पावन आरती संग्रह · स्तुति पाठ
श्री संतोषी माता आरती
18 पाठ

माता संतोषी जी की आरती - जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता अपने सेवक जन को सुख सम्पति दाता

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग यमन / मिश्र कल्याण शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Deepak Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ माता संतोषी जी की आरती - जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता अपने सेवक जन को सुख सम्पति दाता ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

सनातन धर्म में माता संतोषी को शांति, संयम, संतोष और समस्त वैभव की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। देवी संतोषी भगवान गणेश की पुत्री मानी जाती हैं, जिनका प्रकटोत्सव और व्रत विशेष रूप से शुक्रवार के दिन किया जाता है। आधुनिक काल में संतोषी माता के व्रत और कथा का प्रचार-प्रसार बहुत तेजी से हुआ, विशेषकर 'संतोषी माता व्रत कथा' और फिल्म के माध्यम से यह घर-घर में प्रसिद्ध हुईं।

माता संतोषी की यह पावन आरती - 'जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता' - उनके भक्तों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। इस आरती का गायन करने से मन को असीम शांति, संतोष और मानसिक स्थिरता की प्राप्ति होती है। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं है, बल्कि भक्त और भगवान के बीच प्रेम, समर्पण और तृप्ति का एक जीवंत सेतु है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन को, सुख संपत्ति दाता॥ जय संतोषी माता...॥

सुंदर चीर सुनहरा, धारण जेहि कीरा।
बेटा चार भुजा प्रगट चार भुज वीरा॥ जय संतोषी माता...॥

केसर तिलक बिराजत, सुभग मृगमद को।
चंदन आभामंडल, सोहत छवि सबको॥ जय संतोषी माता...॥

बीजपूर फल सोहत, थार कंज रीरा।
सुंदर भाव प्रकाशत, लखि छवि मुनि हीरा॥ जय संतोषी माता...॥

मलिन वसन जो धारत, सुर नर मुनि सेवा।
तन मन धन अर्पण कर, पावे पद मेवा॥ जय संतोषी माता...॥

श्रद्धा भक्ति सहित जो, जन दर्शन पावै।
चैत मास महिमा अति, मंगल मन भावै॥ जय संतोषी माता...॥

संकट हरणि विनाशिनी, जय जय जगधात्री।
भक्तन की प्रतिपालक, जननी मनभात्री॥ जय संतोषी माता...॥

जो जन संतोषी की, आरती नित गावै।
दास कहे सो नर, निश्चय निधि पावै॥ जय संतोषी माता...॥

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन को, सुख संपत्ति दाता॥
भावार्थ: हे माता संतोषी! आपकी जय हो। आप अपने सभी भक्तों और सेवकों को सुख, शांति, वैभव और सभी प्रकार की संपत्तियों को प्रदान करने वाली हैं। हम आपकी वंदना करते हैं।

सुंदर चीर सुनहरा, धारण जेहि कीरा। बेटा चार भुजा प्रगट चार भुज वीरा॥
भावार्थ: माता ने सुंदर और सुनहरे रंग के वस्त्र धारण किए हुए हैं। आपके रूप में चार भुजाएं प्रकट हैं, जो आपके पराक्रम और शक्ति का प्रतीक हैं।

केसर तिलक बिराजत, सुभग मृगमद को। चंदन आभामंडल, सोहत छवि सबको॥
भावार्थ: माता के ललाट पर केसर और कस्तूरी (मृगमद) का सुंदर तिलक सुशोभित हो रहा है। चंदन की सुगंध से युक्त उनका आभामंडल सभी को मोह लेने वाला है।

बीजपूर फल सोहत, थार कंज रीरा। सुंदर भाव प्रकाशत, लखि छवि मुनि हीरा॥
भावार्थ: माता के हाथों में बीजपूर (नारंगी या नींबू प्रजाति का फल) और कमल पुष्प शोभा दे रहे हैं। उनके इस सुंदर स्वरूप को देखकर मुनिगण भी मुग्ध हो जाते हैं।

मलिन वसन जो धारत, सुर नर मुनि सेवा। तन मन धन अर्पण कर, पावे पद मेवा॥
भावार्थ: जो भी भक्त अपने अहंकार का त्याग कर, तन, मन और धन माता के चरणों में अर्पित करता है, वह सुर, नर और मुनियों द्वारा पूजित माता के परम पद को प्राप्त करता है।

श्रद्धा भक्ति सहित जो, जन दर्शन पावै। चैत मास महिमा अति, मंगल मन भावै॥
भावार्थ: जो मनुष्य पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ माता के दर्शन करता है, उसके जीवन में मंगलमय और शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

संकट हरणि विनाशिनी, जय जय जगधात्री। भक्तन की प्रतिपालक, जननी मनभात्री॥
भावार्थ: हे जगत की पालनहार माता! आप सभी संकटों का नाश करने वाली हैं। आप अपने भक्तों की रक्षा करने वाली और माता के समान स्नेह देने वाली हैं।

जो जन संतोषी की, आरती नित गावै। दास कहे सो नर, निश्चय निधि पावै॥
भावार्थ: जो भी भक्त प्रतिदिन या नियमित रूप से माता संतोषी की इस आरती का गान करता है, वह जीवन में अष्टसिद्धि और नवनिधि को प्राप्त करता है।

गायन का राग, ताल एवं धुन

माता संतोषी की आरती का गायन मुख्यतः 'राग यमन' या 'राग बिलावल' में किया जाता है, जो मन को प्रसन्नता और सात्विक ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसे पारंपरिक रूप से 'कहवा ताल' (८ मात्रा) या 'दादरा ताल' (६ मात्रा) में गाया जाता है। आरती की गति मध्यम और उत्साहवर्धक होनी चाहिए, जिससे भक्तों के हृदय में आनंद और भक्तिभाव का संचार हो सके।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

  • आरती प्रारंभ करने से पूर्व पूजा की थाली में शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • थाली में रोली, चावल, पुष्प, और धूपबत्ती या कपूर रखें।
  • आरती गाते समय थाली को माता की मूर्ति या चित्र के समक्ष घड़ी की सुई की दिशा में (Clockwise) धीरे-धीरे घुमाएं।
  • थाली को घुमाने का क्रम इस प्रकार होना चाहिए: चरण में 4 बार, नाभि क्षेत्र में 2 बार, और मुखमंडल की ओर 7 बार, अंत में पूरे शरीर के समक्ष पूर्ण रूप से घुमाएं।
  • आरती संपन्न होने के पश्चात दोनों हाथों से दीप की ज्योति को अपने माथे और नेत्रों से लगाएं।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

आरती के अंत में कपूर जलाने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। कपूर जिस प्रकार बिना किसी अवशेष के जलकर समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार भक्त का अहंकार भी माता की कृपा से पूरी तरह भस्म हो जाना चाहिए। कर्पूर की सुगंध से वातावरण पवित्र और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त होता है।

फलश्रुति: माता संतोषी की आरती का नियमित पाठ करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है, आपसी प्रेम बढ़ता है, गृहक्लेश दूर होते हैं, और व्यक्ति को मानसिक संतोष और भौतिक समृद्धि की प्राप्ति होती है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

१. माता संतोषी जी की आरती - जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता अपने सेवक जन को सुख सम्पति दाता का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री संतोषी माता के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री संतोषी माता जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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