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भजन करने से क्या होगा (Bhajan karne se kya hoga Lyrics in Hindi) - Nirgun Bhajan

निर्गुण चेतावनी भजन 'भजन करने से क्या होगा' के संपूर्ण बोल और भावार्थ पढ़ें। कर्म और वैराग्य की प्रेरणा देने वाला यह पावन भजन संदर्भ सहित समझें।

"भजन करने से क्या होगा" (Bhajan karne se kya hoga Lyrics in Hindi) भारतीय भक्ति परंपरा का एक अत्यंत लोकप्रिय और कालजयी 'चेतावनी भजन' (Nirgun Chetawani Bhajan) है। यह भजन मनुष्य को कर्म की प्रधानता, जीवन की नश्वरता और दिखावे की भक्ति से दूर रहने का दिव्य संदेश देता है। निर्गुण काव्य शैली में रचित यह गीत हमें याद दिलाता है कि यदि हमारे कर्म शुद्ध नहीं हैं, तो केवल बाहरी पूजा-पाठ या नाम-जप से आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है। इस भजन का मुख्य स्वर वैराग्य, आत्म-मंथन और कर्मयोग पर आधारित है। जब हम इस भजन के गहरे अर्थों में उतरते हैं, तो यह हमें श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्मयोग और संत कबीर की व्यावहारिक शिक्षाओं की याद दिलाता है। आइए, इस पावन भजन के संपूर्ण बोल, विस्तृत भावार्थ, आध्यात्मिक महत्व और जीवनोपयोगी संदेशों को गहराई से समझें।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

भजन करने से क्या होगा (Bhajan karne se kya hoga Lyrics)


इंसान इंसान को क्या देता है,
करम तेरे अच्छे हो तो वो बिन मांगे सब देता है।

करम खोटे तो ईश्वर का भजन करने से क्या होगा,
किया परहेज़ ना कुछ भी दवा खाने से क्या होगा।

तू खाली हाथ आया है व खाली हाथ जाएगा,
पथिक मालिक करोडो का ये कहलाने से क्या होगा।

समय पर एक ही ठोकर बदल देती है जीवन को,
जो ठोकर से भी ना समझे तो समझाने से क्या होगा।

समय बीता हुआ हरगिज़ कभी ना हाथ आएगा,
लिया चुग खेत चिड़ियों ने तो पछताने से क्या होगा।

मुसीबत तो टले हरगिज़ सदा हिम्मत ही रखने से,
मुकद्दर पर भरोसा कर के सो जाने से क्या होगा।

करम खोटे तो ईश्वर का भजन करने से क्या होगा,
किया परहेज़ ना कुछ भी दवा खाने से क्या होगा।

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह भजन मानवीय जीवन के सबसे बड़े सत्य यानी 'कर्म सिद्धांत' (Law of Karma) को रेखांकित करता है। भजन की शुरुआत इस सत्य से होती है कि कोई भी मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य को कुछ नहीं दे सकता; देने वाला केवल वह परमेश्वर है। यदि हमारे कर्म अच्छे हैं, तो वह सर्वव्यापी ईश्वर बिना मांगे ही हमारी झोली भर देता है। इसके विपरीत, यदि हमारे कर्म बुरे (खोटे) हैं, तो केवल मंदिर में बैठकर माला फेरने या भजन गाने से कोई लाभ नहीं होने वाला।

भजनकार एक सुंदर उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यदि कोई रोगी दवा तो खा रहा है लेकिन परहेज नहीं कर रहा, तो वह कभी स्वस्थ नहीं हो सकता। ठीक उसी प्रकार, यदि हम जीवन में नैतिक मूल्यों का पालन नहीं कर रहे और केवल दिखावे की भक्ति कर रहे हैं, तो हमारा आध्यात्मिक कल्याण असंभव है। यह भजन हमें भौतिक संचय की व्यर्थता भी सिखाता है। हम इस संसार में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही चले जाएंगे; ऐसे में करोड़ों की संपत्ति का अहंकार करना व्यर्थ है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल एक संगीतमय रचना नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक व्यावहारिक नियमावली है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • कर्म की प्रधानता: यह भजन भाग्यवादी होने के बजाय कर्मठ होने का संदेश देता है। यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर भी उन्हीं की मदद करता है जो सत्कर्म करते हैं।
  • चेतावनी और जागृति: इसे 'चेतावनी भजन' कहा जाता है क्योंकि यह सोई हुई मानवीय चेतना को जगाता है और उसे समय रहते सही मार्ग पर आने की प्रेरणा देता है।
  • व्यावहारिक उदाहरण: भजन में 'दवा और परहेज', 'चिड़ियों द्वारा खेत चुगना' और 'समय की ठोकर' जैसे अत्यंत सरल और दैनिक जीवन से जुड़े उदाहरणों का उपयोग किया गया है, जो सीधे हृदय को छूते हैं।
  • अहंकार का नाश: यह मनुष्य को उसकी नश्वरता की याद दिलाकर उसके भीतर छिपे धन, पद और प्रतिष्ठा के अहंकार को शांत करता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

चूंकि यह एक निर्गुण और वैराग्य प्रधान भजन है, इसलिए इसके गायन और श्रवण के लिए कुछ विशेष परिस्थितियां और समय अत्यंत अनुकूल माने जाते हैं:

  • प्रातः काल का समय: सुबह के समय शांत वातावरण में इस भजन को सुनने से मन में सकारात्मक विचार आते हैं और दिनभर सत्कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।
  • सत्संग और संध्या प्रार्थना: सामूहिक सत्संगों में इस भजन का गायन आत्म-निरीक्षण के लिए बहुत उपयोगी होता है।
  • मन की अशांति के समय: जब मनुष्य जीवन में निराश हो या मार्ग से भटक रहा हो, तब यह भजन उसे सही दिशा दिखाने वाले मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।
  • गायन की विधि: इसे अत्यंत शांत, गंभीर और चिंतनशील मुद्रा में गाया जाना चाहिए। इसमें वाद्य यंत्रों का कोलाहल कम और शब्दों की स्पष्टता अधिक होनी चाहिए ताकि भाव सीधे हृदय तक पहुंचे।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन किसी सगुण साकार रूप (जैसे राम, कृष्ण या शिव) की आराधना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह 'निर्गुण निराकार' ब्रह्म और सार्वभौमिक सत्य को समर्पित है। हालांकि, इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि संत कबीरदास जी, संत रैदास और गुरु नानक देव जी जैसे महान संतों की वाणी से मेल खाती है। इन संतों ने हमेशा बाह्य आडंबरों का विरोध किया और आंतरिक शुद्धि तथा कर्म की पवित्रता पर बल दिया। इस भजन में भी उसी कबीरपंथी दर्शन की झलक मिलती है जो कहता है कि "मन ना रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा"।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

आधुनिक समय में इस भजन को सुप्रसिद्ध गायक प्रशांत सूर्यवंशी ने अपनी मधुर और गंभीर आवाज में गाकर जन-जन तक पहुंचाया है। इसका संगीत सूरज सिंह और नीतीश डाबला द्वारा तैयार किया गया है। यह भजन 'युकी' (Yuki) लेबल के अंतर्गत जारी किया गया था। हालांकि इसके मूल विचार सदियों पुरानी लोक-चेतावनी परंपरा से प्रेरित हैं, लेकिन आधुनिक संगीत और सरल भाषा के संयोजन ने इसे युवाओं और बुजुर्गों दोनों के बीच समान रूप से लोकप्रिय बना दिया है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और व्यावहारिक खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें लोकभाषा के शब्दों का सहज समावेश है। इसकी काव्य शैली 'उपदेशात्मक' और 'संवादात्मक' है। इसमें रूपक (Metaphor) और दृष्टांत (Illustration) अलंकारों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया गया है। उदाहरण के लिए, "लिया चुग खेत चिड़ियों ने तो पछताने से क्या होगा" में एक प्रसिद्ध लोकोक्ति का उपयोग करके समय के महत्व को दर्शाया गया है। इसकी लयबद्धता और सरल तुकबंदी इसे आसानी से याद होने योग्य बनाती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण जीवन सीख देता है:

  1. पुरुषार्थ बनाम प्रारब्ध: केवल भाग्य (मुकद्दर) के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने से कुछ हासिल नहीं होता। मनुष्य को अपनी पूरी शक्ति से प्रयास करना चाहिए।
  2. समय का मूल्य: बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। इसलिए, जीवन के अमूल्य क्षणों को व्यर्थ के विवादों या आलस्य में नहीं गंवाना चाहिए।
  3. आंतरिक अनुशासन: जैसे बिना परहेज के दवा बेअसर होती है, वैसे ही बिना यम-नियम और सदाचार के की गई पूजा-अर्चना निष्फल होती है।
  4. समर्पण और संतोष: यह समझना कि हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जाएंगे, हमें अनावश्यक लालच और संग्रह वृत्ति से बचाता है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
करम (कर्म) कार्य, आचरण, कृत्य मनुष्य द्वारा किए जाने वाले शारीरिक और मानसिक कार्य जो उसका भाग्य तय करते हैं।
खोटे बुरे, दूषित, अनैतिक ऐसे कर्म जो दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं और आत्मा को मलिन करते हैं।
परहेज़ बचाव, अनुशासन, संयम बुराइयों और विकारों (काम, क्रोध, लोभ) से दूरी बनाए रखना।
पथिक यात्री, राही संसार रूपी मार्ग पर यात्रा कर रहा जीवात्मा।
मुकद्दर भाग्य, प्रारब्ध पूर्व संचित कर्मों का फल, जिस पर मनुष्य पूरी तरह निर्भर हो जाता है।
हरगिज़ कभी भी, किसी भी स्थिति में अटल सत्य या अनिवार्यता को दर्शाने के लिए प्रयुक्त शब्द।

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

1. "इंसान इंसान को क्या देता है, करम तेरे अच्छे हो तो वो बिन मांगे सब देता है।"
कोई भी मनुष्य किसी दूसरे की नियति नहीं बदल सकता। यदि आपके कर्म पवित्र और परोपकारी हैं, तो वह परमपिता परमेश्वर आपकी पात्रता देखकर बिना मांगे ही आपको सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।

2. "करम खोटे तो ईश्वर का भजन करने से क्या होगा, किया परहेज़ ना कुछ भी दवा खाने से क्या होगा।"
यदि आपका आचरण भ्रष्ट है और आप दूसरों का दिल दुखाते हैं, तो मंदिर में बैठकर की जाने वाली प्रार्थना व्यर्थ है। यह वैसा ही है जैसे कोई गंभीर रोगी दवा तो ले रहा हो, लेकिन उन चीजों का सेवन जारी रखे जो उसकी बीमारी को बढ़ाती हैं।

3. "तू खाली हाथ आया है व खाली हाथ जाएगा, पथिक मालिक करोडो का ये कहलाने से क्या होगा।"
संसार में मनुष्य का जन्म रिक्त हस्त होता है और मृत्यु के बाद भी वह कुछ साथ नहीं ले जा सकता। इस जीवन रूपी यात्रा में स्वयं को करोड़ों की संपत्ति का स्वामी मानना केवल एक भ्रम और अहंकार है।

4. "समय पर एक ही ठोकर बदल देती है जीवन को, जो ठोकर से भी ना समझे तो समझाने से क्या होगा।"
कभी-कभी जीवन में मिलने वाला एक बड़ा झटका या असफलता मनुष्य की आंखें खोल देती है और उसे सही मार्ग पर ले आती है। लेकिन जो व्यक्ति बार-बार गलतियां करने और कष्ट भोगने के बाद भी नहीं सुधरता, उसे कोई भी उपदेश नहीं सुधार सकता।

5. "समय बीता हुआ हरगिज़ कभी ना हाथ आएगा, लिया चुग खेत चिड़ियों ने तो पछताने से क्या होगा।"
समय की गति अपरिवर्तनीय है। एक बार जब अवसर हाथ से निकल जाता है, तो केवल पश्चाताप ही शेष रहता है। जब फसल नष्ट हो चुकी हो, तब रखवाली करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

6. "मुसीबत तो टले हरगिज़ सदा हिम्मत ही रखने से, मुकद्दर पर भरोसा कर के सो जाने से क्या होगा।"
जीवन की कठिनाइयों का सामना केवल साहस, धैर्य और पुरुषार्थ से ही किया जा सकता है। भाग्य के भरोसे निष्क्रिय होकर बैठ जाने से संकट कभी दूर नहीं होते।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन का मूल संदेश श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के सुप्रसिद्ध श्लोक से अत्यंत मेल खाता है, जहां भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने का उपदेश देते हैं:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थात: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फलों पर कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मों के फल के प्रति आसक्त मत हो और न ही अकर्मण्यता (कर्म न करने) के प्रति तुम्हारा झुकाव हो।

इसके साथ ही, आध्यात्मिक अंधकार को दूर करने और सत्कर्मों की ओर बढ़ने के लिए हम सूर्य गायत्री मंत्र का स्मरण कर सकते हैं, जो बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करता है:

ॐ आदित्याय विद्महे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्॥

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम भजन करने से क्या होगा (Bhajan Karne Se Kya Hoga)
गायक (Singer) प्रशांत सूर्यवंशी (Prashant Suryavanshi)
संगीत (Music) सूरज सिंह एवं नीतीश डाबला (Suraj Singh & Nitish Dabla)
शैली (Genre) निर्गुण चेतावनी भजन (Nirgun Chetawani Bhajan)
मुख्य विषय (Theme) कर्म की प्रधानता, समय का महत्व, वैराग्य
भाषा (Language) सरल हिंदी (खड़ी बोली)
उपयुक्त अवसर सत्संग, प्रातःकालीन प्रार्थना, आत्म-चिंतन का समय

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह एक 'निर्गुण चेतावनी भजन' (Chetawani Bhajan) है। यह मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से जगाने, समय के महत्व को समझाने और सत्कर्म करने की प्रेरणा देने के लिए गाया जाता है।

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि बाहरी आडंबर और दिखावे की भक्ति तब तक व्यर्थ है जब तक मनुष्य के कर्म शुद्ध नहीं होते। कर्मों की पवित्रता ही सच्ची ईश्वर भक्ति है।

इसका अर्थ है कि जैसे बिना परहेज के दवा बीमारी ठीक नहीं कर सकती, वैसे ही बिना नैतिक आचरण, संयम और सदाचार के की गई पूजा-अर्चना या भजन-कीर्तन आत्मा का उद्धार नहीं कर सकते।

नहीं, यह भजन किसी विशिष्ट साकार देवी-देवता को समर्पित न होकर निराकार ईश्वर, कर्म सिद्धांत और जीवन के सार्वभौमिक सत्यों पर आधारित है।

इस भजन को सुप्रसिद्ध भजन गायक प्रशांत सूर्यवंशी (Prashant Suryavanshi) ने गाया है, और इसके संगीतकार सूरज सिंह व नीतीश डाबला हैं।

यह एक प्रसिद्ध कहावत है जिसका अर्थ है कि समय रहते यदि हम सही कदम नहीं उठाते और अवसर हाथ से निकल जाता है, तो बाद में केवल पछताने से कोई लाभ नहीं होता।

इसे प्रातःकाल या संध्याकाल के समय शांत मन से सुनना चाहिए। यह मानसिक शांति प्रदान करने और आत्म-मंथन करने में अत्यंत सहायक है।

हाँ, इस भजन की वैचारिक पृष्ठभूमि पूरी तरह से संत कबीरदास जी के निर्गुण और व्यावहारिक दर्शन से प्रेरित है, जो बाह्य आडंबरों के स्थान पर आंतरिक पवित्रता पर बल देते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत आता है। इस भजन की समीक्षा करते हुए हमारे विद्वान संपादकों ने पाया कि यह रचना आधुनिक समाज में बढ़ रहे भौतिकतावाद और नैतिक पतन के बीच मनुष्य को सही मार्ग दिखाने का एक सशक्त माध्यम है। भजन के बोल अत्यंत सरल होते हुए भी अत्यंत गंभीर दार्शनिक सत्यों को समेटे हुए हैं। यह लेख पाठकों को प्रामाणिक और त्रुटिहीन जानकारी प्रदान करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2, कर्मयोग संदेश)
  • संत कबीर ग्रंथावली (निर्गुण काव्य परंपरा)
  • पारंपरिक चेतावनी भजन संग्रह एवं लोक संगीत संकलन

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 03 Nov 2026

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