी पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अनुपम छवि भारी॥ (जय सरस्वती माता…)
बाएं कर वीणा राजत, दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥ (जय सरस्वती माता…)
देवी शरण जो आए, सो निश्चय पावे।
सो निश्चय पावे, मान वंछित फल पावे॥ (जय सरस्वती माता…)
हरि शिनिधि ब्रम्हाजी की, पावा रूप टहरी।
देवा मुनि जन सेवत, चरणों की बहरी॥ (जय सरस्वती माता…)
पार्वती महालक्ष्मी, तुम ही जग माता।
सूर्य चन्द्र मागती, तुम से सब ज्ञाता॥ (जय सरस्वती माता…)
विनती करूँ तुम्हारी, सुर मुनि सुखकारी।
ज्ञान बुद्धि दो मोहे, पाप हरो भारी॥ (जय सरस्वती माता…)
आरती सरस्वती जी की, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥ (जय सरस्वती माता…)
पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ
माता सरस्वती जी की इस अद्भुत आरती का प्रत्येक चरण आध्यात्मिक रहस्यों और दार्शनिक गहराइयों से परिपूर्ण है। आइए इसका पद-दर-पद भावार्थ समझते हैं:
प्रथम पद
जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता। सद्गुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
भावार्थ: हे माता सरस्वती! आपकी जय हो, आपकी सदा ही जय हो। आप सभी सद्गुणों और ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं। आपकी कीर्ति लोक, परलोक और पाताल—इन तीनों भुवनों में सर्वत्र विख्यात है। आप ही संपूर्ण ब्रह्मांड को ज्ञान का दान देने वाली हैं।
द्वितीय पद
चन्द्रवदनी पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी। सोहे शुभ हंस सवारी, अनुपम छवि भारी॥
भावार्थ: हे मैया! आपका मुख चंद्रमा के समान शांत, शीतल और सुंदर है। आप कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं और आपका कांतिपुंज सबके लिए मंगलकारी है। आपके वाहन के रूप में पवित्र श्वेत हंस सुशोभित होता है, जिससे आपकी यह अलौकिक छवि अत्यंत अनुपम और मनमोहक प्रतीत होती है।
तृतीय पद
बाएं कर वीणा राजत, दाएं कर माला। शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥
भावार्थ: आपके बाएं हाथ में संगीत और नाद की प्रतीक वीणा सुशोभित है और दाएं हाथ में जप-तप की माला (या पुस्तक) है। आपके मस्तक पर मणियों से जटित मुकुट और गले में मोतियों की सुंदर माला शोभा पा रही है, जो आपके सात्विक और दिव्य स्वरूप को दर्शाती है।
चतुर्थ पद
देवी शरण जो आए, सो निश्चय पावे। मान वंछित फल पावे, ज्ञान भक्ति पावे॥
भावार्थ: हे देवी! जो भी मनुष्य सच्चे मन से आपकी शरण में आता है, वह अपने जीवन में निश्चित रूप से सफलता प्राप्त करता है। वह अपने मन की इच्छा के अनुसार वांछित फल और परम ज्ञान तथा भक्ति को प्राप्त करता है।
पंचम पद
हरि शिनिधि ब्रम्हाजी की, पावा रूप टहरी। देवा मुनि जन सेवत, चरणों की बहरी॥
भावार्थ: भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्माजी भी आपकी महिमा का गुणगान करते हैं। बड़े-बड़े देवता और मुनिगण सदैव आपके चरणों की सेवा में लीन रहते हैं, क्योंकि आपके चरणों की धूलि मात्र से ही मनुष्य को भवसागर से तरने की शक्ति मिलती है।
षष्ठ पद
पार्वती महालक्ष्मी, तुम ही जग माता। सूर्य चन्द्र मागती, तुम से सब ज्ञाता॥
भावार्थ: हे माता! आप ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में आदिशक्ति हैं। आप ही जगत की माता हैं। सूर्य, चंद्रमा और समस्त देवता भी आप ही से ज्ञान और प्रकाश प्राप्त करते हैं। संपूर्ण चराचर जगत के ज्ञाता आप ही हैं।
सप्तम पद
विनती करूँ तुम्हारी, सुर मुनि सुखकारी। ज्ञान बुद्धि दो मोहे, पाप हरो भारी॥
भावार्थ: हे देवताओं और मुनियों को सुख प्रदान करने वाली माता! हम आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि हमें दिव्य ज्ञान और श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें तथा हमारे संचित पापों और अज्ञान के अंधकार को पूरी तरह से हर लें।
अष्टम पद
आरती सरस्वती जी की, जो कोई जन गावे। हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे॥
भावार्थ: जो भी मनुष्य माता सरस्वती की इस पावन आरती का श्रद्धापूर्वक गान करता है, उसके जीवन में सदा मंगल होता है। वह परम सुख, अगाध ज्ञान और भगवती की अनन्य भक्ति को प्राप्त करता है।
गायन का राग, ताल एवं धुन
संगीत और कला की देवी की आरती होने के कारण इसका गायन शास्त्रीय मर्यादाओं के अनुसार करने पर विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति होती है।
राग: माता सरस्वती की आरती को मुख्य रूप से 'राग बिलावल' या 'राग यमन' में गाया जाता है। राग बिलावल प्रातःकालीन बेला और विद्या अध्ययन के समय अत्यंत अनुकूल माना जाता है, क्योंकि यह मन को शांति और एकाग्रता प्रदान करता है।
ताल: इसे पारंपरिक रूप से 'कहरवा ताल' (8 मात्रा) या 'दादरा ताल' (6 मात्रा) में लयबद्ध किया जाता है, जिसे सरलता से आम जनमानस भी ताली बजाकर गा सकता है।
लय: आरती का आरंभ मध्यलय (Moderate Tempo) में होना चाहिए और अंत में चरणों में समर्पण भाव दर्शाते हुए गति को थोड़ा शांत और सुमधुर कर देना चाहिए। हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा और तानपुरा के साथ इसका गायन करने से कक्ष का वातावरण पूरी तरह से सात्विक और ऊर्जावान हो जाता है।
दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि
पूजा और आरती के दौरान विधि-विधान का पालन करना साधक के लिए अत्यंत फलदायी होता है। सरस्वती आरती की थाली सजाने और घुमाने की सही विधि निम्नलिखित है:
- थाली की सामग्री: चांदी, पीतल या तांबे की थाली में घी का दीपक (कम से कम पांच बत्तियों वाला या अखंड ज्योति का अंश), कपूर, श्वेत चंदन, पीले या सफेद पुष्प (विशेषकर गेंदा या चमेली), अक्षत (अतूट चावल), रोली और नैवेद्य (मिश्री, फल या बेसन के लड्डू) रखें।
- दीप प्रज्वलन: सबसे पहले दीप प्रज्वलित कर माता के चित्र या विग्रह के समक्ष रखें। 'ॐ ऐं महासरस्वत्यै नमः' मंत्र का उच्चारण करते हुए धूप और दीप अर्पित करें।
- आरती घुमाने का क्रम (आचमन विधि):
- सबसे पहले माता के चरणों की ओर दीपक को चार बार घुमाएं (प्रतीकात्मक रूप से पृथ्वी तत्व का पूजन)।
- इसके पश्चात माता की नाभि या उदर क्षेत्र के समक्ष दो बार आरती घुमाएं (जल तत्व)।
- माता के मुखारबिंद और मस्तक की ओर सात बार पूर्ण वर्तुल में आरती घुमाएं (आकाश और अग्नि तत्व)।
- अंत में संपूर्ण विग्रह के चारों ओर सात या ग्यारह बार आरती की थाली को गोलाकार घुमाते हुए जयकारे लगाएं।
- आचमन और नम्रता: आरती संपन्न होने के पश्चात दोनों हाथों को जलती हुई जोत या कपूर पर रखकर अपनी आँखों और मस्तक से लगाएं (ज्योति लेना)। इसके बाद अपने आसन पर बैठकर तीन बार आचमन करें और क्षमा प्रार्थना करें।
Spiritual Significance, Karpura Gauram & Phalasruthi
आरती के अंत में कपूर जलाना और उसका दर्शन करना केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। कपूर जब जलता है, तो वह बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह से कपूर में विलीन हो जाता है। इसी प्रकार, साधक के अहंकार, अज्ञान और वासनाएं जब ज्ञान रूपी अग्नि में जल जाती हैं, तब उसकी आत्मा परमात्मा में पूर्ण रूप से लीन हो जाती है।
फलश्रुति (Phalasruthi): माता सरस्वती की इस पावन आरती का प्रतिदिन प्रातः काल या अध्ययन करने बैठने से पूर्व पाठ करने वाले छात्र-छात्राओं की बुद्धि तीव्र होती है, एकाग्रता बढ़ती है और परीक्षा में असफलता का भय दूर होता है। संगीतकारों, कवियों, लेखकों और वक्ताओं के लिए यह आरती सिद्धि प्रदान करने वाली मानी गई है। जो व्यक्ति नियमित रूप से विद्या की देवी की वंदना करता है, उसके घर में कभी भी बुद्धि, विवेक और सदाचार की कमी नहीं होती।
Frequently Asked Questions (FAQs)
माता सरस्वती जी की आरती का पाठ कब करना चाहिए?
माता सरस्वती की आरती का पाठ विशेष रूप से बसंत पंचमी, विद्यारंभ संस्कार, परीक्षा के दिनों में और प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के पश्चात करना अत्यंत शुभ माना जाता है। अध्ययन कक्ष या पूजा स्थल पर दीप जलाकर इसे गाना श्रेष्ठ है।
आरती गाते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
आरती गाते समय शारीरिक और मानसिक पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए तथा मन में माता के श्वेत रूप, वीणा और हंस का ध्यान करते हुए पूर्ण भक्ति भाव रखना चाहिए।
क्या माता सरस्वती की आरती के साथ कोई विशेष मंत्र का जाप करना चाहिए?
हाँ, आरती से पहले और बाद में 'ॐ ऐं महासरस्वत्यै नमः' या 'ॐ वाग्देव्यै च विद्महे ब्रह्मपत्नी च धीमहि तन्नो वाग्देवी प्रचोदयात्' गायत्री मंत्र का जाप करना अत्यंत फलदायी होता है।
कौन सा राग माता सरस्वती की वंदना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है?
राग बिलावल और राग यमन को माता सरस्वती की वंदना और आरती के लिए शास्त्रीय संगीत में सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि ये दोनों राग सात्विक और शांतिदायक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।