पावन देवस्थान एवं तीर्थ दर्शन

श्री मणिकुला (मंशा देवी) शक्तिपीठ, हरिद्वार - इतिहास, दर्शन समय, रोपवे एवं संपूर्ण यात्रा गाइड

17 दर्शनार्थी
हरिद्वार, उत्तराखंड
प्रकाशित: 17 Oct 2026
दर्शन व इतिहास पढ़ें
मुख्य आराध्य देव
माँ दुर्गा (माँ मंशा देवी)
दर्शन समय सारिणी
सुबह 05:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक
नित्य आरती समय
मंगला आरती: 05:30 AM | भोग आरती: 12:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM
स्थान / नगर
हरिद्वार, उत्तराखंड
आराध्य देव
माँ दुर्गा (माँ मंशा देवी)
दर्शन समय
सुबह 05:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक
आरती समय
मंगला आरती: 05:30 AM | भोग आरती: 12:00 PM | संध्या आरती: 07:00 PM
स्थान / धाम
बिल्व पर्वत, हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत
अक्षर आकार:
पठन थीम:

हरिद्वार की पावन धरा पर स्थित माँ मंशा देवी का मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह आस्था और विश्वास का वह केंद्र है जहाँ भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दूर-दूर से आते हैं। शिवालिक पर्वतमाला की बिल्व पर्वत श्रृंखला पर स्थित यह मंदिर 'सिद्ध पीठ' के रूप में विख्यात है।

मंदिर का परिचय एवं पौराणिक इतिहास

माँ मंशा देवी का मंदिर हरिद्वार के सबसे प्राचीन और पवित्र मंदिरों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, 'मंशा' शब्द का अर्थ है 'इच्छा' या 'मन की कामना'। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से यहाँ आकर माँ के चरणों में अपनी अर्जी लगाता है, माँ उसकी हर मनोकामना पूर्ण करती हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से, यह मंदिर 'सिद्ध पीठों' में गिना जाता है। कहा जाता है कि जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर आकाश मार्ग से जा रहे थे, तब माता सती के शरीर के कुछ अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे, जिन्हें शक्तिपीठ कहा गया। कुछ विद्वानों का मत है कि यहाँ माता का हृदय और नाभि का अंश गिरा था, जिसके कारण इसे 'मणिकुला' शक्तिपीठ के रूप में भी जाना जाता है। यह मंदिर कश्यप ऋषि की पत्नी और नागों की माता 'माँ मंशा' को समर्पित है।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप महाराजा गोपाल शरण सिंह द्वारा 19वीं शताब्दी के अंत में बनवाया गया था। मंदिर की वास्तुकला उत्तर भारतीय शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ की ऊर्जा इतनी प्रबल है कि यहाँ कदम रखते ही भक्तों को एक अलौकिक शांति का अनुभव होता है।

मंदिर की स्थापत्य कला एवं गर्भगृह संरचना

मंशा देवी मंदिर की वास्तुकला अत्यंत भव्य है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में माँ मंशा देवी की दो प्रतिमाएं स्थापित हैं। एक प्रतिमा में माँ की तीन भुजाएं और पांच मुख हैं, जबकि दूसरी प्रतिमा में माँ की आठ भुजाएं हैं। ये दोनों ही रूप अत्यंत सौम्य और प्रभावशाली हैं।

मंदिर परिसर में संगमरमर का कार्य और नक्काशीदार खंभे इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। गर्भगृह के सामने एक विशाल मंडप है जहाँ भक्त बैठकर कीर्तन और ध्यान करते हैं। मंदिर के चारों ओर की गई नक्काशी में पौराणिक कथाओं का चित्रण किया गया है, जो इसे एक जीवंत कलाकृति बनाता है।

दर्शन, आरती एवं पूजा का समय

मंदिर के कपाट प्रतिदिन सुबह 5:00 बजे खुल जाते हैं। दर्शन का क्रम इस प्रकार है:

  • मंगला आरती: सुबह 05:30 बजे
  • भोग आरती: दोपहर 12:00 बजे
  • संध्या आरती: शाम 07:00 बजे

मंदिर रात 10:00 बजे तक खुला रहता है। विशेष पर्वों पर समय में बदलाव किया जा सकता है।

प्रमुख त्यौहार एवं उत्सव

नवरात्रि के दौरान यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है। चैत्र और शारदीय नवरात्रि में यहाँ विशेष अनुष्ठान और भंडारों का आयोजन होता है। इसके अलावा, कुंभ और अर्धकुंभ के दौरान यहाँ की रौनक देखते ही बनती है।

मंदिर तक कैसे पहुंचे

वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा देहरादून का जॉली ग्रांट एयरपोर्ट (लगभग 40 किमी) है।

रेल मार्ग: हरिद्वार जंक्शन देश के प्रमुख शहरों से रेल द्वारा अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग: दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरों से हरिद्वार के लिए नियमित बसें उपलब्ध हैं।

रोपवे सुविधा: मंदिर तक पहुंचने के लिए 'उड़न खटोला' (रोपवे) सबसे लोकप्रिय माध्यम है। यह नीचे से मंदिर तक का सफर मात्र 5 मिनट में पूरा करता है और यहाँ से हरिद्वार शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।

यात्रियों के लिए उपयोगी सुझाव

मंदिर की यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च के बीच है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते समय शालीन वस्त्र धारण करें। अपने साथ प्रसाद के रूप में नारियल और चुनरी ले जाना शुभ माना जाता है।

आस-पास के अन्य प्रमुख दर्शनीय स्थल

हरिद्वार में मंशा देवी के साथ-साथ चंडी देवी मंदिर, माया देवी मंदिर, हर की पौड़ी और शांतिकुंज अवश्य देखें।

तीर्थ यात्रा विधि

मंदिर दर्शन व पूजा के 4 सरल चरण

प्रभु के अलौकिक दर्शन का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु आवश्यक नियम

१. शुद्ध भाव व स्नान

दर्शन से पूर्व पवित्र भाव से स्नान कर सात्विक वस्त्र धारण करें।

२. आरती समय ज्ञान

मंगला, भोग अथवा शयन आरती के समय उपस्थित होकर दर्शन करें।

३. नैवेद्य व अर्पण

तुलसी, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य श्रद्धापूर्वक प्रभु चरणों में अर्पित करें।

४. परिक्रमा व ध्यान

गर्भगृह की विधिवत परिक्रमा कर शांत भाव से प्रभु का ध्यान करें।

संदर्भ-आधारित एवं संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

भक्तिलोक पर उपलब्ध सभी मंदिर दर्शन समय, आरती सारिणी व इतिहास की जानकारी संबंधित देवस्थानम ट्रस्ट, प्रमाणिक धार्मिक पुस्तकों एवं तीर्थ यात्रियों के अनुभवों के आधार पर निरंतर अद्यतन की जाती है।

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