१. जगज्जननी माँ पार्वती एवं 'ॐ श्री पार्वत्यै नमः' मंत्र का स्वरूप
सनातन धर्म में भगवती माता पार्वती को साक्षात् आद्यशक्ति, मूल प्रकृति, उमा, गौरी और संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी के रूप में पूजा जाता है। वे देवाधिदेव महादेव भगवान शिव की अर्धांगिनी और पराशक्ति हैं। शिव और शक्ति अभिन्न हैं; जिस प्रकार सूर्य और उसका प्रकाश, या अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति अलग नहीं हो सकते, उसी प्रकार शिव के बिना शक्ति और शक्ति के बिना शिव का अस्तित्व कल्पित नहीं किया जा सकता। वेदों और उपनिषदों में माँ पार्वती को 'हैमवती उमा' (केन उपनिषद् ३.२५) कहकर पुकारा गया है, जिन्होंने देवताओं के घमंड को चूर कर उन्हें ब्रह्म-तत्व का बोध कराया था। 'ॐ श्री पार्वत्यै नमः' माँ पार्वती का परम पावन, अत्यंत सरल, सौम्य और अमोघ कृपा प्रदाता षडक्षर नाम-मंत्र है।
यह मंत्र नारी शक्ति, मातृत्व, अखंड सौभाग्य, दांपत्य प्रेम और तपस्या की पराकाष्ठा का प्रतीक है। माता पार्वती पर्वतराज हिमालय और मैना देवी की पुत्री हैं, जिन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए सहस्त्रों वर्षों तक घोर तपस्या की थी। अतः जब कोई साधक या साधिका इस मंत्र का जप करती है, तो उसके भीतर कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अविचल रहने का धैर्य, मानसिक दृढ़ता और तपस्या का सामर्थ्य जाग्रत होता है।
विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने, उत्तम व मनोनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति, दांपत्य जीवन के कलह को समाप्त करने, संतान सुख और घर में सुख-शांति व समृद्धि की स्थापना के लिए यह मंत्र एक अचूक आध्यात्मिक समाधान है। इस मंत्र का प्रभाव अत्यंत शांत, करुणामयी और वात्सल्यपूर्ण है।
२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि
॥ मूल श्री पार्वती मंत्र ॥
ॐ श्री पार्वत्यै नमः॥
Oṃ Śrī Pārvatyai Namaḥ
॥ श्री पार्वती ध्यान श्लोक ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
भावार्थ: हे समस्त मंगलों में सबसे परम मंगलमयी, हे कल्याणकारिणी शिवा, हे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, त्रिनेत्रा गौरी, हे नारायणी! आपको मेरा कोटि-कोटि नमन है।
॥ उमा-महेश्वर ध्यान श्लोक ॥
माणिक्यवीणामुपलालयन्तीं मदालसां मञ्जुलवाग्विलासाम्।
माहेन्द्रनीलद्युतिकोमलाङ्गीं मातङ्गकन्यां मनसा स्मरामि॥
भावार्थ: जो अपने करकमलों में मणियों से जड़ी वीणा को अत्यंत दुलार से बजा रही हैं, जिनकी वाणी अत्यंत मधुर और विलासपूर्ण है, जिनका कोमल अंग इंद्रनीलमणि के समान कांतिमान है, उन परम करुणामयी भगवती पार्वती का मैं मन से ध्यान करता हूँ।
शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'ॐ' का उच्चारण नाभि से ओंकार नाद के साथ धीर-गंभीर भाव से करें। 'श्री' शब्द का उच्चारण दीर्घ ईकार के साथ माँ लक्ष्मी और ऐश्वर्य के सम्मान में कोमलता से करें। 'पार्वत्यै' में 'पा' दीर्घ है, 'र्व' पर रेफ का स्पष्ट उच्चारण हो, और अंत में 'त्यै' पर ऐकार की ध्वनि स्पष्ट गूंजनी चाहिए (पार्वत्यै)। अंत में 'नमः' में विसर्ग का उच्चारण एक कोमल 'ह' की ध्वनि के साथ आत्म-समर्पण के भाव से करें। मंत्र का जप अत्यंत शांत, विनीत और मातृ-भक्ति के भाव से होना चाहिए।
३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ
इस मंत्र के प्रत्येक पद का गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ निम्नलिखित है:
- १. ॐ (प्रणव नाद): समस्त ब्रह्मांड की मूल अनाहत ध्वनि, जो शिव और शक्ति के परम मिलन का प्रतीक है।
- २. श्री (पराशक्ति व ऐश्वर्य बीज): 'श्री' शब्द यहाँ भगवती के संपूर्ण ऐश्वर्य, सौंदर्य, पवित्रता, वात्सल्य और मातृत्व का द्योतक है।
- ३. पार्वत्यै (पर्वतराज-पुत्री माता पार्वती के लिए): 'पर्वतस्य राज्ञः हिमावतः सुता पार्वती, तस्यै पार्वत्यै' - पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती के पावन चरणों में। व्याकरण के अनुसार 'पार्वत्यै' चतुर्थी विभक्ति एकवचन का रूप है, जिसका अर्थ है 'माँ पार्वती को समर्पित'। पर्वत अडिगता, स्थिरता और सर्वोच्चता का प्रतीक है; अतः पार्वती उस चेतना का नाम है जो साधक के मन को हिमालय की भाँति अडिग और दृढ़ बना देती है।
- ४. नमः (प्रणाम एवं शरणागति): 'न मम्' - यह मेरा नहीं है, मेरा अहंकार, मेरा अस्तित्व सब माँ के चरणों में समर्पित है। एक शिशु जिस प्रकार माता की गोद में स्वयं को पूरी तरह छोड़ देता है, उसी निर्भय भाव से नमन करना 'नमः' कहलाता है।
४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं कुण्डलिनी शक्ति रहस्य
योगशास्त्र और तन्त्र दर्शन में भगवान शिव को 'सहस्रार चक्र' (मस्तिष्क का शीर्ष भाग) में स्थित परम शांत, निष्क्रिय शुद्ध चैतन्य माना गया है, जबकि भगवती पार्वती को 'मूलाधार चक्र' (रीढ़ के आधार) में स्थित सुप्त 'कुण्डलिनी शक्ति' माना गया है। साधक का संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन वस्तुतः मूलाधार में सोई हुई कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत कर सहस्रार में स्थित शिव के साथ मिलाना (शिव-शक्ति सायुज्य) ही है:
"मूलाधारे स्थिता या सा कुण्डली परदेवता। शिवेन सह संयोगात् आनन्दं जनयेत् सदा॥"
- योगकुण्डलिन्युपनिषद्
जब साधक 'ॐ श्री पार्वत्यै नमः' का जप करता है, तो मूलाधार चक्र में स्थित शक्ति तरंगित होती है और सुषुम्ना नाड़ी के माध्यम से ऊर्ध्वगामी होने लगती है। जैसे ही यह शक्ति स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्र को भेदती हुई सहस्रार में पहुँचती है, साधक को ब्रह्मानंद और समाधि की प्राप्ति होती है।
सांसारिक दृष्टि से माता पार्वती संपूर्ण गृहस्थ धर्म की आदर्श हैं। उन्होंने भगवान शिव जैसे दिगंबर, भस्मधारी और वैरागी पति को अपनी अनन्य सेवा, प्रेम और तपस्या से एक संपूर्ण पारिवारिक सुख में परिवर्तित कर दिया। जहां कार्तिकेय और गणेश जैसे गुणवान पुत्र हैं, जहां नंदी और सिंह, मयूर और सर्प, मूषक और बिलाव जैसे स्वाभाविक शत्रु जीव भी एक साथ शांतिपूर्वक निवास करते हैं। अतः पार्वती मंत्र का जप परिवार में परस्पर विरोधों को समाप्त कर अद्भुत सामंजस्य और प्रेम स्थापित करता है।
५. वैदिक एवं पौराणिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण
माँ पार्वती का वर्णन वैदिक साहित्य में अत्यंत आदर के साथ मिलता है। केन उपनिषद् के तृतीय और चतुर्थ खंड में कथा आती है कि जब देवताओं को यक्ष के रूप में प्रकट ब्रह्म का ज्ञान नहीं हो सका, तब आकाश में एक अत्यंत रूपवती और तेजस्वी देवी प्रकट हुईं - 'स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीम्'। वे पर्वतराज की पुत्री उमा हैमवती थीं, जिन्होंने इंद्र को बताया कि यह यक्ष कोई और नहीं बल्कि साक्षात् परब्रह्म है।
शिव महापुराण (उमा संहिता एवं पार्वती खंड) में माँ पार्वती के प्राकट्य, उनकी पंचाग्नि तपस्या और शिव-पार्वती विवाह का विस्तृत आख्यान है। शिव पुराण में भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि जो मनुष्य उमा के नाम का संकीर्तन करता है, वह साक्षात् मेरा ही प्रिय बन जाता है। स्कन्द पुराण के काशी खंड और कालिदास रचित 'कुमारसंभवम्' महाकाव्य में माता पार्वती के दिव्य स्वरूप, तपस्या और मातृत्व की अद्वितीय स्तुति की गई है।
॥ गौरी-शंकर समवेत साधना एवं मंगला गौरी व्रत रहस्य ॥
श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को आयोजित होने वाले 'मंगला गौरी व्रत' में इस मंत्र का जप अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाला माना गया है। भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, जिस कन्या के विवाह में मंगल दोष, वैधव्य योग या विषम ग्रह बाधाएं आ रही हों, यदि वह माँ मंगला गौरी (पार्वती) का षोडशोपचार पूजन कर 'ॐ श्री पार्वत्यै नमः' मंत्र की ११ माला का जप करती है, तो उसके समस्त वैवाहिक दोष तत्काल शांत हो जाते हैं और उसे दीर्घायु व सुयोग्य पति की प्राप्ति होती है।
६. संपूर्ण जप विधि, मुहूर्त, माला, दिशा व संकल्प
माँ पार्वती के मंत्र जप की शास्त्रीय, प्रामाणिक एवं सात्विक विधि निम्नलिखित है:
शुभ वार, तिथि एवं मुहूर्त
सोमवार अथवा शुक्रवार का दिन साधना आरंभ करने हेतु सर्वोत्तम है। तिथियों में हरितालिका तीज, करवा चौथ, नवरात्रि, महाशिवरात्रि और प्रदोष काल में किया गया जप तुरंत फलदायी होता है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त अथवा सायंकाल गोधूलि वेला में जप करें।
दिशा, आसन एवं वस्त्र
जप के समय मुख उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर रखें। उत्तर दिशा माँ पार्वती के पिता हिमालय की दिशा मानी गई है। आसन लाल रंग के ऊन अथवा रेशम का होना चाहिए। साधिका को लाल, गुलाबी अथवा पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
जप माला का चयन
पार्वती मंत्र जप के लिए कमलगट्टे की माला, स्फटिक की माला अथवा रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम मानी गई है। इसके अतिरिक्त चंदन (श्वेत या रक्त) की माला पर भी जप किया जा सकता है। माला को सदैव गोमुखी के भीतर रखकर ही जपें।
सुहाग सामग्री एवं नैवेद्य
माँ पार्वती को सोलह श्रृंगार की सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेहंदी, आलता, चुनरी आदि) अर्पित करें। लाल पुष्प (गुलाब, गुड़हल या कमल) चढ़ाएं। भोग में खीर, मालपुआ, पंचामृत, अनार अथवा नारियल अर्पित करें। शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें।
संकल्प विधि: दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर कहें: "हे जगज्जननी माता पार्वती! हे उमा महेश्वरी! मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अपने जीवन के समस्त अमंगलों के नाश, अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख और (अपनी विशेष मनोकामना) की पूर्ति हेतु आपके पावन मंत्र 'ॐ श्री पार्वत्यै नमः' का (१, ३ या ११ माला) जप करने का संकल्प लेता/लेती हूँ। हे माँ! अपनी कृपा दृष्टि मुझ पर बनाए रखें और मेरी साधना को स्वीकार करें।" संकल्प का जल भूमि पर छोड़ दें।
७. आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक एवं सांसारिक लाभ
नित्य 'ॐ श्री पार्वत्यै नमः' मंत्र का निष्ठापूर्वक जप करने से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:
१. शीघ्र विवाह एवं मनोनुकूल जीवनसाथी
जिन कन्याओं अथवा युवकों के विवाह में अनावश्यक विलंब हो रहा हो, रिश्ते तय होकर टूट जाते हों, उनके लिए यह मंत्र वरदान है। माता पार्वती के आशीर्वाद से गुणवान, चरित्रवान और स्नेही जीवनसाथी की प्राप्ति होती है।
२. दांपत्य कलह की शांति एवं अखंड सौभाग्य
पति-पत्नी के बीच यदि बात-बात पर विवाद होता हो, प्रेम का अभाव हो, तो यह मंत्र दोनों के हृदय में पारस्परिक आकर्षण, आदर और सौहार्द की भावना जगाता है। सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य और वैधव्य दोष से रक्षा प्राप्त होती है।
३. संतान सुख एवं मातृत्व का वरदान
माँ पार्वती कार्तिकेय और गणेश की माता हैं। जिन दंपत्तियों को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, गर्भपात का भय रहता हो, वे यदि नियमपूर्वक इस मंत्र का जप करें तो उन्हें उत्तम और तेजस्वी संतान का सुख प्राप्त होता है।
४. मानसिक सौम्यता, सौंदर्य एवं चंद्र दोष शांति
यह मंत्र मन की चंचलता, क्रोध और चिड़चिड़ेपन को समाप्त कर चेहरे पर एक दिव्य सात्विक तेज और सौम्यता प्रदान करता है। कुंडली में पीड़ित चंद्रमा और शुक्र ग्रह के दोष शांत होकर शुभ फल देने लगते हैं।
८. साधना के नियम एवं सावधानियां (Rules & Precautions)
माँ पार्वती की उपासना में शुचिता और सात्विकता का पालन अनिवार्य है:
- मन और वचन की पवित्रता: जप काल में किसी भी स्त्री का अपमान न करें। सभी स्त्रियों में माँ जगदम्बा का स्वरूप देखें। घर की माता, बहन, पत्नी और कन्या का सदैव सम्मान करें।
- तामसिक पदार्थों का त्याग: मांस, मदिरा, अंडा, नशा, लहसुन और प्याज से पूर्ण दूरी बनाए रखें। पूर्ण सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
- मासिक धर्म के दौरान नियम: मासिक धर्म के दिनों में महिलाएं मूर्ति स्पर्श और पूजा स्थल पर बैठने से बचें। इस दौरान केवल मानसिक रूप से बिना माला के मंत्र का स्मरण किया जा सकता है।
- शिव-पार्वती का संयुक्त ध्यान: माँ पार्वती की पूजा के साथ भगवान शिव का स्मरण अवश्य करें। उमा-महेश्वर की संयुक्त पूजा से साधना का फल अनंत गुना बढ़ जाता है।