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भगवान शिव कृपा · श्री हनुमान जी महाराज Devotion

हनुमान मंत्र – ॐ श्री हनुमते नमः: अर्थ, जप विधि, रुद्राक्ष माला नियम, लाभ व शास्त्र प्रमाण

श्री हनुमान जी का शक्तिशाली संकटमोचन मंत्र "ॐ श्री हनुमते नमः" का शुद्ध उच्चारण, पद-पद शब्दार्थ, रुद्राक्ष माला जप विधि, मंगलवार नियम, भय मुक्ति लाभ एवं सम्पूर्ण शास्त्रीय प्रमाण।

इष्ट देव श्री हनुमान जी महाराज
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय
अनुशंसित माला रुद्राक्ष माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ श्री हनुमते नमः

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

१. पवनपुत्र श्री हनुमान एवं 'ॐ श्री हनुमते नमः' मंत्र का स्वरूप

सनातन धर्म में भगवान श्री हनुमान जी को कलिकाल के प्रत्यक्ष जाग्रत और अमर देवता माना गया है। वे अष्टचिरंजीवियों में प्रमुख हैं, जिन्हें भगवान श्री राम और माता जानकी से अजर-अमर होने का वरदान प्राप्त है: 'अजर अमर गुननिधि सुत होऊ। करहुँ बहुत रघुनायक छोऊ॥' हनुमान जी साक्षात भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार हैं, जो अपने भक्तों के समस्त संकटों, भयों, व्याधियों और संतापों को क्षण मात्र में हर लेने के कारण 'संकटमोचन' कहलाते हैं। 'ॐ श्री हनुमते नमः' हनुमान जी का परम पावन, अत्यंत सरल, सुगम और अमोघ शक्ति संपन्न लघु षडक्षर नाम-मंत्र है।

इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर साधक के भीतर असीम आत्म-विश्वास, मानसिक दृढ़ता, शारीरिक बल और परम निर्भयता का संचार करता है। जहाँ आज का आधुनिक मानव मानसिक तनाव, घबराहट, भविष्य की चिंता, अवसाद और असुरक्षा की भावना से त्रस्त है, वहीं 'ॐ श्री हनुमते नमः' का नियमित संकीर्तन एक अभेद्य सुरक्षा-कवच की भाँति आत्मा को संबल प्रदान करता है।

हनुमान जी केवल शारीरिक बल के ही स्वामी नहीं हैं, वे 'बुद्धिमतां वरिष्ठम्' - ज्ञानियों और बुद्धिमानों में भी सर्वोच्च हैं। वे चारों वेदों के प्रकांड विद्वान और नव-व्याकरण के ज्ञाता हैं। इस मंत्र का जप न केवल शारीरिक रोगों और भूत-प्रेत या नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करता है, अपितु यह साधक की बुद्धि को कुशाग्र और विवेक को स्थिर बनाता है। इस मंत्र में किसी भी प्रकार का तांत्रिक दोष या भय नहीं है, इसे कोई भी बालक, वृद्ध, युवा या महिला अत्यंत सहज भाव से जप सकती है।

२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि

॥ मूल श्री हनुमान मंत्र ॥

ॐ श्री हनुमते नमः॥

Oṃ Śrī Hanumate Namaḥ


॥ श्री हनुमान ध्यान श्लोक ॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं,
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं,
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

भावार्थ: जो अतुलित बल के धाम हैं, स्वर्ण पर्वत (सुमेरु) के समान कांतिमान जिनका दिव्य शरीर है, जो दैत्य रूपी वन को भस्म करने के लिए प्रज्वलित अग्नि स्वरूप हैं, ज्ञानियों में जो सबसे आगे गिने जाते हैं, जो समस्त सद्गुणों के भंडार हैं, वानरों के अधिपति हैं और भगवान श्री रघुनाथ जी के परम प्रिय भक्त हैं, उन पवनपुत्र श्री हनुमान जी को मैं शीश नवाकर प्रणाम करता हूँ।

शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'ॐ' का उच्चारण नाभि से ओंकार नाद के रूप में करें। 'श्री' शब्द का उच्चारण दीर्घ ईकार के साथ माँ सीता और लक्ष्मी के सम्मान में कोमलता से करें। 'हनुमते' में 'ह', 'नु', 'म' और 'ते' का स्पष्ट एवं निर्दोष उच्चारण होना चाहिए। अंत में 'नमः' में विसर्ग का उच्चारण एक कोमल 'ह' की ध्वनि के साथ आत्म-समर्पण के भाव से करें। इस मंत्र को उच्चारित करते समय हृदय में वीर रस और भक्ति रस का अद्भुत संतुलन होना चाहिए।

३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ

इस मंत्र के प्रत्येक पद का गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ निम्नलिखित है:

  • १. ॐ (प्रणव नाद): ब्रह्मांड का मूल अनाहत नाद, जो समस्त सृष्टि की उत्पत्ति और चेतना का प्रतीक है।
  • २. श्री (पराशक्ति व सम्मान बीज): 'श्री' शब्द यहाँ भगवती सीता और दिव्य शोभा का प्रतीक है। हनुमान जी को 'श्री' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे सीता जी द्वारा प्रदत्त अष्ट सिद्धि और नवनिधि के स्वामी हैं।
  • ३. हनुमते (हनुमान जी के लिए): संस्कृत में 'हनु' का अर्थ होता है - जबड़ा अथवा अहंकार को नष्ट करने वाला। जब बालपन में हनुमान जी ने सूर्य को निगलने का प्रयास किया था, तब इंद्र के वज्र से उनकी हनु (ठोड़ी) पर आघात हुआ, जिससे उनका नाम 'हनुमान' पड़ा। व्याकरण के अनुसार 'हनुमते' चतुर्थी विभक्ति एकवचन है, जिसका अर्थ है 'महाबली श्री हनुमान के पावन चरणों में समर्पित'।
  • ४. नमः (प्रणाम एवं शरणागति): अहंता और ममता का संपूर्ण त्याग। 'हे संकटमोचन! मेरा बल, बुद्धि और सामर्थ्य आपकी कृपा के समक्ष तुच्छ है, मैं आपके चरणों में नतमस्तक हूँ।'

४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं आध्यात्मिक रहस्य

योग और अध्यात्म के रहस्यमयी विज्ञान में श्री हनुमान जी को 'प्राण तत्व' का साक्षात विग्रह माना गया है। वे 'पवनपुत्र' हैं, अर्थात वायु के पुत्र। हमारे शरीर में जीवन का आधार श्वास (प्राणवायु) है। जब तक शरीर में प्राण का संतुलन है, तब तक स्वास्थ्य, बल, तेज और जीवन है; प्राण के निकलते ही शरीर निष्प्राण हो जाता है। जब साधक 'ॐ श्री हनुमते नमः' का जप करता है, तो उसके शरीर के भीतर प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान - इन पंचप्राणों का अद्भुत संतुलन स्थापित होता है।

शरीर के सात चक्रों में हनुमान जी का संबंध 'अनाहत चक्र' (हृदय) और 'मणिपूरक चक्र' (नाभि) दोनों से है। अनाहत चक्र में भगवान श्री राम और माता जानकी का वास है, जैसा कि हनुमान जी ने अपनी छाती चीर कर प्रत्यक्ष दिखाया था। जब कोई साधक इस मंत्र का जप करता है, तो उसके हृदय से कपट, ईर्ष्या और संकीर्णता समाप्त होकर अनन्य निष्काम भक्ति का प्रादुर्भाव होता है। साथ ही नाभि चक्र जाग्रत होकर साधक को अदम्य साहस और ऊर्जा प्रदान करता है।

हनुमान जी 'अष्ट सिद्धि' (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व, वशित्व) और 'नवनिधि' के दाता हैं। इस मंत्र का नियमित जप करने वाले साधक को भौतिक संसार में किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता। उसके जीवन में विघ्न और संकट वैसे ही भाग जाते हैं, जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार का लोप हो जाता है।

५. वैदिक एवं पौराणिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण

भगवान हनुमान जी का वर्णन केवल रामायण में ही नहीं, अपितु ऋग्वेद के वृषाकपि सूक्त (१०.८६) और शिव पुराण के शतरुद्र संहिता में विस्तार से मिलता है:

"प्रणवपूर्वकं मन्त्रं हनुमन्तं समर्चयेत्। सर्वोपद्रवनाशाय सर्वशत्रुविमर्दनम्॥"
- पराशर संहिता

अर्थात: "प्रणव (ॐ) पूर्वक हनुमान जी के नाम-मंत्र का जप समस्त उपद्रवों (प्राकृतिक, दैविक व भौतिक संकटों) का समूल नाश करने वाला और आंतरिक व बाह्य शत्रुओं का मर्दन करने वाला है।"

हनुमान बाहुक में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि कलियुग में जब समस्त औषधियां और उपाय निष्फल हो जाएं, तब केवल श्री हनुमान जी के नाम का स्मरण ही शरीर की भयंकर से भयंकर पीड़ा और असाध्य व्याधियों को शांत कर देता है: 'लागै न कछु उपाइ एको बाहु पीर सों... नाम राम को अंकुस हनुमान महाबली।' वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में हनुमान जी के नाम-स्मरण को समुद्र लांघने का सामर्थ्य देने वाला बताया गया है।

६. संपूर्ण जप विधि, मुहूर्त, माला, दिशा व संकल्प

हनुमान जी के मंत्र जप की शास्त्रीय एवं सात्विक विधि निम्नलिखित है:

शुभ समय एवं वार

मंगलवार अथवा शनिवार का दिन हनुमान साधना का शुभारंभ करने हेतु सर्वोत्तम है। समय के संदर्भ में प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त अथवा संध्याकाल (गोधूलि वेला) में किया गया जप सर्वाधिक फलदायी होता है। हनुमान जयंती, बुढ़वा मंगल, नवरात्रि और मंगलवार को किया गया जप तुरंत प्रभावी होता है।

दिशा, आसन एवं वस्त्र

जप के समय साधक का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। संकट निवारण हेतु दक्षिणमुखी हनुमान जी के समक्ष बैठकर उत्तर दिशा में मुख करके जप करें। आसन लाल रंग के ऊन अथवा कंबल का होना चाहिए। साधक को स्वयं लाल अथवा नारंगी (भगवा) रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।

जप माला का चयन

हनुमान जी के मंत्र जप के लिए रुद्राक्ष की माला (पंचमुखी रुद्राक्ष) अथवा रक्त चंदन की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इसके अतिरिक्त तुलसी की माला पर भी जप किया जा सकता है। माला को गोमुखी के भीतर रखकर ही जपें और जप के समय मनके न खींचे, अंगूठे और मध्यमा उंगली से फेरें।

नैवेद्य एवं सिंदूर अर्पण

हनुमान जी के चित्र या विग्रह के समक्ष चमेली के तेल अथवा गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। सिंदूर, लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब) और जनेऊ अर्पित करें। भोग में गुड़-चना, बूंदी, बेसन के लड्डू, केला अथवा मीठा पान अर्पित करें। तुलसी दल भोग में अवश्य रखें क्योंकि हनुमान जी राम-नाम और तुलसी से परम तृप्त होते हैं।

संकल्प विधि: दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और दक्षिणा लेकर यह संकल्प लें: "हे पवनपुत्र संकटमोचन श्री हनुमान जी! मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अपनी इस मनोकामना (कार्य का नाम अथवा भय मुक्ति) की सिद्धि हेतु आपके पावन मंत्र 'ॐ श्री हनुमते नमः' का (१, ५ या ११ माला) जप करने का संकल्प लेता हूँ। मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें और मेरे समस्त विघ्नों का नाश करें।" संकल्प का जल धरती पर छोड़ दें।

७. आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक एवं ज्योतिषीय लाभ

प्रतिदिन 'ॐ श्री हनुमते नमः' मंत्र का निष्ठापूर्वक जप करने से साधक को निम्नलिखित विलक्षण लाभ प्राप्त होते हैं:

१. भय, अवसाद एवं नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति

यह मंत्र साधक के आभामंडल को इतना शक्तिशाली बना देता है कि किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति, बुरी नज़र, भूत-प्रेत बाधा अथवा तांत्रिक षड्यंत्र उसके पास नहीं फटकते। रात में डरावने सपने आने, अनिद्रा या फोबिया से पीड़ित व्यक्तियों के लिए यह मंत्र एक संजीवनी औषधि है।

२. असीम आत्म-विश्वास एवं निर्णय क्षमता

हनुमान जी समुद्र लांघने का साहस रखते हैं। इस मंत्र के जप से व्यक्ति का आत्म-बल जाग उठता है। साक्षात्कार , प्रतियोगी परीक्षा, जन-संबोधन या बड़े व्यावसायिक निर्णयों के समय इस मंत्र का जप साधक को निर्भय बनाकर विजय दिलाता है।

३. शनि दोष एवं मंगल दोष का शमन

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, रावण के कारागार से शनिदेव को मुक्त कराने के कारण शनिदेव ने हनुमान जी के भक्तों को कभी भी कष्ट न देने का वचन दिया था। अतः जो व्यक्ति साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा मंगल की महादशा से पीड़ित हैं, उनके लिए यह मंत्र ढाल बनकर ग्रहों के कुप्रभाव को निष्फल कर देता है।

४. शारीरिक आरोग्य एवं दीर्घायु

'नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥' इस मंत्र का जप रक्त संचार को दुरुस्त करता है, प्राणशक्ति बढ़ाता है और असाध्य रोगों से लड़ने की आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करता है।

८. जप के अनिवार्य नियम एवं सावधानियां (Rules & Precautions)

हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी और अत्यंत पावन देव हैं। उनकी साधना में मर्यादा और सात्विकता का पालन अनिवार्य है:

  • ब्रह्मचर्य एवं शुचिता: जप के दिनों में काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और परनिंदा से दूर रहें। मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • तामसिक भोजन का त्याग: मांस, मदिरा, अंडा, लहसुन और प्याज का पूर्ण त्याग करें। पूर्ण सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
  • महिलाओं हेतु नियम: सनातन धर्म में महिलाएं हनुमान जी को अपना पुत्र या भ्राता मानकर पूजा कर सकती हैं। वे मंत्र जप, आरती और चालीसा का पाठ कर सकती हैं, केवल हनुमान जी के विग्रह को सिंदूर लगाने और सीधे स्पर्श करने से परहेज करना चाहिए। मासिक धर्म के दौरान जप मानसिक रूप से किया जा सकता है, पूजा स्थल पर नहीं बैठना चाहिए।
  • भगवान राम का स्मरण: हनुमान जी राम-नाम के बिना कभी तृप्त नहीं होते। अतः इस मंत्र के जप से पूर्व कम से कम ११ बार 'श्री राम जय राम जय जय राम' अथवा 'जय श्री राम' का संकीर्तन अवश्य करें। इससे हनुमान जी तुरंत प्रसन्न होते हैं।

९. प्रामाणिक प्रश्नोत्तरी

हाँ, बिल्कुल कर सकती हैं। हनुमान जी माता सीता के परम प्रिय पुत्र हैं। माता सीता ने उन्हें अजर-अमर होने का आशीष दिया था। महिलाएं हनुमान जी को अपने पुत्र, भाई या रक्षक के रूप में मानकर प्रेमपूर्वक इस मंत्र का जप कर सकती हैं। बस मूर्ति स्पर्श और सिंदूर लेपन से परहेज करना चाहिए।

दैनिक जीवन में १ माला (१०८ बार) जप पर्याप्त है। यदि कोई अत्यंत गंभीर संकट, भय या मुकदमा चल रहा हो, तो मंगलवार या शनिवार से प्रारंभ करके लगातार २१ अथवा ४० दिनों तक प्रतिदिन ११ माला का अनुष्ठान करें। इसके साथ ही एक बार सुंदरकांड का पाठ करना अत्यंत चमत्कारी फल देता है।

हाँ। शास्त्रों के अनुसार, हनुमान जी की उपासना करने वाले भक्त पर शनि का कुप्रभाव निष्प्रभावी हो जाता है। शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष के नीचे या हनुमान मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाकर 'ॐ श्री हनुमते नमः' का जप करने से शनि की पीड़ा तुरंत शांत होती है।

'ॐ श्री हनुमते नमः' एक सरल और सात्विक नाम-मंत्र है। इसके लिए तांत्रिक दीक्षा की अनिवार्यता नहीं है। आप भगवान श्री राम अथवा स्वयं हनुमान जी को अपना गुरु मानकर अत्यंत सहजता और पूर्ण श्रद्धा के साथ इसका जप प्रारंभ कर सकते हैं।

गृहस्थ घर के पूजा मंदिर में हनुमान जी की सौम्य मुद्रा वाली प्रतिमा अथवा चित्र रखना चाहिए (जैसे राम दरबार में हाथ जोड़े बैठे हुए हनुमान जी अथवा ध्यान मग्न हनुमान जी)। उग्र, युद्धरत या छाती चीरती हुई प्रतिमा गृहस्थों को घर के मंदिर में नहीं रखनी चाहिए।

वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

वैदिक ग्रंथों में वर्णित महत्व व कथा

Hanuman Mantra: Om Shri Hanumate Namah – Meaning, Benefits का महत्व और दिव्य पृष्ठभूमि

Hanuman Mantra: Om Shri Hanumate Namah – Meaning, Benefits सनातन धर्म में अत्यंत प्रभावशाली और जाग्रत मंत्र माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, इस मंत्र का नियमित जप करने से साधक को भगवान Hanuman का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। जब मनुष्य जीवन में कठिनाइयों, मानसिक अशांति या स्वास्थ्य समस्याओं से घिर जाता है, तब Hanuman की आराधना और इस महामंत्र का जप एक अचूक कवच की तरह कार्य करता है। यह मंत्र न केवल हमारे बाह्य जीवन को संतुलित करता है, बल्कि हमारे सूक्ष्म शरीर और चक्रों को भी ऊर्जावान बनाता है। जब साधक पूर्ण श्रद्धा के साथ इस दिव्य ध्वनि का उच्चारण करता है, तो उसके भीतर की सुप्त चेतना जागृत होने लगती है और ईश्वरीय सत्ता से उसका संबंध प्रगाढ़ होता है।

मंत्र का जप करने की सही शास्त्रोक्त विधि

मंत्र साधना की पूर्ण सफलता के लिए शास्त्रों में एक निश्चित विधि और नियम बताए गए हैं। इस मंत्र का जप करते समय निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है:

  • उत्तम समय : इस मंत्र के जाप के लिए सर्वोत्तम समय ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय माना जाता है। इस समय प्रकृति में सत्व गुण की प्रधानता होती है जिससे मन आसानी से एकाग्र हो जाता है।
  • दिशा और आसन: साधक को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठना चाहिए।
  • जाप माला : इस दिव्य मंत्र का जप करने के लिए रुद्राक्ष माला का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • जप संख्या : प्रतिदिन कम से कम 108 बार (एक माला) जप करना अत्यंत फलदायी होता है।

मंत्र के दिव्य लाभ

नियमित रूप से इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति: मंत्र की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को शांत करती हैं जिससे अनिद्रा, भय और चिंता का नाश होता है। यह मानसिक साहस को बढ़ाता है।
  2. सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह: घर के वातावरण में सकारात्मक कंपन उत्पन्न होते हैं जिससे वास्तु दोष और बुरी नजर का प्रभाव समाप्त होता है।
  3. शारीरिक आरोग्यता: ध्वनि कंपन से शरीर के भीतर के चक्र सक्रिय होते हैं, जो रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाते हैं। विशेषकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति। में लाभ होता है।
  4. आध्यात्मिक उन्नति: साधक का मन अंतर्मुखी होता है, ध्यान में गहराई आती है और मानसिक एकाग्रता का विकास होता है।

जाप के दौरान सावधानियां

मंत्र जप एक अत्यंत संवेदनशील साधना है। जप के दौरान मन में किसी के प्रति द्वेष भावना न रखें। आचरण सात्विक रखें, मांसाहार और मद्यपान से पूर्णतः दूर रहें। मंत्र का उच्चारण स्पष्ट और शांत कंठ से करें, अधिक जोर से चिल्लाकर या अत्यंत मंद गति से न बोलें। साधना काल में ब्रह्मचर्य और सादगी का पालन करने से मंत्र की शक्ति शीघ्र जाग्रत होती है। मुख्य सावधानी के रूप में: स्वच्छता का ध्यान रखें, पूर्ण श्रद्धा और मौन भाव से जप करें। का सदैव पालन करना चाहिए।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
सकारात्मक ऊर्जा का संचार, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति।
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
स्वच्छता का ध्यान रखें, पूर्ण श्रद्धा और मौन भाव से जप करें।

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय में रुद्राक्ष माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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