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संत कुंभनदास जी का निष्काम भाव - संतन को कहा सीकरी सों काम

संत कुंभनदास जी का निष्काम भाव एवं संतन को कहा सीकरी सों काम प्रसंग पढ़ें। जानिए संदर्भ एवं व्याख्या सहित अष्टछाप संत का जीवन परिचय।

संत कुंभनदास जी का निष्काम भाव - संतन को कहा सीकरी सों काम

अपडेटेड: 2026 | श्रेणी: भक्ति आंदोलन एवं अष्टछाप संत | वाचन समय: 12 मिनट


भारतीय भक्ति परंपरा और विशेषकर पुष्टिमार्गीय अष्टछाप के इतिहास में संत कुंभनदास जी का नाम अत्यंत श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है। उनका संपूर्ण जीवन भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, पूर्ण समर्पण और निष्काम भक्ति का एक जीवंत प्रतीक था। 'संतन को कहा सीकरी सों काम' यह केवल एक पंक्ति नहीं है, बल्कि यह उस महान संत के स्वाभिमान, भगवान के प्रति अगाध निष्ठा और सांसभौतिक प्रलोभनों से पूर्ण विरक्ति का वह ऐतिहासिक उद्गार है जिसने सम्राट अकबर के दरबार को भी निरुत्तर कर दिया था। इस लेख में हम संत कुंभनदास जी के जीवन, उनके इस प्रसिद्ध प्रसंग, उनके निष्काम भाव के दार्शनिक पहलुओं और उनके पदों के आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

अष्टछाप के प्रणेता संत कुंभनदास जी का संक्षिप्त परिचय

संत कुंभनदास जी महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के प्रमुख शिष्यों में से एक थे और उन्हें 'अष्टछाप' के कवियों में अग्रगण्य स्थान प्राप्त है। उनका जन्म विक्रम संवत 1555 (सन् 1498 ईस्वी) के लगभग उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के अंतर्गत आने वाले जमुना पार के जाम ग्राम के एक प्रतिष्ठित क्षत्रिय (या कान्यकुब्ज ब्राह्मण परंपरा के कई मतों के अनुसार) परिवार में हुआ था। वे गृहस्थ जीवन जीते हुए भी पूरी तरह से भगवद्भाक्ति में लीन रहते थे। खेती-बारी करके अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करना तथा शेष समय में श्री गोवर्धन पर्वत की तराई में बैठकर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का गान करना उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था।

जब महाप्रभु वल्लभाचार्य जी ने श्रीनाथ जी की प्रकटोत्सव लीला के पश्चात पुष्टिमार्ग की स्थापना की और ब्रजमंडल में श्री गोवर्धननाथ जी (श्रीनाथ जी) के मंदिर की सेवा-पूजा का भार अपने आठ अनन्य सिद्ध शिष्यों को सौंपा, तो उनमें कुंभनदास जी भी सम्मिलित थे। इन आठ संतों को सामूहिक रूप से 'अष्टछाप' कहा जाता है, जिनमें सूरदास जी, परमानंद दास जी, कृष्णदास जी, कुंभनदास जी, छीतस्वामी, नंददास, चतुर्भुजदास (कुंभनदास जी के सुपुत्र) और गोविंदस्वामी सम्मिलित थे।

ऐतिहासिक प्रसंग: "संतन को कहा सीकरी सों काम"

कुंभनदास जी की वैराग्य भावना और निष्काम भक्ति का सबसे ज्वलंत उदाहरण वह प्रसंग है जब भारत के मुगल सम्राट अकबर ने उनकी ख्याति सुनकर उन्हें अपनी राजधानी सीकरी (फतेहपुर सीकरी) आमंत्रित किया था। उस काल में सम्राट अकबर संत-महात्माओं और विद्वानों का आदर करता था। जब उसने कुंभनदास जी के मधुर और भक्तिरस से सराबोर पदों के बारे में सुना, तो उसने अपने एक दरबारी (या राजा टोडरमल के माध्यम से) कुंभनदास जी को संदेश भिजवाया कि वे फतेहपुर सीकरी आकर उनके दरबार में अपने भजनों का गान करें।

एक सामान्य गृहस्थ और भगवद्भक्त किसान के लिए सम्राट का यह आमंत्रण किसी बड़े प्रलोभन या सम्मान जैसा हो सकता था, परंतु कुंभनदास जी सांसारिक मान-सम्मान और सम्राट के वैभव से पूरी तरह विरक्त थे। वे राजा के दरबार में जाने को भगवान की भक्ति से विमुख होना मानते थे। जब बार-बार आग्रह किया गया, तो वे अत्यंत दुखी मन से बैलगाड़ी में बैठकर फतेहपुर सीकरी पहुंचे।

दरबार में पहुंचकर जब सम्राट अकबर ने उनसे भजन सुनाने का अनुरोध किया, तो कुंभनदास जी ने तनिक भी संकोच नहीं किया और समूची राजसभा के समक्ष अपनी तानपूरे की टंकार के साथ यह अमर पद गाया:

"संतन को कहा सीकरी सो काम?
आवत जात पनहियां टूटी, बिसरि गयो हरि नाम॥
जिनको मुख देखे दुःख उपजत, तिनको करिबे परे प्रनाम।
कुंभनदास लाल गिरधर बिनु, सबे काज बेकाम॥"

इस पद को सुनते ही सम्राट अकबर और उसके दरबारी अवाक रह गए। एक साधारण से दिखने वाले संत ने राजसभा में खड़े होकर स्पष्ट कह दिया कि संतों का सीकरी (दरबार) से क्या काम? वहां आने-जाने में उनके जूते (पनहियां) टूट जाते हैं और भगवान का नाम बिसर जाता है। जिन सांसारिक लोगों के मुख देखने से मन में कष्ट होता है, उनके सामने सिर झुकाना पड़ता है। मेरे लिए तो केवल लाल गिरधर (श्री कृष्ण) ही सब कुछ हैं, उनके बिना बाकी सारे काम व्यर्थ हैं। अकबर ने इस खरी और सच्ची बात पर बुरा मानने के बजाय कुंभनदास जी के निर्भीक स्वभाव और भगवान के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा की प्रशंसा की।

पद का सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ

कुंभनदास जी के इस ऐतिहासिक पद का आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ अत्यंत गहरा है। आइए इसके प्रत्येक चरण का विश्लेषण करें:

  • संतन को कहा सीकरी सो काम: संतों, भक्तों और महात्माओं का सांसारिक राजाओं के राजदरबारों, राजनीति और राजसी ठाट-बाट से क्या प्रयोजन? उनका जीवन तो भगवान की आराधना और प्रेम में ही रमना चाहिए।
  • आवत जात पनहियां टूटी, बिसरि गयो हरि नाम: राजदरबार तक आने और जाने के लंबे सफर में न केवल साधारण जूते (पनहियां) घिसकर टूट जाते हैं, बल्कि सांसारिक प्रपंचों और दौड़-धूप में वह अमूल्य समय भी नष्ट हो जाता है जो भगवान के भजन में लगना चाहिए था। सबसे बड़ी हानि यह है कि मन से भगवान का नाम बिसर (स्मरण से उतर) जाता है।
  • जिनको मुख देखे दुःख उपजत, तिनको करिबे परे प्रनाम: राजदरबारी और सांसारिक लोग जो अहंकार, स्वार्थ और विषय-विकारों में डूबे रहते हैं, उनके मुख का दर्शन करने से भी चित्त में क्षोभ और दुःख उत्पन्न होता है, और उनकी कृपा पाने के लिए उन्हीं के सामने सिर झुकाना (प्रणाम करना) पड़ता है जो कि एक सच्चे भक्त के लिए असह्य है।
  • कुंभनदास लाल गिरधर बिनु, सबे काज बेकाम: संत कुंभनदास जी कहते हैं कि मेरे आराध्य तो एकमात्र श्री गिरधर गोपाल (श्री कृष्ण) हैं। उनके प्रेम और सेवा के अतिरिक्त संसार के जितने भी अन्य कार्य या दरबार की डिग्रियां हैं, वे सभी पूरी तरह से व्यर्थ (बेकाम) हैं।

अष्टछाप संतों में कुंभनदास जी का विशिष्ट स्थान

अष्टछाप के सभी कवि भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का गान करते थे, परंतु कुंभनदास जी की विशेषता यह थी कि उन्होंने अपने व्यावहारिक जीवन में पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों का सबसे कठोरता से पालन किया। वे महाप्रभु वल्लभाचार्य और उनके पुत्र श्री गुसाईं जी विट्ठलनाथ जी के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। उनके पद वात्सल्य और श्रृंगार रस के साथ-साथ वैराग्य और दैन्य भाव के भी उत्कृष्ट नमूने हैं।

उनके पुत्र चतुर्भुजदास जी भी अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि हुए। पिता-पुत्र दोनों ने ब्रज में रहकर गोवर्धन की सेवा और श्रीनाथ जी के दर्शन को ही अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी माना।

कुंभनदास जी के निष्काम भाव की प्रमुख विशेषताएं

विशेषता विवरण आध्यात्मिक संदर्भ
पूर्ण स्वतंत्रता सांसारिक राजाओं या धनपतियों के प्रति किसी भी प्रकार की मोह-माया या अपेक्षा का अभाव। ईश्वर पर पूर्ण निर्भरता (आत्मनिवदन भक्ति)।
स्वाभिमान व निर्भीकता राजदरबार के आमंत्रण को ठुकराने का साहस और अपनी बात सत्यता से रखना। सत्य और भक्ति मार्ग पर चलने वाले संत का आंतरिक बल।
नित्य कृषि कर्म और संतोष खेती करके जो अन्न प्राप्त हो, उसी में संतोष करना और प्रभु स्मरण करना। श्रम की महत्ता और अपरिग्रह का पालन।
नाम स्मरण की प्रधानता हरि नाम को संसार के किसी भी वैभव से बढ़कर मानना। भगवन्नाम संकीर्तन ही मोक्ष का मार्ग है।

संत कुंभनदास जी से जुड़ी अन्य कथाएं एवं प्रसंग

कुंभनदास जी के जीवन से जुड़े कई अन्य प्रसंग भी उनकी भगवद्भक्ति और निष्काम भाव को प्रकट करते हैं। एक बार जब उनके खेत में अच्छी फसल हुई और उस समय श्रीनाथ जी के मंदिर के लिए कुछ विशेष सामग्री की आवश्यकता पड़ी, तो उन्होंने अपनी सारी उपज मंदिर की सेवा में समर्पित कर दी। उनके मन में कभी यह विचार नहीं आया कि भविष्य के लिए धन जोड़ा जाए। उनका विश्वास था कि जो भगवान आज खिला रहा है, वही कल भी व्यवस्था करेगा।

एक अन्य प्रसंग में जब वे एक बार अपने खेतों की रखवाली कर रहे थे और उनके मुख से श्री कृष्ण की लीला का पद निकल रहा था, तो वे इतने तल्लीन हो गए कि सुध-बुध खो बैठे। ब्रज के ग्रामीण और उनके सखा उनकी इस तल्लीनता को देखकर नतमस्तक हो जाते थे।

दैनिक जीवन में संत कुंभनदास जी के निष्काम भाव की प्रासंगिकता

आज के आधुनिक और भौतिकवादी युग में, जहां हर व्यक्ति यश, धन, पद और प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में शामिल है, संत कुंभनदास जी का जीवन हमें एक नई दिशा दिखाता है।

  • मूल्यों की रक्षा: सांसारिक प्रलोभन कितने भी बड़े क्यों न हों, अपने नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए।
  • संतोषी जीवन: अपनी मेहनत की कमाई में संतोष रखना और अनावश्यक महत्वाकांक्षाओं से दूर रहना मानसिक शांति की कुंजी है।
  • अहंकार का त्याग: पद और प्रतिष्ठा की चाह व्यक्ति को मानसिक रूप से गुलाम बना देती है, जबकि निष्काम भाव व्यक्ति को आंतरिक रूप से स्वतंत्र और आनंदित रखता है।
  • पढ़िए अन्य महान संतों के जीवन के बारे में जैसे महाकवी सूरदास जी की भक्ति परंपरा और संत तुलसीदास जी का जीवन चरित्र।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्‍न 1: संत कुंभनदास जी कौन थे?

उत्तर: संत कुंभनदास जी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के प्रमुख शिष्य और पुष्टिमार्गीय 'अष्टछाप' के प्रख्यात संत एवं कवि थे। वे भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे।

प्रश्‍न 2: "संतन को कहा सीकरी सो काम" पंक्ति किसने और क्यों कही थी?

उत्तर: यह पंक्ति संत कुंभनदास जी ने सम्राट अकबर के आमंत्रण पर फतेहपुर सीकरी दरबार में जाने के पश्चात वहां के वातावरण से विरक्त होकर कही थी।

प्रश्‍न 3: अष्टछाप में कुल कितने कवि सम्मिलित हैं?

उत्तर: अष्टछाप में कुल आठ सिद्ध संत कवि सम्मिलित हैं, जिनमें सूरदास, कुंभनदास, परमानंद दास, कृष्णदास, छीतस्वामी, नंददास, चतुर्भुजदास और गोविंदस्वामी हैं।

प्रश्‍न 4: कुंभनदास जी अपनी आजीविका कैसे चलाते थे?

उत्तर: कुंभनदास जी गृहस्थ जीवन जीते थे और कृषि (खेती-बारी) करके अपना भरण-पोषण करते थे।

प्रश्‍न 5: सम्राट अकबर ने कुंभनदास जी को क्यों बुलाया था?

उत्तर: सम्राट अकबर ने उनके मधुर भजनों और भगवद्गुणगान की ख्याति सुनकर उन्हें अपने दरबार में भजन सुनाने के लिए आमंत्रित किया था।

प्रश्‍न 6: निष्काम भक्ति का क्या अर्थ है?

उत्तर: निष्काम भक्ति का अर्थ है बिना किसी फल, यश, धन या सांसारिक कामना के केवल भगवान के प्रति प्रेम और सेवा भाव रखना।

प्रश्‍न 7: कुंभनदास जी के पुत्र का क्या नाम था?

उत्तर: कुंभनदास जी के सुपुत्र चतुर्भुजदास जी थे, जो स्वयं अष्टछाप के एक प्रसिद्ध कवि थे।

प्रश्‍न 8: इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर: इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें सांसारिक मान-सम्मान या प्रलोभनों के पीछे भागने के बजाय अपने आराध्य की भक्ति और सदाचार पर अडिग रहना चाहिए।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख पुष्टिमार्गीय साहित्य, अष्टछाप संतों के इतिहास और ब्रजभाषा के प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को संत कुंभनदास जी के जीवन दर्शन और उनके निष्काम भाव से अवगत कराना है।

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

स्रोत एवं संदर्भ

  • अष्टछाप और पुष्टिमार्ग इतिहास - काँकरोली विद्याविभाग
  • ब्रज के संत और उनकी वाणी - विभिन्न शोध ग्रंथ
  • वल्लभ संप्रदाय साहित्य एवं सिद्धांत

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 30 Sep 2026

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