पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री ज्वाला जी मंदिर, कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश)

22 दर्शनार्थी
ज्वालामुखी, हिमाचल प्रदेश
प्रकाशित: 26 Oct 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
Maa Jwala Ji
दर्शन समय सारिणी
सुबह 05:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक (दैनिक)
नित्य आरती समय
मंगला आरती: 05:30 AM | भोग आरती: 12:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM | शयन आरती: 09:30 PM
स्थान / नगर
ज्वालामुखी, हिमाचल प्रदेश
आराध्य देव
Maa Jwala Ji
दर्शन समय
सुबह 05:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक (दैनिक)
आरती समय
मंगला आरती: 05:30 AM | भोग आरती: 12:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM | शयन आरती: 09:30 PM
स्थान / धाम
Jwala Ji Temple, Jwalamukhi, District Kangra, Himachal Pradesh - 176031
अक्षर आकार:
पठन थीम:

श्री ज्वाला जी मंदिर: एक दिव्य परिचय

हिमाचल प्रदेश की सुरम्य कांगड़ा घाटी में स्थित श्री ज्वाला जी मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह सनातन धर्म की अटूट शक्ति का प्रतीक है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ पौराणिक कथाओं के अनुसार माता सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि सदियों से नौ प्राकृतिक ज्योतियां निरंतर प्रज्वलित हैं।

पौराणिक पृष्ठभूमि और इतिहास

स्कंद पुराण और अन्य प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों को विभाजित किया था। माता सती की जिह्वा यहाँ गिरी थी, जिसके कारण इसे 'ज्वाला जी' कहा जाता है। एक अन्य किंवदंती के अनुसार, गोरखनाथ जी ने यहाँ माता की तपस्या की थी और एक जलते हुए तवे पर दूध उबाला था, जो आज भी उसी रूप में विद्यमान है।

अकबर और माता की परीक्षा

मुगल बादशाह अकबर के समय की एक प्रसिद्ध घटना है। अकबर ने जब इन ज्योतियों के बारे में सुना, तो उसने इसे जादू समझकर बुझाने का प्रयास किया। उसने ज्योतियों पर पानी की नहरें डलवाईं और लोहे के तवे भी रखवाए, लेकिन ज्योतियां बुझने के बजाय और अधिक प्रखर हो गईं। अपनी भूल का एहसास होने पर अकबर ने माता के चरणों में सोने का छत्र अर्पित किया, जिसे माता ने स्वीकार नहीं किया और वह छत्र किसी अज्ञात धातु में परिवर्तित हो गया।

वास्तुकला और गर्भगृह

मंदिर की वास्तुकला इंडो-सिख शैली का एक सुंदर मिश्रण है। मंदिर का मुख्य शिखर सोने का बना है, जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने भेंट किया था। गर्भगृह में नौ ज्योतियां हैं, जिन्हें महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, अन्नपूर्णा, चंडी, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, हिंगलाज और सरस्वती का स्वरूप माना जाता है।

दैनिक अनुष्ठान और आरती

मंदिर में दिन में पांच बार आरती होती है। भक्तगण माता को 'राबड़ी' और 'मिश्री' का भोग लगाते हैं। मंदिर का वातावरण अत्यंत शांत और ऊर्जावान है।

समयअनुष्ठान
05:30 AMमंगला आरती
12:00 PMभोग आरती
07:00 PMसंध्या आरती
09:30 PMशयन आरती

प्रमुख उत्सव

नवरात्रि के दौरान यहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। इसके अलावा, ज्वाला जी का मेला यहाँ का मुख्य आकर्षण है।

यात्रा और ठहरने की व्यवस्था

निकटतम हवाई अड्डा गग्गल (कांगड़ा) है। निकटतम रेलवे स्टेशन ज्वालामुखी रोड है। सड़क मार्ग से यह दिल्ली और चंडीगढ़ से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित कई धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं जहाँ भक्त ठहर सकते हैं।

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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