संत कुंभनदास जी के जीवन की आध्यात्मिक भूमिका
भारतीय संस्कृति और भक्ति आंदोलन के इतिहास में अष्टछाप के कवियों का विशेष स्थान है। महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के शिष्यों में से एक, संत कुंभनदास जी, विरक्ति, सरलता और निष्काम भक्ति के अद्वितीय प्रतीक माने जाते हैं। ब्रज भूमि की पावन धूल में रचे-बसे कुंभनदास जी का संपूर्ण जीवन भगवान श्री कृष्ण और श्री राधिका रानी की सेवा में समर्पित था। उनके लिए सांसारिक वैभव, राजा-महाराजाओं के दरबार, सोने-चांदी के आभूषण और बड़े-बड़े महल तिनके के समान थे। उनका हृदय केवल और केवल गोवर्धन की गिरिभाइयों, यमुना के कूल और निकुंजों में गूंजने वाली मुरली की तान से बंधा हुआ था। जब हम उनके जीवन का गहराई से अध्ययन करते हैं, तो हमें यह स्पष्ट रूप से समझ आता है कि वास्तविक भक्ति में किसी भी प्रकार की भौतिक लालसा या स्वार्थ के लिए कोई स्थान नहीं होता। संत कुंभनदास जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन में यह सिद्ध कर दिखाया कि भगवान का सच्चा भक्त केवल हरि स्मरण में आनंदित रहता है, उसे इस संसार की किसी भी अन्य वस्तु से कोई मोह नहीं होता। उनकी वाणी में जो ओज, सरलता और समर्पण था, वह आज के भौतिकवादी युग में भी प्रत्येक साधक को एक नई दिशा प्रदान करता है। इस संपूर्ण आलेख में हम उनके जीवन के उस ऐतिहासिक प्रसंग पर चर्चा करेंगे जिसने भारतीय आध्यात्मिक जगत में अमरता प्राप्त की है और जो आज भी हर भक्त के हृदय में प्रेरणा की ज्योति प्रज्वलित करता है।
अष्टछाप और ब्रज संस्कृति की पृष्ठभूमि
सोलहवीं शताब्दी का वह कालखंड जब उत्तर भारत में भक्ति की मंदाकिनी प्रवाहित हो रही थी, तब महाप्रभु वल्लभाचार्य और उनके सुयोग्य पुत्र श्री विठ्ठलनाथ जी ने पुष्टिमार्ग की स्थापना की थी। इस मार्ग का मुख्य आधार भगवान श्री कृष्ण की अनन्य और प्रेमलक्षणा भक्ति था। इसी काल में आठ महान संत कवियों को मिलाकर 'अष्टछाप' की स्थापना की गई, जिनमें सूरदास, कुंभनदास, परमानंद दास, कृष्णदास, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास, नंददास और गोविंदस्वामी सम्मिलित थे। ये सभी संत भगवान श्री कृष्ण की लियाओं का गान करते थे और उनका प्रत्येक पद ब्रजभाषा में रचा गया था। इस पृष्ठभूमि में संत कुंभनदास जी का व्यक्तित्व अत्यंत विशिष्ट था। वे आयु में इन सभी संतों में ज्येष्ठ थे और गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी पूरी तरह से विरक्त जीवन व्यतीत करते थे। उनका निवास स्थान गोवर्धन के पास जमुनावती नामक ग्राम था, जहाँ वे खेती-किसानी करके अपना और अपने परिवार का निर्वाह करते थे। कृषि कार्य करते हुए भी उनके हाथ हल पर होते थे और जुबान पर निरंतर श्री कृष्ण के पवित्र नामों का संकीर्तन चलता रहता था। उनके खेतों में जो कुछ भी अन्न उगता था, वे उसे प्रसाद मानकर ग्रहण करते थे और अतिथियों की सेवा में आनंदित रहते थे। ब्रज की भूमि उनके लिए साक्षात बैकुंठ थी और यहाँ की हर एक लता, पता, गौ और ग्वाल-बाल उनके इष्ट के स्वरूप प्रतीत होते थे। इस प्रकार की पवित्र पृष्ठभूमि में पले-बढ़े कुंभनदास जी का मन कभी भी राजसी सुख-सुविधाओं की ओर आकर्षित नहीं हुआ, क्योंकि जिन्होंने साक्षात गोवर्धन धरण का प्रेम पा लिया हो, उनके लिए दिल्ली के सम्राट का सिंहासन भी अत्यंत तुच्छ प्रतीत होता था।
सम्राट अकबर का निमंत्रण और ऐतिहासिक घटनाक्रम
एक बार की बात है, जब मुगल सम्राट अकबर अपनी उदारता और विद्वानों तथा संतों के प्रति सम्मान के लिए प्रसिद्ध था, तब उसने ब्रज क्षेत्र के महान संतों की कीर्ति सुनी। उसने सुना कि ब्रज में कुछ ऐसे संत निवास करते हैं जो भगवान श्री कृष्ण के प्रेम में मग्न रहते हैं और जिनकी वाणी अत्यंत मधुर एवं प्रभावशाली है। सम्राट अकबर ने अपने दरबारियों और मंत्रियों से विचार-विमर्श करके यह इच्छा व्यक्त की कि उन महान संतों में से प्रमुख संत कुंभनदास जी को फतेहपुर सीकरी दरबार में आमंत्रित किया जाए, ताकि उनके दर्शन और उनके मुख से भगवान की महिमा के पद सुने जा सकें। सम्राट की आज्ञा पाकर शाही संदेशवाहक शाही रथ और लवाजमे के साथ गोवर्धन के पास जमुनावती ग्राम पहुँचे। उन्होंने संत कुंभनदास जी को सम्राट का संदेश सुनाया कि दिल्ली के शहंशाह अकबर ने आपको आदरपूर्वक अपनी राजधानी सीकरी आमंत्रित किया है। उस समय कुंभनदास जी अपने खेतों में कार्य कर रहे थे या शायद अपनी कुटिया के बाहर बैठे थे। संदेशवाहक के मुँह से जब यह बात सुनी कि बादशाह ने उन्हें बुलाया है, तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता के स्थान पर एक गंभीर भाव आ गया। उन्होंने विनम्रतापूर्वक शाही आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया और संदेशवाहकों से कहा कि मुझे उस सीकरी से क्या लेना-देना है, जहाँ जाने से मेरे प्रभु के स्मरण में बाधा उत्पन्न होती है। परंतु संदेशवाहक बार-बार आग्रह करने लगे कि सम्राट का अपमान राज्यद्रोह माना जाता है और आपको चलना ही होगा। अधिक आग्रह और भक्तों के समझाने पर कुंभनदास जी ने सीकरी जाने का निर्णय लिया, लेकिन उनके मन में उस राजदरबार के प्रति कोई आकर्षण नहीं था, बल्कि एक असहजता थी कि वे अपने आराध्य की शरण को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं।
संतन को कहा सीकरी सों काम - घटना का विस्तृत विवरण
जब संत कुंभनदास जी अत्यंत विषम मनस्थिति में पैदल ही फतेहपुर सीकरी के विशाल शाही दरबार में पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य अत्यंत भव्य और चकाचौंध करने वाला था। चारों ओर कीमती कालीन बिछे हुए थे, सोने-चांदी के आभूषण पहने हुए दरबारी बैठे थे और स्वयं सम्राट अकबर अपनी पूरी शान-शौकत के साथ तख्त पर विराजमान था। कुंभनदास जी साधारण वेशभूषा में, शरीर पर फटे-पुराने वस्त्र और गले में तुलसी की माला पहने हुए दरबार के बीचों-बीच पहुँचे। उनकी इस साधारण और विरक्त मुद्रा को देखकर दरबारियों को आश्चर्य हुआ। सम्राट अकबर ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया और अपने पास बिठाकर कहा, "हे संत महात्मन, आपके यश के बारे में बहुत सुना है। कृपा करके हमारे दरबार में कोई ऐसा पद गाइए जिससे हमारे मन को शांति मिले और भगवान की महिमा का अनुभव हो।" अकबर को यह अपेक्षा थी कि संत उसकी प्रशंसा में या उसके साम्राज्य की महानता पर कुछ रचना करेंगे। परंतु कुंभनदास जी तो भगवान के सिवाय किसी अन्य के आगे झुकना जानते ही नहीं थे। उन्होंने बिना किसी भय के अपनी मंजीरा उठाई और तानपुरा संभालते हुए वह अमर पद गाया जिसने भारतीय इतिहास और साहित्य में एक नया अध्याय जोड़ दिया। उन्होंने गाया -
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