भक्ति रस काव्य व भजन

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता अध्याय 2 श्लोक 47)

12 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

श्रीमद्भागवत गीता सनातन धर्म का वह शाश्वत प्रकाशपुंज है जो मानव जीवन की हर उलझन को सुलझाने की क्षमता रखता है। गीता के द्वितीय अध्याय का 47वां श्लोक—कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन—मानव जाति के लिए कर्मयोग का सबसे बड़ा महामंत्र है। यह श्लोक मनुष्य को कर्तव्यपरायणता और अनासक्ति का अनूठा पाठ पढ़ाता है। भगवदगीता के इस दिव्य श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धक्षेत्र में अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करने और फल की चिंता से मुक्त होकर कार्य करने का उपदेश दिया था। यह मार्गदर्शक श्लोक आज के आधुनिक युग में भी मानसिक शांति, तनाव मुक्ति और सफलता प्राप्त करने के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना कि महाभारत काल में था।

मूल संस्कृत श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

पदच्छेद एवं अन्वय

पदच्छेद: कर्मणि एव अधिकारः ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुः भूः मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणि।

अन्वय: ते (तव) कर्मणि एव अधिकारः अस्ति, कदाचन फलेषु मा (अधिकारः अस्तु)। त्वं कर्मफलहेतुः मा भूः, अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु।

शब्दार्थ (Word-by-word Meanings)

संस्कृत पदव्याकरण / पदच्छेदसरल हिंदी अर्थEnglish Meaning
कर्मणिसप्तमी विभक्ति, एकवचनकर्म करने मेंIn action / duties
एवअव्ययहीOnly / certainly
अधिकारःप्रथमा विभक्ति, एकवचनअधिकार (हक)Right / entitlement
तेषष्ठी विभक्ति, एकवचन (युष्मद्)तुम्हारा (तेरा)Your
माअव्यय (निषेधार्थक)नहींNot
फलेषुसप्तमी विभक्ति, बहुवचनफलों मेंIn the fruits / results
कदाचनअव्ययकभी भीAt any time / ever
कर्मफलहेतुःकर्मणः फलम् इति कर्मफलम्, हेतुरस्य सःकर्म के फल का कारण (बचने वाला)Motivated by the fruits of action
भूःलोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचनहोओBe / become
सङ्गःप्रथमा विभक्ति, एकवचनआसक्ति या लगावAttachment
अस्तुलोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचनहोLet there be
अकर्मणिसप्तमी विभक्ति, एकवचनकर्म न करने में (आलस्य में)In inaction

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने तक ही सीमित है, उसके परिणामों (फलों) पर तुम्हारा कभी भी कोई अधिकार नहीं है। इसलिए तुम कभी भी कर्मों के फल की कामना करने वाले (कर्मफलहेतु) मत बनो और न ही तुम्हारी कर्म न करने में (आलस्य में) कोई आसक्ति होनी चाहिए। इस श्लोक का सार यह है कि मनुष्य का कर्तव्य केवल कर्म करना है। फल देना ईश्वर के हाथ में है। जब मनुष्य फल की चिंता में डूब जाता है, तब उसके मन में तनाव, भय, और भविष्य की अनिश्चितता जन्म लेती है। इसके विपरीत, जब वह अपने कर्म को ही पूजा मानकर बिना किसी स्वार्थ के करता है, तब उसका मन शांत और स्थिर रहता है। यह निष्काम कर्मयोग की वह कुंजी है जो मनुष्य को संसार के बंधनों से मुक्त कर परम आनंद की ओर ले जाती है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

श्रीमद्भागवत गीता के इस श्लोक को 'कर्मयोग' का मूल आधार माना जाता है। महाभारत के युद्ध के आरंभ में जब अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर विषाद से घिर जाते हैं और गांडीव नीचे रख देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें सांख्य योग और कर्म योग का ज्ञान देते हैं। यह श्लोक उसी महासंवाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपनिषदों और वेदों में भी निष्काम कर्म की महिमा का गुणगान किया गया है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित गीता के इस श्लोक ने सदियों से संतों, ऋषियों, और दार्शनिकों को प्रभावित किया है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में यज्ञ की भावना से किए गए कार्य ही बंधनमुक्त होते हैं, अन्यथा हर कर्म व्यक्ति को किसी न किसी रूप में बांध लेता है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह श्लोक जीव को अहंकार और कर्तापन के भाव से मुक्त करता है। जब व्यक्ति यह मान लेता है कि वह केवल एक निमित्त मात्र है और कर्म का फल ईश्वर के अधीन है, तब उसके भीतर से 'मैं करने वाला हूँ' (अहंकार) का भाव समाप्त हो जाता है। यह स्थिति साधक को मोक्ष और आत्मज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करती है। निष्काम कर्म का अर्थ कर्म का त्याग नहीं है, बल्कि कर्म के फल की आसक्ति का त्याग है। जब आसक्ति समाप्त हो जाती है, तब चित्त शुद्ध हो जाता है और ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति का उदय होता है।

दैनिक जीवन में व्यावहारिक उपयोग

आज के तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धात्मक जीवन में इस श्लोक की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है:

  • विद्यार्थियों के लिए: विद्यार्थियों को परीक्षा के अंकों या परिणामों के बारे में अधिक सोचने के बजाय अपनी पढ़ाई और सीखने की प्रक्रिया पर पूरा ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • व्यापारियों और पेशेवरों के लिए: लक्ष्य और मुनाफे की चिंता में मानसिक स्वास्थ्य खराब करने के बजाय अपने कार्य को पूरी ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ करना चाहिए।
  • मानसिक शांति के लिए: भविष्य की अनिश्चितता के डर से मुक्ति पाने का यह सबसे बड़ा अचूक उपाय है कि हम वर्तमान में जिएँ और अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म करें।
  • पारिवारिक जीवन में: रिश्तों में अपेक्षाओं और स्वार्थ को छोड़कर निःस्वार्थ भाव से प्रेम और कर्तव्य का पालन करने से पारिवारिक सौहार्द बना रहता है।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

इस दिव्य श्लोक की साधना और नियमित पठन के लिए विशेष नियमों का पालन किया जा सकता है:

    Rising sun or morning hours (ब्रह्म मुहूर्त) are ideal for chanting this shloka.
  1. शुद्ध आसन पर बैठकर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें।
  2. इस श्लोक का प्रतिदिन 108 बार मानसिक या वाचिक जाप करने से मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता बढ़ती है।
  3. गुरुवार या एकादशी के दिन गीता के इस अध्याय का पाठ करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 28 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!