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श्री राणी सती दादी आरती
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माता राणी सती जी की आरती: संपूर्ण बोल, पूजा विधि और इतिहास

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग बिलावल व मिश्र यमन शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Vivek Kumar रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ माता राणी सती जी की आरती: संपूर्ण बोल, पूजा विधि और इतिहास ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

राजस्थान की पावन धरा अपनी वीरता, त्याग, सतीत्व और भक्ति के लिए सम्पूर्ण विश्व में अनूठी पहचान रखती है। इसी राजस्थान के झुंझुनू नगर में माँ शक्ति का एक ऐसा दिव्य और तेजोमय स्वरूप विराजित है, जिन्हें सम्पूर्ण मारवाड़, शेखावाटी और दुनिया भर के अग्रवाल व व्यापारी समाज की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। वे हैं माँ राणी सती, जिन्हें स्नेह और श्रद्धा से 'दादी जी' भी कहा जाता है। माता राणी सती का जीवन केवल एक स्त्री का शौर्य नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति में पतिव्रता धर्म, अटूट प्रेम, न्याय और धर्म रक्षा का सर्वोच्च प्रतिमान है।

ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल तथा उसके उपरांत के विभिन्न युगों में शक्ति स्वरूपा माताओं ने समय-समय पर अधर्म का नाश करने और अपने भक्तों की रक्षा के लिए अवतार लिया। राणी सती जी का मूल प्रसंग ऐतिहासिक कालखंड से जुड़ा हुआ है, जहाँ उन्होंने अपने पति श्री नारायण जी (तंथनसिंह) की शहादत के पश्चात न केवल रणक्षेत्र में वीरता का परिचय दिया, बल्कि योगबल और सतीत्व के तेज से इतिहास को अमर कर दिया। तब से लेकर आज तक, झुंझुनू स्थित उनका विशाल मंदिर देश-विदेश के भक्तों के लिए आस्था का महातीर्थ बना हुआ है।

माता राणी सती जी की यह आरती उनके अनन्य भक्तों और संतों द्वारा रची गई है। इस आरती में दादी जी के दिव्य रूप, त्रिशूल, खड्ग, लाल चुनरी, सिंदूरी श्रृंगार और उनके चरणों की वंदना का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया गया है। संध्या के समय जब मंगला या संध्या आरती के सुर गूंजते हैं, तो वातावरण पूरी तरह से चैतन्य और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। इस आरती का नियमित गान करने से घर में सुख-समृद्धि, शांति और दादी जी की असीम कृपा बनी रहती है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

यहाँ माता राणी सती जी की संपूर्ण, शुद्ध और प्रामाणिक आरती के बोल प्रस्तुत किए जा रहे हैं, जिन्हें भक्तगण सस्वर गाकर दादी जी की आराधना करते हैं:

जय राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता।
भक्त जनों के संकट, पल में दूर कराता॥
जय राणी सती माता...

झुंझुनू नगर विराजत, दर्शन सुखकारी।
चरणों में शीश नवायें, महिमा अति भारी॥
जय राणी सती माता...

लाल चुनरिया सोहे, अंग केसरिया बाना।
तेरी महिमा गावे, जग का हर दीवाना॥
जय राणी सती माता...

हाथ त्रिशूल विराजे, खड्ग चक्र धारे।
दुष्ट जनों को मारे, सज्जन प्रतिपाले॥
जय राणी सती माता...

दीनन की प्रतिपालक, दुखियों की माता।
जो कोई शरण में आवे, मनवांछित पाता॥
जय राणी सती माता...

धूप दीप नैवेद्यम, और मेवा मेवा।
चरण कमल में बैठी, करते नित सेवा॥
जय राणी सती माता...

जो यह आरती गावे, ध्यावे मन लाके।
उसके घर में बरसे, सुख वैभव आके॥
जय राणी सती माता...

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

आरती की प्रत्येक पंक्ति का गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ है। आइए, इन पदों का सरल हिंदी में भावार्थ समझते हैं:

प्रथम पद: 'जय राणी सती माता, मैया जय राणी सती माता। भक्त जनों के संकट, पल में दूर कराता॥'
भावार्थ: भक्तगण अपनी आराध्य माँ राणी सती की जयकार करते हुए कहते हैं कि हे माता! आप अपने सच्चे भक्तों के सभी प्रकार के दुखों, कष्टों और संकटों को एक ही पल में दूर कर देती हैं। आपकी शरण में आने वाले को कभी किसी प्रकार का भय नहीं रहता।

द्वितीय पद: 'झुंझुनू नगर विराजत, दर्शन सुखकारी। चरणों में शीश नवायें, महिमा अति भारी॥'
भावार्थ: आपका मुख्य और भव्य धाम राजस्थान के शेखावाटी आंचल के झुंझुनू नगर में सुशोभित है। आपके दर्शन मात्र से भक्तों को असीम मानसिक शांति और सुख की प्राप्ति होती है। हम आपके चरणों में अपना मस्तक झुकाकर आपकी इस अपार और अलौकिक महिमा को नमन करते हैं।

तृतीय पद: 'लाल चुनरिया सोहे, अंग केसरिया बाना। तेरी महिमा गावे, जग का हर दीवाना॥'
भावार्थ: माता का श्रृंगार अत्यंत भव्य है। उनके पावन अंगों पर लाल रंग की चुनरी और केसरिया वस्त्र अत्यधिक शोभित होते हैं। उनकी अद्भुत अलौकिक महिमा को देखकर यह पूरा संसार उनका प्रेमी और भक्त बन गया है।

चतुर्थ पद: 'हाथ त्रिशूल विराजे, खड्ग चक्र धारे। दुष्ट जनों को मारे, सज्जन प्रतिपाले॥'
भावार्थ: माता राणी सती माँ दुर्गा और चंडी का ही साक्षात स्वरूप हैं। उनके हाथों में त्रिशूल, खड्ग और अन्य अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। वे अहंकारियों और दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश करती हैं तथा सज्जन, सीधे-साधे और धर्मपरायण भक्तों की सदैव रक्षा करती हैं।

पंचम पद: 'दीनन की प्रतिपालक, दुखियों की माता। जो कोई शरण में आवे, मनवांछित पाता॥'
भावार्थ: आप गरीबों, असहायों और दीन-दुखियों का पालन-पोषण करने वाली करुणामयी माता हैं। जो भी मनुष्य सच्चे मन से आपकी शरण में आता है, वह अपनी इच्छा के अनुसार सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर लेता है।

षष्ठ पद: 'धूप दीप नैवेद्यम, और मेवा मेवा। चरण कमल में बैठी, करते नित सेवा॥'
भावार्थ: भक्तगण श्रद्धापूर्वक धूप, दीप, नैवेद्य और विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्न व मेवे का भोग लगाते हैं। हम आपके चरण कमलों में बैठकर निरंतर आपकी सेवा और स्तुति करते हैं।

सप्तम पद: 'जो यह आरती गावे, ध्यावे मन लाके। उसके घर में बरसे, सुख वैभव आके॥'
भावार्थ: जो भी साधक या भक्त इस पवित्र आरती को एकाग्र चित्त से और सच्चे मन से गाता है, उसके घर-परिवार में सदा सुख, शांति, वैभव और माँ लक्ष्मी की कृपा बरसती रहती है।

गायन का राग, ताल एवं धुन

संगीत शास्त्र की दृष्टि से किसी भी देवी आरती का गायन सही सुर, लेह और ताल में होने से उसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। माता राणी सती जी की आरती को मुख्य रूप से राग बिलावल या मिश्र यमन की सुमधुर धुनों में गाया जाता है।

  • राग: बिलावल (जो प्रातः काल और संध्या दोनों समय की सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत होता है) या मिश्र यमन।
  • ताल: कहहरवा (4/4 ताल) या दादरा ताल (6 मात्राओं की सुगम ताल), जिसपर करताल, मंजीरा और ढोलक की थाप आसानी से बैठ सके।
  • लय: मध्य लय (Medium Tempo), ताकि भक्तगण आसानी से बिना किसी जल्दबाजी के शब्दों का उच्चारण कर सकें और भावों में डूब सकें।
  • वाद्य यंत्र: हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, घंटी और शंख। आरती के आरंभ और समापन पर शंखनाद का विशेष विधान है।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

माता राणी सती की आरती उतारने की एक निश्चित शास्त्रीय और पारंपरिक विधि होती है, जिससे पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है:

  1. सबसे पहले स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात राणी सती दादी के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  2. आरती की थाली में कुमकुम, अक्षत (चावल), पुष्प, धूपबत्ती, कपूर और मिठाई का भोग रखें।
  3. आरती प्रारंभ करते समय सबसे पहले माता के चरणों की ओर चार बार थाली को गोलाकार घुमाएं।
  4. इसके पश्चात उनकी नाभि या मध्य भाग की ओर दो बार थाली घुमाएं।
  5. अंत में माता के मुखमंडल और संपूर्ण विग्रह की ओर सात बार पूर्ण चक्र में थाली घुमाएं। इस प्रकार कुल सात या ग्यारह बार थाली घुमाने का विधान है।
  6. आरती के उपरांत शंख और घंटी बजाते हुए दोनों हाथों से आरती को अपनी आँखों से लगाएं और चरणामृत ग्रहण करें।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

आरती के अंत में कपूर जलाने की विशेष परंपरा है। 'कर्पूरगौरं करुणावतारम्' की तर्ज पर कपूर का जलना इस बात का प्रतीक है कि जिस प्रकार कपूर बिना कोई अवशेष छोड़े पूर्ण रूप से जलकर समाप्त हो जाता है, उसी प्रकार साधक का अहंकार, उसके सारे पाप और भौतिक मोह-माया भी माँ की ज्योति में विलीन हो जानी चाहिए।

फलश्रुति: माता राणी सती की आरती का जो नित्य पाठ करता है, उसे अखंड सौभाग्य, व्यापार में भारी वृद्धि, पारिवारिक कलह से मुक्ति और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। दादी जी अपने हर भक्त की झोली खुशियों से भर देती हैं।

Frequently Asked Questions (FAQs)

१. माता राणी सती जी की आरती: संपूर्ण बोल, पूजा विधि और इतिहास का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री राणी सती दादी के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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