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श्री काल भैरव आरती
8 पाठ

काल भैरव जी की आरती - जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा जय काली और गौरा देवी कृत सेवा

सम्पूर्ण आरती लिरिक्स हिंदी में, सरल भावार्थ, शास्त्रीय विधि, गायन नियम एवं नित्य पाठ के आध्यात्मिक लाभ।

राग भैरवी / राग यमन शास्त्रीय राग / ताल
5 पठन अवधि
Hindi आरती भाषा
Deepak Kumar Bind रचनाकार / स्रोत
अक्षर आकार:

॥ काल भैरव जी की आरती - जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा जय काली और गौरा देवी कृत सेवा ॥

★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★

आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता

सनातन धर्म में देवाधिदेव महादेव के रुद्र अवतार भगवान काल भैरव को अत्यंत प्रलयकारी, वेगवान, और न्याय के अधिष्ठाता के रूप में पूजा जाता है। काल भैरव का स्वरूप जितना भयावह और प्रचंड है, उनका अंतःकरण उतना ही कारुणिक और भक्तों के लिए वरदायी है। 'काल' का अर्थ समय है और 'भैरव' का अर्थ भय का नाश करने वाला अथवा ब्रह्मांड का भरण-पोषण करने वाला है। जो संपूर्ण काल चक्र को नियंत्रित करते हैं और साधक के जीवन से मृत्यु के भय, कालसर्प दोष, शनि की साढ़ेसाती, राहु-केतु के कष्टों और नकारात्मक ऊर्जा का समूल नाश करते हैं, वे ही बटुक भैरव और काल भैरव हैं।

ऐतिहासिक और पौराणिक ग्रंथों जैसे शिव पुराण, लिंग पुराण और भैरव तंत्र के अनुसार, भगवान काल भैरव की उत्पत्ति ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान शिव के ललाट से हुई थी। जब माता महाकाली और माता पार्वती (गौरा देवी) ने इस प्रचंड स्वरूप को शांत किया और उनकी स्तुति की, तब से देवलोक से लेकर भूलोक तक उनकी नित्य आराधना का विधान प्रारंभ हुआ। काल भैरव जी की यह प्रसिद्ध आरती 'जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा, जय काली और गौरा देवी कृत सेवा' सनातन परंपरा की सर्वाधिक पवित्र और सिद्ध आरतियों में से एक है। इसके रचयिता के संबंध में यह माना जाता है कि इसे नाथ पंथ के योगियों और प्राचीन संतों द्वारा जनसाधारण के कल्याण के लिए रचा गया था, ताकि तामसिक और राजसिक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर भक्त सात्विक मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो सकें।

सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल

यहाँ भगवान श्री काल भैरव जी की संपूर्ण और प्रामाणिक आरती प्रस्तुत है, जिसका गान करने से साधक को अष्टसिद्धि और नवनिधि की प्राप्ति होती है:

जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा।
जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥ जय भैरव देवा...

तुम्हीं पाप उद्धारक दुख सिन्धु तारक।
भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक॥ जय भैरव देवा...

वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी।
महिमािमित तुम्हारी तुम हो भयहारी॥ जय भैरव देवा...

तुम बिन यज्ञ न होवे नहिं सुर सुधि पावें।
चतुर्दिक यश फैला सब जन गुण गावें॥ जय भैरव देवा...

तेल और चहुँ दिशि दीपक की जोत जले।
दर्शन करत पापी भवसागर से तरे॥ जय भैरव देवा...

रक्त विलोचन काले भीषण छवि छाजे।
कर में खप्पर बाजे घुंघरू डम बाजे॥ जय भैरव देवा...

शरण गहे की रक्षा तुम ही करते हो।
दुष्ट जनों के मन में सदा डर भरते हो॥ जय भैरव देवा...

जो जन आरती गावै नित्यानंद पावै।
काल भैरव की कृपा भव से तर जावै॥ जय भैरव देवा...

पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ

आरती के प्रत्येक पद का गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ है, जिसे समझने से पूजा का फल अनंत गुना बढ़ जाता है:

प्रथम पद का भावार्थ

'जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा। जय काली और गौरा देवी कृत सेवा॥'
इस प्रथम पंक्ति में भक्त भगवान भैरव की वंदना करते हुए उनकी जयकार करता है। साथ ही इस बात का स्मरण किया जाता है कि माँ महाकाली और माँ गौरा (पार्वती) ने समय-समय पर इस प्रचंड रूप की सेवा और स्तुति की है। यह पद यह दर्शाता है कि भैरव तत्व आदिशक्ति और आद्यगुरु शिव का संयुक्त और अभिन्न अंग है।

द्वितीय पद का भावार्थ

'तुम्हीं पाप उद्धारक दुख सिन्धु तारक। भक्तों के सुख कारक भीषण वपु धारक॥'
यहाँ भगवान के गुणों का बखान किया गया है कि हे प्रभु! आप ही समस्त पापों का उद्धार करने वाले हैं। संसार रूपी दुःख के अगाध समुद्र (सिन्धु) से अपने भक्तों को पार लगाने वाले आप ही हैं। अपने भक्तों को आत्मीय सुख प्रदान करने के लिए भले ही आपने यह भीषण और विकराल शरीर (वपु) धारण किया हो, किंतु आपका अंतःकरण परम कारुणिक है।

तृतीय पद का भावार्थ

'वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी। महिमािमित तुम्हारी तुम हो भयहारी॥'
भगवान भैरव का वाहन कुत्ता (श्वान) है, जो निष्ठा, सतर्कता और यम के द्वार का प्रतीक है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और अन्य हाथों में डमरू तथा खप्पर सुशोभित रहता है। आपकी महिमा अपार है और आप भक्तों के हृदय से समस्त प्रकार के अज्ञात भयों को हरने वाले हैं।

चतुर्दिक यश और यज्ञ का महत्व

'तुम बिन यज्ञ न होवे नहिं सुर सुधि पावें। चतुर्दिक यश फैला सब जन गुण गावें॥'
शास्त्रों के अनुसार काशी नगरी में भगवान काल भैरव कोतवाल के रूप में विराजते हैं। बिना उनकी अनुमति के यहाँ पत्ता भी नहीं हिलता और कोई भी कर्मकांड या यज्ञ पूर्ण नहीं माना जाता। देवता भी उनकी सुधि (आज्ञा) लेते हैं। दसों दिशाओं में उनका यश फैला हुआ है और संपूर्ण संसार उनके गुणों का गान करता है।

दीप और तेल की महत्ता

'तेल और चहुँ दिशि दीपक की जोत जले। दर्शन करत पापी भवसागर से तरे॥'
काल भैरव की आराधना में विशेष रूप से सरसों के तेल के दीपक का विधान है। चारों दिशाओं में जब उनके नाम का दीपक प्रज्वलित होता है, तो उसका प्रकाश अंधकार के साथ-साथ मन के अज्ञान को भी मिटा देता है। उनके दिव्य दर्शन मात्र से पापी जीव भी इस भवसागर से तर जाता है।

भीषण छवि और खप्पर

'रक्त विलोचन काले भीषण छवि छाजे। कर में खप्पर बाजे घुंघरू डम बाजे॥'
भगवान के नेत्र लाल (रक्त विलोचन) हैं, उनका वर्ण मेघ के समान श्याम (काला) है और उनकी यह भीषण छवि साधक को अनुशासन सिखाती है। उनके हाथों में खप्पर और पैरों में घुंघरू तथा डमरू की ध्वनि ब्रह्मांड के कंपन को दर्शाती है।

शरणागत की रक्षा

'शरण गहे की रक्षा तुम ही करते हो। दुष्ट जनों के मन में सदा डर भरते हो॥'
जो भी मनुष्य अहंकार छोड़कर पूरी शरणागति के साथ भगवान भैरव की शरण में आता है, उसकी रक्षा स्वयं महाकाल करते हैं। वहीं दूसरी ओर, अधार्मिक, पापी और दुष्ट प्रवृत्तियों वाले लोगों के मन में उनका भय हमेशा बना रहता है, जो उन्हें पाप कर्मों से रोकता है।

आरती का फल

'जो जन आरती गावै नित्यानंद पावै। काल भैरव की कृपा भव से तर जावै॥'
अंतिम पंक्ति में आरती के फलश्रुति का वर्णन है। जो भी श्रद्धावान पुरुष या स्त्री नियमपूर्वक इस आरती का गान करता है, वह नित्य आनंद (परमानंद) को प्राप्त करता है। काल भैरव की अकृत्रिम कृपा से वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।

गायन का राग, ताल एवं धुन

संगीत शास्त्र की दृष्टि से काल भैरव जी की यह आरती अत्यंत ऊर्जावान और ओजस्वी है। इसे निम्नलिखित शास्त्रीय पैमानों के अनुसार गाया जाना चाहिए:

  • शास्त्रीय राग: यह आरती मुख्य रूप से राग भैरवी या राग यमन की स्वरलिपि में गाई जाती है। भैरवी राग शिव और शक्ति से जुड़े अनुष्ठानों में विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।
  • ताल: इसे कहरवा ताल (8 मात्रा) या दादरा ताल (6 मात्रा) में तालबद्ध किया जाता है, जिससे आरती गाते समय एक निश्चित लय और उत्साह बना रहता है।
  • लय (Tempo): इसकी गति मध्य-द्रुत (Medium-Fast) होनी चाहिए, जो साधक के भीतर वीरता, साहस और ऊर्जा का संचार करती है।
  • वाद्य यंत्र: हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, और डमरू की संगत इस आरती के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देती है।

दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि

काल भैरव की आरती करते समय कुछ विशेष नियमों और अनुशासित चरणों का पालन करना अनिवार्य होता है:

  1. थाली की सजावट: आरती की थाली में पीतल या तांबे के पात्र का प्रयोग करें। थाली में शुद्ध घी या सरसों के तेल का दीपक रखें। इसके साथ रोली, अक्षत, काले तिल, पुष्प और धूपबत्ती रखें।
  2. दीपक का चयन: काल भैरव की पूजा में सरसों का तेल अत्यंत प्रिय माना जाता है। अतः तेल का दीपक विशेष फलदायी होता है।
  3. आरती का क्रम:
    • सर्वप्रथम दीपक को भगवान काल भैरव के चरणों की ओर 4 बार घुमाएं।
    • इसके पश्चात उनकी नाभि या उदर क्षेत्र की ओर 2 बार घुमाएं।
    • अंत में उनके मुखमंडल (चेहरे) की ओर 7 बार घुमाते हुए पूर्ण ब्रह्मांडीय चक्र बनाएं।
    • इस प्रकार कुल मिलाकर आरती को सात बार संपूर्ण विग्रह के चारों ओर क्लॉकवाइज (घड़ी की दिशा में) घुमाया जाता है।
  4. आचमन और समर्पण: आरती पूर्ण होने के पश्चात हाथ में जल लेकर आरती के चारों ओर घुमाकर आचमन करें और भक्तों में प्रकाश फैलाएं (हाथों की आंच आंखों और मस्तक पर लगाएं)।

कर्पूर का महत्व व फलश्रुति

हिन्दू धर्म में किसी भी आरती के अंत में कर्पूर (Camphor) जलाने का विशेष विधान है। कर्पूर जब जलता है तो वह बिना कोई अवशेष छोड़े पूरी तरह हवा में विलीन हो जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि जीवात्मा जब परमात्मा के दिव्य ज्ञान की अग्नि में समर्पित होती है, तो उसका अहंकार और अज्ञान पूर्णतः समाप्त हो जाता है और वह ब्रह्म में लीन हो जाती है।

फलश्रुति: काल भैरव की नियमित आरती और पूजन से निम्नलिखित आध्यात्मिक और भौतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • असमय मृत्यु का भय (अकाल मृत्यु) टल जाता है।
  • कुंडली में मौजूद राहु, केतु और शनि के महादशा के कष्ट शांत होते हैं।
  • शत्रु बाधा और बुरी नजर से सुरक्षा मिलती है।
  • व्यापार, करियर और जीवन के हर क्षेत्र में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
  • साधक को मोक्ष और मुक्ति की प्राप्ति होती है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

  1. प्रश्न: काल भैरव जी की आरती किस दिन करना सबसे उत्तम माना जाता है?

    उत्तर: काल भैरव जी की आराधना के लिए रविवार और मंगलवार का दिन अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। इसके अलावा प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को 'कालहष्टमी' कहा जाता है, इस दिन विशेष रूप से काल भैरव की आरती और व्रत करने से अनंत गुना फल मिलता है।

  2. प्रश्न: क्या काल भैरव की आरती में सरसों के तेल का दीपक जलाना अनिवार्य है?

    उत्तर: हाँ, काल भैरव को तंत्र और न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है, और उन्हें सरसों का तेल अत्यंत प्रिय है। विशेषकर शनिवार, रविवार या अष्टमी के दिन सरसों के तेल का दीपक जलाकर आरती करना अत्यंत फलदायी माना गया है।

  3. प्रश्न: काल भैरव की आरती करते समय किन सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए?

    उत्तर: काल भैरव की पूजा और आरती अत्यंत अनुशासित भाव से करनी चाहिए। मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, छल या द्वेष न रखें। सात्विक आचरण का पालन करें और पूरी श्रद्धा एवं समर्पण के साथ आरती गाएं।

  4. प्रश्न: क्या महिलाएं काल भैरव की आरती कर सकती हैं?

    उत्तर: बिल्कुल, माता महाकाली और माता गौरा ने स्वयं काल भैरव की सेवा की है। स्त्रियाँ पूरी श्रद्धा, पवित्रता और शिष्टाचार के साथ काल भैरव का स्मरण, पाठ और आरती कर सकती हैं।

१. काल भैरव जी की आरती - जय भैरव देवा प्रभु जय भैरव देवा जय काली और गौरा देवी कृत सेवा का सरल भावार्थ

यह पावन आरती भगवान श्री काल भैरव के दिव्य स्वरूप, उनकी अलौकिक लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करती है। जब भक्त पूर्ण निष्ठा, भक्ति और एकाग्रता के साथ इस आरती का गायन करते हैं, तो उनके हृदय में ईश्वरीय चेतना, सात्विक भाव और आध्यात्मिक शांति का संचार होता है।

"कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्। सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"
अर्थात्: जो कर्पूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के साक्षात् अवतार हैं, संसार के सार हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं, उन भगवान शिव और माता भवानी को मैं अपने हृदय कमल में नमन करता हूँ।

२. आरती की शास्त्रीय पूजा विधि एवं थाली घुमाने के नियम

आरती सदैव शुद्ध, पवित्र और एकाग्र चित्त होकर करनी चाहिए। शास्त्रों में आरती की थाली घुमाने का विशेष वैज्ञानिक व आध्यात्मिक नियम निर्धारित किया गया है:

  • चरणों में ४ बार: भगवान के श्री चरणों में ४ बार आरती की थाली घुमाकर प्रणाम करें।
  • नाभि मंडल में २ बार: भगवान की नाभि में २ बार घुमाकर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता को नमन करें।
  • मुखारविंद पर १ बार: भगवान के दिव्य मुख के सम्मुख १ बार घुमाकर उनके दर्शन करें।
  • सम्पूर्ण विग्रह पर ७ बार: सम्पूर्ण श्री विग्रह पर ७ बार 'ॐ' की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) घुमाएं।

३. नित्य आरती गायन के आध्यात्मिक एवं भौतिक लाभ

प्रतिदिन प्रातःकाल एवं सायंकाल आरती करने से घर के वातावरण में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है। शंख, घंटी और कपूर की दिव्य सुगंध से मन शांत होता है, परिवार में सुख-समृद्धि आती है और समस्त प्रकार के अनिष्ट व कष्ट दूर होते हैं।

४. आरती से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (FAQs)

हाँ, भगवान के प्रति पूर्ण आदर, सत्कार और विनम्रता प्रकट करने के लिए आरती खड़े होकर दोनों हाथों से थाली पकड़कर ही करनी चाहिए। अस्वस्थ होने की स्थिति में बैठकर भी आरती की जा सकती है।
आरती संपन्न होने पर थाली के चारों ओर जल का एक घेरा बनाकर अग्नि को शांत किया जाता है, जिसके पश्चात सभी भक्त दोनों हाथों से ज्योति की ऊष्मा (आशीर्वाद व तेज) ग्रहण करते हैं।
कपूर जलते समय कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो अहंकार के पूर्ण विसर्जन का प्रतीक है। साथ ही कपूर की सुगंध वातावरण को शुद्ध, पवित्र और जीवाणुरहित बनाती है।

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