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श्री गंगा मैया आरती
8 पाठ

माता गंगा जी की आरती - ॐ जय गंगे माता मैया जय गंगे माता जो नर तुमको ध्याता मनवांछित फल पाता

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग यमन / बिलावल शास्त्रीय राग / ताल
6 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Deepak Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ माता गंगा जी की आरती - ॐ जय गंगे माता मैया जय गंगे माता जो नर तुमको ध्याता मनवांछित फल पाता ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में माँ गंगा का स्थान केवल एक पवित्र नदी के रूप में नहीं, बल्कि जगत जननी, मोक्षदायिनी और करुणा की मूर्ति के रूप में है। 'ॐ जय गंगे माता' आरती भारतीय जनमानस की अंतरात्मा से निकली एक ऐसी स्तुति है जो हर भक्त के हृदय में भक्ति और समर्पण का भाव जगा देती है। यद्यपि इस लोकप्रिय आरती के मूल रचयिता के संबंध में विभिन्न जनश्रुतियां प्राप्त होती हैं, तथापि इस आरती की रचना उत्तर भारत के पारंपरिक संतों और आचार्यों द्वारा की गई मानी जाती है। यह आरती संपूर्ण उत्तर भारत में, विशेषकर हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी (काशी) और प्रयागराज जैसे पवित्र तीर्थस्थलों पर संध्या के समय गंगा घाटों पर अत्यंत श्रद्धा और भव्यता के साथ गाई जाती है।

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, माँ गंगा का अवतरण स्वर्ग से पृथ्वी पर राजा भगिरथ के कठोर तप के परिणामस्वरूप हुआ था। भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा के वेग को धारण करके पृथ्वी को प्रलय से बचाया था। तभी से गंगा जी त्रिपथगा कहलाईं—जो स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों में प्रवाहित होती हैं। माँ गंगा का जल अमृततुल्य माना गया है, जिसमें स्नान करने मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्म के पाप धुल जाते हैं और अंत समय में उन्हें वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। संध्या वंदन के समय माँ गंगा की आरती उतारना न केवल उनकी आराधना है, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक पवित्र अनुष्ठान है।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता।
जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

चन्द्र सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता।<ि>शरण पड़ें जो तेरी, सो नर तर जाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता।
कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुखदाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

एक बार जो तेरी, शरण में आ जाता।
यम के त्रास मिटाकर, परम पद पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

आरती जो कोई गाए, स्वामी प्रेम सहित गाता।
दास वही सहृदय से, मुक्ताफल पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

प्रथम पद: 'ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता। जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥'
भावार्थ: हे माँ गंगा! आपकी जय हो, हे मैया आपकी जय हो। जो भी मनुष्य सच्चे मन से आपका स्मरण या ध्यान करता है, वह अपनी सभी इच्छाओं और कामनाओं को पूर्ण कर लेता है। आपके आशीष से उसके जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

द्वितीय पद: 'चन्द्र सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता। शरण पड़ें जो तेरी, सो नर तर जाता॥'
भावार्थ: चंद्रमा के समान शीतल और कांतिमय आपका प्रकाश है, और आपका जल अत्यंत पावन तथा निर्मल है। जो भी प्राणी आपकी शरण में आता है, वह इस भवसागर से पार उतर जाता है (मोक्ष को प्राप्त करता है)।

तृतीय पद: 'पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता। कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुखदाता॥'
भावार्थ: हे मैया! यह सारा संसार जानता है कि आपने महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया था। आपकी एक कृपा दृष्टि तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) के प्राणियों को सुख और शांति प्रदान करने वाली है।

चतुर्थ पद: 'एक बार जो तेरी, शरण में आ जाता। यम के त्रास मिटाकर, परम पद पाता॥'
भावार्थ: जो कोई भी व्यक्ति जीवन में एक बार भी पूर्ण शरणागति के भाव से आपकी शरण में आ जाता है, आप उसके यमराज के भय और दुखों को हमेशा के लिए मिटा देती हैं तथा उसे परम आध्यात्मिक पद (मोक्ष) प्रदान करती हैं।

पंचम पद: 'आरती जो कोई गाए, स्वामी प्रेम सहित गाता। दास वही सहृदय से, मुक्ताफल पाता॥'
भावार्थ: जो भी भक्त प्रेम और निष्ठा के साथ आपकी इस आरती का गान करता है, वह आपका सच्चा सेवक बनकर जीवन के बंधनों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष रूपी फल को प्राप्त करता है।

गायन का राग, ताल एवं धुन

माँ गंगा की आरती का गायन प्रायः सुगम संगीत और शास्त्रीय परंपरा के मिश्रण से किया जाता है। इसके गायन के लिए निम्नलिखित संगीत तत्वों का प्रयोग किया जाता है:

  • राग: राग यमन या राग बिलावल, जो संध्या कालीन बेला में शांति, भक्ति और दिव्यता का संचार करते हैं।
  • ताल: कहवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा), जिससे आरती के बोलों में एक लयबद्ध प्रवाह बना रहता है।
  • वाद्य यंत्र: हारमोनियम, मंजीरा, तबला, शंख और घंटियाँ, जो आरती की ध्वनि को ऊर्जावान और गूंजने वाली बनाते हैं।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

गंगा आरती करने के लिए एक विशेष शास्त्रीय और पारंपरिक विधान है। निम्नलिखित चरणों का पालन करते हुए आरती करें:

  1. सबसे पहले स्वच्छ तांबे, पीतल या चांदी की थाली लें।
  2. थाली में पंचमुखी या सातमुखी दीपक प्रज्वलित करें, जिसमें शुद्ध घी और कपूर का उपयोग किया गया हो।
  3. थाली में रोली, अक्षत, पुष्प, धूपबत्ती और नैवेद्य भी रखें।
  4. आरती प्रारंभ करते समय सबसे पहले माँ गंगा का ध्यान करें।
  5. थाली को clockwise (घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएं: 4 बार चरणों में, 2 बार नाभि या मध्य भाग में, और 3 बार मुख मंडल की ओर। अंत में पूरे शरीर के चारों ओर 7 बार घुमाएं।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

आरती के अंत में कपूर जलाने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। कपूर जिस प्रकार बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह से जल जाता है, उसी प्रकार साधকের अहंकार और वासनाएं भी ईश्वरीय प्रेम में विलीन हो जानी चाहिए। गंगा आरती की फलश्रुति यह है कि नियमित रूप से इस आरती का पाठ या श्रवण करने से मनुष्य के मानसिक पाप नष्ट होते हैं, घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है, और माँ गंगा की असीम कृपा से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

१. माता गंगा जी की आरती - ॐ जय गंगे माता मैया जय गंगे माता जो नर तुमको ध्याता मनवांछित फल पाता का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री गंगा मैया के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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भगवान श्री गंगा मैया जी की नित्य वंदना और आरती पाठ से मन की चंचलता शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है एवं जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं।

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