पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री वीराभद्र स्वामी मंदिर, लेपाक्षी, आंध्र प्रदेश: इतिहास, वीरभद्र अवतार, लटकते खंभे (Hanging Pillar) का रहस्य एवं संपूर्ण यात्रा गाइड | Shri Veerabhadra Swamy Temple Lepakshi: History, Mystery of Hanging Pillar & Travel Guide

203 दर्शनार्थी
लेपाक्षी, आंध्र प्रदेश
प्रकाशित: 28 Sep 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
भगवान वीरभद्र / भगवान शिव
दर्शन समय सारिणी
प्रातः ०५:०० AM से अपराह्न ०१:०० PM एवं संध्या ०४:०० PM से रात्रि ११:०० PM
नित्य आरती समय
मंगला आरती: ०५:०० AM | साकल धूप: १०:०० AM | मध्याह्न धूप: १२:३० PM | संध्या धूप: ०७:०० PM | बड़शृंगार शयन: ११:०० PM
स्थान / नगर
लेपाक्षी, आंध्र प्रदेश
आराध्य देव
भगवान वीरभद्र / भगवान शिव
दर्शन समय
प्रातः ०५:०० AM से अपराह्न ०१:०० PM एवं संध्या ०४:०० PM से रात्रि ११:०० PM
आरती समय
मंगला आरती: ०५:०० AM | साकल धूप: १०:०० AM | मध्याह्न धूप: १२:३० PM | संध्या धूप: ०७:०० PM | बड़शृंगार शयन: ११:०० PM
स्थान / धाम
लेपाक्षी, अनंतपुर जिला, आंध्र प्रदेश, 515331, भारत
अक्षर आकार:
पठन थीम:

१. श्री जगन्नाथ मंदिर (श्रीक्षेत्र पुरी): तीर्थ परिचय एवं आध्यात्मिक महत्व

भारतवर्ष के पूर्वी समुद्री तट पर ओडिशा राज्य के पावन पुरी नगर में बंगाल की खाड़ी (महोदधि) के सुरम्य तट पर स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर (Shri Jagannath Temple, Puri), जिसे सनातन धर्म में 'श्रीक्षेत्र', 'पुरुषोत्तम क्षेत्र', 'नीलांचल धाम' और 'शंख क्षेत्र' कहा जाता है, सनातन धर्म के चार परम पावन महाधामों (बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम) में साक्षात् दारुब्रह्म का महातीर्थ है।

स्कन्द पुराण के उत्कल खंड तथा ब्रह्म पुराण में श्रीक्षेत्र पुरी के आध्यात्मिक महात्म्य का उद्घोष करते हुए महर्षि वेदव्यास जी कहते हैं:

॥ श्री जगन्नाथ महात्म्य श्लोक ॥

"दृष्ट्वा श्रीपुरुषोत्तमं वै सद्यः पापैः प्रमुच्यते।
यः पश्यति रथे यान्तं पुनर्जन्म न विद्यते॥"

भावार्थ: पावन पुरुषोत्तम क्षेत्र में श्री जगन्नाथ जी के दर्शन मात्र से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के समस्त पाप तत्काल भस्म हो जाते हैं; और जो प्राणी रथयात्रा के समय रथ पर आरूढ़ महाप्रभु जगन्नाथ के नयन भर दर्शन कर लेता है, उसका इस संसार में कभी पुनर्जन्म नहीं होता, वह साक्षात् मोक्ष को प्राप्त होता है।

श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलभद्र (बलराम) और छोटी बहन सुभद्रा के साथ सुदर्शन चक्र सहित 'चतुर्धामूर्ति' के रूप में विराजमान हैं। यह विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान पाषाण या धातु के विग्रह में नहीं, बल्कि पवित्र नीम के काष्ठ (दारुब्रह्म - The Sacred Neem Wood) के स्वरूप में पूजे जाते हैं। जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी ने ऋग्वेद की रक्षा हेतु भारत के पूर्वी भाग में इसी पावन धाम में 'गोवर्धन पीठ' (पूर्व आम्नाय पीठ) की स्थापना की थी। यहाँ का महाप्रसाद जाति-पांति के समस्त भेदों को मिटाकर विश्व बंधुत्व की साक्षात् अनुभूति कराता है।

२. पौराणिक कथा एवं स्थल पुराण (Sthala Purana)

स्कन्द पुराण के उत्कल खंड में राजा इंद्रद्युम्न और दारुब्रह्म प्राकट्य की अत्यंत रोमांचक और दिव्य कथा वर्णित है:

॥ राजा इंद्रद्युम्न की तपस्या, नील माधव एवं दारुब्रह्म का प्राकट्य ॥

सत्ययुग में मालवा के सूर्यवंशी राजा इंद्रद्युम्न भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्होंने सुना कि ओडिशा के घने जंगलों में एक शबर (आदिवासी) राजा विश्ववसु गुप्त रूप से भगवान विष्णु के अत्यंत मनोहारी नीलकांत मणि विग्रह 'नील माधव' की पूजा करते हैं। राजा इंद्रद्युम्न ने अपने विद्वान पुरोहित विद्यापति को नील माधव की खोज हेतु भेजा। विद्यापति ने शबर राजा की पुत्री ललिता से विवाह कर बड़ी चतुराई से आंख पर पट्टी बांधकर नील माधव की गुप्त गुफा के दर्शन किए।

जब राजा इंद्रद्युम्न विशाल सेना सहित नील माधव के दर्शन हेतु पहुंचे, तो भगवान अंतर्धान हो गए। राजा अत्यंत व्याकुल होकर आमरण अनशन पर बैठ गए। तब भगवान ने स्वप्न में राजा को सांत्वना दी: "हे राजन! कलियुग में मैं मणि रूप में नहीं, बल्कि दारु (काष्ठ) रूप में प्रकट होऊंगा। पुरी के समुद्र तट (बांकी मुहाणा) पर एक विशाल नीम का तना तैरता हुआ आएगा, जिस पर शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिह्न होंगे; उसी से मेरे चतुर्धा विग्रहों का निर्माण कराओ।"

राजा को समुद्र तट पर वह दिव्य सुगंधित नीम का लट्ठा प्राप्त हुआ। परंतु कोई भी साधारण बढ़ई उस कठोर काष्ठ पर अपनी छेनी नहीं चला सका। तभी साक्षात् देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई (अनंत महारानी) का वेश धारण कर उपस्थित हुए। उन्होंने एक शर्त रखी: "मैं २१ दिनों में गुंडिचा मंदिर के बंद कक्ष के भीतर इन विग्रहों को बनाऊंगा। इन २१ दिनों में कोई भी कक्ष का द्वार नहीं खोलेगा; यदि किसी ने द्वार खोला, तो मैं उसी क्षण काम अधूरा छोड़कर चला जाऊंगा।"

॥ रानी गुंडिचा की अधीरता एवं अधूरा विग्रह रहस्य ॥

चौदह दिनों तक कक्ष के भीतर से छेनी-हथौड़े की ठक-ठक सुनाई देती रही। पंद्रहवें दिन अचानक कक्ष से कोई आवाज नहीं आई। रानी गुंडिचा को भय हुआ कि वृद्ध बढ़ई कहीं भूख-प्यास से मर तो नहीं गया। रानी के अत्यधिक आग्रह पर राजा इंद्रद्युम्न ने २१ दिन पूरे होने से पूर्व ही कक्ष का द्वार खोल दिया। द्वार खुलते ही वृद्ध शिल्पी अदृश्य हो चुके थे और वहाँ तीन अधूरे काष्ठ विग्रह रखे मिले—जिनके हाथ और पैर नहीं थे तथा आंखें बड़ी-बड़ी और गोल थीं। राजा पश्चाताप में डूब गए। तब आकाशवाणी हुई: "हे राजन! दुखी मत हो। यह मेरा साक्षात् निराकार से साकार रूप है। बिना हाथों के मैं संपूर्ण जगत के भक्तों का अर्पण स्वीकार करता हूँ और बिना पैरों के अपने भक्तों की पुकार सुनकर दौड़ता हूँ। यही 'दारुब्रह्म' स्वरूप संपूर्ण कलियुग का उद्धार करेगा।"

३. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं मंदिर निर्माण कालक्रम

श्री जगन्नाथ मंदिर का ऐतिहासिक इतिहास अत्यंत प्राचीन और उत्कल संस्कृति की गौरव गाथा है:

कालखंड / वर्ष ऐतिहासिक घटनाक्रम शासक / ऐतिहासिक व्यक्तित्व
सत्ययुग / प्राचीन काल राजा इंद्रद्युम्न द्वारा प्रारंभिक काष्ठ मंदिर स्थापना। मालवा नरेश राजा इंद्रद्युम्न एवं रानी गुंडिचा।
८वीं शताब्दी ईस्वी गोवर्धन मठ की स्थापना। जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी द्वारा पुरी को चार धामों में प्रतिष्ठित करना।
ईस्वी सन् ११३५-११९८ वर्तमान विशाल पाषाण मंदिर (बड़ा देउल) का निर्माण। पूर्वी गंग राजवंश के महान सम्राट अनंतवर्मन चोड़गंग देव एवं अनंगभीम देव द्वारा।
१६वीं शताब्दी भक्ति आंदोलन एवं महाप्रभु चैतन्य आगमन। श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुरी में २४ वर्षों तक संकीर्तन और जगन्नाथ प्रेम रस का प्रचार किया।
१६वीं-१८वीं शताब्दी मुगल और अफगान आक्रांताओं के हमलों से विग्रह रक्षा। ओडिशा के गजपति महाराजाओं और सेवायतों ने चिलिका झील की गुफाओं में विग्रहों को छिपाकर सनातन धर्म की रक्षा की।
वर्तमान समय श्री जगन्नाथ मंदिर प्रबंधन अधिनियम (१९५५)। ओडिशा सरकार, पुरी गजपति महाराज एवं श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA)।

ओडिशा के राजा को भगवान जगन्नाथ का 'आद्य सेवक' (प्रथम सेवक) माना जाता है। आज भी पुरी के गजपति महाराज रथयात्रा के दिन स्वर्ण की झाड़ू लेकर तीनों रथों पर झाड़ू लगाते हैं, जिसे 'छेरा पहंरा' (Chhera Panhara) कहा जाता है। यह परंपरा सिखाती है कि भगवान के सम्मुख राजा और रंक सब समान हैं।

४. मंदिर की कलिंग वास्तुकला एवं पुरी के ८ अलौकिक वैज्ञानिक-आध्यात्मिक रहस्य

श्री जगन्नाथ मंदिर प्राचीन भारतीय कलिंग स्थापत्य कला का चरमोत्कर्ष है:

  • १. मंदिर संरचना (चार मुख्य कक्ष): पूरा मंदिर बलुआ और ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है। इसके चार प्रमुख भाग हैं—विमान (बड़ा देउल - गर्भगृह) जो २१४ फीट ऊंचा है, जगमोहन (मुखशाला), नाटमंडप (नृत्य शाला), और भोगमंडप (प्रसाद अर्पण कक्ष)। पूरा परिसर दोहरी पाषाण दीवारों—बाहरी 'मेघनाद पचेरी' और भीतरी 'कूर्म बेढा' से सुरक्षित है।
  • २. चार भव्य द्वार एवं अरुण स्तंभ: मंदिर के चार दिशाओं में चार विशाल तोरण द्वार हैं—पूर्व में सिंहद्वार (Lion Gate), दक्षिण में अश्वद्वार (Horse Gate), पश्चिम में व्याघ्रद्वार (Tiger Gate), और उत्तर में हस्तिद्वार (Elephant Gate)। सिंहद्वार के सामने कोणार्क सूर्य मंदिर से लाया गया १६ कोणों वाला भव्य एक-पाषाण 'अरुण स्तंभ' स्थित है।

॥ श्री जगन्नाथ मंदिर के ८ विस्मयकारी रहस्य (The 8 Marvels of Puri) ॥

  1. हवा के विपरीत लहराती ध्वजा (Patitapavana Flag): मंदिर के २१४ फीट ऊंचे शिखर पर स्थापित 'पतितपावन ध्वजा' सदैव हवा के प्रवाह की विपरीत दिशा में लहराती है, जिसका वैज्ञानिक कारण आज भी रहस्य बना हुआ है।
  2. दिन में कभी नहीं पड़ती मुख्य गुंबद की छाया: संपूर्ण दिन के किसी भी पहर—चाहे प्रातःकाल हो, दोपहर हो या सांध्य बेला—मंदिर के मुख्य शिखर (बड़ा देउल) की छाया भूमि पर कभी नहीं दिखाई देती।
  3. शिखर के ऊपर पक्षियों और विमानों का न उड़ना: मंदिर के शिखर पर स्थापित अष्टधातु निर्मित 'नीलचक्र' के ऊपर से कभी कोई पक्षी नहीं उड़ता और न ही कोई पक्षी शिखर पर बैठता है। मंदिर के ऊपर से किसी भी हवाई जहाज के उड़ने की अनुमति नहीं है।
  4. सिंहद्वार पर समुद्र की आवाज का गायब होना: जब आप मंदिर के बाहर खड़े होते हैं, तो समुद्र की प्रचंड लहरों की गर्जना स्पष्ट सुनाई देती है। परंतु जैसे ही आप सिंहद्वार की पहली सीढ़ी लांघकर मंदिर के भीतर प्रवेश करते हैं, समुद्र की आवाज पूरी तरह गायब हो जाती है!
  5. मिट्टी की सात हांडियों का अलौकिक रसोई रहस्य: मंदिर की विशाल रसोई में महाप्रसाद बनाते समय एक चूल्हे पर लकड़ी की आग के ऊपर मिट्टी की सात हांडियां एक के ऊपर एक रखी जाती हैं। आश्चर्य यह है कि सबसे नीचे की हांडी का अन्न बाद में पकता है, और सबसे ऊपर रखी हांडी का अन्न सबसे पहले पकता है!
  6. अन्न का कभी कम या ज्यादा न पड़ना: वर्ष भर मंदिर में प्रतिदिन २०,००० से लेकर रथयात्रा के दिन २० लाख श्रद्धालु भोजन करते हैं, परंतु महाप्रसाद न कभी एक व्यक्ति हेतु कम पड़ता है और न ही कभी एक दाना व्यर्थ बचता है।
  7. उल्टी समुद्री हवा: सामान्यतः समुद्र तटीय क्षेत्रों में दिन में समुद्र से जमीन की ओर और रात में जमीन से समुद्र की ओर हवा चलती है। परंतु पुरी में यह प्राकृतिक नियम उल्टा है—यहाँ दिन में जमीन से समुद्र की ओर और रात में समुद्र से जमीन की ओर हवा बहती है।
  8. नित्य ध्वज परिवर्तन परंपरा: पिछले ८०० वर्षों से प्रतिदिन संध्या समय एक सेवायत बिना किसी सुरक्षा रस्सी या सीढ़ी के २१४ फीट ऊंचे सपाट पाषाण शिखर पर नंगे पैर चढ़कर पुरानी ध्वजा उतारता है और नई ध्वजा फहराता है।

५. महाप्रसाद, आनंद बाजार एवं दैनिक पूजा-आरती क्रम

श्री जगन्नाथ जी का भोग संपूर्ण ब्रह्मांड में सबसे शुद्ध, पवित्र और अमृतमय माना जाता है:

प्रातः द्वारपिट्ठा व मंगला आरती

०५:०० AM - ०६:०० AM

कपाट उद्घाटन, मंगल शंखनाद, मंगला आरती एवं मैलम वस्त्र सेवा।

मध्याह्न धूप एवं राजभोग

१२:३० PM - ०१:३० PM

५६ भोग अर्पण, पंचामृत स्नान एवं मध्याह्न महाआरती।

संध्या धूप व बड़शृंगार शयन

०७:०० PM - ११:०० PM

संध्या आरती, गीत गोविंदम गायन, पुष्प मुकुट श्रृंगार एवं रात्रि शयन।

आनंद बाजार (The World's Largest Open-Air Food Market): मंदिर परिसर के भीतर स्थित 'आनंद बाजार' सनातन धर्म की सामाजिक समरसता का सर्वोच्च उदाहरण है। यहाँ मिट्टी की हांडी में परोसे गए छप्पन भोग महाप्रसाद (दाल, भात, बेसर, खीर, खाजा आदि) को ब्राह्मण से लेकर शूद्र तक सभी एक साथ एक ही पंक्ति में बैठकर प्रेमपूर्वक ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि इस महाप्रसाद को स्वयं माता लक्ष्मी अपने हाथों से तैयार करती हैं।

६. नवकलेवर रहस्य, गुप्त 'ब्रह्म पदार्थ' एवं विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा

पुरी धाम के दो महापर्व संपूर्ण विश्व को विस्मय में डाल देते हैं:

१. नवकलेवर महापर्व (Nabakalebara Ritual)

जब हिंदू पंचांग के अनुसार एक ही वर्ष में दो 'आषाढ़ मास' (अधिक मास) पड़ते हैं (सामान्यतः प्रत्येक ८, १२ या १९ वर्ष में), तब महाप्रभु जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन जी के पुराने दारु विग्रहों का समाधि संस्कार कर नए नीम के वृक्षों से नए विग्रह बनाए जाते हैं। मध्यरात्रि में जब पूरे पुरी नगर की बिजली काट दी जाती है, तब मंदिर के सबसे वरिष्ठ सेवायत अपनी आंखों पर काली पट्टी बांधकर और हाथों में रेशमी दस्ताने पहनकर पुराने विग्रहों से एक रहस्यमयी दिव्य वस्तु निकालकर नए विग्रहों में स्थापित करते हैं, जिसे 'ब्रह्म पदार्थ' (Brahma Padartha - भगवान श्री कृष्ण का साक्षात् धड़कता हुआ हृदय) माना जाता है।

२. विश्वविख्यात रथयात्रा (Rath Yatra / Gundicha Yatra)

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को आयोजित होने वाला विश्व का सबसे विशाल धार्मिक महोत्सव। महाप्रभु जगन्नाथ अपने १६ पहियों वाले 'नंदीघोष' रथ पर, भगवान बलभद्र १४ पहियों वाले 'तालध्वज' रथ पर, और देवी सुभद्रा १२ पहियों वाले 'दर्पदलन' रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) ९ दिनों के प्रवास पर जाते हैं। लाखों श्रद्धालु बिना किसी जाति-भेद के इन रथों की मोटी रस्सियों को खींचकर अपने जीवन को धन्य बनाते हैं।

३. स्नान पूर्णिमा एवं अनावरण (अणसर काल)

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर १०८ स्वर्ण कलशों के सुगंधित जल से स्नान करने के बाद महाप्रभु बीमार पड़ जाते हैं। वे १५ दिनों तक एकांतवास (अणसर कक्ष) में रहते हैं जहाँ उन्हें जड़ी-बूटियों का काढ़ा और फल का भोग लगाया जाता है।

४. यात्रा हेतु सर्वोत्तम मौसम

पुरी समुद्र तटीय नगर है। यहाँ घूमने और दर्शन हेतु अक्टूबर से मार्च का समय सर्वाधिक सुखद और शीतल रहता है। रथयात्रा का आनंद लेने हेतु जून-जुलाई में यात्रा की जाती है।

७. यात्रा मार्गदर्शिका: कैसे पहुँचें जगन्नाथ पुरी?

पुरी देश के सभी बड़े नगरों से उत्तम रेल, वायु और सड़क नेटवर्क से जुड़ा है:

  • हवाई मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, भुवनेश्वर (BBI - लगभग ६० किमी) है। भुवनेश्वर हवाई अड्डे से पुरी हेतु शानदार फोर-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-316) है। टैक्सी या एसी वोल्वो बस द्वारा मात्र १ से १.५ घंटे में पुरी पहुंचा जा सकता है।
  • रेल मार्ग (By Train): निकटतम रेलवे स्टेशन पुरी रेलवे स्टेशन (PURI - मंदिर से मात्र २ किमी) है। यह देश का एक बड़ा टर्मिनस है जहाँ से हावड़ा, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, अहमदाबाद, तिरुपति और हरिद्वार हेतु सीधी सुपरफास्ट और वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेनें संचालित होती हैं।
  • सड़क मार्ग (By Road): पुरी भुवनेश्वर (६० किमी), कटक (८५ किमी), और कोणार्क (३५ किमी) से उत्तम फोर-लेन हाईवे और मरीन ड्राइव से जुड़ा है। ओडिशा राज्य सड़क परिवहन निगम (OSRTC) की बसें निरंतर उपलब्ध रहती हैं।

८. तीर्थयात्रियों के लिए आवास, नियम एवं आवश्यक सावधानियां

श्री जगन्नाथ मंदिर में प्राचीन परंपराओं का कड़ाई से पालन किया जाता है:

  • १. प्रवेश मर्यादा एवं गैर-हिंदू नियम: मंदिर के गर्भगृह और भीतरी प्रांगण में केवल सनातन धर्मी (हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख) भक्तों को ही प्रवेश की अनुमति है। अन्य धर्मों के श्रद्धालुओं हेतु सिंहद्वार के मुख्य द्वार पर साक्षात् 'पतितपावन' विग्रह प्रतिष्ठित हैं, जिसके दर्शन बाहर से ही किए जा सकते हैं।
  • २. इलेक्ट्रॉनिक उपकरण एवं चमड़ा वर्जित: मंदिर के भीतर मोबाइल फोन, कैमरा, स्मार्ट वॉच, चमड़े के बेल्ट, जूते और पर्स ले जाना पूर्णतः प्रतिबंधित है। सिंहद्वार पर सुरक्षित क्लॉक रूम उपलब्ध हैं।
  • ३. आवास व्यवस्था: पुरी में श्री जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट के विशाल भक्त निवास (नीलाचल भक्त निवास, जगन्नाथ बल्लभ यात्री निवास), ओडिशा पर्यटन (OTDC) के होटल, गुजराती धर्मशालाएं और समुद्र तट पर सैकड़ों रिसॉर्ट उपलब्ध हैं।

९. पुरी के प्रमुख दर्शनीय एवं तीर्थ स्थल (Nearby Attractions)

पुरी यात्रा के दौरान निम्नलिखित विश्वप्रसिद्ध स्थलों का भ्रमण अवश्य करें:

  1. श्री गुंडिचा मंदिर (Gundicha Temple): पुरी मुख्य मंदिर से ३ किमी दूर स्थित महाप्रभु की मौसी का घर जहाँ रथयात्रा के दौरान भगवान सात दिन विश्राम करते हैं।
  2. स्वर्ण समुद्र तट (Golden Beach - Blue Flag): भारत के चुनिंदा अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्वच्छ और सुरक्षित ब्लू फ्लैग प्रमाणित समुद्र तटों में से एक।
  3. कोणार्क सूर्य मंदिर (Konark Sun Temple): पुरी से ३५ किमी दूर स्थित यूनेस्को विश्व धरोहर १३वीं शताब्दी का विशाल पाषाण रथ मंदिर।
  4. साक्षी गोपाल मंदिर (Sakshi Gopal): पुरी से २० किमी दूर स्थित वह मंदिर जहाँ भगवान श्री कृष्ण एक निर्धन ब्राह्मण की गवाही देने वृंदावन से पैदल चलकर आए थे।
  5. चिलिका झील (Chilika Lake - सतपड़ा): एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील जहाँ दुर्लभ इरावदी डॉल्फिन और प्रवासी पक्षी देखे जा सकते हैं।
  6. लोकनाथ मंदिर (Lokenath Temple): पुरी का प्राचीन शिव मंदिर जहाँ शिवलिंग सदा प्राकृतिक जलधारा में डूबा रहता है।

१०. प्रामाणिक प्रश्नोत्तरी (FAQ)

सनातन मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ 'दारुब्रह्म' हैं। काष्ठ (लकड़ी) प्रकृति की सादगी और वनस्पति जगत का प्रतीक है। भगवान ने राजा इंद्रद्युम्न को वचन दिया था कि वे कलियुग में नीम की पवित्र लकड़ी से बने विग्रहों में निवास करेंगे ताकि यह संदेश दिया जा सके कि परमात्मा पाषाण और धातु के साथ-साथ प्रकृति के कण-कण में समान रूप से विद्यमान हैं।

पौराणिक और तांत्रिक परंपरा के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण ने प्रभास क्षेत्र में अपनी देहलीला पूर्ण की थी और उनका दाह संस्कार हुआ, तब उनका हृदय (अग्नि से न जलने वाला भाग) समुद्र में प्रवाहित कर दिया गया था जो काष्ठ बनकर पुरी तट पर पहुंचा। इसी दिव्य स्पंदनशील तत्व को 'ब्रह्म पदार्थ' कहा जाता है। नवकलेवर के समय इसे पुराने विग्रह से निकालकर नए विग्रह में अत्यंत गुप्त रूप से स्थापित किया जाता है।

मान्यता है कि पुरी के मंदिर में पहले यह भोजन भगवान जगन्नाथ को समर्पित होता है, और उसके बाद यह माँ विमला (शक्तिपीठ) को अर्पित किया जाता है। माँ विमला का उच्छिष्ट बनते ही यह साधारण भोजन दिव्य 'महाप्रसाद' बन जाता है। इस महाप्रसाद में किसी भी प्रकार का छुआछूत या जाति-भेद नहीं माना जाता; यह सभी के लिए परम पावन और मोक्षदायी होता है।

स्कन्द पुराण में स्पष्ट उल्लेख है: 'रथे तु वामनं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते'—अर्थात रथ पर आरूढ़ भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने और उनके रथ की रस्सी (रज्जु) को छूने मात्र से मनुष्य के करोड़ों जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे पुनर्जन्म के चक्र से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है।

सैकड़ों वर्षों की प्राचीन परंपरा और मंदिर नियमावली के अनुसार मुख्य मंदिर के भीतर केवल सनातन धर्मी (हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख) भक्तों को ही प्रवेश की अनुमति है। अन्य धर्मों के श्रद्धालुओं के कल्याण हेतु मंदिर के मुख्य सिंहद्वार के प्रवेश तोरण पर भगवान का 'पतितपावन' विग्रह स्थापित है, जहाँ से कोई भी व्यक्ति बाहर खड़े होकर दर्शन कर सकता है। इसके अतिरिक्त वार्षिक रथयात्रा में भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आकर सभी मानवों को दर्शन देते हैं।
तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

दर्शनार्थियों के अनुभव व समीक्षाएँ (0)

मंदिर दर्शन की अपनी आध्यात्मिक अनुभूति साझा करें

मंदिर विवरण कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!