पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री तारापीठ, बीरभूम (पश्चिम बंगाल)

19 दर्शनार्थी
तारापीठ, पश्चिम बंगाल
प्रकाशित: 26 Oct 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
माँ उग्र तारा
दर्शन समय सारिणी
प्रातः 05:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक (दोपहर में मंदिर के कपाट बंद रहते हैं)
नित्य आरती समय
प्रातः मंगला आरती: 05:30 AM | भोग आरती: 01:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM | शयन आरती: 09:30 PM
स्थान / नगर
तारापीठ, पश्चिम बंगाल
आराध्य देव
माँ उग्र तारा
दर्शन समय
प्रातः 05:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक (दोपहर में मंदिर के कपाट बंद रहते हैं)
आरती समय
प्रातः मंगला आरती: 05:30 AM | भोग आरती: 01:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM | शयन आरती: 09:30 PM
स्थान / धाम
श्री तारापीठ मंदिर, ग्राम व पोस्ट- तारापीठ, थाना- रामपुरहाट, जिला- बीरभूम, पश्चिम बंगाल, पिन- 731233
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श्री तारापीठ मंदिर: एक परिचय

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के शांत और आध्यात्मिक परिवेश में स्थित श्री तारापीठ मंदिर सनातन धर्म के सबसे शक्तिशाली और रहस्मयी शक्तिपीठों में शुमार है। पवित्र द्वारका नदी के तट पर स्थित यह पावन स्थल देवी सती के अंगों के गिरने से बने 51 शक्तिपीठों में से एक होने के साथ-साथ महान तांत्रिक संत बामाखेपा (Bamakhepa) की अमर साधना स्थली के रूप में भी विश्वविख्यात है। यहाँ माँ भगवती 'उग्र तारा' के रूप में विराजमान हैं, जो अपने भक्तों के सभी दुखों, बंधनों और अकाल मृत्यु के भय का नाश करती हैं।

पौराणिक कथा एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Sthapana & Puranic References)

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव ने माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर उठाकर तांडव किया था, तब ब्रह्मांड को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को काटा था। इस क्रम में माता सती का 'नयन' (नेत्र) इस स्थान पर गिरा था। इसी कारण इस पावन क्षेत्र को 'नयन पीठ' या तारापीठ के नाम से जाना गया।

एक अन्य प्राचीन कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के समय जब कालकूट विष निकला था, तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को पी लिया था। विष के प्रचंड प्रभाव से शिवजी अचेत होने लगे थे। तब जगत कल्याण के लिए माँ आदिशक्ति ने ममतामयी माता का रूप धारण कर भगवान शिव को अपनी गोद में लिटाया और उन्हें अपने स्तन से स्तनपान कराया, जिससे शिवजी उस विष के प्रभाव से मुक्त हुए। माँ का यही वात्सल्यमय और ममता से परिपूर्ण रूप 'तारा' के रूप में यहाँ पूजित होता है। महर्षि वशिष्ठ ने भी इसी भूमि पर माँ तारा की कठोर साधना कर सिद्धि प्राप्त की थी।

महासाधक बामाखेपा और तारापीठ की महिमा

उन्नीसवीं शताब्दी में तारापीठ की ख्याति को शिखर पर पहुँचाने वाले महान संत श्री बामा चरण चट्टोपाध्याय, जिन्हें दुनिया 'बामाखेपा' के नाम से जानती है, इसी पावन भूमि से जुड़े थे। बामाखेपा ने श्मशान घाट में बैठकर माँ तारा की अनन्य साधना की थी। माँ तारा उन्हें अपनी पुत्री के समान प्रेम करती थीं और कई बार उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देती थीं। आज भी तारापीठ का श्मशान क्षेत्र और बामाखेपा का आश्रम भक्तों के लिए किसी जीवित तीर्थ से कम नहीं है।

वास्तुशिल्प एवं गर्भगृह (Architectural Splendor & Sanctum Sanctorum)

तारापीठ मंदिर की वास्तुकला बंगाल की पारंपरिक चार-चाला और आट-चाला शैली का सुंदर मिश्रण है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर टेराकोटा (पकी हुई मिट्टी) की सुंदर नक्काशी उकेरी गई है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं के दृश्यों को दर्शाती है।

गर्भगृह का स्वरूप:
गर्भगृह में माँ तारा की दो मूर्तियां एक साथ स्थापित हैं। मुख्य मूर्ति प्रस्तर की है जिसमें माँ उग्र तारा भगवान शिव की छाती पर लेटी हुई उन्हें स्तनपान करा रही हैं। इस रूप को 'सौम्य और वात्सल्य का उग्र प्रतीक' माना जाता है। गर्भगृह के ठीक सामने सोने के मुकुट और चांदी के आभूषणों से सुसज्जित माँ का दूसरा चल विग्रह (उत्सव मूर्ति) स्थापित है, जिसके दर्शन प्रतिदिन श्रद्धालुओं को कराए जाते हैं।

दैनिक अनुष्ठान एवं दर्शन समय (Timings & Ritual Schedule)

तारापीठ मंदिर में प्रतिदिन सुबह से लेकर रात तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और आरतियाँ संपन्न होती हैं:

अनुष्ठान / सेवासमय (प्रातः / सायं)विशेष विवरण
मंदिर के कपाट खुलना व मंगला आरतीप्रातः 05:00 AM - 05:30 AMप्रभात दर्शन की शुरुआत
सामान्य दर्शन प्रारंभप्रातः 06:00 AM - दोपहर 12:00 PMश्रद्धालु कतारबद्ध होकर दर्शन करते हैं
भोग आरती एवं मध्याह्न विश्रामदोपहर 12:00 PM - 03:30 PMमाँ को महाभोग अर्पण, मंदिर के कपाट बंद
संध्या आरती व श्रृंगारसायं 06:30 PM - रात्रि 09:00 PMभव्य श्रृंगार एवं संध्या पूजन
शयन आरती व कपाट बंदरात्रि 09:30 PM - 10:00 PMरात्रि विश्राम से पूर्व अंतिम आरती

प्रमुख उत्सव एवं मेले (Major Festivals)

  • श्यामा पूजा (काली पूजा): दीपावली के अवसर पर यहाँ भव्य मेले का आयोजन होता है और लाखों की संख्या में भक्त पहुँचते हैं।
  • कोजागरी पूर्णिमा (लक्ष्मी पूजा): इस दिन माँ तारा का विशेष स्वर्ण श्रृंगार किया जाता है।
  • बामाखेपा तिरोभाव तिथि: हर साल माघ महीने में बामाखेपा की पुण्यतिथि पर यहाँ विशाल उत्सव मनाया जाता है।
  • महाशिवरात्रि और नवरात्रि: इन दिनों में विशेष तांत्रिक अनुष्ठान, हवन और रुद्राभिषेक होते हैं।

कैसे पहुँचें श्री तारापीठ? (Complete Travel Guide)

वायु मार्ग (By Air): निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, कोलकाता है, जो तारापीठ से लगभग 270 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ से टैक्सी या बस द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।

रेल मार्ग (By Rail): तारापीठ का अपना रेलवे स्टेशन है जिसका नाम 'तारापीठ रोड' (Tarapith Road - TPF) है, जो हावड़ा-साहिबगंज लूप लाइन पर स्थित है। इसके अलावा, मुख्य जंक्शन रामपुरहाट (Rampurhat - RPH) यहाँ से मात्र 7 किमी दूर है, जहाँ देश के प्रमुख शहरों (कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, पटना) से सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं।

सड़क मार्ग (By Road): राष्ट्रीय राजमार्ग 12 (NH 12) और NH 14 के माध्यम से यह पश्चिम बंगाल के सभी प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग द्वारा अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। कोलकाता, दुर्गापुर, और आसनसोल से नियमित सरकारी और निजी बसें उपलब्ध हैं।

आवास एवं तीर्थ यात्री सुविधाएं (Accommodation & Facilities)

तारापीठ में श्रद्धालुओं के ठहरنے के लिए उच्च कोटि की व्यवस्था है:

  • धर्मशाला और गेस्ट हाउस: पश्चिम बंगाल पर्यटन विकास निगम (WBTDCL) का टूरिस्ट लॉज और कई निजी धर्मशालाएं एवं डीलक्स होटल किफायती दरों पर उपलब्ध हैं।
  • अन्नक्षेत्र (महाप्रसाद): मंदिर समिति और विभिन्न मठों द्वारा प्रतिदिन श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क और किफायती महाप्रसाद की व्यवस्था की जाती है।
  • अन्य सुविधाएं: लॉकर रूम, जूता स्टैंड, और पूजा सामग्री की दुकाने मंदिर परिसर के आसपास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।

महत्वपूर्ण निर्देश एवं नियम (Guidelines for Pilgrims)

मंदिर परिसर में प्रवेश करते समय शालीन वस्त्र पहनें। गर्भगृह के अंदर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी सख्त वर्जित है। श्मशान घाट क्षेत्र में शांति और पवित्रता बनाए रखें। स्थानीय पंडा या पुजारियों के माध्यम से विधिवत पूजा अर्चना करने के लिए पूर्व में ही दक्षिणा तय कर लें।

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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