॥ भगवान श्री कृष्ण (bhagwan shri krishna) बांके बिहारी जी की आरती - श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं सम्पूर्ण पद व भावार्थ ॥
★ नित्य पाठ व संकीर्तन ★आरती की पृष्ठभूमि व रचयिता
सनातन संस्कृति में भगवान श्रीकृष्ण की उपासना का विशेष स्थान है, और जब बात ब्रजभूमि की आती है, तो वहाँ के कण-कण में राधा-कृष्ण की प्रेममयी लीलाएं समाहित हैं। वृंदावन का श्री बांके बिहारी मंदिर संपूर्ण विश्व में अपनी अनूठी संस्कृति, अद्भुत दर्शन और भावपूर्ण परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। 'श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं' यह दिव्य आरती केवल कुछ शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक प्रेमी भक्त के हृदय से निकला हुआ वह पावन संगीत है जो साक्षात परब्रह्म को रिझाने की सामर्थ्य रखता है।
इस आरती के रचयिता के संबंध में ब्रज की विभिन्न परंपराओं और संप्रदायों में कई कथाएं प्रचलित हैं। महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य और स्वामी हरिदास जी के आराध्य देव बांके बिहारी जी के इस विग्रह का प्राकट्य निधिवन में स्वामी हरिदास जी की साधना से हुआ था। स्वामी हरिदास जी की निकुंज उपासना पद्धति ने ब्रज में संगीत और भक्ति का ऐसा अद्भुत समन्वय स्थापित किया, जिसमें भगवान को रिझाने के लिए राग-रागिनियों का प्रयोग किया गया। यही कारण है कि बांके बिहारी जी की यह आरती शास्त्रीय संगीत के नियमों में ढली हुई है और इसे गाते समय भक्त का मन स्वतः ही बाह्य जगत से कटकर अंतरंग भावों में डूब जाता है।
आरती उतारने की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। जब हम अपने आराध्य की आरती करते हैं, तो हम अपने भीतर के अहंकार, अज्ञान और मोह रूपी अंधकार को ज्ञान और भक्ति के प्रकाश से भगाते हैं। बांके बिहारी जी का त्रिभंग मुद्रा में खड़ा होना – जहाँ गर्दन, कमर और घुटने पर शरीर मुड़ा होता है – अत्यंत मोहक है। इस त्रिभंग छवि की आरती करने मात्र से मानव जीवन के सभी ताप और संताप नष्ट हो जाते हैं।
Complete Authentic Hindi Lyrics of Aarti (सम्पूर्ण आरती के प्रामाणिक बोल)
यहाँ श्री बांके बिहारी जी की संपूर्ण और प्रामाणिक आरती प्रस्तुत की जा रही है:
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं,
मेरे बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं।
मोर मुकुट कर मुरली साजे,
नंद नंदन पावन यश गाऊं॥
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं...चरणों से निकली गंगा प्यारी,
त्रिपुरारि जी ने जटाओं में धारी,
चरण कमल की महिमा न्यारी,
दर्शन करके भव भय तारूं॥
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं...चमक रही किरणें भाल बिराजै,
वैजयन्ती माला गले में साजे,
सुन्दर झांकी मन को भावे,
चरणों में अपना शीश झुकाऊं॥
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं...दास मीरा प्रभु दर्शन दीज्यो,
संकट मोचन कृपा करीज्यो,
चरणामृत पावन रस पीज्यो,
जीवन सफल कर चरण चित लाऊं॥
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं,
मेरे बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं॥
Stanza-by-Stanza Hindi Meaning & Bhavarth (पद-दर-पद विस्तृत भावार्थ)
आइए अब इस अलौकिक आरती के प्रत्येक पद के गहरे आध्यात्मिक और भक्तिमय अर्थ को समझते हैं:
प्रथम पद का भावार्थ
"श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, मेरे बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं। मोर मुकुट कर मुरली साजे, नंद नंदन पावन यश गाऊं॥"
भावार्थ: भक्त अपने आराध्य भगवान श्री कृष्ण, जिन्हें वृंदावन में प्यार से 'बांके बिहारी' कहा जाता है (बांके का अर्थ है तीन जगहों से टेढ़ा - त्रिभंग, और बिहारी का अर्थ है आनंद विहार करने वाले), के चरणों में समर्पित होकर कहता है कि हे प्रभु! मैं आपकी स्तुति में यह आरती गा रहा हूँ। आपके मस्तक पर मोर पंखों से सुसज्जित अत्यंत सुंदर मुकुट सुशोभित है और आपके दोनों करों (हाथों) में भक्तों को मंत्रमुग्ध करने वाली बंसरी या मुरली सुशोभित हो रही है। हे नंदलाल! हे यशोदा नंदन! मैं आपके पवित्र और पावन यश का गान बार-बार करना चाहता हूँ।
द्वितीय पद का भावार्थ
"चरणों से निकली गंगा प्यारी, त्रिपुरारि जी ने जटाओं में धारी, चरण कमल की महिमा न्यारी, दर्शन करके भव भय तारूं॥"
भावार्थ: इस पद में भगवान के चरणों के अलौकिक महत्व का वर्णन किया गया है। वामन अवतार के समय जब भगवान ने अपने चरण को ब्रह्मांड के छोर तक उठाया था, तब ब्रह्मा जी ने उनके चरण धोए और वही जल पवित्र गंगा बनकर प्रवाहित हुआ। भगवान शिव (त्रिपुरारि) ने उस पवित्र गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। आपके इन चरण कमलों की महिमा संसार में सबसे न्यारी और अद्भुत है। हे प्रभु! आपके इन चरणों के दर्शन मात्र से ही मेरे जन्म-जन्म के भव-भय और सांसारिक बंधन कट जाएं, ऐसी मेरी कामना है।
तृतीय पद का भावार्थ
"चमक रही किरणें भाल बिराजै, वैजयन्ती माला गले में साजे, सुन्दर झांकी मन को भावे, चरणों में अपना शीश झुकाऊं॥"
भावार्थ: भक्त भगवान के अंगों के श्रृंगार का वर्णन करते हुए कहता है कि हे प्रभु! आपके भाल (मस्तक) पर कस्तूरी और चंदन का तिलक सुशोभित है जिससे दिव्य किरणें छिटक रही हैं। आपके गले में वनमाला या वैजयंती माला ऐसे सुशोभित हो रही है जैसे बादलों के बीच इंद्रधनुष हो। आपकी यह अत्यंत मनोहारी और सुंदर झांकी मेरे मन को बहुत भाती है। मैं अपने इस अहंकार को त्यागकर आपके चरणों में अपना शीश झुकाता हूँ और अपने जीवन को धन्य मानता हूँ।
चतुर्थ पद का भावार्थ
"दास मीरा प्रभु दर्शन दीज्यो, संकट मोचन कृपा करीज्यो, चरणामृत पावन रस पीज्यो, जीवन सफल कर चरण चित लाऊं॥"
भावार्थ: अंतिम पद में भक्त अपने को भगवान का दास मानते हुए प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! जैसे आपने अपनी अनन्य भक्त मीराबाई को दर्शन दिए और उनके सभी संकटों का निवारण किया, वैसे ही मुझ पर भी अपनी कृपा की दृष्टि डालिए। आपके चरणों का पावन चरणामृत संसार के सभी रोगों और दुखों को दूर करने वाला अमृत है। मैं उस चरणामृत का पान करके अपने इस दुर्लभ मानव जीवन को सफल बनाना चाहता हूँ और हर पल मेरा चित आपके चरणों में ही लगा रहे, यही मेरी एकमात्र विनती है।
Classical Raga, Tala & Melodic Notation (गायन का राग, ताल एवं धुन)
संगीत की दृष्टि से श्री बांके बिहारी जी की यह आरती अत्यंत समृद्ध है। ब्रज संस्कृति और पुष्टिमार्गीय संगीत परंपरा में इसे मुख्य रूप से राग यमन अथवा राग बिलावल की कोमल धुनों में गाया जाता है। राग यमन संध्या कालीन बेला का राग है, जो शांति, भक्ति और समर्पण के भाव को प्रगाढ़ करता है। जब संध्या आरती के समय मंदिर के पट खुलते हैं और मृदंग, झांझ, मंजीरे तथा हारमोनियम की थाप पर यह आरती गूंजती है, तो संपूर्ण वातावरण वैकुंठ समान प्रतीत होता है।
इस आरती को गाते समय ताल का विशेष ध्यान रखा जाता है। आमतौर पर इसे दादरा ताल (6 मात्रा) या केरवा ताल (8 मात्रा) में गाया जाता है ताकि श्रोता और गायक दोनों ही एक लयबद्ध आनंद का अनुभव कर सकें। सुरों का उतार-चढ़ाव ऐसा होता है कि भगवान के श्रृंगार दर्शन के साथ भक्तों के कंठ से स्वतः ही भावपूर्ण स्वर फूट पड़ते हैं।
Aarti Thali Rotation Protocol & Ritual Rules (दीप प्रज्वलन, थाली घुमाने का क्रम व विधि)
सनातन धर्म में आरती केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह पंचतत्वों के माध्यम से आराध्य की पूजा करने का एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विज्ञान है। बांके बिहारी जी की आरती करते समय निम्नलिखित नियमों और क्रम का पालन करना चाहिए:
- थाली की सामग्री: आरती की थाली में कपूर, शुद्ध घी का दीपक (कम से कम पाँच बत्तियों वाला), कुमकुम, अक्षत, पुष्प और जल से भरा आचमनी कलश अवश्य होना चाहिए।
- दीप प्रज्वलन: सबसे पहले शुद्ध घी का दीपक और कपूर जलाएं। कपूर की ज्योति अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करने का प्रतीक है।
- आरती घुमाने का क्रम:
- सबसे पहले भगवान के श्री चरणों की ओर दीपक को चार बार घुमाएं (प्रतीकात्मक रूप से पृथ्वी तत्व का पूजन)।
- इसके बाद भगवान की नाभि और कटि भाग की ओर दो बार आरती घुमाएं (जल तत्व)।
- फिर भगवान के मुखमंडल और त्रिभंग झांकी की ओर सात बार पूर्ण वृत्त में आरती घुमाएं (अग्नि, वायु और आकाश तत्व का समन्वय)।
- अंत में पूरे शरीर के दर्शन करते हुए भगवान के चारों तरफ सात बार आरती को घुमाया जाता है।
- आचमन और समर्पण: आरती पूर्ण होने के बाद थाली में थोड़ा जल घुमाकर चारों दिशाओं में छिड़कें, तत्पश्चात भक्तगण श्रद्धापूर्वक आरती की ज्योति पर अपने हाथ फेरकर अपनी आंखों और मस्तक से लगाते हैं। अंत में कपूर की आरती पर हाथ रखकर भगवान की चरणों में समर्पित करते हैं।
Spiritual Significance, Karpura Gauram & Phalasruthi (कर्पूर का महत्व व फलश्रुति)
आरती के अंत में गाए जाने वाले मंत्र 'कर्पूरगौरं करुणावतारं...' का भी विशेष महत्व है। यद्यपि यह शिव स्तुति है, किंतु अद्वैत भाव के कारण ब्रज संप्रदाय में इसे भगवान विष्णु, कृष्ण और शिव की एकता के रूप में देखा जाता है। कर्पूर की विशेषता यह होती है कि वह जलते समय स्वयं पूरी तरह मिट जाता है और अपने पीछे कोई अवशेष नहीं छोड़ता। इसी प्रकार, एक सच्चे भक्त का अहंकार भी भगवान की भक्ति की अग्नि में जलकर समाप्त हो जाना चाहिए और उसकी सुगंध पूरे वातावरण में फैल जानी चाहिए।
फलश्रुति: नित्य नियम से जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा, एकाग्रता और प्रेम भाव के साथ श्री बांके बिहारी जी की इस पावन आरती का गायन और श्रवण करता है, उसके जीवन के सभी दुखों का नाश होता है। भगवान बांके बिहारी उसकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और अंत में बांके बिहारी की निकुंज लीलाओं में स्थान प्राप्त होता है। घर में इस आरती का नियमित पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है और घर में सुख-शांति व समृद्धि का वास होता है।
Frequently Asked Questions (FAQs)
| प्रश्न (Question) | उत्तर (Answer) |
|---|---|
| श्री बांके बिहारी जी की आरती किस समय करनी चाहिए? | श्री बांके बिहारी जी की आरती मुख्य रूप से प्रातः काल शृंगार आरती और संध्या काल में उत्थापन या शयन आरती के समय की जाती है। घर में आप इसे सुबह और संध्या वंदन के समय कर सकते हैं। |
| क्या इस आरती को कोई भी गृहस्थ अपने घर में गा सकता है? | हाँ, यह आरती अत्यंत सरल और भावपूर्ण है। इसे कोई भी गृहस्थ, बच्चा या वृद्ध व्यक्ति पूरी श्रद्धा के साथ अपने घर के मंदिर में गा सकता है। |
| बांके बिहारी जी के दर्शन करते समय पर्दा बार-बार क्यों हटाया और डाला जाता है? | ऐसी मान्यता है कि बांके बिहारी जी के नयनों में इतनी अगाध मोहकता है कि यदि कोई भक्त लगातार उनकी आँखों में देख ले, तो वह सुध-बुध खो बैठता है। इसलिए ठाकुर जी की नजर न लगे, इसलिए बीच-बीच में पर्दा डाल दिया जाता है। |
| आरती के समय ताली बजाने का क्या महत्व है? | आरती के समय ताली बजाने से शरीर के एक्यूप्रेशर पॉइंट्स दबते हैं, मन की एकाग्रता बढ़ती है और तालबद्ध रूप से भगवान के प्रति हर्ष और उल्लास प्रकट होता है। |