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माँ महालक्ष्मी कृपा · भगवान चित्रगुप्त Mantra

भगवान चित्रगुप्त कर्म फल मंत्र: पाप मुक्ति, आयु वृद्धि और यम भय निवारण

भगवान चित्रगुप्त के शक्तिशाली कर्म फल मंत्र का संपूर्ण विधि-विधान। पाप मुक्ति, आयु वृद्धि और यम भय से मुक्ति के लिए इस मार्गदर्शिका का पालन करें।

इष्ट देव भगवान चित्रगुप्त
शास्त्र स्रोत वैदिक सनातन धर्मग्रंथ एवं संहिता
उत्तम जप समय ब्रह्म मुहूर्त या यम द्वितीया
अनुशंसित माला रुद्राक्ष या स्फटिक माला

मूल संस्कृत महामंत्र

शुद्ध शास्त्रीय पाठ एवं उच्चारण स्वरूप

॥ ॐ तत्सत् · सिद्ध वैदिक महामंत्र ॥
ॐ श्रीं चित्रगुप्ताय नमः। ॐ नो चित्रगुप्ताय वै यमाय धर्मराजाय नमः।
सरल हिंदी भावार्थ:

हे चित्रगुप्त देव, आप धर्मराज के लेखपाल हैं, आपको मेरा नमन है। मेरे समस्त कर्मों को आप धर्म के मार्ग पर प्रतिष्ठित करें।

विस्तृत आध्यात्मिक व्याख्या एवं शास्त्रीय विवेचन

मंत्र का गूढ़ रहस्य एवं साधना विधि

मंत्र का उद्गम एवं ऋषि-छंद-देवता

भगवान चित्रगुप्त का प्राकट्य भगवान ब्रह्मा की काया से हुआ है। जब ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना पूर्ण की, तब यमराज ने उनसे प्रार्थना की कि उन्हें मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने के लिए एक सहायक की आवश्यकता है। तब ब्रह्माजी ने अपनी काया (शरीर) से एक दिव्य पुरुष को उत्पन्न किया, जो 'चित्र' (गुप्त) रूप से समस्त प्राणियों के कर्मों को लिखने में सक्षम थे। इसीलिए उन्हें 'चित्रगुप्त' कहा गया। वे धर्मराज के प्रधान सचिव हैं।

मूल शुद्ध मंत्र

ॐ श्रीं चित्रगुप्ताय नमः।

ॐ नो चित्रगुप्ताय वै यमाय धर्मराजाय नमः।

पद-दर-पद अर्थ एवं भावार्थ

इस मंत्र का अर्थ अत्यंत गहरा है। 'ॐ' परमात्मा का प्रतीक है। 'श्रीं' लक्ष्मी और ऐश्वर्य का बीज मंत्र है। 'चित्रगुप्ताय' का अर्थ है जो गुप्त रूप से हमारे कर्मों को चित्रित करते हैं। 'वै यमाय धर्मराजाय' का अर्थ है कि वे यमराज और धर्मराज के अधीन रहकर न्याय का कार्य करते हैं। भावार्थ यह है कि हे प्रभु, मेरे द्वारा किए गए ज्ञात-अज्ञात पापों को क्षमा करें और मेरे कर्मों को धर्म के अनुकूल बनाएं।

विनियोग, न्यास एवं ध्यान श्लोक

विनियोग: अस्य श्री चित्रगुप्त मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, चित्रगुप्तो देवता, मम पाप क्षयार्थे जपे विनियोगः। ध्यान श्लोक: 'मसिपात्रं करैर्बिभ्रत् लेखनीं कटिमेखलाम्। चित्रगुप्तं भजे नित्यं धर्मराजस्य सचिवम्॥'

सावधानियां एवं नियम

मंत्र जप के समय मन में किसी के प्रति द्वेष न रखें। जप के दौरान सात्विक भोजन करें। मांस-मदिरा का पूर्ण त्याग करें। जप के लिए पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करना सर्वोत्तम माना गया है।

विशिष्ट लाभ एवं फलश्रुति

इस मंत्र के नियमित जप से मनुष्य के संचित कर्मों का भार हल्का होता है। यह मंत्र अकाल मृत्यु के भय को दूर करता है और व्यक्ति को दीर्घायु प्रदान करता है। यमराज के दरबार में व्यक्ति को न्याय और सुरक्षा प्राप्त होती है।

जाप के सिद्ध फल व सावधानियां

पुण्य लाभ एवं साधना के महत्वपूर्ण नियम

प्राप्त होने वाले पुण्य लाभ
पाप मुक्ति, आयु वृद्धि, यम भय निवारण, कर्म शुद्धि
साधना में ध्यान रखने योग्य नियम
सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य का पालन, एकाग्रता

मंत्र से जुड़े मुख्य प्रश्न व समाधान (FAQs)

श्रद्धालुओं द्वारा पूछे जाने वाले सामान्य प्रश्न

इस पावन मंत्र का जप ब्रह्म मुहूर्त या यम द्वितीया में रुद्राक्ष या स्फटिक माला से १०८ बार करना सबसे शुभ व फलदायी माना गया है।
हाँ, मानसिक जप (मानस जप) को शास्त्रों में वाचिक जप से भी अधिक प्रभावशाली और फलदायी माना गया है। इसे आप शांत चित्त होकर कभी भी कर सकते हैं।
नियमित जप से अकाल मृत्यु व नकारात्मकता का भय समाप्त होता है, मानसिक शांति व सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और इष्टदेव की असीम कृपा प्राप्त होती है।
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री

यह लेख वेदों, उपनिषदों एवं सनातन धर्मग्रंथों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा श्रद्धालुओं के मार्गदर्शन हेतु तैयार किया गया है।

मंत्र जप के ५ स्वर्णिम नियम
शुद्धता: स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पवित्र आसन पर बैठें।
दिशा: पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके जप करना सर्वोत्तम है।
माला का नियम: जप करते समय माला पर तर्जनी उंगली का स्पर्श न होने दें।
एकाग्रता: मंत्र के शब्दों के भावार्थ का हृदय में निरंतर ध्यान करें।
नियमितता: प्रतिदिन निश्चित समय और संख्या में जप करने से सिद्धि मिलती है।
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