१. जगद्गुरु भगवान श्री कृष्ण एवं 'ॐ क्लीं कृष्णाय नमः' कामबीज मंत्र का स्वरूप
सनातन धर्म में भगवान श्री कृष्ण को केवल एक अवतार नहीं, अपितु स्वयं साक्षात् परिपूर्णतम परब्रह्म माना गया है: 'कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' (श्रीमद्भागवत १.३.२८)। वे प्रेम, आनंद, सौंदर्य, ज्ञान, आकर्षण और मोक्ष के अनन्त महासागर हैं। भगवान श्री कृष्ण के अनेक पावन मंत्रों में 'ॐ क्लीं कृष्णाय नमः' को समस्त तंत्रों, आगमों और पुराणों में 'कामबीज युक्त सम्मोहन एवं आकर्षण महामंत्र' की संज्ञा दी गई है। यह मंत्र साधक के जीवन से संताप, विरह, अवसाद और दरिद्रता को दूर कर परम आनंद और कृष्ण-प्रेम का संचार करता है।
इस मंत्र का प्राण-तत्व 'क्लीं' (Klīṃ) बीज में समाहित है। 'क्लीं' को कामदेव और भगवान श्री कृष्ण का साक्षात् सूक्ष्म ध्वनि-स्वरूप कहा जाता है। यह समस्त जगत को अपनी ओर खींचने वाली दिव्य आकर्षण शक्ति का बीज है। इस बीज के प्रभाव से व्यक्ति के भीतर ऐसी सात्विक चुंबकीय ऊर्जा उत्पन्न होती है कि शत्रु भी उसके मित्र बन जाते हैं और समाज में उसका प्रभाव, सम्मान और आकर्षण सर्वव्यापी हो जाता है।
यह मंत्र केवल सांसारिक आकर्षण तक सीमित नहीं है। इसका सर्वोच्च लक्ष्य है - साधक के हृदय में 'भगवान श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेमाभक्ति' को जाग्रत करना। जब काम (वासना) का रूपांतरण प्रेम (भक्ति) में हो जाता है, तो आत्मा भवसागर के बंधनों से मुक्त होकर गोलोक धाम के नित्य रास में प्रवेश करती है।
२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि
॥ मूल श्री कृष्ण कामबीज मंत्र ॥
ॐ क्लीं कृष्णाय नमः॥
Oṃ Klīṃ Kṛṣṇāya Namaḥ
॥ श्री कृष्ण ध्यान श्लोक ॥
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं,
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलिं,
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥
भावार्थ: जिनके ललाट पर कस्तूरी का दिव्य तिलक शोभायमान है, जिनके वक्षःस्थल पर कौस्तुभ मणि जगमगा रही है, जिनकी नासिका के अग्रभाग पर सुंदर गजमुक्ता सुशोभित है, जिनके करकमल में मधुर मुरली और कंगन हैं, जिनके सर्वांग में सुगंधित हरिचंदन लगा है, कंठ में मोतियों की सुंदर माला है, और जो चारों ओर से गोपियों से घिरे हुए हैं, उन गोपों के मुकुटमणि भगवान श्री कृष्ण की जय हो!
॥ वेणुगोपाल ध्यान ॥
फुल्लेन्दीवरकान्तिमिन्दुवदनं बर्हावतंसप्रियं,
श्रीवत्साङ्कमनर्घ्यरत्नघटितं पीताम्बरं सुन्दरम्।
गोपीनां नयनाभिमर्दनरसं वेणुं क्वणन्तं मुदा,
ध्यायेद्गोकुलनायकं सुललितं वृन्दावनस्थं प्रभुम्॥
भावार्थ: खिले हुए नीलकमल के समान जिनकी श्यामल कांति है, चंद्रमा के समान सुंदर जिनका मुख है, जिन्हें मयूरपिच्छ परम प्रिय है, जो श्रीवत्स चिन्ह और अमूल्य रत्नों से विभूषित हैं, जिन्होंने पीतांबर धारण किया है, जो गोपियों के नयनों को आनंद देने वाली मुरली की मधुर धुन बजा रहे हैं, उन वृन्दावन बिहारी गोकुल नायक प्रभु का मैं ध्यान करता हूँ।
शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'ॐ' का उच्चारण प्रणव नाद से करें। 'क्लीं' का उच्चारण अत्यंत महत्वपूर्ण है - इसमें आधा 'क', आधा 'ल', दीर्घ 'ई' और नासिका से अनुस्वार 'ं' का एक सम्मोहक गुंजन (क्लींग्) निकलता है। 'कृष्णाय' में 'कृ' ऋकार स्वर है, 'ष्ण' मूर्धन्य है (कृष्णाय)। अंत में 'नमः' में विसर्ग का उच्चारण एक कोमल विसर्जन के साथ करें। इस मंत्र को अत्यंत प्रेम, मधुरता और आनंद भाव से जपें।
३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ
इस मंत्र के प्रत्येक पद का गहरा तांत्रिक और दार्शनिक विश्लेषण निम्नलिखित है:
- १. ॐ (प्रणव नाद): ब्रह्मांड का अनाहत नाद, जो समस्त मंत्रों को जाग्रत और सक्रिय करता है।
- २. क्लीं (कामबीज ध्वनि): कामबीज का वर्ण-विभाजन तंत्रशास्त्र (शारदा तिलक) के अनुसार:
- 'क्' वर्ण: साक्षात् भगवान श्री कृष्ण (सर्व-आकर्षक चैतन्य)।
- 'ल्' वर्ण: पराशक्ति, दिव्य प्रेम और इंद्र (ऐश्वर्य)।
- 'ई' स्वर: तुष्टि, संतोष और कामकला (आनंद का अमृत)।
- अनुस्वार (ं - बिन्दु): नादब्रह्म, शून्य और संपूर्ण दुःखों का हरण।
- अतः 'क्लीं' का अर्थ है - 'समस्त सांसारिक कामनाओं को शांत कर परमात्मा के दिव्य प्रेम को अपनी ओर आकर्षित करना।'
- ३. कृष्णाय (सर्व-आकर्षक परमात्मा हेतु): 'कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः। तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते॥' (महाभारत, उद्योगपर्व ७०.५) - 'कृष्' का अर्थ है समस्त जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने वाली सत्ता (सत्य), और 'ण' का अर्थ है परमानंद (आनंद)। सत्य और आनंद के इसी एकाकार रूप को 'कृष्ण' कहा जाता है। 'कृष्णाय' का अर्थ है 'उन परम आनंदस्वरूप श्री कृष्ण के निमित्त'।
- ४. नमः (प्रणाम एवं शरणागति): मैं अपने क्षुद्र अहंता-ममता को त्यागकर भगवान श्री कृष्ण के पावन चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण करता हूँ।
४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं गोपाल तापनी उपनिषद् रहस्य
वैदिक साहित्य में अथर्ववेद के अंतर्गत आने वाला 'गोपाल तापनी उपनिषद्' श्री कृष्ण साधना का मेरुदंड है। इस उपनिषद् में मुनियों ने ब्रह्मा जी से पूछा कि इस संसार का मूल कौन है और किस मंत्र के जप से संसार-सागर से मुक्ति मिलती है? तब ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया:
"स होवाच हैरण्यगर्भः—कृष्णो वै परमं दैवतम्। गोविन्दात् मृत्युरिभेति। गोपीजनवल्लभाय स्वाहा। क्लीं इति बीजम्॥"
- गोपाल तापनी उपनिषद्, पूर्व भाग
उपनिषद् के अनुसार, 'क्लीं' बीज मंत्र की ध्वनि समस्त ब्रह्मांड की इच्छा-शक्ति को संतुलित करती है। जब साधक इस मंत्र का जप करता है, तो उसके हृदय में स्थित 'अनाहत चक्र' जाग्रत होता है। अनाहत चक्र प्रेम और करुणा का केंद्र है। जब अनाहत चक्र पर कृष्ण चेतना का प्रकाश पड़ता है, तो साधक के भीतर से ईर्ष्या, द्वेष, संकीर्णता और भय समाप्त हो जाते हैं और वह समस्त प्राणियों में भगवान श्री कृष्ण का दर्शन करने लगता है।
यह मंत्र मानव जीवन के सबसे बड़े संघर्ष - 'काम' को 'प्रेम' में रूपांतरित करने की कला सिखाता है। काम में व्यक्ति दूसरे से कुछ पाना चाहता है, जबकि प्रेम में व्यक्ति अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है। भगवान कृष्ण उसी अनन्य समर्पण के रसिया हैं।
५. वैदिक एवं पौराणिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण
भगवान श्री कृष्ण की महिमा ऋग्वेद (८.९६.१३-१५), छांदोग्य उपनिषद् (३.१७.६) में देवकीपुत्र कृष्ण के रूप में उल्लिखित है। श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में रासलीला के प्रसंग में इस प्रेम-तत्व का चरम उत्कर्ष दिखाया गया है।
नारद पंचरात्र और ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्ण जन्म खंड) में स्पष्ट विधान है कि जो साधक एकांत में बैठकर तुलसी माला पर 'ॐ क्लीं कृष्णाय नमः' का जप करता है, उसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - चारों की प्राप्ति अनायास ही हो जाती है। चैतन्य चरितामृत में श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस कामबीज मंत्र को गोलोक धाम की सर्वोच्च चाबी बताया है।
॥ श्री सम्मोहन तंत्र एवं वशीकरण का सात्विक रहस्य ॥
श्री सम्मोहन तंत्र और मंत्र महार्णव के अनुसार, 'क्लीं' बीज का प्रयोग किसी दुर्भावनापूर्ण वशीकरण के लिए नहीं, अपितु 'विश्व-मैत्री' और 'सात्विक आकर्षण' हेतु किया जाता है। जब साधक नित्य इस मंत्र का जप करता है, तो उसकी वाणी में माधुर्य, नेत्रों में सौम्यता और आभा में ऐसा सात्विक तेज आ जाता है कि उसके संपर्क में आने वाला कोई भी व्यक्ति स्वतः ही शांत, आदरयुक्त और सहयोगी बन जाता है। पारिवारिक कलह और वैमनस्य को समाप्त करने में यह अत्यंत प्रभावशाली है।
६. संपूर्ण जप विधि, मुहूर्त, माला, दिशा व संकल्प
श्री कृष्ण कामबीज मंत्र के जप की शास्त्रीय एवं सात्विक विधि निम्नलिखित है:
शुभ वार, तिथि एवं समय
बुधवार अथवा गुरुवार का दिन इस साधना का शुभारंभ करने हेतु उत्तम है। तिथियों में श्री कृष्ण जन्माष्टमी, एकादशी, शरद पूर्णिमा और रोहिणी नक्षत्र में किया गया जप तुरंत सिद्ध होता है। समय के लिए ब्रह्ममुहूर्त अथवा रात्रि काल (८ से १० बजे) अत्यंत अनुकूल है।
दिशा, आसन एवं वस्त्र
जप के समय मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें। पीले रंग के ऊन अथवा कुश का आसन बिछाएं। साधक को पीले रंग के स्वच्छ धोती-कुर्ता अथवा सूती वस्त्र धारण करने चाहिए।
जप माला का चयन
भगवान श्री कृष्ण की साधना में तुलसी की माला का प्रयोग ही परम अनिवार्य और सर्वोत्तम माना गया है। यदि तुलसी माला न हो तो चंदन (श्वेत या पीत) अथवा स्फटिक माला का प्रयोग करें। माला को गोमुखी में रखकर अनामिका व कनिष्ठिका के स्पर्श से बचाते हुए अंगूठे व मध्यमा से जपें।
प्रिय भोग एवं अर्पण
भगवान कृष्ण को माखन-मिश्री का भोग सर्वाधिक प्रिय है। इसके अतिरिक्त पंजीरी, पंचामृत, खीर अथवा पेड़ा अर्पित करें। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें। पीले पुष्प (गेंदा), मोरपंख और सुगंधित चंदन अर्पित करें। गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
संकल्प विधि: दाहिने हाथ में जल, तुलसी दल, अक्षत और दक्षिणा लेकर कहें: "हे देवाधिदेव योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण! मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अपनी आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति, दांपत्य माधुर्य, आकर्षण एवं भगवत्-प्रेम की प्राप्ति हेतु आपके पावन मंत्र 'ॐ क्लीं कृष्णाय नमः' का (१, ५ या ११ माला) जप करने का संकल्प लेता हूँ। हे मुरलीधर! मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखें।" जल धरती पर छोड़ दें।
७. आध्यात्मिक, मानसिक, सांसारिक एवं ज्योतिषीय लाभ
'ॐ क्लीं कृष्णाय नमः' मंत्र के नित्य अनुष्ठान से साधक को निम्नलिखित चमत्कारी लाभ प्राप्त होते हैं:
१. दिव्य आकर्षण, व्यक्तित्व विकास एवं सम्मोहन
'क्लीं' बीज के कंपन से साधक के आभामंडल में सात्विक आकर्षण का संचार होता है। साधक की वाणी मधुर और प्रभावशाली बनती है। सामाजिक संबंधों, व्यापारिक वार्ताओं और जन-संपर्क में साधक को सहज सम्मान और सफलता प्राप्त होती है।
२. प्रेम, दांपत्य सुख एवं प्रेम विवाह में सफलता
पति-पत्नी के बीच तनाव और विमुखता को समाप्त कर यह मंत्र प्रगाढ़ प्रेम स्थापित करता है। जो युवक-युवती मनोनुकूल जीवनसाथी अथवा प्रेम विवाह में आ रही पारिवारिक अड़चनों को दूर करना चाहते हैं, उनके लिए यह मंत्र अत्यंत फलदायी है।
३. अवसाद, चिंता एवं मानसिक संतापों से मुक्ति
भगवान कृष्ण आनंद के विग्रह हैं। इस मंत्र का जप मस्तिष्क में डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे सुखद हार्मोन्स को सक्रिय करता है, जिससे घोर निराशा, अकेलापन, ब्रेकअप का तनाव और अनिद्रा की समस्या क्षण भर में शांत हो जाती है।
४. बुध एवं शुक्र ग्रह के दोषों की शांति
ज्योतिष में श्री कृष्ण बुद्धि के कारक बुध और सौंदर्य व प्रेम के कारक शुक्र दोनों के अधिपति हैं। यह मंत्र कुंडली में बुध की जड़ता और शुक्र के काम-दोषों को शांत कर जीवन में कला, विद्या, संगीत, सौंदर्य और धन-समृद्धि की वर्षा करता है।
८. साधना के नियम एवं सावधानियां (Rules & Precautions)
भगवान श्री कृष्ण प्रेम के अवतार हैं, परंतु उनकी साधना में मर्यादा अनिवार्य है:
- वासना और कुदृष्टि का त्याग: 'क्लीं' बीज का जप करते समय मन में कामुकता, वासना या किसी को अनुचित रूप से वश में करने की दुर्भावना नहीं होनी चाहिए। मन को शुद्ध प्रेम और भक्ति में स्थित रखें।
- तुलसी की मर्यादा: तुलसी माला से जप करते समय मांस, मदिरा, नशा, प्याज और लहसुन का सर्वथा त्याग करें। अशुद्ध अवस्था में तुलसी माला को न छुएं।
- गोसेवा का नियम: भगवान कृष्ण 'गोपाल' हैं। इस मंत्र के साधक को यथासंभव गायों की सेवा करनी चाहिए, उन्हें हरा चारा या गुड़-रोटी खिलानी चाहिए। इससे मंत्र का फल तुरंत दृष्टिगोचर होता है।
- राधारानी का स्मरण: कृष्ण भक्ति बिना श्री राधा के अधूरी है। अतः जप से पूर्व 'श्री राधे' का स्मरण करने से भगवान कृष्ण अत्यंत शीघ्र रीझ जाते हैं।