श्री ज्ञान सरस्वती मंदिर, बासर: विद्या, संस्कृति और अध्यात्म का अद्वितीय संगम
भारत भूमि पर अनगिनत दिव्य तीर्थस्थल हैं, जो हमारी सनातन संस्कृति के गौरवशाली इतिहास को जीवंत करते हैं। दक्षिण भारत के तेलंगाना राज्य के निर्मल जिले में पवित्र गोदावरी नदी के तट पर स्थित श्री ज्ञान सरस्वती मंदिर (Sri Gyana Saraswati Temple, Basar) उन्हीं अत्यंत विशिष्ट और चमत्कारी तीर्थों में से एक है। यह देश के उन अत्यंत दुर्लभ और प्राचीन मंदिरों में शुमार है जहाँ माता सरस्वती अपने मूल स्वरूप में विराजमान हैं। विशेष रूप से बच्चों के औपचारिक शिक्षा आरंभ करने के संस्कार यानी 'अक्षरभ्यास' (Aksharabhyasam) के लिए यह संपूर्ण विश्व के भक्तों का प्रमुख केंद्र है। यहाँ आने वाले प्रत्येक साधक, विद्यार्थी और अभिभावक को माँ वाग्देवी की असीम कृपा की अनुभूति होती है।
पौराणिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: महर्षि व्यास और बासर की पावन कथा
इस पवित्र तीर्थ के इतिहास की जड़े सीधे महाभारत काल और वैदिक ऋषियों से जुड़ी हुई हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत के रचयिता महर्षि व्यास ने कुरुक्षेत्र के युद्ध और महाकाव्य की रचना के उपरांत मानसिक शांति और आध्यात्मिक साधना की खोज में विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा की थी। यात्रा करते-करते वे गोदावरी नदी के इस शांत, सुरम्य और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण तट पर पहुँचे।
महर्षि व्यास ने यहाँ डेरा डाला और माँ सरस्वती की कठोर तपस्या की। उनकी साधना से प्रसन्न होकर माता सरस्वती ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए। माँ के आदेशानुसार, महर्षि व्यास ने गोदावरी तट की पवित्र बालू (रेत) से माँ सरस्वती, माता लक्ष्मी और महाकाली की मूर्तियों का निर्माण किया और उनकी नियमित पूजा-अर्चना की। चूँकि महर्षि व्यास ने यहाँ बहुत समय तक वास किया और तपस्या की, इसलिए इस स्थान का मूल नाम 'व्यासरांध्र' या 'व्यासरूद्र' था, जो कालान्तर में प्राकृत और स्थानीय बोलियों के प्रभाव से अपभ्रंश होकर 'बासर' (Basar) बन गया।
एक अन्य ऐतिहासिक संदर्भ के अनुसार, बासर पर बाद में चालुक्य राजवंश और अन्य दक्षिण भारतीय राजाओं का शासन रहा, जिन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहाँ की वास्तुकला और मूर्तिकला इस बात की गवाही देती है कि सदियों से यह स्थान ज्ञान और मोक्ष का एक महान केंद्र रहा है।
दिव्य वास्तुकला एवं गर्भगृह (Sanctum Sanctorum)
बासर का श्री ज्ञान सरस्वती मंदिर अपनी विशिष्ट वास्तुकला शैली के लिए जाना जाता है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही एक शांत, दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा का अहसास होता है।
- गर्भगृह (Sanctum Sanctorum): गर्भगृह के भीतर माता सरस्वती की वह पावन प्रतिमा स्थापित है, जिसे महर्षि व्यास ने बालू से निर्मित किया था। बालू से बनी होने के कारण इस विग्रह का विशेष ध्यान रखा जाता है। माँ सरस्वती यहाँ श्वेत वस्त्रों और सुंदर आभूषणों से सुसज्जित होकर श्वेत कमल पर विराजमान हैं, जो ज्ञान, पवित्रता और चेतना का प्रतीक है।
- अन्य देव विग्रह: मुख्य गर्भगृह के पास ही माता महालक्ष्मी (धन और समृद्धि की देवी) और महाकाली (शक्ति की देवी) के विग्रह भी स्थापित हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में भगवान श्री कार्तिकेय (सुब्रह्मण्य स्वामी), भगवान शिव (व्यासेश्वर महादेव) और भगवान गणेश के मंदिर भी स्थित हैं, जो संपूर्ण परिवार को अध्यात्मिक पूर्णता प्रदान करते हैं।
- गोदावरी नदी का तट: मंदिर के ठीक पीछे पावन गोदावरी नदी प्रवाहित होती है। भक्तगण मंदिर में प्रवेश करने से पहले गोदावरी के पवित्र जल में स्नान करते हैं या आचमन कर स्वयं को शुद्ध करते हैं, जिसे शास्त्रों में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
दैनंदिन दर्शन, समय सारणी एवं आरती विधान
मंदिर के कपाट प्रातः काल से ही भक्तों के लिए खुल जाते हैं। दैनिक अनुष्ठान और दर्शन की समय सारणी इस प्रकार है:
| क्रम | अनुष्ठान / सेवा का नाम | निर्धारित समय |
|---|---|---|
| 1 | प्रातः मंगला दर्शन एवं द्वार खुला | प्रातः 04:00 बजे से |
| 2 | सुप्रभात सेवा एवं मंगला आरती | प्रातः 04:30 AM |
| 3 | महा अभिषेक एवं बालू विग्रह अर्चन | प्रातः 05:30 AM से 07:30 AM |
| 4 | अक्षरभ्यास संस्कार (सामूहिक/व्यक्तिगत) | प्रातः 08:00 AM से दोपहर 12:00 PM तक |
| 5 | राजभोग एवं दोपहर आरती | दोपहर 12:30 PM |
| 6 | पुनः दर्शन प्रारंभ | दोपहर 02:00 PM से सायं 06:00 PM तक |
| 7 | संध्या आरती एवं दीप प्रज्वलन | सायं 06:30 PM |
| 8 | शयन आरती एवं मंदिर बंद होने का समय | रात्रि 08:30 PM |
विशेष उत्सव और पर्व: वसंत पंचमी का महामेला
बासर मंदिर में वर्ष भर विभिन्न धार्मिक पर्व मनाए जाते हैं, किंतु कुछ विशेष उत्सवों पर यहाँ का वैभव देखते ही बनता है:
- वसंत पंचमी (Vasant Panchami): यह दिन माँ सरस्वती का प्राकट्य उत्सव माना जाता है। इस पावन अवसर पर मंदिर में लाखों की संख्या में श्रद्धालु देश-विदेश से आते हैं। वसंत पंचमी के दिन बच्चों के 'अक्षरभ्यास' के लिए विशेष व्यवस्था होती है और पूरा परिसर वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठता है।
- महाशिवरात्रि: व्यासेश्वर महादेव के सानिध्य में महाशिवरात्रि पर विशेष रुद्राभिषेक और रात्रि जागरण का आयोजन किया जाता है।
- देवी नवरात्र (शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि): नौ दिनों तक चलने वाले इन उत्सवों में माँ सरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली का विशेष श्रृंगार, शतचंडी यज्ञ और दैनिक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
अक्षरभ्यास संस्कार: बच्चों के भविष्य का स्वर्णिम आरंभ
बासर का नाम आते ही सबसे पहले 'अक्षरभ्यास' (विद्यारंभ संस्कार) का ध्यान आता है। हिंदू परंपरा में बच्चे की आयु जब लगभग दो से तीन वर्ष की हो जाती है, तब उसे शिक्षा के मार्ग पर अग्रसर करने के लिए यह संस्कार कराया जाता है। बासर में मान्यता है कि यदि कोई बच्चा वसंत पंचमी या किसी भी शुभ दिन पर माँ सरस्वती के चरणों में बैठकर अपना पहला अक्षर (सामान्यतः 'ॐ नमः शिवाय' या 'श्री गणेशाय नमः') लिखता है, तो वह बुद्धिमान, कुशाग्र और ज्ञानी बनता है। मंदिर परिसर में इसके लिए विशेष काउंटर हैं जहाँ तख्ती, खड़िया (चाक) और आवश्यक सामग्री न्यूनतम शुल्क पर उपलब्ध कराई जाती है।
संपूर्ण यात्रा गाइड: कैसे पहुँचें (How to Reach)
बासर तेलंगाना के उत्तरी भाग में स्थित है और सड़क तथा रेल मार्ग से बेहतरीन तरीके से जुड़ा हुआ है:
- वायु मार्ग (By Air): निकटतम अंतरराष्ट्रीय और घरेलू हवाई अड्डा हैदराबाद का राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (HYD) है, जो बासर से लगभग 210 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हवाई अड्डे से टैक्सी या बस के माध्यम से आसानी से बासर पहुँचा जा सकता है।
- रेल मार्ग (By Rail): बासर का अपना रेलवे स्टेशन (Basar Railway Station - BSX) है, जो सिकंदराबाद-मुदखेड़ रेल खंड के अंतर्गत आता है। यह स्टेशन हैदराबाद, निजामाबाद, नांदेड़ और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों से सीधी ट्रेनों द्वारा जुड़ा हुआ है।
- सड़क मार्ग (By Road): तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम (TSRTC) की बसें हैदराबाद, निजामाबाद, आदिलाबाद और निजामाबाद से नियमित रूप से बासर के लिए संचालित होती हैं। राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से निजी वाहनों से भी सुगमता से यात्रा की जा सकती है।
आवास, प्रसादम और यात्री सुविधाएं
भक्तों की सुविधा के लिए मंदिर देवस्थानम और स्थानीय प्रशासन द्वारा बेहतरीन प्रबंध किए गए हैं:
- आवास व्यवस्था (Accommodation): मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित विश्राम गृह (Dharamshala) और आधुनिक एसी/नॉन-एसी कमरे किफायती दरों पर उपलब्ध हैं। इसके अलावा बासर शहर में कई निजी होटल और लॉज भी मौजूद हैं।
- अन्नाप्रसादम (Annaprasadam): मंदिर परिसर के समीप नियमित रूप से निःशुल्क महाप्रसाद वितरण की व्यवस्था चलती है, जहाँ हजारों श्रद्धालु भोजन ग्रहण करते हैं।
- अन्य सुविधाएं: लॉकर रूम, जूता स्टैंड, पेयजल और दिव्यांगजनों के लिए व्हीलचेयर की सुविधा उपलब्ध है।
"या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना... सा पातु मां सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।"
पौराणिक पृष्ठभूमि एवं महर्षि व्यास की तपःस्थली: बासर का उद्गम इतिहास
दक्षिण भारत के तेलंगाना राज्य के निर्मल जिले में पवित्र गोदावरी नदी के तट पर स्थित श्री ज्ञान सरस्वती मंदिर, बासर भारत के अति-दुर्लभ एवं सर्वाधिक प्राचीन सरस्वती पीठों में से एक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत के भीषण धर्मयुद्ध के पश्चात महर्षि वेदव्यास जी अत्यधिक मानसिक अशांति और उद्वेग का अनुभव कर रहे थे। आत्मिक शांति और ज्ञान की पुनः प्रतिष्ठा हेतु वे महर्षि वाल्मीकि के निर्देश पर गोदावरी नदी के उत्तरी तट पर पहुँचे। यहाँ का शांत, सुरम्य और तपोमय वातावरण देखकर उन्होंने इसी स्थान पर कठोर तपस्या करने का संकल्प लिया।
तपस्या काल के दौरान महर्षि व्यास प्रतिदिन गोदावरी नदी से रेत (बालू) लाकर तीन विशेष स्थानों पर तीन मुट्ठी रेत अर्पित करते थे। अपनी योगशक्ति और मंत्रोच्चार के द्वारा उन्होंने उस मुट्ठी भर बालू से तीन पवित्र दिव्य मूर्तियों का निर्माण किया—माँ ज्ञान सरस्वती, माँ महालक्ष्मी और माँ महाकाली। क्योंकि महर्षि व्यास ने यहाँ निवास कर ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी को जाग्रत किया था, इसलिए इस स्थान का नाम प्रारंभ में 'व्यासपुरी' पड़ा। कालक्रम में अपभ्रंश होकर 'व्यासपुरी' से 'वासरा' और वर्तमान में यह 'बासर' (Basar) नाम से संपूर्ण विश्व में विख्यात हुआ।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो इस मंदिर का पुनर्निर्माण एवं संरक्षण चालुक्य राजवंश के राजाओं द्वारा कराया गया था। बाद में काकतिया नरेशों और निजाम काल में भी स्थानीय हिंदू श्रद्धालुओं ने इस धाम की पवित्रता को अक्षुण्ण रखा। मंदिर के गर्भगृह में विराजित माँ सरस्वती की मूर्ति बालू (रेत) से निर्मित होने के कारण अत्यंत संवेदनशील है, जिस पर निरंतर हल्दी (हरिद्रा) का लेप किया जाता है। हल्दी के इस दिव्य लेप का प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित होता है, जिसके प्राशन से वाक्-सिद्धि और बुद्धि में अद्भुत निखार आने की लोक-मान्यता है।
शास्त्रीय मान्यता: भारतवर्ष में मुख्य रूप से केवल दो ज्ञान सरस्वती मंदिर अत्यंत सिद्ध माने जाते हैं—पहला कश्मीरी शारदा पीठ (वर्तमान में पोक) और दूसरा तेलंगाना का बासर धाम। यहाँ त्रिदेवियों की उपस्थिति ज्ञान, धन और शक्ति का अद्भुत संतुलन प्रदान करती है।
अक्षरभ्यास (विद्यारंभ) संस्कार: विधि, नियम एवं धार्मिक महत्व
बासर धाम का मुख्य आकर्षण यहाँ प्रतिदिन आयोजित होने वाला 'अक्षरभ्यास' (Aksharabhyasam) अथवा 'विद्यारंभ संस्कार' है। सनातन हिंदू परंपरा में षोडश संस्कारों में से एक, विद्यारंभ संस्कार बच्चों की शिक्षा प्रारंभ करने से पूर्व कराया जाता है। बासर में अपने बच्चे का अक्षरभ्यास कराना माता-पिता परम सौभाग्य मानते हैं, क्योंकि स्वयं वेदमाता सरस्वती यहाँ महर्षि व्यास द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रतिष्ठित हैं।
अक्षरभ्यास संस्कार की पूरी प्रक्रिया अत्यंत वैज्ञानिक, आध्यात्मिक एवं विधि-विधान से परिपूर्ण होती है:
- गोदावरी स्नान एवं संकल्प: प्रातः काल बालक/बालिका को गोदावरी नदी के तट पर ले जाकर पवित्र स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात नए वस्त्र (पीले या श्वेत) पहनाकर मंडप में संकल्प लिया जाता है।
- पाटी (स्लेट) एवं चावल पूजन: पूजा मंडप में पीतल या लकड़ी की पाटी पर शुद्ध अक्षत (चावल) फैलाए जाते हैं। चावल समृद्धि और ज्ञान के विस्तार का प्रतीक हैं।
- अक्षर लेखन: पुजारी की देखरेख में पिता या गुरु बच्चे की उंगली पकड़कर चावल के दानों पर "ॐ", "श्री" तथा मातृभाषा के प्रथम अक्षर लिखवाते हैं।
- जिह्वा पर स्वर्ण/शहद से सरस्वती बीजाक्षर: बालक की जिह्वा पर शुद्ध शहद अथवा स्वर्ण की सलाई (Gold Ring/Needle) से 'ऐं' (AIM) बीजाक्षर लिखा जाता है, जिससे बच्चे में मधुर वाणी, प्रखर स्मरण शक्ति और एकाग्रता का विकास होता है।
अक्षरभ्यास हेतु आवश्यक निर्देश व अवस्था
सामान्यतः बालकों की आयु 2 से 5 वर्ष के मध्य होने पर बासर में अक्षरभ्यास कराया जाता है। बसंत पंचमी, विजयादशमी (नवरात्रि), श्रावण पूर्णिमा और व्यास पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) के दिन यहाँ हजारों की संख्या में परिवार अपने बच्चों का अक्षरभ्यास कराने आते हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा सामान्य एवं विशेष/शीघ्र दर्शन अक्षरभ्यास के टिकट काउंटर उपलब्ध कराए जाते हैं।
मंदिर स्थापत्य, दर्शन समय एवं नित्य आरती सारणी
बासर ज्ञान सरस्वती मंदिर की स्थापत्य शैली द्रविड़ और गुफा-स्थापत्य का सुंदर सम्मिश्रण है। मुख्य मंदिर परिसर के मध्य में गर्भगृह स्थित है जहाँ माँ ज्ञान सरस्वती की पद्मासन मुद्रा में दिव्य मूर्ति विराजित है। माँ के हाथों में वीणा और पुस्तक सुशोभित है। मुख्य गर्भगृह के ठीक ऊपर महाकाली देवी का मंदिर एक प्राकृतिक चट्टानी गुफा के रूप में बना हुआ है, जबकि महालक्ष्मी देवी का स्थान परिसर के निकट ही स्थित है।
मंदिर में नित्य पूजा-अर्चना का समय अत्यंत अनुशासित एवं शास्त्रोक्त है। श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु दर्शन एवं आरती सारणी नीचे दी गई है:
| पूजा / सेवा का नाम | समय (प्रातः / सायं) | विवरण व आध्यात्मिक महत्व |
|---|---|---|
| सुप्रभातम एवं मंदिर उद्घाटन | प्रातः 04:00 AM - 04:30 AM | माँ सरस्वती का प्रातःकालीन जागरण एवं शंखनाद। |
| अभिषेकम एवं निवेधना | प्रातः 04:30 AM - 07:30 AM | पंचामृत स्नान, हल्दी लेपन तथा विशेष वस्त्र श्रृंगार। |
| प्रातः दर्शन एवं अक्षरभ्यास प्रारंभ | प्रातः 07:30 AM - दोपहर 12:30 PM | सामान्य श्रद्धालुओं हेतु दर्शन एवं मुख्य अक्षरभ्यास मंडप सेवा। |
| महा नैवेद्यम (मध्याह्न भोग) | दोपहर 12:30 PM - 02:00 PM | माँ सरस्वती को अन्न भोग एवं पट बंद (अल्पविराम)। |
| अपराह्न दर्शन एवं सेवा | दोपहर 02:00 PM - सायं 06:30 PM | अक्षरभ्यास की द्वितीय पाली तथा दर्शन सेवा। |
| संध्या आरती एवं महा मंगल आरती | सायं 06:30 PM - रात्रि 08:30 PM | धूप-दीप दर्शन, वेद पाठ एवं दैनिक शयन आरती के बाद मंदिर समापन। |
बासर में मनाए जाने वाले प्रमुख उत्सव
यद्यपि बासर में वर्ष भर भक्तों का ताँता लगा रहता है, परंतु तीन प्रमुख पर्वों पर यहाँ का वैभव दर्शनीय होता है:
- बसंत पंचमी: यह माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस है। इस दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु गोदावरी स्नान कर बच्चों का अक्षरभ्यास कराते हैं। संपूर्ण मंदिर परिसर को पीले पुष्पों से सजाया जाता है।
- शारदीय नवरात्रि (दशहरा): नौ दिनों तक देवी के विभिन्न स्वरूपों की विशेष पूजा होती है। मूल नक्षत्र के दिन 'सरस्वती पूजा' का आयोजन अत्यंत भव्य रूप में किया जाता है।
- व्यास पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा): महर्षि वेदव्यास की तपोभूमि होने के कारण गुरु पूर्णिमा पर यहाँ विशेष व्यास पूजा और वेद पाठ का आयोजन होता है।
संपूर्ण बासर यात्रा गाइड: मार्ग, आवास एवं समीपवर्ती दर्शनीय स्थल
बासर धाम तेलंगाना के निर्मल जिले में महाराष्ट्र की सीमा के समीप स्थित है। यह सड़क और रेल मार्ग द्वारा भारत के प्रमुख शहरों से भली-भांति जुड़ा हुआ है।
कैसे पहुँचें बासर (Transportation Options)
रेल मार्ग द्वारा: बासर का अपना रेलवे स्टेशन 'बासर (BSX)' है, जो सिकंदराबाद-नांदेड़ रेल मार्ग पर स्थित है। हैदराबाद (सिकंदराबाद), नांदेड़, निजामाबाद और मुम्बई से बासर के लिए सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी मात्र 2 किलोमीटर है, जहाँ से ऑटो-रिक्शा आसानी से मिल जाते हैं।
सड़क मार्ग द्वारा: बासर हैदराबाद से लगभग 210 किमी, निजामाबाद से 35 किमी और निर्मल जिला मुख्यालय से 70 किमी दूर है। तेलंगाना राज्य परिवहन (TSRTC) की बसें हैदराबाद (MGBS व JBS), निजामाबाद और नांदेड़ से निरंतर उपलब्ध रहती हैं।
वायु मार्ग द्वारा: निकटतम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, हैदराबाद (HYD) है, जो बासर से लगभग 235 किमी दूर है। हवाई अड्डे से टैक्सी अथवा ट्रेन पकड़कर बासर पहुँचा जा सकता है।
आवास एवं भोजन व्यवस्था (Accommodation & Food)
बासर में श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए मंदिर न्यास (Basar Devasthanam) द्वारा संचालित अनेक विश्राम गृह, कॉटेज और धर्मशालाएँ उपलब्ध हैं, जिनकी बुकिंग ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों माध्यमों से की जा सकती है। इसके अतिरिक्त तेलंगाना पर्यटन का 'हरिता होटल' (Haritha Resort) तथा निजी होटल भी मध्यवर्ती बजट में उपलब्ध हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा प्रतिदिन दोपहर और रात्रि में श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क 'नित्य अन्नदानम' (प्रसादम) की उत्तम व्यवस्था की जाती है।
बासर के समीपवर्ती पवित्र एवं दर्शनीय स्थल
- व्यास गुफा (Vyasa Guha): मंदिर परिसर के निकट पहाड़ी पर स्थित वह ऐतिहासिक गुफा जहाँ महर्षि व्यास ने कठोर तपस्या की थी। यहाँ का प्रवेश द्वार संकरा है और अंदर शांत आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव होता है।
- गोदावरी स्नान घाट: बासर मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित पवित्र गोदावरी घाट जहाँ श्रद्धालु दर्शन से पूर्व स्नान करते हैं और पित्र तर्पण भी करते हैं।
- महाकाली मंदिर: मुख्य मंदिर के ऊपर स्थित गुफा मंदिर, जहाँ माँ काली की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है।
- निज़ामाबाद किला व कंठेश्वर मंदिर: बासर से 35 किमी दूर स्थित ऐतिहासिक किला और भगवान शिव का प्राचीन मंदिर जहाँ की वास्तुकला दर्शनीय है।
श्रद्धालुओं के लिए व्यावहारिक सुझाव: यदि आप अपने बच्चे का अक्षरभ्यास कराने आ रहे हैं, तो बसंत पंचमी या रविवार को अत्यधिक भीड़ रहती है। शांतिपूर्वक पूजा संपन्न कराने के लिए सामान्य कार्यदिवसों (Mon-Thu) का चयन करें। प्रातः 5:00 बजे गोदावरी स्नान के पश्चात प्रथम पाली में अक्षरभ्यास कराना सबसे उत्तम माना जाता है।