भक्ति रस काव्य व भजन

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता अध्याय 2 श्लोक 47)

6 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
आकार:
कंट्रास्ट:

श्रीमद्भगवद्गीता सनातन संस्कृति का वह प्रकाश स्तंभ है, जो जीवन के प्रत्येक अंधकारमय मोड़ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है। कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया यह उपदेश संपूर्ण मानव जाति के लिए कर्म और धर्म का सनातन विधान है। द्वितीय अध्याय के $47$वें श्लोक के रूप में वर्णित 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' निष्काम कर्मयोग का प्राण है। यह श्लोक मनुष्य को मानसिक शांति, कर्तव्यनिष्ठा और अनासक्ति का अचूक पाठ पढ़ाता है।

मूल संस्कृत श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

पदच्छेद एवं अन्वय

पदच्छेद: कर्मणि एव अधिकारः ते, मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुः भूः, मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणि॥

अन्वय: ते कर्मणि एव अधिकारः अस्तु, फलेषु कदाचन मा (अस्तु)। त्वं कर्मफलहेतुः मा भूः, अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु।

शब्दार्थ (Word-by-word Meanings)

संस्कृत पदव्याकरण / पदच्छेदसरल हिंदी अर्थEnglish Meaning
कर्मणिसप्तमी विभक्ति, एकवचनकर्म करने मेंIn action / duties
एवअव्ययहीOnly / certainly
अधिकारःप्रथमा विभक्ति, एकवचनअधिकार, सामर्थ्यRight / authority
तेषष्ठी विभक्ति, एकवचन (युष्मद्)तुम्हारा, तेराYour / of you
माअव्यय (निषेधार्थक)मतNot
फलेषुसप्तमी विभक्ति, बहुवचनफलों में, परिणामों मेंIn the fruits / results
कदाचनअव्ययकभी भीEver / at any time
कर्मफलहेतुःप्रथमा विभक्ति, एकवचनकर्म के फल का कारणMotivated by the fruits of action
भूःलोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचनहोओBe / become
सङ्गःप्रथमा विभक्ति, एकवचनआसक्ति, लगावAttachment
अस्तुलोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचनहोLet there be
अकर्मणिसप्तमी विभक्ति, एकवचनकर्म न करने में (आलस्य में)In inaction / non-performance

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम्हारा अधिकार केवल अपने नियत कर्म (कर्तव्य) को करने तक ही सीमित है, उसके परिणामों या फलों पर तुम्हारा कभी भी कोई अधिकार नहीं है। इसलिए तुम कर्म के फल की कामना करने वाले या फल के हेतु बनने वाले मत बनो। साथ ही, कर्म न करने में यानी अकर्मण्यता या आलस्य में भी तुम्हारी कोई आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

इस श्लोक की आध्यात्मिक गहराई बहुत अगाध है। सामान्यतः मनुष्य किसी भी कार्य को करने से पूर्व उसके परिणाम के प्रति आशान्वित या भयभीत रहता है। जब परिणाम अनुकूल नहीं होता, तो वह दुःख और निराशा से घिर जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस चक्रव्यूह को भेदने का मार्ग बताते हैं। वे कहते हैं कि फल ईश्वर के अधीन है, प्रकृति के नियमों के अधीन है, किंतु कर्म करना मनुष्य के स्वतंत्र पुरुषार्थ के अधीन है। जब हम फल की चिंता छोड़कर केवल कर्म पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हमारे कार्य की गुणवत्ता में निखार आता है और चित्त में शांति बनी रहती है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अंग है। यह उपदेश उस समय दिया गया जब अर्जुन अपने स्वजनों को युद्धभूमि में सामने पाकर मोहग्रस्त हो गए थे और गाधिव गाण्डीव उठाने से इंकार कर रहे थे। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' श्लोक गीता के 'कर्मयोग' अध्याय का केंद्र बिंदु है। महर्षि वेदव्यास रचित यह ग्रंथ उपनिषदों का सार माना गया है। समस्त वैदिक साहित्य—चाहे वह वेद हों, पुराण हों या उपनिषद—कर्म की पवित्रता और निष्काम भाव की महिमा का गुणगान करते हैं। कठोपनिषद और ईशोपनिषद में भी इसी प्रकार के कर्म और त्याग के सामंजस्य का वर्णन मिलता है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

भारतीय दर्शन में कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। कर्मण्येवाधिकारस्ते श्लोक हमें कर्माशय (कर्म के बीजों) से मुक्त होने की कुंजी देता है। जब हम फल की इच्छा से कर्म करते हैं, तो हम उस कर्म के बंधन (ಕರ್म बंधन) में बंध जाते हैं, जिससे आवागमन का चक्र चलता रहता है। इसके विपरीत, जब हम यज्ञ की भावना से (लोकसंग्रहार्थ) कर्म करते हैं, तो वह कर्म बंधन का कारण न बनकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यह सांख्य योग और बुद्धियोग दोनों का समन्वय है, जहाँ समत्वं योग उच्यते (समता ही योग है) का संदेश चरितार्थ होता है।

दैनिक जीवन में व्यावहारिक उपयोग

विद्यार्थियों के लिए: विद्यार्थियों को परीक्षा के अंकों या परिणाम की अत्यधिक चिंता करने के बजाय अपनी अध्ययन प्रक्रिया, एकाग्रता और सीखने की प्रवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए। फल स्वतः अनुकूल प्राप्त होगा।

व्यावसायिक जीवन में: कॉरपोरेट जगत और कार्यस्थलों पर तनाव, लक्ष्य प्राप्ति का दबाव (Targets pressure) और डिप्रेशन आम हो गए हैं। यदि पेशेवर व्यक्ति फल की आसक्ति छोड़कर अपनी कार्यकुशलता पर ध्यान दें, तो उनकी उत्पादकता बढ़ेगी और मानसिक शांति बनी रहेगी।

मानसिक शांति और संतुलन: यह श्लोक चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) का सबसे बड़ा आध्यात्मिक उपचार है। भविष्य की अनिश्चितता से घबराने के वर्तमान क्षण में श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देता है।

पारिवारिक और सामाजिक दायित्व: परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन बिना किसी स्वार्थ या अपेक्षा के करना ही सच्चा धर्म है। अपेक्षारहित प्रेम और सेवा संबंध को प्रगाढ़ बनाती है।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

इस पावन श्लोक की साधना के लिए किसी विशेष बड़े अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है, परंतु इसे दैनिक नित्यचर्या में शामिल करना अत्यंत फलदायी है।

  • पाठ का समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूजागृह में बैठकर या कार्य आरंभ करने से पूर्व इस श्लोक का 11 या 21 बार मानसिक जप करना चाहिए।
  • विशेष मुहूर्त: गीता जयंती, एकादशी तिथि, या किसी भी नए कार्य (व्यापार, अध्ययन, नौकरी) के आरंभ के दिन इस श्लोक का स्मरण अत्यंत शुभ माना गया है।
  • संकल्प: कार्य के आरंभ में 'हे कृष्ण, मैं यह कर्म आपको समर्पित करता हूँ' इस भाव के साथ कार्य शुरू करना चाहिए।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 28 Sep 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!