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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता अध्याय 2 श्लोक 47)

65 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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श्रीमद्भागवत गीता के द्वितीय अध्याय का 47वां श्लोक 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' संपूर्ण मानवता के लिए कर्मयोग का मूल मंत्र है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए इस दिव्य उपदेश में निष्काम कर्म की महत्ता को अत्यंत सरल और स्पष्ट रूप से समझाया गया है। यह श्लोक न केवल जीवन के संकटों से उबरने का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि व्यक्ति को मानसिक शांति, कर्तव्यनिष्ठा और अनासक्ति का पाठ भी पढ़ाता है।

मूल संस्कृत श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूमा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥

पदच्छेद एवं अन्वय

पदच्छेद: कर्मणि एव अधिकारः ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुः भूः मा ते सङ्गः अस्तु अकर्मणि॥

अन्वय: ते कर्मणि एव अधिकारः अस्ति, फलेषु कदाचन मा (अस्तु)। कर्मफलहेतुः मा भूः, अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु॥

शब्दार्थ (Word-by-word Meanings)

संस्कृत पदव्याकरण / पदच्छेदसरल हिंदी अर्थEnglish Meaning
कर्मणिसप्तमी विभक्ति एकवचनकर्म में, कर्तव्य मेंIn action / duty
एवअव्ययहीOnly / certainly
अधिकारःप्रथमा विभक्ति एकवचनअधिकार, सामर्थ्यRight / authority / entitlement
तेषष्ठी विभक्ति एकवचन (युष्मद्)तुम्हारा, तेराYour / of you
माअव्यय (निषेधार्थक)मत, नहींNot / do not
फलेषुसप्तमी विभक्ति बहुवचनफलों मेंIn the fruits / results
कदाचनअव्ययकभी भीEver / at any time
कर्मफलहेतुःकर्मणः फलम् = कर्मफलम्, फलस्य हेतुः = फलहेतुःकर्म के फल का कारणMotivated by the fruit of action
भूःलुङ् लकार मध्यम पुरुष एकवचनहोओBe / become
सङ्गःप्रथमा विभक्ति एकवचनआसक्ति, लगावAttachment
अस्तुलोट् लकार प्रथम पुरुष एकवचनहोLet there be
अकर्मणिन कर्म अकर्म, तस्मिन्कर्म न करने में, अक्रियता मेंIn inaction / non-performance of duty

सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में ही है, उसके फलों में कभी भी नहीं। इसलिए तुम कभी भी अपने कर्मों के फलों के कारण मत बनो यानी फल की इच्छा से प्रेरित होकर कर्म मत करो। इसके साथ ही, तुम्हारी अकर्मणि यानी कर्म न करने में भी कोई आसक्ति या रुचि नहीं होनी चाहिए।

इस श्लोक का आंतरिक और आध्यात्मिक अर्थ बहुत गहरा है। सामान्य मनुष्य जब भी कोई कार्य करता है, तो उसके मन में सबसे पहले उस कार्य के परिणाम की चिंता समा जाती है। यदि फल अनुकूल हो, तो वह प्रसन्न होता है और यदि प्रतिकूल हो, तो वह दुख, निराशा और तनाव से घिर जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इसी मानसिक स्थिति पर प्रहार करते हैं। वे कहते हैं कि फल तुम्हारे नियंत्रण में नहीं है। नियंत्रण केवल तुम्हारे पुरुषार्थ और कर्म पर है। जब हम फल की चिंता छोड़कर केवल अपने कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हमारी कार्यक्षमता कई गुना बढ़ जाती है और मन शांत रहता है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

यह श्लोक श्रीमद्भागवत गीता के 'सांख्य योग' नामक द्वितीय अध्याय का crowning jewel माना जाता है। महाभारत के युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं और अपने कर्तव्यों से विमुख होने लगते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें गीता का यह अमर ज्ञान प्रदान करते हैं। वैदिक सनातन संस्कृति में कर्मयोग को मोक्ष प्राप्ति का एक अत्यंत सुगम मार्ग बताया गया है। महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण में भी निष्काम कर्म की महिमा का बार-बार उल्लेख किया गया है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

दर्शन शास्त्र के दृष्टिकोण से यह श्लोक जीव और प्रकृति के संबंधों को स्पष्ट करता है। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' का तात्पर्य यह है कि जीवात्मा का स्वभाव कर्म करना है। प्रकृति अपने नियमों के अनुसार फलों का निर्धारण करती है। जब मनुष्य फल पर अपना अधिकार जताने लगता है, तब वह अहंकार और बंधनों में बंध जाता है। 'मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि' यह चेतावनी देता है कि फल की अनिश्चितता से डरकर मनुष्य को कर्तव्य त्यागकर अक्रिय (आलसी) नहीं हो जाना चाहिए। अनासक्त भाव से किया गया कर्म ही योग कहलाता है।

दैनिक जीवन में व्यावहारिक उपयोग

आज के आधुनिक और भागदौड़ भरे जीवन में इस श्लोक की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। इसे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में इस प्रकार उतारा जा सकता है:

  • विद्यार्थियों के लिए: विद्यार्थियों को परीक्षा में अंक या रैंक की चिंता करने के बजाय अपनी पढ़ाई, विषयों को समझने और निरंतर अभ्यास पर ध्यान देना चाहिए।
  • व्यापारियों और पेशेवरों के लिए: प्रोफेशनल्स और कारोबारियों को टर्नओवर, प्रॉफिट और टारगेट का तनाव लेने के बजाय अपनी कार्यकुशलता, ईमानदारी और ग्राहक सेवा पर फोकस करना चाहिए।
  • मानसिक शांति के लिए: भविष्य की चिंता (अति-चिन्ता) और भूतकाल के पछतावे से मुक्त होकर वर्तमान क्षण में जीने की कला यह श्लोक सिखाता है।
  • पारिवारिक जीवन में: परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह बिना किसी अपेक्षा या प्रतिदान की भावना के करना ही सच्ची पारिवारिक शांति लाता है।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

इस दिव्य श्लोक का दैनिक जीवन में जाप और मनन करने से मानसिक दृढ़ता प्राप्त होती है।

  1. पाठ का समय: प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात ब्रह्ममुहूर्त में या संध्याकाल में इस श्लोक का 11, 21 या 108 बार मानसिक जप करना चाहिए।
  2. शुभ मुहूर्त: किसी भी नए कार्य का शुभारंभ करने से पहले, परीक्षा के दिन या जीवन में किसी महत्वपूर्ण निर्णय के समय इस श्लोक का स्मरण करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।
  3. साधना विधि: भगवान श्रीकृष्ण के चित्र या विग्रह के समक्ष दीप प्रज्वलित कर शांत चित्त से इस श्लोक का सस्वर पाठ करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 28 Sep 2026

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