१. देवाधिदेव भगवान श्री नारायण एवं अष्टाक्षर महामंत्र का स्वरूप
सनातन वैदिक संस्कृति में भगवान श्रीमन नारायण को संपूर्ण सृष्टि के परम आधार, पालनकर्ता और जीवों के अंतिम आश्रय स्थल के रूप में वंदित किया गया है। वेद कहते हैं: 'नारायण परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः। नारायण परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः॥' (महानारायण उपनिषद्) - अर्थात नारायण ही परम ब्रह्म हैं, नारायण ही सर्वोच्च सत्य हैं, नारायण ही परम प्रकाश हैं और नारायण ही परमात्मा हैं। भगवान नारायण की कृपा प्राप्ति, संसार के जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति और वैकुंठ लोक की प्राप्ति हेतु वेदों और उपनिषदों में प्रकट 'ॐ नमो नारायणाय' को 'अष्टाक्षर महामंत्र' कहा गया है।
यह महामंत्र आठ अत्यंत पावन अक्षरों (ॐ - न - मो - ना - रा - य - णा - य) से मिलकर बना है। वैष्णव संप्रदायों (श्री संप्रदाय, रामानुज परंपरा, निम्बार्क और माध्व संप्रदाय) में अष्टाक्षर मंत्र को समस्त मंत्रों का राजा और साक्षात् 'तारक ब्रह्म' माना गया है। जगतगुरु श्री रामानुजाचार्य जी ने इस मंत्र की महिमा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए तिरुक्कोट्टियूर मंदिर के विशाल गोपुरम (शिखर) पर चढ़कर समस्त जनसाधारण को इसका उपदेश दिया था, ताकि प्रत्येक प्राणी संसार-सागर से तर सके।
इस मंत्र का जप साधक के अंतःकरण को क्षीरसागर के समान शांत, निर्मल और सात्विक बना देता है। जब मन में घोर अशांति, चिंता, पारिवारिक कलह या निराशा छाई हो, तब 'ॐ नमो नारायणाय' का संकीर्तन मन को सीधे परमात्मा के अभय चरणों से जोड़कर असीम आनंद और सुरक्षा का अनुभव कराता है।
२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि
॥ मूल वैष्णव अष्टाक्षर महामंत्र ॥
ॐ नमो नारायणाय॥
Oṃ Namo Nārāyaṇāya
॥ श्री नारायण ध्यान श्लोक ॥
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
भावार्थ: जिनकी आकृति परम शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के भी ईश्वर हैं, जो संपूर्ण विश्व के आधार हैं, आकाश के समान जो सर्वव्यापी हैं, मेघ के समान जिनका श्याम-सुंदर वर्ण है, जिनके अंग परम कल्याणकारी हैं, जो लक्ष्मीपति हैं, कमल के समान जिनके सुंदर नेत्र हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान में जानने योग्य हैं, संपूर्ण भवों (संसार के जन्म-मरण) के भय को हरने वाले और समस्त लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान श्री विष्णु-नारायण को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ नारायण सूक्त स्तुति ॥
यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन् दृश्यते श्रूयतेऽपि वा।
अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः॥
भावार्थ: इस संसार में जो कुछ भी देखा अथवा सुना जाता है, उस समस्त चराचर जगत के भीतर और बाहर सब जगह भगवान नारायण ही पूर्णतः व्याप्त होकर स्थित हैं।
शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'ॐ' का उच्चारण नाभि से ओंकार नाद के साथ धीर-गंभीर भाव से करें। 'नमो' में 'मो' पर कोमल विश्राम लें। 'नारायणाय' में 'णा' का उच्चारण मूर्धन्य नासिका से स्पष्ट होना चाहिए (ना-रा-य-णा-य)। अंत में विसर्ग नहीं है, अतः 'य' का उच्चारण पूर्ण एवं शांत रूप से समाप्त करें। मंत्र का जप अत्यंत विनीत, शांत और शरणागति के भाव से किया जाना चाहिए।
३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ
इस अष्टाक्षर महामंत्र के प्रत्येक पद का गहरा व्याकरणिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक विश्लेषण निम्नलिखित है:
- १. ॐ (प्रणव नाद - एकाक्षर): समस्त वेदों का सार और परब्रह्म की शाश्वत ध्वनि। अकार (सृष्टि/विष्णु), उकार (स्थिति/लक्ष्मी) और मकार (जीव/चेतना) का एकत्व।
- २. नमः (प्रणाम व शरणागति - द्वयक्षर 'न' और 'मः'): 'न मम्' - यह मेरा नहीं है। जीव की अहंता (मैं कर्ता हूँ) और ममता (यह मेरा है) का पूर्ण विसर्जन। 'हे नारायण! मेरा अस्तित्व आपके चरणों में समर्पित है।'
- ३. नारायणाय (परमपिता नारायण के निमित्त - पञ्चाक्षर 'ना-रा-य-णा-य'):
- 'नर' का अर्थ है - अविनाशी परमात्मा और उनसे उत्पन्न समस्त आत्माएं (जीव)।
- 'अयन' का अर्थ है - आश्रय स्थल या अंतिम गंतव्य।
- 'नराणां अयनानि यस्मिन् सः नारायणः' - समस्त जीव जिसके भीतर वास करते हैं और जो समस्त जीवों के भीतर अंतर्यामी रूप से वास करता है, वह नारायण है। 'नारायणाय' का अर्थ है 'उन परमेश्वर नारायण के निमित्त'।
४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं रामानुज परंपरा का शरणागति रहस्य
विशिष्टाद्वैत दर्शन में अष्टाक्षर मंत्र को 'प्रपत्ति' (पूर्ण शरणागति) का सर्वोत्तम साधन माना गया है। शरणागति के छह अंग बताए गए हैं: आनुकूल्यस्य संकल्पः, प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्, रक्षिष्यतीति विश्वासः, गोप्तृत्ववरणं तथा, आत्मनिक्षेपकार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः। इसका अर्थ है - भगवान के अनुकूल आचरण करना, प्रतिकूल आचरण का त्याग करना, यह अटूट विश्वास रखना कि नारायण मेरी रक्षा करेंगे, नारायण को ही अपना एकमात्र रक्षक चुनना, अपने आपको पूरी तरह उनके चरणों में सौंप देना, और अपनी दीनता स्वीकार करना।
जब साधक 'ॐ नमो नारायणाय' का जप करता है, तो उसके भीतर का अहंकार, जो आत्मा और परमात्मा के बीच सबसे बड़ी दीवार है, वह ढह जाता है। शरीर के चक्रों में यह मंत्र सीधे 'अनाहत चक्र' (हृदय) और 'सहस्रार चक्र' को सक्रिय करता है। अनाहत चक्र में नारायण और लक्ष्मी का वास होने से साधक का हृदय प्रेम, क्षमा, दया और आनंद से भर जाता है।
योगशास्त्र के अनुसार, अष्टाक्षर मंत्र के आठ अक्षर हमारे शरीर की 'अष्टधा प्रकृति' (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार) को शुद्ध कर परमात्मा के दिव्य स्वरूप में लीन कर देते हैं।
५. वैदिक एवं पौराणिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण
अष्टाक्षर नारायण महामंत्र का मूल स्रोत सामवेद के अंतर्गत आने वाले 'नारायण उपनिषद्' में साक्षात् ब्रह्मा जी द्वारा प्रकट हुआ है:
"ॐ इत्येकाक्षरम्। नम इति द्वे अक्षरे। नारायणायेति पञ्चाक्षराणि। एतद्वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदम्। यो ह वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदमध्य्येति अनपब्रुवः सर्वमायुरेति विन्दते प्राजापत्यं रायस्पोषं गौपत्यं ततोऽमृतत्वमश्नुते॥"
- नारायणोपनिषद्, तृतीय खंड
अर्थात: "ॐ एकाक्षर है, नमः दो अक्षर हैं, और नारायणाय पांच अक्षर हैं। यह नारायण का अष्टाक्षर पद है। जो कोई भी इस अष्टाक्षर मंत्र का नित्य अध्ययन व जप करता है, वह निष्पाप होकर पूर्णायु प्राप्त करता है, संतान, धन, गौ-धन पाता है और अंत में मोक्ष (अमृतत्व) को प्राप्त कर लेता है।"
पद्म पुराण (उत्तर खंड) में भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं: 'अष्टाक्षरो महामन्त्रः सर्वमन्त्रेषु चोत्तमः' (समस्त मंत्रों में अष्टाक्षर मंत्र सर्वोत्तम है)। श्रीमद्भागवत महापुराण के षष्ठ स्कंध में अजामिल उद्धार के प्रसंग में वर्णन आता है कि मरते समय केवल अपने पुत्र 'नारायण' का नाम पुकारने मात्र से ही यमदूत भाग गए और विष्णुदूतों ने आकर अजामिल को वैकुंठ पहुँचा दिया। जब अनजाने में लिया गया नारायण नाम इतना समर्थ है, तो श्रद्धापूर्वक जपे गए मंत्र का फल कितना अनंत होगा!
॥ तिरुक्कोट्टियूर गोपुरम पर स्वामी रामानुजाचार्य का महान त्याग ॥
ऐतिहासिक वैष्णव परंपरा के अनुसार, जब स्वामी रामानुजाचार्य जी को उनके गुरु तिरुक्कोट्टियूर नांबी ने यह अष्टाक्षर मंत्र यह कहकर दिया कि 'यह गुप्त मंत्र है, इसे किसी को मत बताना, अन्यथा तुम नरक में जाओगे।' तब दयानिधि रामानुजाचार्य जी ने विचार किया कि 'यदि मेरे अकेले के नरक जाने से इस मंत्र को सुनकर हजारों-लाखों जीवों का उद्धार हो सकता है, तो मुझे सहर्ष नरक जाना स्वीकार है।' वे तुरंत मंदिर के शिखर पर चढ़ गए और पूरे नगर के नर-नारियों को पुकारकर 'ॐ नमो नारायणाय' महामंत्र का दान कर दिया। गुरु ने उनके इस असीम करुणा भाव को देखकर उन्हें गले से लगा लिया।
६. संपूर्ण जप विधि, मुहूर्त, माला, दिशा व संकल्प
अष्टाक्षर नारायण महामंत्र की शास्त्रीय, प्रामाणिक एवं सात्विक जप विधि निम्नलिखित है:
शुभ वार, तिथि एवं मुहूर्त
गुरुवार अथवा एकादशी तिथि (शुक्ल व कृष्ण पक्ष) इस साधना का शुभारंभ करने हेतु सर्वोत्तम है। वैकुंठ एकादशी, अनंत चतुर्दशी, देवशयनी व देवउठनी एकादशी पर किया गया जप महासिद्धिदायक होता है। समय के लिए प्रातः ब्रह्ममुहूर्त अथवा संध्या संधिवेला उत्तम है।
दिशा, आसन एवं वस्त्र
जप के समय मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें। पीले रंग के ऊन अथवा कुश का आसन बिछाएं। साधक को स्वयं पीले अथवा श्वेत स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। ललाट पर गोपीचंदन का ऊर्ध्वपुण्ड्र (वैष्णव तिलक) लगाना अत्यंत शुभ होता है।
जप माला का चयन
भगवान नारायण की साधना में तुलसी की माला ही सर्वोपरि और अनिवार्य मानी गई है। तुलसी भगवान नारायण को प्राणों से भी अधिक प्रिय है। यदि तुलसी माला न हो, तो श्वेत या पीत चंदन की माला पर जप करें। माला को गोमुखी में रखकर अनामिका व कनिष्ठिका के स्पर्श से बचाते हुए अंगूठे व मध्यमा से जपें।
नैवेद्य एवं शालिग्राम अर्पण
भगवान नारायण अथवा शालिग्राम शिला पर तुलसी पत्र, पीले पुष्प और पीला चंदन अर्पित करें। नैवेद्य में पंचामृत, तुलसी दल युक्त खीर, पंजीरी, माखन अथवा केले का भोग लगाएं। गाय के शुद्ध घी का दीपक और सुगंधित चंदन की धूप प्रज्वलित करें।
संकल्प मंत्र: हाथ में जल, तुलसी पत्र, अक्षत और दक्षिणा लेकर कहें: "हे देवाधिदेव सर्वव्यापक जगत्पति भगवान श्रीमन नारायण! मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अपने अंतःकरण की शुद्धि, समस्त पापों के क्षय, पारिवारिक सुख-शांति, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धि तथा आपकी अनन्य प्रीति की प्राप्ति हेतु आपके पावन अष्टाक्षर महामंत्र 'ॐ नमो नारायणाय' का (१, ३ या ११ माला) जप करने का संकल्प लेता हूँ। मुझ पर अपनी असीम कृपा दृष्टि बनाए रखें।" जल भूमि पर छोड़ दें।
७. आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक एवं सांसारिक लाभ
'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र के नित्य अनुष्ठान से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:
१. परम मानसिक शांति एवं तनाव-चिंताओं से मुक्ति
भगवान नारायण शांति के साक्षात् विग्रह हैं (शान्ताकारं)। इस मंत्र के नियमित जप से मन का भारीपन, अवसाद, अनिद्रा और भविष्य की चिंताएं क्षण भर में शांत हो जाती हैं और चित्त में क्षीरसागर जैसी शीतलता का अनुभव होता है।
२. स्थिर लक्ष्मी एवं पारिवारिक सौहार्द
जहाँ भगवान नारायण का वास होता है, वहाँ माँ महालक्ष्मी बिना बुलाए स्वतः ही स्थिर रूप से निवास करती हैं। घर में होने वाले व्यर्थ के क्लेश, धन की कमी और अशांति समाप्त होकर सुख-समृद्धि की वर्षा होती है।
३. गुरु (बृहस्पति) ग्रह एवं पितृ दोष की शांति
कुंडली में देवगुरु बृहस्पति के पीड़ित होने पर ज्ञान, धन और विवाह में बाधाएं आती हैं। भगवान नारायण की उपासना से गुरु ग्रह परम बलवान होता है और कुल के समस्त पितृ तृप्त होकर साधक को वंश-वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
४. मोक्ष एवं वैकुंठ धाम की प्राप्ति
यह अष्टाक्षर मंत्र साक्षात् मुक्ति-प्रदाता है। साधक के जन्म-जन्मांतरों के संचित कर्म भस्म हो जाते हैं। जीवन के अंत में नारायण-स्मरण से जीव यमलोक के कष्टों से बचकर सीधे परम वैकुंठ धाम में श्री हरि के चरणों में स्थान पाता है।
८. साधना के नियम एवं सावधानियां (Rules & Discipline)
वैष्णव साधना में शुचिता और सात्विकता का सर्वोच्च स्थान है:
- पूर्ण सात्विक आहार: जप काल में मांसाहार, मद्यपान, अंडा, लहसुन और प्याज का पूर्ण त्याग करें। सात्विक और भगवान को भोग लगाया हुआ प्रसाद ही ग्रहण करें।
- तुलसी की मर्यादा: तुलसी माला से जप करते समय माला को कभी अशुद्ध हाथों से न छुएं और न ही उसे पहनकर अशुद्ध स्थानों पर जाएं। जप के उपरांत माला को पूजा स्थल पर स्वच्छ वस्त्र में रखें।
- एकादशी व्रत का पालन: यदि संभव हो तो माह की दोनों एकादशियों का व्रत रखें अथवा चावल व अन्न का त्याग कर फलाहार करें। एकादशी के दिन अष्टाक्षर मंत्र का जप अनंत गुना फल देता है।
- सत्य और दया का आचरण: भगवान नारायण समस्त जीवों में वास करते हैं। अतः किसी भी जीव को न सताएं, परनिंदा, चुगली और झूठ से बचें।