छठ के व्रतीया (Chhath Ke Vratiya) - किरण सिंह का पावन लोकगीत एवं छठी मईया की महिमा
छठ पर्व सनातन संस्कृति, लोक आस्था, प्रकृति पूजा और सूर्य उपासना का महाकुंभ है, जो मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस पावन पर्व का मूल आधार आत्मीय शुचिता, कठोर व्रत विधान और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता है। लोक गायिका किरण सिंह द्वारा स्वरबद्ध और तरंद म्यूजिक के बैनर तले प्रस्तुत भजन एवं लोकगीत "छठ के व्रतीया (Chhath Ke Vratiya)" इस महाव्रत की कठिन साधना, व्रतियों के अटूट विश्वास और छठी मईया के प्रति अगाध प्रेम का अत्यंत जीवंत एवं हृदयस्पर्शी चित्रण करता है। राहुल मतलबी द्वारा रचित इसके शब्द और सिंटू कुमार का संगीत श्रोताओं को पूरी तरह से भक्ति रस में डुबो देते हैं। यह गीत केवल एक संगीत रचना नहीं है, बल्कि यह सूर्य देव (भास्कर) और षष्ठी माता की आराधना का वह पवित्र मंत्र है जो हर घर के आंगन में लोक-संस्कृति की खुशबू बिखेर देता है। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम इस पावन गीत के बोल, उसका गूढ़ अर्थ, छठ पर्व की महत्ता, कथा और इसके आध्यात्मिक पक्षों का गहराई से अध्ययन करेंगे।
सम्पूर्ण गीत के बोल | Complete Chhath Puja Geet Lyrics
गीत विवरण: गायक - किरण सिंह | गीतकार - राहुल मतलबी | संगीत - सिंटू कुमार | बैनर - तरंग म्यूजिक
जगमग-जगमग करे दियना, छठ के व्रतीया जगमग करे...
घाटे उमड़ल बा भीड़ भारी, दर्शन देतु न छठी मईया हमारी!
काँचहीं बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाव...
सूयो देव के अरघ देनि, मनवा हरषाव!
उगहू सूरज देव भइले अरघ के बेर,
दर्शन दीहिं हे दीनानाथ, लागल बाटे ढेर फेर।
केकरा के अरघ देब, केकरा के धरिअवा?
छठ मैया के बरतिया, जगमग कइले सगरो नगरिया!
नहाय-खाय से शुरू होला पावन यह त्योहार,
खरना के परसाद खाके झूमे पूरा संसार!
डूबते सूरज को पहला अरघ जब हम देइछ,
जीवन के अंधेरा मिटा के नया उजियार लेइछ।
घाट सजले बा सुंदर, कोसी भराइल बा भारी,
दउरा उठवले बानी माथे पर खड़ी नर-नारी!
किरण सिंह के सुरवा में गूंजे छठी माई के गान,
भक्ति भाव में डूबी जात बाटे सारा जहान!
जय छठी मईया! जय हो दीनानाथ!
सबकी मनोकामना पूर्ण करें सूर्य भगवान!
गीत का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Song Meaning & Bhavarth
किरण सिंह द्वारा गाया गया यह गीत छठ पर्व के विभिन्न चरणों, जैसे कि घाट की सजावट, बहंगी उठाना, खरना, नहाय-खाय और सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा का बहुत ही सुंदर वर्णन करता है। गीत के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि कैसे एक व्रती महिला या पुरुष पूरे वर्ष इस कठिन व्रत की प्रतीक्षा करता है।
गीत की पंक्तियाँ "जगमग-जगमग करे दियना, छठ के व्रतीया जगमग करे..." इस बात का प्रतीक हैं कि छठ पूजा के दौरान नदी के घाटों और घरों में जलाए जाने वाले मिट्टी के दीये संपूर्ण वातावरण को आलोकित और पवित्र कर देते हैं। व्रतियों की भीड़ और उनकी आंखों में छठी मईया के दर्शन की जो ललक होती है, वह इस लोकगीत के भावों में स्पष्ट झलकता है। 'काँचहीं बाँस के बहंगिया' का संदर्भ बांस से बनी उस पवित्र पिटारी से है जिसमें ठेकुआ, फल और पूजन सामग्री रखकर घाट तक ले जाया जाता है। यह प्रकृति के सबसे करीब रहने वाले जीवन मूल्यों को दर्शाता है।
आगे गीत में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के विधान का वर्णन है। सनातन धर्म में केवल उगते सूर्य की नहीं, बल्कि अचल सत्य के प्रतीक डूबते सूर्य की भी वंदना की जाती है—यही छठ पर्व का सबसे अनूठा दार्शनिक संदेश है। इस गीत को सुनकर हर उस प्रवासी के हृदय में अपनी माटी और लोकसंस्कृति की यादें ताजा हो जाती हैं जो अपने घर से दूर रहकर भी इस महापर्व को श्रद्धा से मनाते हैं।
गीत की मुख्य भावना एवं संदेश | Theme, Emotion & Message
इस भक्ति गीत की मुख्य भावना पवित्रता, समर्पण, कृतज्ञता और अटूट आस्था है। छठ महापर्व अहंकार को त्यागकर पूर्णतः प्रकृति और परम शक्ति के प्रति समर्पित होने का पर्व है। इस गीत का संदेश यह है कि जब मनुष्य अपने सभी भौतिक बंधनों को छोड़कर पूरी निष्ठा से प्रकृति (सूर्य और जल) की आराधना करता है, तो उसके जीवन के समस्त अंधकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
गीत की जानकारी | Song Information Table
| गीत का नाम | छठ के व्रतीया (Chhath Ke Vratiya) |
|---|---|
| गायिका | किरण सिंह (Kiran Singh) |
| गीतकार | राहुल मतलबी (Rahul Matalbi) |
| संगीतकार | सिंटू कुमार (Sintu Kumar) |
| श्रेणी / विधा | छठ पूजा गीत / लोकगीत / भक्ति गीत |
| संगीत लेबिल | तरंग म्यूजिक (Tarang Music) |
| भाषा | भोजपुरी / हिंदी लोकभाषा |
गीत के रचनाकार एवं कलाकार | Artists & Creators
लोक संगीत की परंपरा को जीवित रखने में कलाकारों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। गायिका किरण सिंह ने अपनी सुरीली और भावपूर्ण आवाज से इस गीत में प्राण फूंक दिए हैं। उनके गले की मिठास और ठेठ भोजपुरी लोक लहजा श्रोताओं के रोंगटे खड़े कर देता है। वहीं, राहुल मतलबी के लिखे शब्द छठ पर्व की हर एक रस्म को जीवंत कर देते हैं। तरंग स्टूडियो पटना के माध्यम से इस गीत को जो ऑडियो-विजुअल रूप मिला, उसने इसे घर-घर तक पहुँचाया। ऐसे सांस्कृतिक गीतों के माध्यम से हमारी प्राचीन परंपराएं आज की युवा पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंच रही हैं।
कठिन शब्दों के अर्थ | Difficult Word Meanings
| शब्द / पद | सरल हिंदी अर्थ | सांस्कृतिक संदर्भ |
|---|---|---|
| व्रतीया | व्रत करने वाली महिला या पुरुष (व्रती) | छठ का कठिन 36 घंटे का उपवास रखने वाले साधक |
| बहंगिया | बांस की बनी टोकरी जो कंधे पर रखकर ले जाई जाती है | पूजा सामग्री ढोने का पारंपरिक साधन |
| अरघ | अर्घ्य (सूर्य देव को जल और दूध अर्पित करना) | छठ पूजा का मुख्य अनुष्ठान |
| कोसी भराइल | कोसी भरना (गन्ने का मंडप बनाकर दीप जलाना) | छठ व्रत की समाप्ति पर छठी मईया को धन्यवाद देने की रस्म |
| दउरा | बांस की बड़ी टोकरी | फल, ठेकुआ और पूजन सामग्री रखने का पात्र |
गीत का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व | Spiritual & Cultural Significance
छठ पूजा केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा की शुद्धि का एक अनुष्ठान है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जो प्रकृति हमें जीवन देती है, उसका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। किरण सिंह का यह गीत हमें उसी सांस्कृतिक चेतना से जोड़ता है। जब संध्या बेला में घाटों पर इस तरह के गीत गूंजते हैं, तो पूरा वातावरण दिव्यता से भर जाता है। यह लोकगीत समाज में भाईचारा, सामूहिक सहभागिता और नारी शक्ति (व्रती माताओं के त्याग) को नमन करता है।
गीत से मिलने वाली जीवन सीख | Life Lessons
- कठोर अनुशासन: छठ व्रत का अनुशासन जीवन में संयम और नियम का पाठ पढ़ाता है।
- प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: सूर्य और जल के बिना जीवन असंभव है; उनके प्रति आभार प्रकट करना हमारी संस्कृति है।
- सामूहिक सद्भाव: जाति और वर्ग के भेदों से ऊपर उठकर सभी लोग एक ही घाट पर एक साथ पूजा करते हैं।
- माता के प्रति समर्पण: माताओं का अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए किया गया त्याग व तपस्या वंदनीय है।
- सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव: आधुनिकता की दौड़ में भी अपनी लोक संस्कृति और भाषाओं को नहीं भूलना चाहिए।
गीत सुनने का अवसर एवं परंपरा | When to Listen / Sing
यह गीत विशेष रूप से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक मनाए जाने वाले छठ महापर्व के दौरान सुना जाता है। इसके अलावा, जब भी सूर्योपासना, किसी पारिवारिक अनुष्ठान या लोक संगीत के सम्मेलनों का आयोजन होता है, तब किरण सिंह के इस गीत को विशेष रूप से बजाया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और धार्मिक आस्था के समन्वय को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत गीत के बोल, उसका भावार्थ और छठ पर्व की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पूरी तरह प्रामाणिक और लोक परंपराओं पर आधारित हैं। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि पाठकों को भक्ति भाव के साथ-साथ सांस्कृतिक ज्ञान भी प्राप्त हो।
स्रोत एवं संदर्भ
- पारंपरिक लोकगीत संग्रह एवं भोजपुरी संगीत परंपरा
- तरंग म्यूजिक ऑफिशियल रिलीज आर्काइव
- सूर्य पुराण एवं षष्ठी व्रत कथा परंपरा
- भारतीय लोक संस्कृति एवं पर्व विधान शोध ग्रंथ
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