१. मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम एवं 'ॐ श्री रामाय नमः' मंत्र का परिचय
सनातन संस्कृति और अध्यात्म के सर्वोच्च शिखर पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम विराजमान हैं। वे साक्षात् 'रामो विग्रहवान् धर्मः' - धर्म के साकार विग्रह हैं। भगवान राम का चरित्र मर्यादा, त्याग, सत्य, करुणा, न्याय और आदर्श जीवन का वह अद्वितीय प्रतिमान है जो युगों-युगों से संपूर्ण मानव जाति को सन्मार्ग दिखाता आया है। भगवान श्री राम का पावन नाम केवल एक संबोधन नहीं है, अपितु यह संसार-सागर के जन्म-मरण चक्र से पार उतारने वाला साक्षात् 'तारक मंत्र' है। 'ॐ श्री रामाय नमः' भगवान श्री राम का परम पावन, अत्यंत सरल, सुगम और अमोघ शक्ति संपन्न षडक्षर महामंत्र है।
इस मंत्र में तीन अत्यंत पावन तत्वों का समन्वय है: 'ॐ' (सृष्टि का आदि अनाहत नाद), 'श्री' (माँ सीता, प्रकृति, करुणा और दिव्य ऐश्वर्य), और 'रामाय नमः' (सर्वव्यापक आनंदस्वरूप परब्रह्म श्री राम के पावन चरणों में पूर्ण समर्पण)। जब साधक इस मंत्र का उच्चारण करता है, तो उसके चित्त में एक अभूतपूर्व शांति, शीतलता और निर्भयता का संचार होता है। आज के इस आपाधापी, कलह और मानसिक तनाव से भरे कलिकाल में राम-नाम का आश्रय साक्षात् कल्पवृक्ष के समान है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के बालकांड में स्पष्ट लिखा है कि कलयुग में न तो योग है, न यज्ञ है, न तप है; केवल और केवल राम नाम का संकीर्तन ही मनुष्य का कल्याण करने में पूर्ण समर्थ है: 'कलिजुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥' यह मंत्र किसी भी जाति, वर्ण, लिंग, आयु या परिस्थिति का भेद किए बिना प्रत्येक मानव के लिए सुलभ और परम कल्याणकारी है।
२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि
॥ मूल श्री राम षडक्षर महामंत्र ॥
ॐ श्री रामाय नमः॥
Oṃ Śrī Rāmāya Namaḥ
॥ श्री राम ध्यान श्लोक ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं,
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढ़सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं,
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम्॥
भावार्थ: जिनकी भुजाएं घुटनों तक लंबी (आजानुबाहु) हैं, जिन्होंने हाथों में धनुष और बाण धारण किए हैं, जो पद्मासन पर विराजमान हैं, जिन्होंने पीतांबर धारण किया है, जिनके नेत्र नवीन खिले कमलदल के समान सुंदर और विशाल हैं, जो सदा प्रसन्नमुख हैं, जिनकी बाईं गोद में विराजमान माता जानकी के मुखकमल से जिनके नयन मिले हुए हैं, नवीन मेघ के समान जिनका श्याम-उज्ज्वल वर्ण है, जो विविध आभूषणों से देदीप्यमान हैं और सुंदर जटामुकुट धारण किए हुए हैं, उन भगवान श्री रामचंद्र जी का मैं नित्य ध्यान करता हूँ।
॥ श्री राम तारक स्तुति ॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम्।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्॥
भावार्थ: जो समस्त विपत्तियों का हरण करने वाले हैं, संपूर्ण सुख-संपत्तियों को देने वाले हैं, और संपूर्ण लोकों में सबसे अधिक सुंदर और आनंददायक हैं, उन भगवान श्री राम को मैं बारंबार शीश नवाकर नमन करता हूँ।
शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'ॐ' का उच्चारण नाभि से ओंकार नाद के रूप में करें। 'श्री' शब्द का उच्चारण दीर्घ ईकार के साथ माता जानकी और लक्ष्मी के सम्मान में कोमलता से करें। 'रामाय' में 'रा' और 'मा' दोनों दीर्घ स्वर हैं, अतः इनका उच्चारण स्पष्ट और सस्वर होना चाहिए (रा-मा-य)। अंत में 'नमः' में विसर्ग का उच्चारण एक कोमल 'ह' की ध्वनि के साथ पूर्ण आत्म-समर्पण के भाव से करें। इस मंत्र को अत्यंत प्रेम, शांति और श्रद्धा से जपें।
३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ
इस पावन षडक्षर मंत्र के प्रत्येक पद का गहरा व्याकरणिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ निम्नलिखित है:
- १. ॐ (प्रणव नाद): समस्त ब्रह्मांड का आदि अनाहत नाद, जो अकार, उकार और मकार के मिलन से बना है। यह सगुण और निर्गुण दोनों का आधार है।
- २. श्री (पराशक्ति व जानकी बीज): 'श्री' शब्द यहाँ भगवती सीता, प्रकृति, करुणा, क्षमा और दिव्य शोभा का प्रतीक है। भगवान राम के नाम के आगे 'श्री' लगाने से शक्ति और शक्तिमान का पूर्ण समन्वय होता है। श्री के बिना राम तक पहुँचना संभव नहीं है।
- ३. रामाय (परम आनंदस्वरूप राम हेतु): संस्कृत में 'राम' शब्द की व्युत्पत्ति 'रमु क्रीड़ायाम्' धातु से हुई है: 'रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि। इति रामपदेनौसौ परं ब्रह्माभिधीयते॥' (जिस अनंत, नित्य आनंदमय चिदात्मा में समस्त योगीजन रमण करते हैं, वही परब्रह्म 'राम' है)। 'रामाय' चतुर्थी विभक्ति एकवचन का रूप है, जिसका अर्थ है 'उस परब्रह्म परमात्मा श्री राम के पावन चरणों में'।
- ४. नमः (प्रणाम एवं शरणागति): 'न मम्' - यह मेरा नहीं है, मेरा अहंकार, मेरा शरीर, मेरी बुद्धि सब प्रभु श्री राम की कृपा पर आश्रित है। मैं प्रभु की शरण में हूँ।
४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं तारक रहस्य
सनातन अध्यात्म में 'राम' शब्द के दो अक्षरों - 'रा' और 'म' का रहस्य अत्यंत विलक्षण है। वैदिक मंत्रशास्त्र के अनुसार:
- 'रा' अक्षर: अष्टाक्षर नारायण महामंत्र (ॐ नमो नारायणाय) का प्राण-तत्व है। यदि नारायण मंत्र से 'रा' हटा दिया जाए तो वह 'न नयन' (नेत्रहीन/निष्प्राण) हो जाता है।
- 'म' अक्षर: पंचाक्षर शिव महामंत्र (ॐ नमः शिवाय) का प्राण-तत्व है। यदि शिव मंत्र से 'म' हटा दिया जाए तो वह 'न शिवाय' (अकल्याणकारी) हो जाता है।
अतः 'रा' और 'म' के मिलन से बना 'राम' नाम वैष्णव और शैव - दोनों संप्रदायों की दिव्य ऊर्जा का एकीभूत महासंगम है। जब साधक 'ॐ श्री रामाय नमः' का जप करता है, तो भगवान विष्णु का पालन-पोषण सामर्थ्य और भगवान शिव का कल्याणकारी व पाप-विनाशक सामर्थ्य एक साथ साधक के जीवन में सक्रिय हो जाते हैं।
योगशास्त्र के अनुसार, 'रा' अक्षर नाभि में स्थित 'मणिपूरक चक्र' (अग्नि तत्व) को प्रज्वलित करता है, जिससे साधक के संचित पाप, वासनाएं और अज्ञान भस्म होते हैं। और 'म' अक्षर मस्तक में स्थित 'सहस्रार चक्र' (अमृत तत्व) से शांति और आनंद की वर्षा करता है। इस प्रकार राम नाम जप से शरीर और मन का संपूर्ण कायाकल्प हो जाता है।
५. वैदिक एवं पौराणिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण
भगवान श्री राम की महिमा वेदों के ऋग्वेद (१०.९३.१४), शुक्ल यजुर्वेद, और विशेष रूप से 'रामोत्तरतापनी उपनिषद्' तथा 'रामरहस्य उपनिषद्' में विस्तार से वर्णित है। रामरहस्य उपनिषद् में भगवान शिव स्वयं सनकादिक ऋषियों से कहते हैं:
"राममंत्राः कोटिशः सन्ति तेषु तारकमन्त्रः सर्वोपरि भवति। ॐ श्री रामाय नम इति षडक्षरो मन्त्रः सर्वकामप्रदः॥"
- रामरहस्योपनिषद्, अध्याय १
अर्थात: "करोड़ों राम मंत्रों में षडक्षर तारक मंत्र सर्वोपरि है। यह समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला और अंत में मोक्ष प्रदान करने वाला है।"
पद्म पुराण में कथा आती है कि भगवान शिव काशी में देहत्याग करने वाले प्रत्येक प्राणी के दाहिने कान में यही 'राम' नाम रूपी तारक मंत्र फूंकते हैं, जिससे वह जीव सीधे मुक्ति को प्राप्त हो जाता है: 'काशी मरणान्मुक्तिः' का वास्तविक रहस्य भगवान शिव द्वारा प्रदत्त राम नाम ही है। वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में भी इस नाम को समस्त पापों का समूल नाश करने वाली गंगा के समान बताया गया है।
॥ अगस्त्य संहिता एवं लिखित राम नाम बैंक रहस्य ॥
अगस्त्य संहिता के अनुसार, 'ॐ श्री रामाय नमः' मंत्र का उच्चारण करने से वाणी शुद्ध होती है, मनन करने से मन शुद्ध होता है, और पुस्तिका पर लाल स्याही से नित्य १०८ अथवा १००८ बार लिखने (लिखित जप) से साधक के चित्त की संपूर्ण चंचलता समाप्त हो जाती है। इसे 'राम नाम बैंक' कहा जाता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि राम नाम का एक भी अक्षर यदि अशुद्ध भाव (उलटा नाम - मरा मरा) से भी जपा जाए, तब भी वह महर्षि वाल्मीकि की भाँति ब्रह्म-समान बना देता है: 'उलटा नाम जपत जगु जाना। बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना॥'
६. संपूर्ण जप विधि, मुहूर्त, माला, दिशा व संकल्प
श्री राम षडक्षर मंत्र की शास्त्रीय, प्रामाणिक एवं सात्विक जप विधि निम्नलिखित है:
शुभ वार एवं मुहूर्त
मंगलवार अथवा गुरुवार का दिन साधना शुभारंभ करने हेतु सर्वोत्तम है। तिथियों में रामनवमी, दीपावली, विजयादशमी, हनुमान जयंती और एकादशी पर किया गया जप तुरंत सिद्ध होता है। समय के लिए प्रातः ब्रह्ममुहूर्त अथवा संध्याकाल गोधूलि वेला सर्वोत्तम है।
दिशा, आसन एवं वस्त्र
जप के समय मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें। पीले रंग के ऊन अथवा कुश का आसन बिछाएं। साधक को पीले अथवा हल्के नारंगी (भगवा) रंग के स्वच्छ एवं सात्विक वस्त्र धारण करने चाहिए।
जप माला का चयन
भगवान श्री राम के मंत्र जप के लिए तुलसी की माला ही परम अनिवार्य और सर्वोत्तम मानी गई है। तुलसी भगवान विष्णु और राम को प्राणों से भी अधिक प्रिय है। यदि तुलसी माला न हो, तो चंदन (श्वेत या पीत) अथवा रुद्राक्ष की माला पर भी जप किया जा सकता है। माला को सदैव गोमुखी में रखकर जपें।
नैवेद्य एवं अर्पण
भगवान राम को पीले पुष्प, पीला चंदन और तुलसी पत्र अर्पित करें। नैवेद्य में पंचामृत, पंजीरी, फल (विशेषकर बेर, केला), खीर अथवा बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और सुगंधित धूप जलाएं।
संकल्प मंत्र: हाथ में जल, तुलसी पत्र, अक्षत और दक्षिणा लेकर कहें: "हे रघुकुलतिलक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी! मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अपने अंतःकरण की शुद्धि, समस्त संकटों के निवारण, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि तथा आपकी अनन्य भक्ति की प्राप्ति हेतु आपके पावन षडक्षर मंत्र 'ॐ श्री रामाय नमः' का (१, ३ या ११ माला) जप करने का संकल्प लेता हूँ। मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।" जल भूमि पर छोड़ दें।
७. आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक एवं सांसारिक लाभ
'ॐ श्री रामाय नमः' मंत्र के नियमित जप से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:
१. मानसिक शांति, भय मुक्ति एवं अवसाद का शमन
यह मंत्र मन की समस्त व्यग्रता, घबराहट, भविष्य की चिंता और अज्ञात भय को क्षण भर में दूर कर देता है। जिस प्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम राम वनवास की घोर विषमताओं में भी शांत रहे, उसी प्रकार साधक को जीवन में अद्भुत धैर्य और संतुलन प्राप्त होता है।
२. पारिवारिक मर्यादा एवं दांपत्य सौहार्द
प्रभु श्री राम आदर्श पुत्र, आदर्श भ्राता, आदर्श पति और आदर्श राजा हैं। इस मंत्र का जप घर के कलह को समाप्त करता है, पारिवारिक सदस्यों के बीच प्रेम और कर्तव्यबोध जगाता है, तथा समाज में साधक की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान बढ़ाता है।
३. समस्त अनिष्ट ग्रहों एवं संकटों से रक्षा
भगवान राम का नाम स्मरण करने से समस्त ग्रह दोष (सूर्य, शनि, राहु, मंगल आदि) शांत हो जाते हैं। जहाँ राम-नाम की गूंज होती है, वहाँ पवनपुत्र हनुमान जी साक्षात् उपस्थित होकर साधक की समस्त संकटों और भूत-प्रेत बाधाओं से रक्षा करते हैं।
४. संचित पापों का क्षय एवं मोक्ष की प्राप्ति
यह तारक मंत्र साधक के जन्म-जन्मांतरों के पापों को भस्म कर देता है। जीवन के अंतिम समय में चेतना को राम-नाम में लीन करने से जीव भवसागर के जन्म-मरण के बंधन से छूटकर साकेत लोक (परमधाम) को प्राप्त होता है।
८. साधना के नियम एवं सावधानियां (Rules & Discipline)
भगवान श्री राम मर्यादा के स्वामी हैं, अतः उनकी साधना में सात्विकता अनिवार्य है:
- सत्य और मर्यादा का पालन: राम-नाम जपने वाले साधक को झूठ, कपट, परस्त्री गमन और किसी के साथ विश्वासघात से पूर्णतः बचना चाहिए। अपने जीवन में मर्यादा और सत्य का पालन करें।
- तामसिक खानपान का त्याग: जप काल में मांस, मदिरा, नशा, प्याज और लहसुन का सर्वथा त्याग करें। सात्विक, पवित्र और प्रभु को अर्पित भोजन ही ग्रहण करें।
- माता-पिता और गुरु का आदर: भगवान राम ने पिता के वचनों के लिए चौदह वर्षों का वनवास स्वीकार किया था। जो व्यक्ति अपने माता-पिता और गुरु का अनादर करता है, उसकी राम साधना कभी फलित नहीं होती।
- हनुमान जी की उपासना: राम जी की साधना से पूर्व और पश्चात हनुमान जी का स्मरण अवश्य करें। हनुमान जी की प्रसन्नता के बिना राम कृपा प्राप्त करना असंभव है।