मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता
भगवान चित्रगुप्त का प्राकट्य भगवान ब्रह्मा की काया से हुआ है। जब ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना पूर्ण की, तब यमराज ने उनसे प्रार्थना की कि उन्हें मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने के लिए एक सहायक की आवश्यकता है। तब ब्रह्माजी ने अपनी काया (शरीर) से एक दिव्य पुरुष को उत्पन्न किया, जो 'चित्र' (गुप्त) रूप से समस्त प्राणियों के कर्मों को लिखने में सक्षम थे। इसीलिए उन्हें 'चित्रगुप्त' कहा गया। वे धर्मराज के प्रधान सचिव हैं।
मूल शुद्ध मंत्र
ॐ श्रीं चित्रगुप्ताय नमः।
ॐ नो चित्रगुप्ताय वै यमाय धर्मराजाय नमः।
पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ अत्यंत गहरा है। 'ॐ' परमात्मा का प्रतीक है। 'श्रीं' लक्ष्मी और ऐश्वर्य का बीज मंत्र है। 'चित्रगुप्ताय' का अर्थ है जो गुप्त रूप से हमारे कर्मों को चित्रित करते हैं। 'वै यमाय धर्मराजाय' का अर्थ है कि वे यमराज और धर्मराज के अधीन रहकर न्याय का कार्य करते हैं। भावार्थ यह है कि हे प्रभु, मेरे द्वारा किए गए ज्ञात-अज्ञात पापों को क्षमा करें और मेरे कर्मों को धर्म के अनुकूल बनाएं।
विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक
विनियोग: अस्य श्री चित्रगुप्त मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, चित्रगुप्तो देवता, मम पाप क्षयार्थे जपे विनियोगः। ध्यान श्लोक: 'मसिपात्रं करैर्बिभ्रत् लेखनीं कटिमेखलाम्। चित्रगुप्तं भजे नित्यं धर्मराजस्य सचिवम्॥'
सावधानियां एवं नियम
मंत्र जप के समय मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें। जप के दौरान सात्विक भोजन करें। मांस-मदिरा का पूर्ण त्याग करें। जप के लिए पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करना सर्वोत्तम माना गया है।
विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति
इस मंत्र के नियमित जप से मनुष्य के संचित कर्मों का भार हल्का होता है। यह मंत्र अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है और व्यक्ति को दीर्घायु प्रदान करता है। यमराज के दरबार में व्यक्ति को न्याय और सुरक्षा प्राप्त होती है।