१. पवनपुत्र श्री हनुमान एवं 'ॐ श्री हनुमते नमः' मंत्र का स्वरूप
सनातन धर्म में भगवान श्री हनुमान जी को कलिकाल के प्रत्यक्ष जाग्रत और अमर देवता माना गया है। वे अष्टचिरंजीवियों में प्रमुख हैं, जिन्हें भगवान श्री राम और माता जानकी से अजर-अमर होने का वरदान प्राप्त है: 'अजर अमर गुननिधि सुत होऊ। करहुँ बहुत रघुनायक छोऊ॥' हनुमान जी साक्षात भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार हैं, जो अपने भक्तों के समस्त संकटों, भयों, व्याधियों और संतापों को क्षण मात्र में हर लेने के कारण 'संकटमोचन' कहलाते हैं। 'ॐ श्री हनुमते नमः' हनुमान जी का परम पावन, अत्यंत सरल, सुगम और अमोघ शक्ति संपन्न लघु षडक्षर नाम-मंत्र है।
इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर साधक के भीतर असीम आत्म-विश्वास, मानसिक दृढ़ता, शारीरिक बल और परम निर्भयता का संचार करता है। जहाँ आज का आधुनिक मानव मानसिक तनाव, घबराहट, भविष्य की चिंता, अवसाद और असुरक्षा की भावना से त्रस्त है, वहीं 'ॐ श्री हनुमते नमः' का नियमित संकीर्तन एक अभेद्य सुरक्षा-कवच की भाँति आत्मा को संबल प्रदान करता है।
हनुमान जी केवल शारीरिक बल के ही स्वामी नहीं हैं, वे 'बुद्धिमतां वरिष्ठम्' - ज्ञानियों और बुद्धिमानों में भी सर्वोच्च हैं। वे चारों वेदों के प्रकांड विद्वान और नव-व्याकरण के ज्ञाता हैं। इस मंत्र का जप न केवल शारीरिक रोगों और भूत-प्रेत या नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करता है, अपितु यह साधक की बुद्धि को कुशाग्र और विवेक को स्थिर बनाता है। इस मंत्र में किसी भी प्रकार का तांत्रिक दोष या भय नहीं है, इसे कोई भी बालक, वृद्ध, युवा या महिला अत्यंत सहज भाव से जप सकती है।
२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि
॥ मूल श्री हनुमान मंत्र ॥
ॐ श्री हनुमते नमः॥
Oṃ Śrī Hanumate Namaḥ
॥ श्री हनुमान ध्यान श्लोक ॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं,
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं,
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
भावार्थ: जो अतुलित बल के धाम हैं, स्वर्ण पर्वत (सुमेरु) के समान कांतिमान जिनका दिव्य शरीर है, जो दैत्य रूपी वन को भस्म करने के लिए प्रज्वलित अग्नि स्वरूप हैं, ज्ञानियों में जो सबसे आगे गिने जाते हैं, जो समस्त सद्गुणों के भंडार हैं, वानरों के अधिपति हैं और भगवान श्री रघुनाथ जी के परम प्रिय भक्त हैं, उन पवनपुत्र श्री हनुमान जी को मैं शीश नवाकर प्रणाम करता हूँ।
शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'ॐ' का उच्चारण नाभि से ओंकार नाद के रूप में करें। 'श्री' शब्द का उच्चारण दीर्घ ईकार के साथ माँ सीता और लक्ष्मी के सम्मान में कोमलता से करें। 'हनुमते' में 'ह', 'नु', 'म' और 'ते' का स्पष्ट एवं निर्दोष उच्चारण होना चाहिए। अंत में 'नमः' में विसर्ग का उच्चारण एक कोमल 'ह' की ध्वनि के साथ आत्म-समर्पण के भाव से करें। इस मंत्र को उच्चारित करते समय हृदय में वीर रस और भक्ति रस का अद्भुत संतुलन होना चाहिए।
३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ
इस मंत्र के प्रत्येक पद का गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ निम्नलिखित है:
- १. ॐ (प्रणव नाद): ब्रह्मांड का मूल अनाहत नाद, जो समस्त सृष्टि की उत्पत्ति और चेतना का प्रतीक है।
- २. श्री (पराशक्ति व सम्मान बीज): 'श्री' शब्द यहाँ भगवती सीता और दिव्य शोभा का प्रतीक है। हनुमान जी को 'श्री' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे सीता जी द्वारा प्रदत्त अष्ट सिद्धि और नवनिधि के स्वामी हैं।
- ३. हनुमते (हनुमान जी के लिए): संस्कृत में 'हनु' का अर्थ होता है - जबड़ा अथवा अहंकार को नष्ट करने वाला। जब बालपन में हनुमान जी ने सूर्य को निगलने का प्रयास किया था, तब इंद्र के वज्र से उनकी हनु (ठोड़ी) पर आघात हुआ, जिससे उनका नाम 'हनुमान' पड़ा। व्याकरण के अनुसार 'हनुमते' चतुर्थी विभक्ति एकवचन है, जिसका अर्थ है 'महाबली श्री हनुमान के पावन चरणों में समर्पित'।
- ४. नमः (प्रणाम एवं शरणागति): अहंता और ममता का संपूर्ण त्याग। 'हे संकटमोचन! मेरा बल, बुद्धि और सामर्थ्य आपकी कृपा के समक्ष तुच्छ है, मैं आपके चरणों में नतमस्तक हूँ।'
४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य
योग और अध्यात्म के रहस्यमयी विज्ञान में श्री हनुमान जी को 'प्राण तत्व' का साक्षात विग्रह माना गया है। वे 'पवनपुत्र' हैं, अर्थात वायु के पुत्र। हमारे शरीर में जीवन का आधार श्वास (प्राणवायु) है। जब तक शरीर में प्राण का संतुलन है, तब तक स्वास्थ्य, बल, तेज और जीवन है; प्राण के निकलते ही शरीर निष्प्राण हो जाता है। जब साधक 'ॐ श्री हनुमते नमः' का जप करता है, तो उसके शरीर के भीतर प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान - इन पंचप्राणों का अद्भुत संतुलन स्थापित होता है।
शरीर के सात चक्रों में हनुमान जी का संबंध 'अनाहत चक्र' (हृदय) और 'मणिपूरक चक्र' (नाभि) दोनों से है। अनाहत चक्र में भगवान श्री राम और माता जानकी का वास है, जैसा कि हनुमान जी ने अपनी छाती चीर कर प्रत्यक्ष दिखाया था। जब कोई साधक इस मंत्र का जप करता है, तो उसके हृदय से कपट, ईर्ष्या और संकीर्णता समाप्त होकर अनन्य निष्काम भक्ति का प्रादुर्भाव होता है। साथ ही नाभि चक्र जाग्रत होकर साधक को अदम्य साहस और ऊर्जा प्रदान करता है।
हनुमान जी 'अष्ट सिद्धि' (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व, वशित्व) और 'नवनिधि' के दाता हैं। इस मंत्र का नियमित जप करने वाले साधक को भौतिक संसार में किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता। उसके जीवन में विघ्न और संकट वैसे ही भाग जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार का लोप हो जाता है।
५. वैदिक एवं पौराणिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण
भगवान हनुमान जी का वर्णन केवल रामायण में ही नहीं, अपितु ऋग्वेद के वृषाकपि सूक्त (१०.८६) और शिव पुराण के शतरुद्र संहिता में विस्तार से मिलता है:
"प्रणवपूर्वकं मन्त्रं हनुमन्तं समर्चयेत्। सर्वोपद्रवनाशाय सर्वशत्रुविमर्दनम्॥"
- पराशर संहिता
अर्थात: "प्रणव (ॐ) पूर्वक हनुमान जी के नाम-मंत्र का जप समस्त उपद्रवों (प्राकृतिक, दैविक व भौतिक संकटों) का समूल नाश करने वाला और आंतरिक व बाह्य शत्रुओं का मर्दन करने वाला है।"
हनुमान बाहुक में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि कलियुग में जब समस्त औषधियां और उपाय निष्फल हो जाएं, तब केवल श्री हनुमान जी के नाम का स्मरण ही शरीर की भयंकर से भयंकर पीड़ा और असाध्य व्याधियों को शांत कर देता है: 'लागै न कछु उपाइ एको बाहु पीर सों... नाम राम को अंकुस हनुमान महाबली।' वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में हनुमान जी के नाम-स्मरण को समुद्र लांघने का सामर्थ्य देने वाला बताया गया है।
६. संपूर्ण जप विधि, मुहूर्त, माला, दिशा व संकल्प
हनुमान जी के मंत्र जप की शास्त्रीय एवं सात्विक विधि निम्नलिखित है:
शुभ समय एवं वार
मंगलवार अथवा शनिवार का दिन हनुमान साधना का शुभारंभ करने हेतु सर्वोत्तम है। समय के संदर्भ में प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त अथवा संध्याकाल (गोधूलि वेला) में किया गया जप सर्वाधिक फलदायी होता है। हनुमान जयंती, बुढ़वा मंगल, नवरात्रि और मंगलवार को किया गया जप तुरंत प्रभावी होता है।
दिशा, आसन एवं वस्त्र
जप के समय साधक का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। संकट निवारण हेतु दक्षिणमुखी हनुमान जी के समक्ष बैठकर उत्तर दिशा में मुख करके जप करें। आसन लाल रंग के ऊन अथवा कंबल का होना चाहिए। साधक को स्वयं लाल अथवा नारंगी (भगवा) रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
जप माला का चयन
हनुमान जी के मंत्र जप के लिए रुद्राक्ष की माला (पंचमुखी रुद्राक्ष) अथवा रक्त चंदन की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इसके अतिरिक्त तुलसी की माला पर भी जप किया जा सकता है। माला को गोमुखी के भीतर रखकर ही जपें और जप के समय मनके न खींचे, अंगूठे और मध्यमा उंगली से फेरें।
नैवेद्य एवं सिंदूर अर्पण
हनुमान जी के चित्र या विग्रह के समक्ष चमेली के तेल अथवा गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। सिंदूर, लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब) और जनेऊ अर्पित करें। भोग में गुड़-चना, बूंदी, बेसन के लड्डू, केला अथवा मीठा पान अर्पित करें। तुलसी दल भोग में अवश्य रखें क्योंकि हनुमान जी राम-नाम और तुलसी से परम तृप्त होते हैं।
संकल्प विधि: दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर यह संकल्प लें: "हे पवनपुत्र संकटमोचन श्री हनुमान जी! मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अपनी इस मनोकामना (कार्य का नाम अथवा भय मुक्ति) की सिद्धि हेतु आपके पावन मंत्र 'ॐ श्री हनुमते नमः' का (१, ५ या ११ माला) जप करने का संकल्प लेता हूँ। मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें और मेरे समस्त विघ्नों का नाश करें।" संकल्प का जल धरती पर छोड़ दें।
७. आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक एवं ज्योतिषीय लाभ
प्रतिदिन 'ॐ श्री हनुमते नमः' मंत्र का निष्ठापूर्वक जप करने से साधक को निम्नलिखित विलक्षण लाभ प्राप्त होते हैं:
१. भय, अवसाद एवं नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति
यह मंत्र साधक के आभामंडल को इतना शक्तिशाली बना देता है कि किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति, बुरी नज़र, भूत-प्रेत बाधा अथवा तांत्रिक षड्यंत्र उसके पास नहीं फटकते। रात में डरावने सपने आने, अनिद्रा या फोबिया से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह मंत्र एक संजीवनी औषधि है।
२. असीम आत्म-विश्वास एवं निर्णय क्षमता
हनुमान जी समुद्र लांघने का साहस रखते हैं। इस मंत्र के जप से व्यक्ति का आत्म-बल जाग उठता है। साक्षात्कार , प्रतियोगी परीक्षा, जन-संबोधन या बड़े व्यावसायिक निर्णयों के समय इस मंत्र का जप साधक को निर्भय बनाकर विजय दिलाता है।
३. शनि दोष एवं मंगल दोष का शमन
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रावण के कारागार से शनिदेव को मुक्त कराने के कारण शनिदेव ने हनुमान जी के भक्तों को कभी भी कष्ट न देने का वचन दिया था। अतः जो व्यक्ति साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा मंगल की महादशा से पीड़ित हैं, उनके लिए यह मंत्र ढाल बनकर ग्रहों के कुप्रभाव को निष्फल कर देता है।
४. शारीरिक आरोग्य एवं दीर्घायु
'नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥' इस मंत्र का जप रक्त संचार को दुरुस्त करता है, प्राणशक्ति बढ़ाता है और असाध्य रोगों से लड़ने की आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है।
८. जप के अनिवार्य नियम एवं सावधानियां (Rules & Precautions)
हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी और अत्यंत पावन देव हैं। उनकी साधना में मर्यादा और सात्विकता का पालन अनिवार्य है:
- ब्रह्मचर्य एवं शुचिता: जप के दिनों में काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और परनिंदा से दूर रहें। मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- तामसिक भोजन का त्याग: मांस, मदिरा, अंडा, लहसुन और प्याज का पूर्ण त्याग करें। पूर्ण सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
- महिलाओं हेतु नियम: सनातन धर्म में महिलाएं हनुमान जी को अपना पुत्र या भ्राता मानकर पूजा कर सकती हैं। वे मंत्र जप, आरती और चालीसा का पाठ कर सकती हैं, केवल हनुमान जी के विग्रह को सिंदूर लगाने और सीधे स्पर्श करने से परहेज करना चाहिए। मासिक धर्म के दौरान जप मानसिक रूप से किया जा सकता है, पूजा स्थल पर नहीं बैठना चाहिए।
- भगवान राम का स्मरण: हनुमान जी राम-नाम के बिना कभी तृप्त नहीं होते। अतः इस मंत्र के जप से पूर्व कम से कम ११ बार 'श्री राम जय राम जय जय राम' अथवा 'जय श्री राम' का संकीर्तन अवश्य करें। इससे हनुमान जी तुरंत प्रसन्न होते हैं।